‘सारा आकाश’ फ़िल्म की अद्भुत सफलता ने बासुदा (बासु चैटर्जी) को बेहद उत्साहित किया और वे तुरन्त ही कोई दूसरी फ़िल्म बनाने के लिए किसी अच्छी कहानी की तलाश में लग गए. कुछ बांग्ला और हिन्दी की कहानियां पढ़ने के दौरान उनकी नज़र मेरी ‘यही सच है’ कहानी पर गई. उन्होंने शायद उसे दो-तीन बार पढ़ा और उन्हें लगा कि किसी ऐसी ही कहानी की तलाश में वे थे. जब बासुदा ने मेरे सामने इस कहानी पर फ़िल्म बनाने का प्रस्ताव रखा तो मैं तो चकित! इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘सारा आकाश’ पर फ़िल्म बनने के बाद मैं भी चाहती तो यही थी कि मेरी भी किसी कहानी पर फ़िल्म बने पर जब ‘यही सच है’ पर फ़िल्म बनने की बन आई तो मेरे मन में अनेक संदेह और सवाल उठने लगे.

वैसे यह सच है कि छपते ही इस कहानी पर मुझे प्रशंसा तो बहुत मिली...अनेक पत्रिकाओं में इसकी चर्चा हुई और देखते ही देखते यह कई संकलनों में संकलित भी हो गई. इसके बावजूद इसका फ़िल्मांकन मुझे संदेहास्पद लग रहा था. कारण और कुछ नहीं, कहानी की थीम. यह सारी कहानी एक लड़की के मानसिक द्वन्द्व पर आधारित है और इसीलिए लिखते समय भी मैंने इसे डायरी-फ़ॉर्म में ही लिखा था. अपने मन की बेहद निजी बातों को हम डायरी में ही तो लिखते हैं और फिर द्वंद्व भी जिस बात को लेकर था एक लड़की तो उसे केवल डायरी में ही लिख सकती थी.

नायिका दीपा के अपने जिस प्रेमी—निशीथ से कभी के संबंध टूट चुके थे, उसे लेकर उसका मन बेहद कटुता से भरा हुआ था. अपने नए प्रेमी संजय के सामने न तो वह कभी उसका नाम लेना पसंद करती थी और न ही सुनना. संयोग की बात कि इंटरव्यू के सिलसिले में कलकत्ता जाने पर अचानक उसकी मुलाक़ात निशीथ से हो जाती है. इसकी सारी उपेक्षा के बावजूद वह उससे मिलने उसकी मित्र के घर आ जाता है. इंटरव्यू की बात सुनकर वह भरपूर मदद करने का आश्वासन ही नहीं देता, इस काम के लिए ऑफ़िस से एक दिन की छुट्टी भी ले लेता है.

दोनों का रोज़ का मिलना और न चाहते हुए भी अनायास ही दीपा के मन में दोनों प्रेमियों की तुलना चलने लगती है और धीरे-धीरे वह फिर निशीथ की ओर आकृष्ट होने लगती है. इंटरव्यू के बाद वह दोनों सफाई-रूम में कॉफ़ी पीने जाते हैं...रात में लेक के किनारे बैठते हैं. दोनों ओर से भावनाओं का मौन आदान-प्रदान और उसे लगता है कि उसका वास्तविक प्रेम तो इसी से था...आज भी इसी से ही है. किसी ने ठीक ही कहा है कि पहला प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है. कानपुर के लिए रवाना होते समय पहली बार निशीथ उसका हाथ पकड़कर हल्के से दबा देता है तो उसका रोम-रोम सिहर जाता है...उसे लगता है इन दिनों में साथ रहकर भी निशीथ जो नहीं कह पाया, वह सब इस स्पर्श ने कह दिया.

कानपुर लौटकर वह अपने कमरे का दरवाज़ा खोलती है तो यह सूचना देती हुई संजय की एक चिट मिलती है कि वह सप्ताह भर के लिए ऑफ़िस के काम से कटक जा रहा है. पढ़ा तो वह आश्वस्त हुई. दूसरे दिन सवेरे सबसे पहले उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए निशीथ को एक प्रेम-पत्र लिखा और तीसरे दिन से ही उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी. चार दिन बीत गए कोई पत्र नहीं आया, पांचवें दिन नियुक्ति की सूचना और बधाई देते हुए निशीथ का चार पंक्तियों का एक पत्र मिलता है. न कोई प्रेमाभिव्यक्ति और न ही उसके प्रेम की अपेक्षित प्रतिक्रिया. तो क्या यह सब उसका भ्रम ही था? उसका मन एक गहरी हताशा में डूबने लगा.

‘दीप.’ और दरवाज़ा खोलकर ढेर सारे रजनीगंधा के फूलों के साथ मुसकराता हुआ संजय प्रवेश करता है. एक क्षण वह अवाक् सी उसे देखती है और फिर दौड़कर उसे बांहों में भर लेती है. दोनों आलिंगनबद्ध और दीपा को लगता है यह स्पर्श, यह क्षण, यह सुख ही सच है, बाकी सब भ्रम था.

मेरी समस्या थी कि कोई पचास साल पहले लिखी गई इस कहानी की एक मध्यवर्गीय लड़की का दो प्रेमियों के बीच बंटा यह मानसिक द्वंद्व जो उसका इतना निजी और गोपनीय था और उसके मन में ही चलता रहता था क्योंकि सबके बीच उसे व्यक्त करना तो उसके लिए संभव ही नहीं था, बासुदा फ़िल्म में कैसे व्यक्त करेंगे? मेरी समस्या सुनकर बासुदा हंसे और फिर निर्द्वंद्व होकर उन्होंने कहा कि यह सारी समस्या मैं उन पर छोड़ दूं...बस, उन्हें मेरी अनुमति भर चाहिए. मैं तो खुद बहुत उत्सुक थी कि मेरी कहानी पर फ़िल्म बने सो अनुमति मिलते ही बासुदा बम्बई गए और कुछ ही दिनों में इसकी स्क्रिप्ट पर काम करना भी शुरू कर दिया. कुछ दिनों बाद मुझे सूचित किया कि फ़िल्म का नाम ‘रजनीगंधा’ रखा है. मुझे भी यह नाम ज़्यादा आकर्षक ही नहीं, ज़्यादा सटीक भी लगा.

इसके कुछ हिस्से की शूटिंग दिल्ली में भी हुई थी! बड़े उत्साह से हम लोग देखने जाते? विद्या सिन्हा और अमोल पालेकर...बिलकुल नए नाम, शायद पहली बार फ़िल्म में उतरे थे. अंततः फ़िल्म पूरी हुई, मैं बेहद प्रसन्न...पूरी फ़िल्म को पर्दे पर देखने को उत्सुक! थोड़े दिनों बाद सूचना मिली कि इस फ़िल्म को लेनेवाला कोई डिस्ट्रीब्यूटर ही नहीं मिल रहा. दो महीने, चार महीने, छह महीने...फ़िल्म डिब्बों में ही पड़ी है. मैंने सब्र ही नहीं किया बल्कि धीरे-धीरे इस बात को भूलने भी लगी. शुरू में ज़रूर लगा था कि अच्छा होता बासुदा ने एकाध नामी अभिनेता रख लिया होता तो शायद डिस्ट्रीब्यूटर खरीद लेते क्योंकि खरीदते समय वे लोग नाम भी तो देखते होंगे. ख़ैर, इन सब बातों पर बोलने का न तो मुझे कोई अधिकार था, न समझ.

कोई साल भर बाद बासुदा ने बड़े प्रसन्नभाव से बताया कि इसे ताराचन्द बड़जात्या ने खरीद लिया है, शायद बहुत बड़े डिस्ट्रीब्यूटर! और फिर रिलीज़ होने के बाद तो जो कमाल हुआ, उसकी आशा मुझे क्या, बासुदा तक को नहीं थी. इसने केवल सिल्वर जुबली ही नहीं मनाई बल्कि अनेक अवॉर्ड भी जीते. ‘फ़िल्म-फ़ेयर’ के दो अवॉर्ड होते हैं—एक क्रिटिक्स अवॉर्ड (जो हमेशा किसी कलात्मक फ़िल्म को मिलता है) और एक पब्लिक अवॉर्ड (जो किसी अच्छी कमर्शियल फ़िल्म को मिलता है). यह जानकर बहुत-बहुत अच्छा लगा और खुशी हुई कि यह पहली मेरी फ़िल्म है जिसे दोनों अवॉर्ड एक साथ मिले. यानी यह एक अच्छी कलात्मक फ़िल्म भी मानी गई और अच्छी कमर्शियल फ़िल्म भी. जहां तक मेरा खयाल है उसके बाद भी यह सुयोग किसी एक ही फ़िल्म को फिर कभी नहीं मिला.

लोकप्रियता का यह हाल था कि बाज़ारों में रजनीगंधा साड़ी...रजनीगंधा पान-मसाला जैसी कई चीज़ें रजनीगंधा के नाम से चल पड़ीं. ‘फ़िल्म-फ़ेयर’ का एक अंक उस पर ही केंद्रित था. उसमें छपे एक लेख ने जिस बात को रेखांकित किया, उस पर तो आज तक किसी का ध्यान ही नहीं गया था. प्रेम के त्रिकोण की यह पहली ऐसी कहानी है जिसमें उसकी अनिवार्य परिणति किसी खलपात्र की उपस्थिति नदारद है. दर्शक की सहानुभूति तीनों पात्रों के साथ बराबर बनी रहती है. आश्चर्य है कि प्रकाशित होने पर इस पर चर्चाएं तो बहुत छपी थीं, पर इस बात पर तो शायद ही किसी का ध्यान गया था इसलिए किसी ने इसका उल्लेख भी नहीं किया. सोचने पर आज हैरानी तो होती है कि कैसे मैं और सारे आलोचक इस बात से अनभिज्ञ ही रहे. बस, ‘फ़िल्म-फ़ेयर’ के इस लेख ने ही पहली बार कहानी की इस विशेषता की ओर ध्यान खींचा. अब आज तो मुझे न उस लेखक का नाम याद है और न ही फ़िल्म-फ़ेयर का वह अंक मेरे पास सुरक्षित है.

बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी पहली ही फ़िल्म की ऐसी सफलता और लोकप्रियता ने मुझे केवल प्रसन्न ही नहीं किया, बल्कि बेहद गद्गद और उल्लसित भी किया. जब ‘यही सच है’ कहानी लिखी थी तो मैंने कभी इस बात की कल्पना तक नहीं की थी. कहानी पर भी प्रशंसा तो मिली थी पर वह प्रशंसा और लोकप्रियता केवल साहित्यिक जगत तक ही सीमित थी. अब आम जनता के बीच इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय तो केवल और केवल फ़िल्म रजनीगंधा को ही जाता है.