पहली जुलाई से अगले छह महीनों तक जर्मनी यूरोपीय संघ की बैठकों की अध्यक्षता करेगा. चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल, बुधवार 27 मई को, अपनी अध्यक्षता के दौरान संघ की भावी विदेशनीति की रूपारेखा बता रही थीं. चीन का नाम उन्होंने सबसे पहले लिया. कहा कि सितंबर के मध्य में जर्मनी के लाइपज़िक शहर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ यूरोपीय संघ की शिखर बैठक होगी. इस बैठक में वे चीन से अपने बाज़ार को यूरोपीय संघ के लिए और अधिक खोलने, जलवायुरक्षा और अफ्रीका की सहायता के लिए साझी रणनीति पर काम करने तथा महामारियों के मामले में पारदर्शिता दिखाने का आग्रह करेंगी. मीडिया में उस दिन सर्वत्र हांगकांग की चर्चा थी, पर मेर्कल ने एक बार भी उसका नाम नहीं लिया.

अगले ही दिन, 28 मई को, चीन की संसद कहलाने वाली ‘राष्ट्रीय जन-कांग्रेस’ के समक्ष एक नया क़ानून बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया. क़ानून का नाम तो होगा ‘चीन का राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून,’ पर काम होगा 1997 में ब्रिटेन से चीन को वापस मिले हांगकांग की वर्तमान स्वायत्तता छीनना. क़रीब शत-प्रतिशत बहुमत के साथ, 29 मई के दिन, यह प्रस्ताव पारित भी हो गया.

चीन की पसंद का क़ानून बनेगा

चीनी संसद ‘राष्ट्रीय जन-कांग्रेस’ की स्थायी समिति अब जल्द ही, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार की पसंद का, एक ऐसा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ गढ़ेगी, जिसे हांगकांग के ‘बेसिक लॉ’ (संविधान) के साथ भी नत्थी कर दिया जायेगा, भले ही वहां की जनता इसे बिल्कुल नहीं चाहती. जनता यदि चाहती होती, तो हांगकांग अपने ‘बेसिक लॉ’ की धारा 23 के अधीन खुद एक ऐसा क़ानून बना कर अपनी सुरक्षा के लिए चीन को अधिकृत कर सकता था.

नये क़ानून में “अलगाववाद,” “आतंकवाद,” और “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे” जैसे कई ऐसे उल्लेख होंगे, जिन्हें गंभीर अपराध बता कर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाइयों का प्रावधान किया जायेगा. जो कुछ चीन की आंख का कांटा हो सकता है, उसे इस क़ानून के दायरे में आता माना जायेगा. यह क़ानून चीन को अपनी पुलिस और सेना हांगकांग में भेजने तथा मनचाहे समय तक वहां तैनात रखने का अधिकार प्रदान करेगा. इस समय ऐसा नहीं है.

180 प्रदर्शनकारी गिरफ़्तार

चीनी जन-कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि हांगकांग के मामलों में “विदेशी या बाहरी शक्तियों की हर प्रकार की दखल का समुचित जवाब” दिया जायेगा. प्रस्ताव पारित होने से पहले उसके विरोध में हांगकांग की सड़कों पर कई उग्र प्रदर्शन हुए. लगभग 180 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया.

स्मरणीय है कि मात्र 1106 वर्ग किलोमाटर बड़ा हांगकांग 1843 से 1997 तक ब्रिटेन का उपनिवेश था. ब्रिटेन के वहां से जाने से पहले उसके और चीन के बीच एक समझौता हुआ था कि चीन अगले 50 वर्षों तक ‘’एक देश, दो प्रणालियों’’ वाले सिद्धांत का पालन करते हुए हांगकांग पर अपनी कम्युनिस्ट शासन प्रणाली नहीं थोपेगा; उसकी स्वायत्तता का आदर करेगा. 74 लाख 51 हज़ार जनसंख्या वाले हांगकांग प्रायद्वीप की जनता का भारी बहुमत ब्रिटेन से विरासत में मिली अपनी राजनैतिक भिन्नता तथा धार्मिक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाये रखना चाहता है. जनसंख्या के लगभग एक-तिहाई के बराबर बौद्ध एवं ईसाई धर्मियों को डर है कि हांगकांग पर नास्तिकतावादी चीन का प्रभुत्व बढ़ने से उनके साथ भेदभाव होगा.

चीन अपने विरुद्ध प्रदर्शनों से कुपित

हांगकांग की जनता को जब भी ऐसा लगता है कि चीन की सरकार उसकी स्वायत्तता को छीनने जा रही है, तब वहां चीन-विरोधी भारी प्रदर्शन होने लगते हैं. पिछले वर्ष कई-कई सप्ताहों तक यहां अब तक के सबसे उग्र प्रदर्शन हुए थे. लाखों लोग सड़कों पर उतर जाया करते थे. चीन की सरकार के तभी से हाथ-पैर फूल रहे हैं कि हांगकांग से प्रेरित होकर चीन की मुख्य भूमि के अप्रसन्न नागरिक भी सरकार-विरोधी प्रदर्शन करने लग सकते हैं.

नये राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के बहाने से चीन हांगकांग में संभावित प्रदर्शनों आदि को आरंभ में ही इस प्रकार कुचल देना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पंगु बना देगा चाहेगा कि चीन की मुख्य भूमि के लोग उनसे कोई प्रेरणा न ले सकें. इसमें सफल होने पर चीन 2047 से पहले ही हांगकांग की स्वयत्तता का अंत कर उसके पूर्णतः चीन में विलय की भी सोच सकता है. उसका समझना है कि दुनिया में अभी ही कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो हांगकांग को पूरी तरह निगल जाने से उसे रोक सके. चीन के पास ऐसा सोचने का कारण भी है.

यूरोपीय संघ ने हाथ उठा दिये

यूरोप और अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया वैश्वीकरण की धुन में चीन पर इतनी निर्भर हो गयी है कि अपना भी नुकसान किये बिना चीन का कुछ बिगाड़ नहीं सकती. लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले पश्चिमी जगत में अमेरिका के बाद 27 देशों का यूरोपीय संघ ही एक ऐसी आर्थिक-राजनैतिक शक्ति माना जाता है, जो चीन को कुछ सिखा-दिखा सकता है. पर उसने तो नये क़ानून के पक्ष में चीनी जन-कांग्रेस के निर्णय के दूसरे ही दिन दोनों हाथ उठा कर आत्मसमर्पण कर अपने आप को कागज़ी शेर सिद्ध कर दिया.

यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रभारी, स्पेन के ख़ोसेप बोरेल ने यूरोपीय विदेश मंत्रियों के साथ एक वीडियो-काऩ्फ्रेन्स के बाद कहा कि चीन का प्रस्तावित क़ानून “गंभीर चिंताजनक” है. तब भी यूरोपीय संघ उसका उत्तर “चीन के विरुद्ध प्रतिबंधों के साथ नहीं देगा... चीन के साथ समस्याओं के हल के लिए प्रतिबंध-आदि सही रास्ता नहीं हैं.” बोरेल ने कहा कि हमारा “लक्ष्य चीन के साथ बातचीत करते रहना और बातचीत के माध्यम से उस की सरकार पर दबाव डालना है.” चीन पर दबाव डालना, और वह भी बातचीत से - ऐसा केवल वही कह सकता है, जो या तो चीन को नहीं जनता या फिर अपने लोगों को बरगला रहा है.

भीगी बिल्ली बना यूरोपीय संघ

स्मरणीय है कि जब बात यूक्रेन के प्रसंग में रूस की या किसी और प्रसंग में किसी दूसरे देश की हो, तब तो यही यूरोपीय संघ शेर बन कर स्वयं प्रतिबंधों की दहाड़ लगाने लगता है. किंतु चीन के प्रसंग में अमेरिका के बहुत क्षुब्ध होते हुए भी, उसकी हां में हमेशा हां मिलाने वाला यूरोपीय संघ, भीगी बिल्ली बन गया है. उसकी सारी नैतिकता चरने चली गयी है. संघ के विदेश नीति प्रभारी बोरेल ने - और जर्मनी के विदेशमंत्री हाइको मास ने भी - कहा कि चीन के साथ सितंबर में जर्मनी में होने जा रहा शिखर सम्मेलन टाला नहीं जायेगा.

जर्मनी में अमेरिका के राजदूत और राष्ट्रपति ट्रम्प के विश्वासपात्र रिचर्ड ग्रेनेल ने यूरोपीय संघ पर तुरंत प्रहार करते हुए अपने ट्वीट में लिखा, “यूरोपीय संघ की चीन के साथ केवल आर्थिक संबंधों में ही दिलचस्पी है... आधिकारिक यूरोप पश्चिम (की एकजुटता) से एक क़दम पीछे हटते हुए पैसे के लोभ में पड़ गया है.”

हांगकांग वालों के लिए ब्रिटेन की नागरिकता

अमेरिका उसी 28 मई की शाम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक बुलाना चाहता था. इसका कड़ा विरोध करते हुए चीन ने उस पर आरोप लगाया कि वह सुरक्षा परिषद को अपना “बंधक बनाना” चाहता है. “सुरक्षा परिषद कोई ऐसा औज़ार नहीं है कि अमेरिका उसका मनचाहा इस्तेमाल करे.” चीनी विदेश मंत्रालय ने उसी दिन ब्रिटेन को भी आड़े हाथों लिया. ब्रिटेन ने कहा था कि वह हांगकांग के लोगों के लिए ब्रिटेन की नागरिकता प्राप्त करना सरल बना देगा.

वैसे तो हांगकांग की स्वायत्तता के बारे में ब्रिटेन और चीन की 1984 की संयुक्त घोषणा तथा बाद के कई समझौतों और क़ानूनों में इस स्वायत्तता की रक्षा के अनेक आश्वासन दिये गये हैं. पर तथ्य यह भी है कि हांगकांग के ‘बेसिक लॉ’ (संविधान) की अंतिम वैध व्याख्या का अधिकार चीन की संसद कहलाने वाली ‘राष्ट्रीय जन-कांग्रेस’ की उसी स्थायी समिति को दिया गया है, जो हांगकांग पर भी लागू होने वाले नये सुरक्षा क़ानून को अब बनायेगी.

चीन के पास है क़ानूनी कुंजी

यह समिति ही तय करती है कि ‘बेसिक लॉ’ के कौन से प्रावधान स्वायत्तता के दायरे में आते हैं और कौन से चीन की केंद्रीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में. यही वह क़ानूनी कुंजी है, जिसे घुमा कर चीन की सरकार किसी भी समय हांगकांग की स्वायत्तता का ताला खोल कर वहां अपनी हेकड़ी चला सकती है. चीन का बनाया राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून अब हांगकांग पर भी थोपना और उसकी स्वायत्तता के पर कतरना इसी कारण चीन के लिए वास्तव में बांए हाथ का खेल बनने जा रहा है, न कि कोई दुस्साहसिक अभियान.

अमेरिका और चीन के बीच टकराव में कागज़ी शेर यूरोपीय संघ पिसना नहीं चाहता. उसके पास चीन के आड़े आने का न तो साहस है और न संकल्प. जर्मनी ही नहीं, चीन की ‘वन रोड, वन बेल्ट’ योजना में शामिल इटली, हंगरी और ग्रीस जैसे यूरोपीय देश भी नहीं चाहते कि यूरोपीय संघ चीन के विरुद्ध ज़बानी जमा-ख़र्च से अधिक कुछ करे. उन्हें अपने यहां चल रही चीनी परियोजनाओं को आंच पहुंचने का डर है. यूरोप से बाहर ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर चीन की आलोचना की है. पर उनके स्वर में भी ऐसा कोई तीखापन नहीं है कि चीन को चिंता करनी पड़े.

चीन से भिड़ना अमेरिका भी नहीं चाहेगा

रहा अमेरिका. वह भी अकेले चने की तरह कौन-सा भाड़ फोड़ लेगा! चीन से भिड़ना वह भी नहीं चाहेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में कहा कि हांगकांग में चीन के बढ़ते हुए हस्तक्षेप के कारण उनका देश हांगकांग को मिले विशेष व्यापारिक दर्जे को अब उचित नहीं समझता. चीन के साथ व्यापार-युद्ध में अमेरिका ने चीन से आने वाले आयातों पर जो दंडात्मक सीमाशुल्क (कस्टम ड्यूटी) लगा रखा है, वह हांगकांग से आने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं पर लागू नहीं होता.

पोम्पेयो के वक्तव्य का यही अर्थ है कि हांगकांग के चीन की मुठ्ठी में कस जाने पर अमेरिका उसे मिली व्यापारिक सुविधा के अंत से अधिक कुछ करने की नहीं सोच रहा है. इस बात से अमेरिका भी इनकार नहीं कर सकता कि हांगकांग चीन का एक हिस्सा है, भले ही उसे कुछ समय के लिए एक स्वायत्तशासी विशेषाधिकार मिला हुआ है. उसके साथ अमेरिका का सीधा व्यापार 67 अरब डॉलर के बराबर है. इस धनराशि को खोने से चीन को ऐसी कोई चोट नहीं पहुंचेगी कि उसके डर से वह हांगकांग पर अपना शिकंजा कसना छोड़ दे. अंत में होगा वही, जो चीन ने सोच रखा है.