क़रीब तीन साल हुए. तब गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए हुए चुनाव ने देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया था. उस चुनाव में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार और पार्टी के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल भी मैदान में थे और उन्हीं की वजह से ये चुनाव चर्चाओं में आया था. बड़ी राजनीतिक उठापटक के बाद ही पटेल इस चुनाव को जीत पाए थे. अब गुजरात में एक बार फिर वही स्थिति बनती नज़र आ रही है. इस बार कांग्रेस ने गुजरात से ही आने वाले पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता व बिहार प्रभारी का पद संभाल रहे शक्ति सिंह गोहिल और गुजरात में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके भरत सिंह सोलंकी को अपना उम्मीदवार बनाया है.

कुछ महीने पहले तक विश्लेषकों का अनुमान था कि चार राज्यसभा सीटों के इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दो-दो सीटों के साथ बराबरी पर रहेंगी. तब गुजरात विधानसभा का गणित भी इस बात का समर्थन करता था. उस समय प्रदेश के 180 विधायकों में से 103 विधायक भारतीय जनता पार्टी से आते थे और 73 कांग्रेस से. इनके अलावा गुजरात में दो विधायक भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के हैं, एक नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के और एक जिग्नेश मेवानी निर्दलीय हैं. अब तक ये सभी कांग्रेस को समर्थन देते आए हैं. जबकि गुजरात में एक राज्यसभा उम्मीदवार को जीतने के लिए 37 विधायकों के मत की ज़रूरत थी. यानी तब कांग्रेस के पास उसके दोनों प्रत्याशियों की जीत के लिए आवश्यक 74 से तीन ज़्यादा विधायकों का समर्थन तय माना जा रहा था. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है.

मार्च में होने वाले इन चुनावों को कोरोना वायरस के चलते 19 जून तक के लिए स्थगित कर दिया गया था. लेकिन लॉकडाउन से पहले ही कांग्रेस के पांच विधायकों ने पार्टी का हाथ छोड़ दिया और लॉकडाउन खुलने के बाद तीन अन्य ने. इस तरह कांग्रेस के पास अब सिर्फ़ 65 विधायक बचे हैं. वहीं, आठ विधायकों के इस्तीफ़े के बाद गुजरात विधानसभा में 172 सदस्य रह गए हैं. राज्यसभा चुनाव की गणित के मुताबिक़ अब गुजरात में एक उम्मीदवार को जीतने के लिए केवल 35 मतों की आवश्यकता है. लेकिन कांग्रेस के पास इस समय एनसीपी, बीटीपी और जिग्नेश मेवानी को मिलाकर भी अधिकतम 69 विधायकों का ही समर्थन है जो कि उसके दो प्रत्याशियों को जिताने के लिए आवश्यक 70 मतों से एक कम है.

फ़िर इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि प्रदेश में एनसीपी के इकलौते विधायक कंधाल जडेजा भी नए समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस के बजाय भारतीय जनता पार्टी को अपना समर्थन दे सकते हैं. सूत्रों की मानें तो जडेजा ख़ुद भी इस बात का इशारा दे चुके हैं. हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की सहयोगी एनसीपी ने जडेजा को ऐसा करने से रोकने के लिए व्हिप जारी कर दिया है. वहीं, बीते लोकसभा चुनाव में अपने साथ गठबंधन न करने की वजह से बीटीपी प्रमुख छोटू भाई वसावा भी कांग्रेस से नाख़ुश बताए जाते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि गुजरात में कांग्रेस प्रबंधन, नेतृत्व और अनुशासन के मामले में कितनी कमज़ोर है. बीते कुछ सालों में यह पहली बार नहीं है जब पार्टी के विधायकों ने उसे अपनी सबसे ज़्यादा ज़रूरत के वक़्त दगा दिया है. जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के बाद गुजरात में कांग्रेस को अतिरिक्त ऐहतियात बरतने की ज़रूरत थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वहीं, भाजपा अभय भारद्वाज और रमीवा बेन बारा के अलावा नरहरि अमीन की शक्ल में तीसरा राज्यसभा उम्मीदवार उतार कर पहले ही अपने इरादे ज़ाहिर कर चुकी थी. अगर ऐसा न होता तो उसे अपने विधायकों की संख्या के लिहाज़ से सिर्फ दो ही प्रत्याशी उतारने चाहिए थे. लेकिन कांग्रेस इस खुली चेतावनी के बाद भी अपने विधायकों को संभाल पाने में नाकाम रही.

हालांकि कांग्रेस के विधायक नौशाद सोलंकी इस बात को स्वीकार नहीं करते कि पार्टी नेतृत्व ने विधायकों को संभालने में कोई कसर छोड़ी थी. सत्याग्रह से हुई बातचीत में वे कहते हैं, ‘संगठन ज़मीन से जुड़े नेताओं को चुनाव में मौका दे सकता है. उनकी जीत के लिए जी-जान एक कर सकता है. लेकिन ये तो संभव नहीं कि उनके विधायक बनने के बाद उन्हें ख़ुद से जोड़े रखने के लिए उनकी हर ग़ैरवाज़िब मांग को मानता रहे.’ यहां सोलंकी का इशारा आर्थिक मांग से भी है.

वे आगे जोड़ते हैं, ‘पहले जब ऐसा होता था तो लोग और मीडिया उस राजनैतिक दल को कटघरे में खड़ा कर देते थे जो विपक्षी नेताओं को इस तरह लालच देकर तोड़ने का काम करते थे. लेकिन मौज़ूदा दौर में भारतीय जनता पार्टी एक ख़तरनाक किस्म के राजनीतिक भ्रष्टाचार को अस्तित्व में ले आई है. इसके लिए वह सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने से भी नहीं चूकती. लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोई भी उससे इस बारे में सवाल पूछने के लिए तैयार नहीं है.’

बकौल सोलंकी, ‘देश में लोग कोरोना से मर रहे हैं. लेकिन भाजपा इतनी निर्लज्ज है कि उसे विधायकों की ख़रीद-फरोख़्त के सिवाय कुछ और नहीं दिखता है. यदि वह इस पैसे का इस्तेमाल प्रवासी मज़दूरों को उनके घर पहुंचाने और उनके लिए भोजन व स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने में करती तो सड़कों पर मांओं और बच्चों की लाशें देखने को नहीं मिलती. कोरोना संक्रमण के मामले में गुजरात देश में तीसरे पायदान पर पहुंच गया है. लेकिन भाजपा को उसकी फ़िक्र नहीं है. उसे सिर्फ़ अपनी राजनीतिक रोटियां सेकनी हैं. इससे ज़्यादा वीभत्स और क्या हो सकता है!’

लेकिन विश्लेषकों की राय में, चाहे कोई कुछ भी कहे पर, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि गुजरात में अपनी दुर्दशा के लिए कांग्रेस ख़ुद ही जिम्मेदार है. दरअसल गुजरात उन राज्यों में शुमार हैं जहां कांग्रेस के अंदर सबसे ज़्यादा खींचतान की स्थिति बनी हुई है. ये राज्यसभा चुनाव भी इससे अछूते नहीं. कांग्रेस इन चुनावों के लिए शक्ति सिंह गोहिल के साथ तीन बार सांसद रह चुके राजीव शुक्ला पर दांव आजमाने का मन बना चुकी थी. लेकिन पार्टी का एक धड़ा खुलकर इसके विरोध में आ गया. ये गुट भरतसिंह सोलंकी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अर्जुन मोडवाड़िया को टिकट दिलवाना चाहता था.

चूंकि तब मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की वजह से लगा झटका नया ही था इसलिए कांग्रेस गुजरात में फूंक-फूंक कर क़दम रखना चाहती थी. नतीजतन उसने राजीव शुक्ला की बजाय भरतसिंह सोलंकी का नाम ही आगे बढ़ा दिया. लेकिन गुजरात में अपने नेताओं को बांधे रखने की कांग्रेस की यह कवायद हाल-फिलहाल किसी काम आती नहीं दिख रही है.

दरअसल, गुजरात कांग्रेस पर अहमद पटेल का प्रभाव किसी से नहीं छिपा है. लेकिन भरत सिंह सोलंकी उन नेताओं में शुमार हैं जो पटेल की आंखों में आंखें डालने की कुव्वत रखते हैं. प्रदेश कांग्रेस से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस वजह से गुजरात में पटेल समर्थक कांग्रेसी नेता भरत सिंह सोलंकी को कमज़ोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. अहमदाबाद स्थित गुजरात कांग्रेस कमेटी के कार्यालय यानी राजीव गांधी भवन में दबी आवाज़ में यह चर्चा भी सुनी जा सकती है कि बीते आम चुनाव में भरत सिंह सोलंकी की हार के पीछे भी यही सबसे बड़ी वजह रही थी. कहा तो यह तक जा रहा है कि यदि कांग्रेस हाईकमान चाहता तो इन आठ विधायकों में से कुछ को जाने से रोक सकता था. लेकिन उसने ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. यहां हाईकमान से कुछ नेताओं का इशारा अहमद पटेल की तरफ़ ही है.

भरत सिंह सोलंकी की प्रदेश संगठन के भी कुछ कद्दावर नेताओं से तनातनी की ख़बरें किसी से छिपी नहीं हैं. इनमें गुजरात में कांग्रेस पक्ष के नेता/नेता प्रतिपक्ष परेश धनाणी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि सोलंकी को राज्यसभा चुनाव का टिकट मिलने से पार्टी के कुछ और विधायक बाग़ी रुख अपना सकते हैं. फ़िर, उनके पिता और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी का राजनीतिक इतिहास भी रह-रहकर भरत सिंह के आड़े आता रहा है. माधव सिंह 1980 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे और तभी से उन्होंने सूबे में बेहद प्रभावशाली पाटीदार समुदाय को दरकिनार करना शुरु कर दिया था.

तत्कालीन राजनैतिक हालात देखते हुए माधव सिंह सोलंकी ने 1981 में बक्शी आयोग की सिफारिश पर 86 जातियों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला करते हुए ‘खाम’ (केएचएएम) सिद्धांत दिया. इसमें ‘के’ का मतलब क्षत्रियों से था, ‘एच’ का हरिजनों से, ‘ए’ यानी आदिवासी और ‘एम’ मुसलमान. पाटीदारों को इससे बाहर रखा गया. इसके बाद जो कसर बची थी वह सोलंकी ने अपने मंत्रिमंडल में किसी पाटीदार नेता को शामिल न करके पूरी कर दी थी.

इसके बाद अपने दूसरे कार्यकाल (1985-90) में माधव सिंह सोलंकी ने सार्वजनिक मंचों से पाटीदारों के खिलाफ ऐसी कई बातें कहीं जिन्होंने समुदाय में भयंकर आक्रोश भर दिया. इसके बाद नाराज पटेल राज्यव्यापी आंदोलन पर उतर आए जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए. कई लोगों का कहना है कि आरक्षण के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन को बाद में कुछ फिरकापरस्त लोगों ने पहले पाटीदार-ओबीसी और बाद में हिंदू-मुसलमान दंगों की शक्ल दे दी.

माना जाता है कि पाटीदारों की नाराज़गी के चलते ही कांग्रेस 1990 के बाद से अब तक गुजरात में सत्ता की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाई हैं. और शायद यही कारण था कि 2017 के विधानसभा चुनावों में सोलंकी हाईकमान के इशारे पर चुनावी दंगल में नहीं उतरे थे. तब आरक्षण आंदोलन और हार्दिक पटेल की वजह से पाटीदारों का झुकाव वर्षों बाद कांग्रेस की तरफ़ देखा गया था. ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि कांग्रेस से जुड़े पाटीदार विधायक भरत सिंह सोलंकी की दावेदारी से कितने ख़ुश हैं. ग़ौरतलब है कि जो आठ विधायक कांग्रेस को छोड़ गए हैं उनमें से तीन पाटीदार समुदाय से ही आते हैं.

सूत्रों की मानें तो शक्ति सिंह गोहिल को कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने राज्यसभा चुनाव में फर्स्ट रेफरेंस दिया है. इसका मतलब है कि कांग्रेस के पहले 35 विधायक गोहिल को मतदान में वरीयता देकर उनका रास्ता साफ कर देंगे. यदि ऐसा हुआ तो सोलंकी का मामला फंस जाएगा. कुछ ऐसी ही स्थिति दूसरी तरफ़ भाजपा के नरहरि अमीन की भी होगी. ऐसे में इन दोनों नेताओं के बीच सीधा मुक़ाबला होगा.

चूंकि राज्यसभा चुनाव दूसरे चुनावों से अलग होता है और इसके अगले चरण भी थोड़े जटिल होते हैं. इसलिए इन दोनों की ही कोशिश रहेगी कि पहले चरण में ही आवश्यक मत हासिल कर लिए जाएं. ऐसे में कयासों का बाज़ार गर्म है कि आने वाले कुछ दिनों में गुजरात में कुछ और विधायक इधर-उधर हो सकते हैं. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत इस बारे में हम से कहते हैं कि ‘राजनीति संभावनाओं का खेल है और भरत सिंह सोलंकी इस खेल में अनुभवी भी हैं और हर तरह से सक्षम भी. वे आख़िरी वक़्त में भी चौंका सकते हैं.’

गुजरात मामलों के कांग्रेस प्रभारी राजीव सातव का इस बारे में कहना है कि, ‘हमें दूसरी सीट जीतने के लिए सिर्फ़ एक वोट की जरूरत है. हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे हैं. जैसे हमने अहमद पटेल वाला चुनाव जीता था. इस चुनाव को भी हम वैसे ही जीतेंगे.’ जानकारों का मानना है कि यदि किसी कारण से भाजपा के कुछ विधायक मतदान के लिए न पहुंचें तो भरत सिंह सोलंकी की राह आसान हो सकती है. लेकिन ऐसा होने की संभावना काफी कम है.

गुजरात कांग्रेस से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र भी नाम न छापने की शर्त के साथ हमें बताते हैं, ‘किसी विशेष परिस्थिति को छोड़कर इस बात में कोई तुक नज़र नहीं आता कि भारतीय जनता पार्टी का कोई विधायक कांग्रेस में शामिल होगा. ऐसे में यदि भरत सिंह सोलंकी अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं तो उन्हें शक्ति सिंह गोहिल के ही समर्थक विधायकों में सेंधमारी करनी पड़ेगी.’ इसके साथ ही ये वरिष्ठ नेता जोर देकर दोहराते हैं कि ‘उस हालत में सोलंकी और उन्हें वरीयता क्रम में ऊपर रखने वाले विधायकों को पार्टी आलाकमान की नाराज़गी झेलने का ख़तरा मोल लेना पड़ेगा.’ यदि उनकी इस बात को सही मानें तो कांग्रेस के सामने अपने विधायकों को भाजपा से बचाए रखने के साथ-साथ अपने ही नेताओं से बचाने और उऩकी आपसी सिर-फुटव्वल को रोकने की चुनौती भी है.

प्रदेश के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार का इस बारे में कहना है, ‘इस समय गुजरात कांग्रेस चाहती तो कोरोना से निपटने में बहुत बुरा प्रदर्शन कर रही गुजरात की विजय रुपानी सरकार को आड़े हाथों ले सकती थी. यह मौका था जब गुजरात मॉडल के मिथक को ढहाकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बैकफुट पर लाया जा सकता था. लेकिन हमेशा की तरह इस महत्वपूर्ण समय में भी पार्टी की पूरी ऊर्जा ख़ुद से ही उलझने और निपटने में खर्च हो रही है. किसी संगठन के पतन के लिए इससे ज्यादा और क्या चाहिए होगा!’