उन्नीसवीं सदी आधी बीतने वाली थी और दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से गुज़र रही थी. कहा जाता है कि उस समय अमेरिका ने एक नहीं बल्कि दो युद्ध लड़े. विश्व युद्ध में अमेरिका ने बड़े स्तर पर तैयारी की थी और उसमें वह जीत भी गया था. लेकिन दूसरा युद्ध ऐसा था जिसमें अमेरिका बहुत बुरी तरह से हार रहा था. उसका दूसरा युद्ध पोलियो से था.

पोलियो भी एक वायरस से फैलता है. वायरस भी इतना अदना कि आदमी की मूंछ के बाल की मोटाई से लगभग दस हज़ार गुना छोटा. यही वायरस आदमी की मूंछों को लांघते हुए मुंह या नाक से शरीर के अन्दर घुस जाता और महामारी का रूप धारण कर लेता.

हालांकि पोलियो का इतिहास काफी पुराना है लेकिन बीसवीं शताब्दी से पहले इंसान इस वायरस के बारे में अधिक नहीं जानता था. प्राचीन मिस्र की सभ्यता में मिली पेंटिंग्स में भी लकवे से ग्रसित पतले पैरों वाले लोगों का चित्रण मिलता है, लेकिन पोलियो वायरस को इरविन पोपर नामक वैज्ञानिक ने पहली बार सन 1909 में कोशिकाओं से अलग किया था. इसके बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक रोजालिंड फ्रेंकलिन ने इस वायरस की संरचना की खोज की. सन 1900 तक पोलियो काफी शांत था मगर इसके बाद यूरोप में यह महामारी बार-बार फैलने लगी. सन 1910 के बाद इस महामारी का प्रकोप फैलना आम बात हो गई. अमेरिका में सन 1940 और 1950 के दशक में यह चरम पर था. इस दौर में हर साल पूरे विश्व में लगभग पांच लाख लोग या तो अपंग हो जाते या मौत के मुंह में चले जाते. यह संख्या उस समय की वैश्विक जनसंख्या के अनुपात में काफी अधिक थी.

सन 1910 के बाद ही पूरे संसार में पोलियो का इलाज खोजने के प्रयास शुरू हो गए. इस बीच तमाम थेरेपी, दवाओं या उपचारों का परीक्षण किया गया. इसी समय वेंटिलेटर का प्रारंभिक संस्करण भी विकसित किया गया जिसे बच्चों को कृत्रिम रूप से सांस लेने में सहायता करने के लिए बनाया गया था. इन प्रयासों ने लोगों की जानें तो बचाई लेकिन पोलियो की महामारी के सामने ये प्रयास बौने साबित हो रहे थे.

समय के साथ जब विज्ञान ने प्रगति की और वायरसों के सम्बन्ध में इंसानी समझ और मजबूत हुई तो पोलियो वायरस की वैक्सीन खोजने के प्रयास शुरू हो गए. फिर भीे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तक पोलियो वैक्सीन बना पाने में सफलता नहीं मिल पायी.

सन 1934 में ‘सिटी कोलेज ऑफ़ न्यूयॉर्क’ का एक लड़का इस अबूझ दुनियां में अपना हिस्सा पाने की चाह में भटक रहा था. पढ़ाई में तेज़ जोनस साक (Jonas Salk) एक वकील बनना चाहते थे लेकिन उनकी मां चाहती थीं कि वे एक डॉक्टर बनें. बीएससी की परीक्षा पास करने के बाद जोनस साक अपनी मां के साथ एक भावनात्मक विवाद में हार गए. एक सफल वकील बनने की चाह वाले लड़के ने मां के कहने पर मेडिसिन की पढाई शुरू कर दी. लेकिन अब वह लड़का कुछ और करना चाहता था. अच्छे अंकों से पास होने के बाद भी, जोनस साक ने अस्पताल में डॉक्टर बनने का विकल्प नहीं चुना. वह लड़का चाहता था कि वह अस्पताल में बैठकर एक-एक मरीज को ठीक करने के बजाय कुछ ऐसा करे कि पूरी दुनिया के मरीजों को उससे मदद पहुंचे. इस तरह की बड़ी इच्छाएं युवावस्था में अक्सर ही कई लोगों के मन में होती हैं लेकिन ज्यादातर लोगों को सही रास्ते नहीं मिलते. जोनस साक भी अस्पताल में डॉक्टरी करने का मौका छोड़कर अपने लिए नए रास्ते तलाशने लगे. इस बीच इस तेज-तर्रार युवा को तमाम भटकाव और लुभावने मौके मिले मगर कहीं उसका मन नहीं लगा.

जोनस साक के सफ़र में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन में थॉमस फ्रांसिस के साथ दो महीने का शोध-कार्य. थॉमस फ्रांसिस ने हाल में ही इस विश्वविद्यालय में नौकरी शुरू की थी. उन्होंने हाल में ही टाइप-बी इन्फ्लुएंजा वायरस की खोज भी की थी. बस इन्हीं दो महीनों में जोनस ने अपनी मंजिल को तय कर लिया.

इसके बाद सन 1947 में जोनस साक ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग में नौकरी शुरू की और यहीं अपनी प्रयोगशाला स्थापित की. यह भी एक संयोग ही है कि नेशनल फ़ाउंडेशन फॉर इन्फेन्टाइल पेरालिसिस के निदेशक हेरी वीवर ने जोनस साक से संपर्क स्थापित किया. उस समय तक वैज्ञानिक पोलियो के तीन प्रकार के वायरसों के बारे में ही जानते थे. हेरी वीवर चाहते थे कि जोनस साक यह जानने की कोशिश करें कि क्या पोलियों के अन्य प्रकार के वायरस भी मौजूद हैं? इस काम के लिए जोनस को उपकरण और आवश्यक धन उपलब्ध कराया गया. बाद में जोनस साक अमेरिकी राष्ट्रपति फेंक्लिन रूसवेल्ट द्वारा चलाये गए पोलियो प्रोजेक्ट में शामिल हो गये. इसी समय जोनस ने पोलियो की वैक्सीन बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया. यह सब बस एक क्रम में होता गया.

उसी समय मेडिकल रिसर्चर अलबर्ट सेबिन भी पोलियो की वैक्सीन बनाने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहे थे. वे पोलियो वायरस को कमजोर बनाकर मुंह से पिलाई जा सकने वाली वैक्सीन बनाना चाहते थे मगर इसमें लगातार असफल हो रहे थे. जोनस साक ने सुरक्षा की दृष्टि से मरे हुए यानी निष्क्रिय पोलियो वायरस के साथ पोलियो वैक्सीन बनानी शुरू की, जिसे इंजेक्शन की सहायता से बच्चों को दिया जा सकता था. अंततः 2 जुलाई 1952 को जानवरों पर सफल प्रयोग के बाद 43 बच्चों को यह वैक्सीन दी गई. सुरक्षित वैक्सीन बनाने के लिए सन 1954 में साक ने दस लाख बच्चों पर अपनी वैक्सीन को टेस्ट किया. इस प्रकार 12 अप्रैल, 1955 को यह घोषणा कर दी गई कि यह वैक्सीन सुरक्षित और कारगर है. इस प्रोजेक्ट के लिए नेशनल फ़ाउंडेशन फॉर इन्फेन्टाइल पेरालिसिस ने खुद को कर्ज में डुबो लिया लेकिन जोनस साक के प्रयोगों को बंद नहीं होने दिया.

पोलियो की सफल वैक्सीन बनते ही जोनस साक एक चर्चित शख्सियत बन गए. उन्होंने करोड़ों बच्चों को अपंग होने या मरने से बचा लिया था. इसके बाद वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के दफ्तरों में हलचलें बढ़ गईं. हर कोई यह बात समझता था कि जिस किसी के पास पोलियो की वैक्सीन का पेटेंट होगा वह मिनटों में अरबपति हो जाएगा. एक दिन जब पत्रकार ने टेलीविजन पर जोनस साक से पूछा, ‘इस वैक्सीन का पेटेंट किस के नाम है?’

जोनस साक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘मेरा जवाब है जनता के पास. इसका कोई पेटेंट नहीं है, क्या कोई सूरज को भी पेटेंट करवा सकता है?’

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जोनस साक का वह साक्षात्कार जिसमें उन्होंने कहा था कि क्या कोई सूरज को भी पेटेंट करवा सकता है.

उस समय ऐसा अंदाज लगाया गया था कि अगर जोनस साक ने इस वैक्सीन का पेटेंट कराया होता तो उन्हें इससे कम से कम सात बिलियन डॉलर मिलते. यह एक अथाह धन होता. मगर जोनस साक चाहते थे कि वैक्सीन का दाम सस्ता रहे ताकि गरीब से गरीब इसका फायदा उठा सके. इसीलिए उन्होंने पोलियो की वैक्सीन को पेटेंट कराने से इनकार कर दिया. जोनस साक के इस बड़प्पन के कारण आज दुनिया के अधिकतम देश पोलियो मुक्त हो चुके हैं. इनमें भारत भी शामिल है.

65 साल बाद विश्व आज फिर एक बार फिर उसी चौराहे पर खड़ा है. कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने की दौड़ में विश्व के सभी समर्थ वैज्ञानिक/कम्पनियां शामिल हैं. दुनिया भर के तमाम अमीरों ने इनमें अपना पैसा लगाया है क्योंकि कोरोना वायरस की वैक्सीन एक अपार मुनाफे का बाज़ार है. अगर इस बाज़ार का अनुमान लगाया जाए, तो हम पायेंगे कि अगर कोरोनावायरस की वैक्सीन का औसत दाम 100 डॉलर भी माना जाए (इबोला की वैक्सीन का दाम 120 डॉलर है) तो आज करीब 500 अरब डॉलर का बाज़ार हाथ फैलाये इस वैक्सीन बनने के इन्तजार में है.

वहीं दूसरी ओर आम जनता एक बार फिर किसी ‘जोनस साक’ को देखना चाहती है जो एक बार फिर मुस्कुराते हुए कह दे - ‘क्या कोई सूरज को भी पेटेंट करवा सकता है?’