निर्ममता का भूगोल

इन दिनों भारत का नक़्शा अन्तर्विरोध ग्रस्त नज़र आता है. उसमें निर्ममता का भूगोल पसरता-फैलता दीख पड़़ता है तो सम्वेदना और सहायता का भूगोल भी इस क्रूर निर्ममता को बार-बार जहां-तहां अतिक्रमित करता नज़र आता है. लोकतंत्र का अधिकांश तंत्र अद्भुत, अप्रत्याशित और बिलकुल अतार्किक क्रूरता दिखा रहा है. इस हृदयहीनता के विशाल परिसर में रेलगाड़ियां, ग़रीब मज़दूरों आदि को उनकी घरवापसी की कोशिश में, बीसियों की संख्या में अपने लक्ष्यों से लगातार भटककर, कहीं और पहुंचा रही हैं. उनमें यात्रियों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था अपर्याप्त है, लोग संडास का पानी पीने को मजबूर हो रहे हैं.

रेलवे के अधिकारियों ने इस वक़्त तक भटकी और भयानक विलम्ब से चलने वाली गाड़ियों और उनसे हुई मानवीय असुविधा और भयानक कष्ट के लिए न तो माफ़ी मांगी है, न दोषी अधिकारियों को दण्डित किया है. उलटे इसे सामान्य घटना बताया जा रहा है. किसी ऐसी गाड़ी के कहीं रूकने पर जिन मुसलमान भाइयों ने खाना-पानी, बिना किसी भेदभाव के, यात्रियों को दिया, उन्हें उत्तर प्रदेश की पुलिस ने किसी उल्लंघन के अभियोग में गिरफ्तार कर लिया है.

सत्ता क्रूर होने के साथ उद्दण्ड और सर्वथा हृदयहीन हो रही है. किसी स्टेशन पर एक बच्ची अपनी मां को जगाने की कोशिश कर रही थी जबकि वह स्त्री मर चुकी थी. इस करुण दृश्य को देखकर क्या प्रशासन के किसी अंग ने अपनी निष्करुण संवेदनहीनता पर पुनर्विचार किया? नीचता की हद तक जाकर राजनीति इस समय बड़े पैमाने पर अपने साधनहीन असहाय नागरिकों के साथ अन्याय और अत्याचार कर रही है. तंत्र, दुर्भाग्य से, इस कृत्य में, बिना कोई नैतिक संकोच किये, शिरकत कर रहा है. राजनीति की सर्वग्रासिता का इतना अभूतपूर्व विस्तार हुआ है कि अब तंत्र अपनी स्वतंत्रता, न्यायबुद्धि, अधिकार सब उसके हवाले कर चुका है.

इस असभ्य और अमानवीय क्रूरता के, बरक़्स भारतीय नागरिकता का एक ऐसा असंगठित, स्वतःस्फूर्त हिस्सा दूसरे अभागे नागरिकों की, जोखिम उठाकर भी, सहायता कर रहा है. इसमें, सभी धर्मों-जातियों-सम्प्रदायों के नागरिक दोनों ओर शामिल हैं - जो सहायता कर रहे हैं उनमें और जो सहायता पा रहे हैं उनमें भी. भारतीय नागरिकता का यह हिस्सा, सत्ता और न्यायालय उसके साथ कैसा भी दुर्व्यवहार करें, हमारी बुनियादी मानवीयता को जगा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सत्यापित कर रहा है.

असल जनप्रतिनिधि तो वे लोग हैं जो जन की विपत्ति में उसकी मदद करने आगे आ रहे हैं, वे नहीं जो वोट लेकर नोट लेने-जुगाड़ने के दुष्चक्र में फंसे सड़कों पर मदद के लिए आगे आने से कतरा रहे हैं. क्यों देश के हर अंचल में वहां के विधायक, सांसद, पार्षद आदि स्थापित चुने हुए प्रतिनिधि वहां राहत शिविर चला कर अपने सारे साधनों को इस समय लोगों की राहत और मदद में नहीं लगा रहे हैं? क्या लोग, क्या भारत इन तथाकथित प्रतिनिधियों द्वारा अपने ग़रीब बन्धुओं के साथ किये गये विश्वासघात को भूल पायेंगे?

मुश्किल यह है कि विपत्ति में फंसे और कुप्रबन्ध द्वारा फंसा दिये गये लोगों की संख्या करोड़ों में है और उन्हें राहत-मदद पहुंचाने वाले अन्तःकरण के योद्धाओं की संख्या और साधन सीमित हैं. इस कारण भारत में निर्ममता का भूगोल अधिक व्यापक और दुखदायी है. अरुन्धति राय का कहना ठीक है कि राष्ट्र की कल्पना से ग़रीब अदृश्य हो गये हैं. यह कहना मुश्किल है कि अब जब सोशल मीडिया पर मुख्यतः और दूसरे मंचों पर भी ये बदहाल बेराहत ग़रीब लगातार भयावह यन्त्रणा से गुजरते हुए दीख पड़ रहे हैं तो सचाई की ये छवियां हमारी राष्ट्रीय कल्पना में हमेशा के लिए नहीं तो कम-से-कम काफ़ी समय के लिए दाखि़ल हो जायेंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो इस मामले में हस्तक्षेप करना ज़रूरी नहीं समझा और अब दो महीनों बाद, जब लगभग एक करोड़ लोग इतनी मुसीबतें झेलकर घर-गांव पहुँच चुके, हस्तक्षेप कर उन्हें रेल-किराया, शरण और खान-पान देना केन्द्र और राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी बताया है. क्या यह विलंबित न्याय, न्याय न कर पाने के बराबर नहीं है?

परिवर्तन के सन्दर्भ

साहित्य में परिवर्तन को किसी राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन से जोड़कर देखने की एक लोकप्रिय रूढ़ि ही बन गयी है. उदारीकरण, सोवियत संघ का विघटन, बाबरी मसजिद ध्वंस, नवपूंजीवाद का विस्तार, लोकतंत्र का वर्तमान संकोच आदि जो व्यापक परिवर्तन हुए या हो रहे हैं उनका प्रभाव साहित्य पर पड़ना स्वाभाविक है. अकसर तो इन प्रभावों को सामान्यीकृत करके देखा-समझा जाता है और थोड़ा-बहुत किसी कृति-विशेष के विश्लेषण में भी ऐसे सामान्यीकरणों का इस्तेमाल होता है. कुल मिलाकर यह धारणा प्रबल और व्यापक होती रही है कि साहित्य में परिवर्तन स्वयं साहित्य के अपने कारणों से कम बाहरी कारणों से अधिक होते हैं. कई बार तो इस अतिरेक तक आसानी से पहुंचा जाता है मानो साहित्य को अपने से बदलने का कोई हक़ या ज़रूरत ही नहीं है. कई बार इसकी कोई पहचान सक्रिय नहीं होती कि साहित्य में कुछ परिवर्तन, कुछ रूझान, किसी सामाजिक-राजनैतिक वृत्ति के कारण नहीं साहित्यिक कारणों से भी होते हैं.

किसी भी लेखक को, अपने समय की, मुक्तिबोध के शब्दों में, जड़ीभूत सौन्दर्याभिरूचि खोजने-चरितार्थ करने का उचित उत्साह हो सकता है. दूसरे शब्दों में, साहित्य में परिवर्तन लाने के लिए लेखक को हमेशा साहित्य से बाहर हो रहे परिवर्तन का मुंह जोहना या प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती. कई बार ऐसा हुआ है कि साहित्य को परिवर्तन का, जो समाज या सचाई में होने जा रहा है या भविष्य में अवश्यम्भावी है, पूर्वाभास होता है. मुक्तिबोध की क्लैसिक कविता ‘अंधेरे में’ को, इस सन्दर्भ में, याद किया जा सकता है. यह कविता आश्चर्यजनक रूप से आपातकाल और हमारे आज के कुसमय का विलक्षण पूर्वाभास है. वह अपने लिखे-छपे जाने के समय जितनी प्रासंगिक थी, उससे कहीं अधिक प्रासंगिक आज लगती है. ज़ाहिर है कि यह सौन्दर्याभिरूचि सामाजिक और अन्य तत्वों को हिसाब में लेकर ही बनती, विकसित होती है. सौन्दर्य और संघर्ष को परस्पर विलोम की तरह देखना-बरतना साहित्य रचने और उसे पढ़ने-गुनने की निहायत भोंथरी समझ का प्रमाण है. शमशेर ने यों ही नहीं कहा था: ‘शब्द का परिष्कार स्वयं दिशा है.’ कई बार यह देखकर बहुत खेद होता है कि हम जितना महत्व सामाजिक यथार्थ को देते हैं इतना शब्द को नहीं. शब्द भी यथार्थ हैं, उनके बिना कोई भी यथार्थ हम विन्यस्त नहीं कर सकते.

बैठि कबीरा जीम

पिछले दो महीनों में विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के लोगों ने जिस तरह से जोखिम उठाकर भी, ख़ासकर देश की अनेक सड़कों पर ग़रीब मज़दूरों आदि को राहत और खान-पान की मदद की है उसे देखकर कबीर की एक साखी याद आयी:

काबा फिर कासी भया, रामहि भया रहीम.

मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम..

भारत की साधारण अज्ञातनाम नागरिकता ने अपने व्यवहार से उम्मीद का, निर्ममता के बरक़्स, एक नया आख्यान रचा है. यह आख्यान हमारे समय में, बहुत अभागे और निष्करुण सत्ता-समय में, कबीर का सिर्फ़ शब्द में नहीं कर्म में पुनराख्यान है.