श्रीलंका में नब्बे का दशक लिट्टे के अलावा एक और तमिल विद्रोही संगठन ईपीआरएलएफ (ईलम पीपुल्स रिवॉल्यूशनरी लिबरेशन फ्रंट) की सक्रियता के लिए भी जाना जाता है. इस संगठन की सैन्य शाखा पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) उस समय बेहद चर्चित हुए एलेन अपहरण कांड के पीछे थी. इस समय अमेरिका श्रीलंका के आतंकवाद प्रभावित इलाकों में कई विकास योजनाएं चला रहा था. उसकी खूफिया एजेंसी सीआईए यहां तमिल विद्रोहियों के खिलाफ श्रीलंका सरकार की मदद कर रही थी. इस वजह से तमिल विद्रोही ज्यादातर अमेरिकी नागरिकों को संदेह की नज़र से देखते. ईपीआरएलएफ उस समय अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में था. इसके लिए उसने अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने की एक योजना पर काम शुरू किया.

संगठन ने तय किया कि पीएलए के जरिए कुछ अमेरिकी नागरिकों का अपहरण किया जाए. पीएलए ने जल्दी ही इस योजना को अमलीजामा पहनाते हुए एक अमेरिकी दंपति, स्टेनिली एलेन और मैरी एलेन का अपहरण कर लिया. इन दो अमेरिकी नागरिकों का अपहरण 13 मई, 1984 को किया गया था. इसके तीन दिन बाद ही अमेरिका के उपराष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भारत यात्रा पर आने वाले थे. ईपीआरएलएफ इस अपहरण के जरिए श्रीलंका सरकार से अपने साथियों की रिहाई और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल करना चाहता था.

इस घटना से भारत, श्रीलंका सहित अमेरिकी सरकार में खलबली मच गई. असली संकट भारत के सामने पैदा हुआ क्योंकि ईपीआरएलएफ ने इस दंपति की रिहाई के बदले अपने 20 कार्यकर्ताओं के साथ में पांच करोड़ रुपए की राशि तमिलनाडु सरकार को सौंपने की मांग रखी थी. श्रीलंका सरकार ने तुरंत ही इस मांग पर भारत सरकार से स्पष्टीकरण मांगा. उस समय भारत के विदेशमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने श्रीलंका सरकार को भरसक यह समझाने की कोशिश की कि घटना में तमिलनाडु सरकार का हाथ नहीं है लेकिन दोनों सरकारों के बीच बयानबाज़ी से हालात बिगड़ते गए.

16 तारीख को अमेरिकी उपराष्ट्रपति भारत आने वाले थे और भारत सरकार हर हाल में इस संकट को पहले ही हल करना चाहती थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस स्थिति में हस्तक्षेप करते हुए तुरंत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन को यह मसला सुलझाने को कहा. यह बात उस समय दबी-छिपी नहीं थी कि तमिलनाडु सरकार का श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों पर असर है. यह बात तब और पुख्ता हो गई जब तमिल विद्रोहियों ने मांगे स्वीकार हुए बिना ही अचानक अमेरिकी दंपति को मुक्त कर दिया.

आधिकारिक रूप से इस घटना पर सरकार को कोई बयान नहीं आया. लेकिन मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस अपहरणकांड की साजिश रचने वाला पीएलए का कमांडर, डगलस देवानंद उस समय मद्राहस के होटल में रह रहा था. उसे अमेरिकी सरकार के दबाव में तमिलनाडु पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इसके बाद ईपीआरएलएफ के सदस्यों को अपने कमांडर की रिहाई के बदले अमेरिकी नागरिकों को रिहा करना पड़ा.

इस घटना का सबसे बुरा प्रभाव यह हुआ कि भारत-श्रीलंका के बीच संबेधों में कुछ सालों के लिए बेहद कटुता आ गई और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को गहरा धक्का लगा.