कोरोना वायरस के चलते घोषित करीब दो महीने के लॉकडाउन ने बड़ी संख्या में लोगों को बेरोजगार कर दिया है. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार खोकर शहरों से गांव लौटे इन प्रवासियों की एक बड़ी संख्या अब महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा का रुख कर रही है. इनमें ऊंची डिग्रियों वाले युवा भी हैं. मनरेगा के तहत साल भर में कम से कम 100 दिन रोजगार देने का प्रावधान है. इसके तहत तालाब खोदने से लेकर सड़क बनाने तक तमाम काम किए जाते हैं.

कोरोना वायरस ने देश में बेरोजगारी की दर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है. इस समस्या से निपटने के लिए सरकारें जो उपाय अपना रही हैं उनमें मनरेगा का दायरा बढ़ाना भी शामिल है. उत्तर प्रदेश इसका उदाहरण है जहां लॉकडाउन के बाद करीब 30 लाख प्रवासी घरों को लौट आए हैं. यहां योगी आदित्यनाथ सरकार कोशिश कर ही है कि जितना हो सके, ऐसे लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार दिया जाए.

पूरे देश में करीब 14 करोड़ लोगों के पास मनरेगा जॉब कार्ड है. बताया जा रहा है कि इस साल एक अप्रैल के बाद कम से कम 35 लाख लोगों ने इस योजना में शामिल होने के लिए आवेदन किया है. यह संख्या बीते एक दशक में सबसे ज्यादा है जो लॉकडाउन के चलते बढ़ी बेरोजगारी का भी अंदाजा देती है. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक इन सभी लोगों को 100 दिन का रोजगार देने के लिए सरकार को 2.8 लाख करोड़ रु की जरूरत होगी. बीते दिनों घोषित आर्थिक पैकेज में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रु का अतिरिक्त आवंटन करने का ऐलान किया था. इससे पहले बजट में इस योजना के लिए करीब 61 हजार 500 करोड़ रु का आवंटन हुआ था.