देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट कीर्तीश भट्ट अक्सर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कार्टून के अलावा ‘ओफ्फो ग्राफिक्स’ भी पोस्ट करते हैं. इन्फो ग्राफिक्स की तर्ज पर बने इन ग्राफिक्स में देश और समाज से जुड़े मुद्दों पर कुछ व्यंग्यपूर्ण बातें, काल्पनिक आंकड़ों के जरिए कही जाती हैं. हाल ही में उन्होंने कोरोना वायरस के प्रति लोगों के बदलते रवैये की चुगली करता हुआ एक ओफ्फो ग्राफिक्स पोस्ट किया था. यह ग्राफ (नीचे) बड़ी सीधी-सी बात कहता है कि मार्च में जब संक्रमण के मामले सीमित थे तब लोगों में इसका डर कहीं ज्यादा दिख रहा था और अब जून में जब संक्रमणों का आंकड़ा रोजाना नए रिकॉर्ड बना रहा है, लोगों ने इससे डरना कम कर दिया है.

जो बात कीर्तीश अपने ओफ्फो-ग्राफिक्स के जरिए कह रहे हैं, वह बीते कुछ दिनों से कई लोग कहते और समझाते नज़र आ रहे हैं. लॉकडाउन के समय कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या जहां महज 500 थी वहीं इसे खोले जाने के समय यह आंकड़ा दो लाख पहुंचने को था. लेकिन इसके बावजूद मंदिर-मस्जिद जैसे धार्मिक स्थलों से लेकर ऑफिस-दुकान, रेल और विमान सब खुल रहे हैं और लोग, थोड़ी कम संख्या में ही सही पर आते-जाते दिखाई देने लगे हैं. इनमें ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिनका कामकाज दोबारा शुरू हो चुका है, एक बड़ा हिस्सा उनका भी है जो लंबे समय से अटके अपने ज़रूरी कामों को हालात और बिगड़ने से पहले किसी भी तरह से पूरा करने की कोशिश में लगे हुए हैं. और, इनके साथ थोड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो बीते दो महीनों से घर पर बंद रहकर उकता चुके हैं.

भले ही मजबूरी में या मर्जी से, लोगों के बाहर निकलने से यह भी अंदाज़ा मिलता है कि उनमें अब कोरोना वायरस को लेकर डर कम हुआ है. मनोविज्ञानी कहते हैं कि महामारी की शुरूआत में जानकारी का अभाव या अपुष्ट सूचनाओं की बमबारी होने के चलते लोगों में डर और घबराहट ज्यादा देखने को मिल रही थी. यह डर इतना बढ़ा था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को एडवाइजरी जारी कर लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए सचेत रहने की बात कहनी पड़ गयी थी. उस समय इससे जुड़ी एडवाइजरी में यह भी शामिल किया गया था कि किसी भी तरह की ऐसी खबरों, कोरोना वायरस से जुड़ी खबरों को देखने, सुनने और पढ़ने से बचें जो आपको परेशान करती हों.

हालांकि अब भी कोरोना वायरस के संक्रमण की भयावहता, इलाज की अनिश्चितता और शरीर पर होने वाले अनगिनत-अनिश्चित दुष्प्रभावों के चलते वैज्ञानिक तबका इस पर एकराय नहीं हो पाया है. दुनिया के कुछ प्रमुख वायरस वैज्ञानिक यहां तक कहते हैं कि नया कोरोना वायरस इतना बहुरूपिया और छलिया है कि उसके सारे छल-कपटों की कलई खुलने में अभी लंबा समय लग सकता है. लेकिन पूरी तरह से नहींं भी सही तो भी फिलहाल कोरोना वायरस के बारे में कुछ ठोस बातें हमें मालूम हो चुकी हैं. जैसे, यह किस तरह से फैलता है या इससे संक्रमित होने वालों में मरने वालों की दर कितनी है और यह भी कि संक्रमण के शिकार एक बड़े हिस्से के लिए यह साधारण जुकाम-बुखार से ज्यादा कुछ नहीं हैं. इन सब बातों ने डर पर काबू पाने में लोगों की काफी मदद की है.

यह बात मजबूती के साथ इसलिए भी कही जा सकती है क्योंकि महामारियों के जानकार भी कहते हैं कि कोई भी महामारी दो तरह से खत्म होती है, मेडिकली या सोशली. पहले तरीके से यानी मेडिकली कोई महामारी तब खत्म होती है जब उसका टीका या कोई प्रभावशाली इलाज खोज लिया जाता है. जैसे – मीजल्स (खसरा), चेचक या पोलियो के टीके खोजकर उन्हें खत्म कर दिया गया है. वहीं, दूसरे यानी सामाजिक तरीके से कोई बीमारी तब खत्म होती है जब लोगों में उसका डर खत्म होने लगता है. महामारी से उपजी विषम परिस्थितियों में भी लोग बीमारी से डरते और उससे जुड़ी चिंताएं करते-करते थक जाते हैं और उसके साथ जीना सीख लेते हैं. एचआईवी और इबोला इस तरह की बीमारियों के उदाहरण माने जा सकते हैं.

बीमारियों के डर से जुड़ी कुछ इसी तरह की बात, नोएडा में रहने वाले और एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले अनुज गुप्ता भी कहते हैं कि ‘अगर मार्च की तुलना में 400 गुना ज्यादा केस बढ़ चुके हैं तो इसका मतलब है कि कोरोना का खतरा भी इतना ही बढ़ चुका है. लेकिन अब हफ्ते दर हफ्ते फ्रस्ट्रेशन भी इसी रेट से बढ़ रहा है. एक तरफ तो कोरोना के बारे में साइंटिस्ट कोई पक्की बात नहीं कहते हैं वहीं दूसरी तरफ हर कोई ये कहता है कि अब यह हमेशा हमारे साथ रहेगा. अगले छह महीने हमारी 10 परसेंट सैलरी कटने वाली है क्योंकि हम टारगेट्स नहीं अचीव कर पाएंगे. आगे खतरा इस बात का भी है कि टारगेट और घटाए गए तो सैलरी भी और घटा दी जाएगी. कई तरह के नुकसान हैं. कोई कितने दिन घर बैठ सकता है. कभी न कभी तो बाहर निकलना ही है. कुछ मामलों में वैज्ञानिक कह रहे हैं कि एक बार संक्रमण होने पर छह महीने से एक साल के लिए आप इम्यून हो जाते हैं. सरकार भी अब हर्ड इम्यूनिटी के बारे में सोच रही है. कभी-कभी तो लगता है, अब जो होना है, हो-हुआ के खत्म हो.’

अपनी बातचीत में अनुज हर्ड इम्यूनिटी का जिक्र करते हैं, भारत समेत कई देश अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या हर्ड इम्यूनिटी महामारी से निजात पाने का एक विकल्प हो सकता है? किसी समुदाय या जनसमूह में हर्ड इम्यूनिटी होने से मतलब इसके एक बड़े हिस्से - आमतौर पर 70 से 90 फीसदी लोगों - में किसी संक्रामक बीमारी से लड़ने की ताकत विकसित हो जाना है. ये लोग बीमारी के लिए इम्यून हो जाते हैं. जैसे-जैसे इम्यून लोगों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है. इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो इम्यून नहीं हैं. यह अवधारणा हर्ड इम्यूनिटी कहलाती है.

हर्ड इम्यूनिटी पर विचार किए जाने को भी कुछ हद तक महामारियों के सामाजिक तरीके से खत्म होने की शुरूआत से जोड़कर देखा जा सकता है. दूसरी तरह से कहें तो हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचना भी महामारी की समाप्ति ही है. इसे दो तरीकों से हासिल किया जा सकता है. पहला तरीका टीकाकरण (वैक्सीनेशन) है. यानी बीमारी का इलाज खोजा जाए और इससे अधिक से अधिक लोगों के शरीर में ऐसी जैविक व्यवस्था (एंटीबॉडीज) तैयार की जाए कि उन्हें संक्रमण न हो. दूसरा तरीका है, नैचुरल इम्यूनिटी यानी अधिक से अधिक संख्या में लोग बीमारी के शिकार हों ताकि उनके भीतर अपने आप संक्रमण का सामना करने वाले एंटीबॉडीज विकसित हो सकें. इस तरह संक्रमण के शिकार लोग हर्ड इम्यूनिटी का वह बहुसंख्यक हिस्सा बन जाएंगे जो संक्रमण से सुरक्षित रहेंगे और बाकी लोग संक्रमण से बचे रहेंगे. यानी कि ठीक वैसे ही जैसे सामाजिक तौर पर बीमारी का डर खत्म होने पर महामारी खत्म होने की बात हम ऊपर कर चुके हैं. इस स्थिति इलाज उपलब्ध होना कोई ज़रूरी शर्त नहीं है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमकॉम की बढ़ाई कर रही एम अंकिता भी हर्ड इम्यूनिटी की बात करती हैं और कुछ अलग तरह के सवाल करती दिखती हैं. वे कहती हैं कि ‘वैक्सीन जितनी दूर है, उससे तो लगता है कि हर्ड इम्यूनिटी ही आखिरी उपाय बनेगा. सोचकर देखिए दो महीने से हम बंद हैं. और सरकार से कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा है. कोई कुछ भी कहे हमें ये मानना पड़ेगा कि कंट्री में कम्युनिटी स्प्रेड हो चुका है. तो मतलब आज नहीं तो कल हमें इन्फेक्टेड होना ही है. बस अब मुद्दा ये है कि कौन-कब तक, खुद को कोरोना से और अपनी मेंटल सैनिटी को अकेलेपन से बचाए रख सकता है.’ अंकिता यह भी पूछती हैं कि ‘कोई कब तक बंद रहेगा? मान लो साल भर रह गए लेकिन बीमारी तो कंट्रोल हो नहीं रही, जब बाहर निकलेंगे तब क्या होगा? फिर तो खुद ही को कोसेंगे एक साल बंद रह के भी कौन सा तीर मार लिया? और अगर मर गए तो ज़िंदगी का आखिरी एक साल खराब हो जाएगा.’

दुनिया के प्रमुख वायरस वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस के बारे में हम अब भी इतना नहीं जानते कि उसे पर्याप्त कहा जा सके. लेकिन कुछ शोध बताते हैं कि एक बार कोरोना संक्रमित हो जाने वाले लोग कुछ समय के लिए न सिर्फ सार्स कोव-2 से सुरक्षित हो जाते हैं बल्कि कोरोना वायरस की किसी भी किस्म से लड़ने वाली एंटीबॉडीज भी उनमें विकसित हो जाती है. इसके अलावा, कई जगहों पर कोरोना संक्रमण से उबर चुके लोगों के लिए इम्यूनिटी पासपोर्ट और स्वास्थ्य प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर भी विचार किया जा रहा है. ताकि ऐसे लोग काम पर लौट सकें या विदेश यात्राएं कर सकें. इस तरह की खबरें भी लोगों को थोड़ी उम्मीद देती दिखती है. एक स्थापित मीडिया संस्थान में काम करने वाले मुबारक अली कहते हैं कि ‘मुझे कोरोना के बारे में सबसे बुरी बात यही लगती है कि इसके कारण मुझे जबरन घर में बंद कर दिया गया है. ऐसा तब है, जब मैं वीकेंड्स पर भी घर पर ही बैठने वालों में से एक हूं. अगर मुझे अपनी छह साल की बेटी और घर वालों की चिंता न हो और कोई मुझसे कह दे कि तुम्हारी जान नहीं जाएगी या कोई सीवियर डैमेज नहीं होगा तो संक्रमित होकर कुछ महीनों के लिए भी इम्यून हो जाना मुझे फेयर डील लगेगी. बस डर यही है कि कोरोना के मामले में कुछ भी निश्चित नहीं है.’

अगर तथ्यों के साथ हर्ड इम्यूनिटी पर थोड़ी बात और करें तो भारत के मामले में यह विचार उतना व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यहां इतने बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सुविधाएं और संसाधन भी उपलब्ध नहीं है. उदाहरण के लिए पब्लिक हेल्थ पर शोध करने वाले संस्थान सेंटर फॉर डिजीज डायनामिक्स, इकनॉमिक एंड पॉलिसी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल 19 लाख हॉस्पिटल बेड्स हैं. इनमें से केवल 95,000 आईसीयू बेड्स हैं और सिर्फ 48,000 के साथ वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध है. शायद बतौर पत्रकार मुबारक यह बात समझते हैं, इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘हालांकि यह कहना नहीं चाहिए. लेकिन मैंने एकाध बार मजाक में कहा है कि वे लोग लकी थे जिन्हें शुरूआत में यह संक्रमण हो रहा है क्योंकि अभी तक कम से कम अस्पतालों में इतनी अफरा-तफरी नहीं मची है. अगर भविष्य में कभी हमारी बारी आ गई तो जाने तब तक क्या हाल होगा.’ मुबारक का यह कहना यह सोचने पर मजबूर करता है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सुविधाओं की क्या स्थिति हो सकती है. बीती अठारह मई को संक्रमणों की संख्या जहां एक लाख थी, वहीं अगले 15 दिनों में यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो गया था. यहां तक कि अब देश भर से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि मेडिकल स्टाफ का एक बड़ा हिस्सा भी संक्रमण की जद में आने लगा है. ऐसे में अगर कुछ लोगों को लग रहा है कि जो होना है तुरंत हो जाए तो यह उतने आश्चर्य की भी बात नहीं है.

मुबारक अली की तरह ही बड़ोदरा में रहने वाली आईटी प्रोफेशनल संजुक्ता मजूमदार भी भारतीय अस्पतालों पर विश्वास करने की हिम्मत करते हुए डरती हैं. वे कहती हैं, ‘कोरोना से ज्यादा खतरनाक तो मुझे अपने यहां के अस्पताल लगते हैं. मेरी उम्र और अच्छी हेल्थ के चलते हो सकता है कि कोरोना मेरा कुछ ना बिगाड़ पाए पर अस्पताल तो पाताललोक लगते हैं. वो एक वेबसीरीज आई थी न अभी. वही. मैं बहुत चाहती हूं लेकिन जब तक कोई वैक्सीन नहीं बन जाती है, मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलूंगी.’ हालांकि यह कहते हुए वे इस बात का जिक्र करती हैं कि उनके पास ऐसा करने की सुविधा है लेकिन सभी ऐसा नहीं कर सकते हैं.

संजुक्ता की यह बात संगठित-अंसगठित क्षेत्र के उन कामगारों पर पूरी तरह से लागू होती है जो महामारी के दौरान भी किसी तरह खुद को शहरों में टिकाए रख पाने में सफल हुए हैं. सालों पहले नेपाल से दिल्ली रोजगार की तलाश में आईं बिमला घरों में बतौर हाउस-हेल्प काम करती हैं, वे बताती हैं कि ‘कई बंगलों में जहां मैं काम करती थी वहां दो महीने पहले ही मुझे आने से मना कर दिया गया था. बस एक जगह से अब भी मुझे बगैर काम किए पगार मिलती है. उससे किराया भरती हूं और खाने का सामान आ जाता है. दो और घरों में जहां मैं काम करती थी, वो ना काम करने को बुलाते हैं और ना कोई और मदद कर रहे हैं. सब मना करते हैं कि मत जाओ बाहर लेकिन निकले बिना काम कैसे चलेगा?’ अपनी बात खत्म करते हुए बिमला यह भी जोड़ती हैं कि ‘घरों में तो लोग अब पता नहीं कब बुलाएंगे. आगे कोई और रोजी-रोजगार भी खोजना पड़ सकता है.’

फिलहाल इस माहौल में बिमला को कोई दूसरा काम मिलने की संभावना कितनी है, कह पाना मुश्किल है. वह भी तब, जब एमएनसी में काम करने वाले अनुज जैसे लोग भी सैलरी काटे जाने की बात कह रहे हैं. लेकिन इसके जरिए एक बात बहुत पक्के तौर पर कही जा सकती है कि आने वाले समय में बहुत सारे लोगों में कोरोना का डर खत्म होने की वजह उनकी आर्थिक मजबूरियां ही होंगी. इस बात को हाल ही मे हुआ एक सर्वे थोड़ी और मजबूती दे देता है. इसके नतीजे बताते हैं कि कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों की तुलना में भारत में इससे होने वाले आर्थिक नुकसान को लेकर डर कहीं ज्यादा है. लगभग आठ हजार लोगों के सैंपल साइज पर किए गए, इस सर्वे में लगभग 20 फीसदी लोगों ने कोरोना संकट में नौकरी गंवा देने का डर होने की बात कहते हैं. वहीं, 16 फीसदी को लग रहा था कि इससे उपजा आर्थिक संकट उनकी तनख्वाह में कटौती की वजह बन सकता है. आने वाले समय में ये डर कोरोना के डर को खत्म करने की वजह बन सकते हैं.

इस सबके चलते काम पर जाते या सामान्य जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाते लोग अब यह मानकर चल रहे हैं कि मास्क, सफाई और सोशल डिस्टेसिंग जैसी जरूरी सावधानियां रखकर कोरोना वायरस के संक्रमण से काफी हद तक बचा जा सकता है. इसके साथ-साथ अब दो मोर्चों पर लोग कोरोना वायरस से मुकाबले की तैयारी करते दिखाई देने लगे हैं. इनमें से पहला अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को बढ़ाना है ताकि आपका शरीर इससे लड़ाई करने के लिए तैयार हो. और दूसरा इस बात का इंतजाम करना है कि कोरोना वायरस का संक्रमण होते ही इसके लक्षणों को काबू में रखने के हमारे प्रयास भी चालू हो जाएं ताकि ये लक्षण इतने न बिगड़ें कि हमें अस्पताल या आईसीयू में दाखिल होना पड़े. इसके लिए लोग योग-व्यायाम, खान-पान की अच्छी आदतों और कुछ बेहद प्रचलित आयुर्वेदिक उपायों की तरफ कदम बढ़ाते दिख रहे हैं.

कुल मिलाकर, एक तबका अब इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार होता दिखने लगा है कि आज नहीं तो कल उन्हें कोरोना संक्रमण का शिकार होना है. इनमें से कई इस बात की उम्मीद करते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो उन्हें पूरी तरह से नहीं भी सही, कुछ समय के लिए तो इसके डर से आज़ादी मिल ही जाएगी. और, शायद अब सावधानी के अलावा यह हिम्मत ही इस महामारी को हरा सकेगी.