नॉवेल कोरोना वायरस यानी कोविड-19 से अब तक लाखों लोगों की मौत हो चुकी है और वैश्विक आंकड़ों के अनुसार इसकी चपेट में अब तक साठ लाख से भी अधिक लोग आ चुके हैं. दुनिया भर के वैज्ञानिक कोविड-19 वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए वैक्सीन और दवाइयां बनाने में जी-जान से लगे हुए हैं. हालांकि अब तक विशेषज्ञों का मानना यह है कि कोविड-19 की वैक्सीन बनने में काफी वक्त लग सकता है. नोबेल पुरस्कार विजेता प्रतिरक्षा विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर पीटर डोहर्टी ने एक साक्षात्कार में कहा है कि कोविड-19 की दवा बनने में अपेक्षाकृत कम समय लगना चाहिए क्योंकि दवाओं की सुरक्षा जांच वैक्सीन की अपेक्षा सरल होती है. लेकिन जब तक वैज्ञानिकों द्वारा सुरक्षित और कारगर वैक्सीन या दवा नहीं बना ली जाती, कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव ही उत्तम उपाय है.

इस वैश्विक महामारी से बचने के लिए लॉकडाउन के समय में कोरोना वायरस से जुड़ी हुई जानकारियों की बाढ़ आई हुई है. सोशल मीडिया से लेकर आम-जन की बातचीत में कोरोना संक्रमण से बचने के नुस्खों से जुडी जानकारियों का आदान-प्रदान हो रहा है. इतिहास गवाह है कि महामारियों के समय में लोगों को सही जानकारी न मिल पाना घातक सिद्ध हुआ है. बीएमजे ग्लोबल हेल्थ नामक अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में 14 मई को प्रकाशित एक शोध-पत्र में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार प्रसिद्ध वीडियो प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर कोरोना वायरस से जुड़े विषयों पर बड़ी संख्या में भ्रामक और गलत जानकारियों वाले वीडियोज उपलब्ध हैं.

ओटावा विश्वविद्यालय और ओटावा हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों द्वारा किये गए इस शोध में पाया गया कि यूट्यूब पर कोरोना वायरस से जुड़े विषयों पर सबसे ज्यादा देखे गए वीडियोज में से चौथाई हिस्सा ऐसे वीडियोज का है जिनमें गलत और भ्रामक जानकारियां दी गई हैं. इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि कोरोना वायरस से जुड़े विषयों पर सही और बेहतर जानकारी तमाम सरकारी चैनलों पर उपलब्ध वीडियोज में उपलब्ध थी लेकिन लोगों ने उन्हें बहुत ही कम संख्या में देखा. यह संख्या गलत जानकारी वाले वीडियोज की अपेक्षा न के बराबर थी.

इस रिपोर्ट से कई निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं जिनमें से एक यह भी है कि सरकारों और आधिकारिक संस्थाओं को सूचना देने के नए और रोचक तरीके खोजने चाहिए. इसके अलावा सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे पोर्टल्स पर भ्रामक जानकारी दे रहे वीडियोज और अन्य श्रोतों को चिन्हित करने के और बेहतर तरीके खोजे जाने चाहिए.

महामारियों और आपातकाल जैसी परिस्थितियों में मानव मस्तिष्क सामान्य तौर पर बचने के लिए शॉर्टकट्स तलाशने लगता है. यह एक सामान्य मानव मनोविज्ञान है. इसके उलट ऐसे समय में गंभीर और जिम्मेदार बने रहना अति आवश्यक होता है. विशेष रूप से उन लोगों का जो अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली और चर्चित लेकिन महामारी के कम जानकार हैं. ऐसे लोगों को जनता के बीच कुछ भी कहने से पहले विशेषज्ञों या उचित श्रोतों से परामर्श ज़रूर कर लेना चाहिए.

कुछ समय पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना संक्रमण से बचने के लिए डिसइन्फेक्टेंट यानि निस्संक्रामक के इंजेक्शन लगा लेने की सलाह दे डाली थी. उनके ऐसा करने के बाद अमेरिका में कई लोगों ने डिसइन्फेक्टेंट को इंजेक्शन में भरकर खून की नलिकाओं के ज़रिये अपने शरीर में डाल लिया जिससे उन लोगों की जान खतरे में आ गई. इसके बाद डिसइन्फेक्टेंट बनाने वाली कंपनियों ने आधिकारिक रूप से घोषणा करते हुए कहा कि लोग ऐसा न करें, दुनिया भर के डॉक्टर्स को भी ऐसा न करने की तुरंत सलाह देनी पड़ी.

इसी प्रकार हमारे देश के ही एक राजनेता ने तर्क देते हुए यह कहा कि जब शराब शरीर के बाहर कोरोना को मार सकती है तो अन्दर भी इसे कोरोना वायरस मार देने में सक्षम होना चाहिए. उन्होंने शराब की दुकानें इस तर्क के आधार पर खोलने की अनुमति देने के लिए भी अधिकारियों को पत्र लिखा. इन दोनों मामलों में संक्रमण की प्रक्रिया से सम्बंधित सबसे मामूली तथ्यों को नज़रअंदाज किया गया था.

मानव के शरीर में संक्रमण तभी होता है जब हमारी कोशिकाएं (त्वचा कोशिकाओं के अलावा) वायरस या वैक्टीरिया के संपर्क में आती हैं. इस प्रक्रिया में त्वचा की परत एक किले की दीवार की तरह वायरस से सुरक्षा का काम करती है. सामान्य परिस्थितियों में वायरस त्वचा को भेदकर शरीर के अन्दर नहीं जा पाता. शरीर में संक्रमण के लिए वायरस का हमारे शरीर के उन छिद्रों से अन्दर जाना ज़रूरी होता है, जहां कोशिकाएं लाल मांस के रूप में उपलब्ध होती हैं. इन छिद्रों को त्वचा की ऊंची दीवारों वाले किले के दरवाजों की तरह समझा जा सकता है.

सामान्यतः कोई भी वायरस आंख, नाक, मुंह या मूत्र की नली से ही हमारे शरीर के अन्दर घुस पाता है. इसीलिए वायरस/बैक्टीरिया के संक्रमण से बचने के लिए इन द्वारों को सुरक्षित रखने के लिए कहा जाता है. इसीलिए हम मुंह पर मास्क पहनते हैं, आंखों को बचाने के लिए शील्ड लगाते हैं. एक बार जब वायरस शरीर के इन द्वारों से अन्दर घुस आता है तो हमारे शरीर की कोशिकाओं की पतली सी बाहरी झिल्ली (मेम्ब्रेन) इसे अपने अन्दर आने से रोकने की कोशिश करती है. लेकिन वायरस अक्सर किसी ऐसे चोले में खुद को छिपाकर आते हैं जिसे हमारी कोशिकाओं की झिल्ली अपना समझने की भूल कर बैठती है और इन वायरसों को अन्दर आ जाने की छूट मिल जाती है.

आपने ट्रॉय के युद्ध का ट्रोजन हॉर्स वाला किस्सा तो सुना ही होगा. वायरल संक्रमण यह खेल शायद ठीक ऐसे ही होता है. कोशिका के अन्दर आने के बाद यह वायरस कोशिका की कार्यप्रणाली पर अपना कब्ज़ा ज़माना शुरू कर देता है. इसके बाद यह एक के बाद एक शरीर की सभी कोशिकाओं पर कब्ज़ा करता जाता है, एकदम उपनिवेशवादियों की तरह. जब यह शरीर की अधिकतम कोशिकाओं पर कब्ज़ा करने में सफल हो जाता है तो यह सांस, मल के ज़रिये शरीर के बाहर आना शुरू कर देता है ताकि इसे किसी अन्य के शरीर पर भी कब्ज़ा जमाने का मौका मिल सके. इस प्रकार एक बार वायरस के शरीर में जाने के बाद इसे शराब या डिसइन्फेक्टेंट से नहीं साफ़ किया जा सकता. वायरस को शराब या डिसइन्फेक्टेंट से तब तक साफ़ करना सम्भव होता है जब तक यह हमारी त्वचा पर बैठा है. यानी इस शत्रु को किले के बाहर ही मारना आसान है.

यहां एक बात और बताना ज़रूरी है. कोरोना वायरस के आरएनए ने अपनी सुरक्षा के लिए चारों ओर वसा का कवच पहना होता है और उसके ऊपर वे प्रोटीन अणु चिपके होते हैं जो मानव कोशिकाओं की झिल्ली को धोखा देकर अन्दर घुसने के लिए ज़रूरी होते हैं. हम यह जानते ही हैं कि साबुन से चिकनाई यानी वसा को साफ़ यानी डिग्रेड किया जाता है, इसीलिए बर्तनों की चिकनाई धुलने में साबुन का इस्तेमाल होता है. इसी प्रकार साबुन से कोरोना वायरस के आरएनए के ऊपर चढ़े वसा के कवच को तोड़ दिया जाता है, इसके बाद उसकी शरीर की कोशिकाओं में घुस पाने की सम्भावना कम हो जाती है.

हालांकि यह जानकारी भले ही इतनी आसान लग रही हो मगर इसमें ब्रह्मांड के जटिलतम रहस्य छुपे हैं जिन्हें वैज्ञानिक खोजने की दिन-रात कोशिशें करते रहते हैं. जिन रहस्यों की मदद से अभी दवा और वैक्सीन बनना बाकी है. (मुझे उम्मीद है इस कठिनतम विषय का इतना सरलीकरण करने के लिए मेरे साथी वैज्ञानिक मुझे माफ़ कर देंगे)

यह भी भ्रामक खबर भारत में तेज़ी से फैली है कि सब्जियों और फलों को भी साबुन से धोकर खाने से कोरोना वायरस संक्रमण नहीं होता. इसके बाद तमाम लोगों ने सब्जियां और फल साबुन से धोकर खाना शुरू कर दिया. इससे कई लोगों को तमाम समस्याएं होना शुरू हो गईं. साबुन से सब्जियां धोने से उनके अन्दर साबुन समा जाने की काफी संभावना होती है, सब्जियों या फलों के साथ यह साबुन खा लेने की वज़ह से हमें जानलेवा परेशानियां भी हो सकती हैं. अब डॉक्टर्स और विशेषज्ञों को साबुन से सब्जियां/फल न धोने की सलाह देनी पड़ रही है.

ऐसी भ्रामक जानकारियों की एक लम्बी फेहरिश्त है जो रोज़ सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से हम तक पहुंचती है. ऐसे में हमें सही जानकारियां देने वाले संस्थानों और विशेषज्ञों की पहचान होनी चाहिए, वैश्विक स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद् (आईसीएमआर), वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद (सीएसआईआर), विज्ञान और तकनीकी विभाग (भारत सरकार) के द्वारा दी गई जानकारियां ही भरोसेमंद हैं. कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी के साथ-साथ हमें ‘इन्फोडेमिक’ यानि भ्रामक जानकारियों की मार से बचना भी ज़रूरी है.