आगामी राज्यसभा चुनाव के चलते राजस्थान की राजधानी जयपुर में बड़ी राजनीतिक गहमागहमी चल रही है. दरअसल अन्य कुछ राज्यों की तरह राजस्थान में भी 19 जून को तीन सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव होना है. इस चुनाव में कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल और प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री नीरज डांगी को मैदान में उतारा है तो दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के पूर्व मंत्री राजेंद्र गहलोत और ओंकार सिंह लखावात पर दांव खेला है. प्रदेश में विधायकों की कुल संख्या 200 है और इस हिसाब से इन उम्मीदवारों में से प्रत्येक को जीत के लिए 51 मतों की ज़रूरत है.

यदि विधानसभा की गणित को देखें तो इन में से दो सीटें कांग्रेस और एक सीट भारतीय जनता पार्टी की झोली में जाती दिख रही है. क्योंकि राजस्थान में 107 विधायक सत्ताधारी दल कांग्रेस से आते हैं. इनमें बहुजन समाज पार्टी के छह विधायक भी शामिल हैं जो पिछले साल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इनके अलावा राज्य के 13 निर्दलीय, भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के दो, सीपीएम के दो और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के एक विधायक का भी समर्थन प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार को हासिल है. इस तरह कांग्रेस के पास उसके दोनों उम्मीदवारों की जीत के लिए आवश्यक 102 मतों से 23 मत ज़्यादा है.

वहीं भाजपा की बात करें तो राजस्थान में उसके पास 72 विधायक हैं और उसे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के तीन और विधायकों का समर्थन हासिल है जो कि उसके एक उम्मीदवार की जीत के लिए पर्याप्त थे. लेकिन आख़िरी समय पर पार्टी ने ओंकार सिंह लखावत की शक़्ल में दूसरा उम्मीदवार खड़ा कर सभी को चौंका दिया. क्योंकि दो प्रत्याशियों की जीत के लिए भाजपा को 102 मतों की ज़रूरत होगी जो कि उसके मौजूदा मतों से 27 ज़्यादा है.

फ़िर अचानक चर्चाओं का बाज़ार गर्म हुआ कि भारतीय जनता पार्टी गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और गुजरात की ही तरह राजस्थान में भी कांग्रेस और उसके समर्थक विधायकों में बड़े स्तर पर सेंधमारी कर सकती है. और इसका असल निशाना राज्यसभा चुनाव नहीं बल्कि सत्ता परिवर्तन होगा. इन कयासों को तब और हवा मिल गई जब राजस्थान में कुछ कांग्रेसी और निर्दलीय विधायकों ने भाजपा पर उन्हें करोड़ों रुपए का प्रलोभन देने का आरोप लगाया.

ऐसी बातें सामने आते ही मुख्यमंत्री गहलोत एकदम से सक्रिय हो गए. उन्होंने भी दावा किया कि उनके कुछ विधायकों को 25 करोड़ रुपये तक की पेशकश की गई है और इस ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए अरबों रुपए जयपुर पहुंच चुके हैं. राजस्थान में कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को एक पत्र लिखकर कहा कि उनकी पार्टी के विधायकों को लालच देकर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है.

एहतियातन गहलोत ने अपने सभी विधायकों को बुधवार रात अपने निवास पर खाने पर बुलाया और वहीं से उन्हें जयपुर के ही एक रिज़ॉर्ट में भेज दिया गया. मौके की नजाकत समझते हुए केसी वेणुगोपाल, राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडेय, सहप्रभारी विवेक बंसल और राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला भी तुरत-फुरत जयपुर पहुंच गए.

यहां ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि इस पूरे घटनाक्रम वाले दिन यानी बुधवार को ही राजस्थान सरकार ने राज्य की सीमाओं को नियंत्रित करने का आदेश दिया था. इसके ज़रिए प्रशासन को प्रत्येक वाहन की तलाशी लेने का अधिकार दे दिया गया. शुरुआत में इस फैसले के लिए प्रदेश में लगातार बढ़ रहे कोरोना संक्रमण का हवाला दिया गया. लेकिन शाम होते-होते चर्चा होने लगी कि मुख्यमंत्री गहलोत ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि राज्य से कोई भी विधायक सड़कमार्ग से बाहर न जा सके. और न ही कोई राजनीतिक तौर पर संदिग्ध व्यक्ति प्रदेश में प्रवेश कर सके.

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर चर्चा करते हुए कांग्रेस के सहप्रभारी विवेक बंसल सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘राजस्थान में पार्टी और सभी समर्थक विधायक एकजुट हैं. राज्यसभा चुनाव में हमारे दोनों उम्मीदवारों की जीत तय है और सरकार को किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है.’ कांग्रेस के दूसरे पदाधिकारी भी एक स्वर में बंसल जैसी ही बात दोहरा रहे हैं. प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों का भी कुछ-कुछ ऐसा ही मानना है. लेकिन इन सभी की बात को सही मान लिया जाए तो सवाल उठता है कि जब कांग्रेस को किसी बात का ख़तरा है ही नहीं तो फ़िर धोरों की धरती राजस्थान में इतना बड़ा राजनीतिक बवंडर उठने की असल वजह आख़िर है क्या? इसके जवाब में जानकारों के अलग-अलग मत हैं.

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक नारायण बारेठ मौज़ूदा राजनीतिक हालातों को देखते हुए मुख्यमंत्री गहलोत की इस पूरी कोशिश को आवश्यक बताते हैं. वे कहते हैं, ‘कांग्रेस का हालिया अनुभव बहुत बुरा रहा है. मध्यप्रदेश में पार्टी अलर्ट नहीं थी और उसका ख़ामियाज़ा उठाया. कर्नाटक, गोवा और गुजरात में भी यही हुआ. ज़ाहिर तौर पर अशोक गहलोत उस ग़लती को नहीं दोहराने चाहेंगे.’ बारेठ आगे जोड़ते हैं, ‘भारतीय जनता पार्टी भली भांति समझती है कि गणित किसके पक्ष में है. लेकिन इसके बावज़ूद अस्थिरता की कोशिश करना चाहती है. लोकतांत्रिक शुचिता के लिए यह ठीक नहीं.’

लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की इस कवायद के कई और मायने भी निकाल रहे हैं. राजस्थान में कांग्रेसी विधायकों के संभावित बिखराव की ख़बरें जैसे ही सामने आईं, तुरंत ही इसके तार उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट से जोड़े जाने लगे. दरअसल गहलोत और पायलट के बीच के असहज रिश्ते किसी से नहीं छिपे हैं. मुख्यमंत्री पद को लेकर इन दोनों ही नेताओं के बीच उसी तरह की खींचतान चलती रही है जैसी कि मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच चला करती थी. यहां तक कि पायलट के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर सड़कों पर भी उतर आए थे.

ऐसे में रह-रह कर राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में पायलट और उनके समर्थक विधायकों के कांग्रेस से बाग़ी हो जाने के कयास लगाए जाते रहे हैं. पायलट के करीबी माने जाने वाले प्रदेश कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा ने मुख्यमंत्री गहलोत की हालिया अपील के बावज़ूद उनके आवास पर नहीं पहुंचकर इन कयासों को हवा देने का काम किया. फ़िर इसके अगले दिन उसी रिज़ॉर्ट में एक मीटिंग तय की गई थी जहां विधायकों को रखा गया था. लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत के पहुंचने से पहले ही सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ वहां से निकल गए थे.

हालांकि जानकार ऐसे कई कारण गिनवाते हैं जिनके चलते सचिन पायलट शायद ही कभी भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना चाहेंगे या हो सकते हैं. लेकिन वे यह भी बताते हैं कि इस तरह के कयासों की अनकही धौंस दिखाकर पायलट मुख्यमंत्री गहलोत और कांग्रेस आलाकमान पर दवाब ज़रूर बनाए रखते हैं. सूत्रों के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ देने के बाद हाईकमान अशोक गहलोत को यह इशारा दे चुका है कि वे सचिन पायलट के नाराज़ होने की स्थिति पैदा न होने दें. इसका एक मतलब यह भी था कि अगले मंत्रिमंडल विस्तार में पायलट के क़रीबी नेताओं को सम्मानोचित जगह दी जाए.

विश्लेषकों के मुताबिक पेंच यहीं फंस गया. बीते कुछ सालों में ऐसे कई मौके आए जब पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पेशानी पर बल ला दिए. यह सही है कि गहलोत सरीखे परिपक्व नेता के लिए चुनौती बनना पायलट की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. लेकिन अपने लंबे राजनीतिक अनुभव की मदद से गहलोत हर बार उन पर इक्कीस ही साबित हुए. पार्टी से जुड़े सूत्रों की मानें तो सत्ता में आने के बाद से पायलट के कुछ बेहद विश्वस्त नेता उनसे दूरियां बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री गहलोत की तरफ़ झुकते चले गए. इनमें से कुछ कैबिनेट मंत्री भी थे.

ऐसे में अब फ़िर से पायलट के कुछ अन्य क़रीबी नेताओं को मंत्रिमंडल में मजबूत जगह देने का मतलब है ख़ुद उन्हें भी मजबूत करना. ज़ाहिर तौर पर गहलोत जैसा कूटनीति में माहिर नेता अपने विरोधियों को आसानी से तो यह मौका देने से रहा. सूत्रों के मुताबिक़ इस पूरे घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि मुख्यमंत्री गहलोत उन गैर कांग्रेसी विधायकों में से कुछ को मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहते हैं जिन्होंने उनके भरोसे ही कांग्रेस को समर्थन दिया है.

यह तो साफ़ है कि ऐसा होना उन लोगों को शायद ही रास आएगा जो कैबिनेट में गहलोत का प्रभाव घटते देखना चाहते हैं. लेकिन इसे लेकर सचिन पायलट के असहज होने का एक और भी कारण बताया जाता है. जानकारों के अनुसार प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते पायलट अपने बूते इन सभी विधायकों को कांग्रेस के पाले में लाना चाहते थे. ताकि राजस्थान में बहुमत के बिल्कुल किनारे पर खड़ी सरकार को मजबूती देकर वे ख़ुद को हाईकमान की नज़रों में साबित कर सकें. लेकिन कहा जाता है कि गहलोत ने पायलट को भनक तक नहीं लगने दी और इन सभी विधायकों को ले उड़े. कहा जाता है कि अब पायलट ने इन विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर एक तरह से वीटो लगा रखा है.

वहीं, दूसरी तरफ़ अंदरखाने चर्चा यह भी है कि सभी ग़ैरकांग्रेसी विधायक मुख्यमंत्री गहलोत पर उनमें से कुछ को मंत्रिमंडल में शामिल करने का लगातार दवाब बना रहे हैं. फ़िर, मुख्यमंत्री ख़ुद को साबित करने में नाकाम रहे कुछ मौज़ूदा मंत्रियों को चलता कर पार्टी के ही अन्य नए चेहरों को भी मौका देना चाहते हैं. लेकिन सचिन पायलट का गुट इसका भी विरोध करता रहा है. ऐसे में अशोक गहलोत के सामने मंत्रिमंडल का विस्तार करने या न करने के सवाल ने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी थी. कुछ ऐसी ही स्थिति विभिन्न राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी बनी हुई थी. लेकिन इसी बीच कोरोना वायरस अनचाहे मेहमान की तरह धमक पड़ा और राजस्थान में सारी राजनीतिक गतिविधियों पर विराम लग गया.

पर देखा जाए तो यह आपदा मुख्यमंत्री गहलोत के लिए ऐसा अवसर बनकर आई जिसने उन्हें अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता साबित करने का मौका दे दिया. राजस्थान सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए जो रणनीतियां बनाईं उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहलोत की तारीफ़ की. लॉकडाउन लगाने से लेकर उसे खोलने तक राजस्थान हर निर्णय में केंद्र से एक क़दम आगे ही रहा. प्रदेश में भी गहलोत को अपने प्रबंधन के लिए विरोधियों और आलोचकों तक से सराहना मिली. यही कारण था कि बीते क़रीब तीन महीने में राजस्थान की राजनीति और मीडिया में सिर्फ़ गहलोत छाए रहे और पायलट समेत पार्टी के अन्य सभी नेता गौण से हो गए.

अब यदि भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो उसकी राजस्थान इकाई ख़ुद पर लगे विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ कर रही है. पार्टी से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र इस बारे में तंज कसते हुए कहते हैं, ‘यदि पार्टी को अरबों रुपए ख़र्च करने ही होते तो क्या उसे इसके लिए ओंकार सिंह ही मिले थे जिनकी कोई बड़ी राजनीतिक पहचान नहीं है! ये सही है कि हाईकमान की इज़ाजत के बिना कोई भी प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा जा सकता है. लेकिन मूलरूप से यह प्रदेश नेतृत्व का दांव था.’

हम से हुई बातचीत में भाजपा के ये नेता आगे जोड़ते हैं, ‘वसुंधरा सरकार के समय हुए एक राज्यसभा चुनाव में हमारी पार्टी में भी क्रॉस वोटिंग हो चुकी है. ऐसा ग़लती से हुआ या जानबूझकर किया गया, इसकी जांच के लिए कमेटी बिठाई गई. लेकिन वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. उसी तर्ज पर लखावत को भी आगे करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना ही रहा होगा कि कांग्रेस के लूपहोल्स का पता लग जाए और उस पर एक मनोवैज्ञानिक दवाब बनाया जा सके. यदि कांग्रेस का कोई विधायक जाने-अनजाने क्रॉस वोटिंग कर देता तो उस हिसाब से आगे रणनीति बनाई जाती. लेकिन अब ये दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है.’

इन सूत्र के शब्दों में, ‘हो सकता है भाजपा में भी किसी नेता ने अपनी महारथ दिखाने के चक्कर में किसी निर्दलीय या अन्य दल के विधायक से कुछ कह दिया हो. अशोक गहलोत को इस बात की सूचना मिल गई और उसी के आधार पर या वैसे ही उन्होंने इतने बड़े ड्रामे की स्क्रिप्ट रच दी.’ उनकी ये आख़िरी बात ध्यान खींचती है. क्योंकि वे अकेले नहीं हैं जो मानते हैं कि सिरे से आख़िर तक यह पूरी बिसात राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत की ही बिछाई हुई है. उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी बयान दे चुके हैं कि ‘इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि किस विधायक को किसने प्रलोभन देने की कोशिश की है. यह सिर्फ़ माहौल ख़राब करने की कोशिश है. लेकिन ऐसा करने वाला कामयाब नहीं होगा फ़िर चाहे वह किसी भी पार्टी का हो.’

लेकिन कोई कुछ भी कहे जानकारों के मुताबिक ये पूरा हाईवोल्टेज घटनाक्रम मुख्यमंत्री गहलोत के लिए ऐसा तीर साबित हुआ है जिससे उन्होंने कई निशाने साध लिए हैं:

पहला तो यही कि यदि कांग्रेस या उसका कोई समर्थक विधायक पाला बदलने की सोच भी रहा होगा तो इतना हो-हल्ला खड़ा होने के बाद उसके लिए ऐसा कर पाना अब मुश्किल होगा और भारतीय जनता पार्टी भी ऐसा करने में सहज नहीं होगी. देखा जाए तो गहलोत उसी मोहरे की मदद से भाजपा को दवाब में लाते दिखाई दे रहे हैं जिसे उन्हीं के ख़िलाफ़ आगे बढ़ाया गया था.

दूसरे, इस सब के बाद इस चुनाव में दोनों पार्टियों द्वारा व्हिप जारी किया जाना तय माना जा रहा है. इसका मतलब है कि यदि कोई विधायक चुनाव में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करेगा तो उसकी पार्टी सदस्यता के साथ विधायकी भी क़ानूनन ख़तरे में आ जाएगी. इस तरह गहलोत ने पार्टी के उन विधायकों को भी पाबंद करने का पुख़्ता इंतजाम कर दिया है जो सिर्फ़ अपनी नाराज़गी जताने के लिए भी क्रॉसवोटिंग कर सकते थे. ग़ौरतलब है कि गहलोत के करीबी माने जाने वाले नीरज डांगी की उम्मीदवारी से पार्टी में कुछ लोग खुश नहीं थे. ये ख़बर सामने आने के बाद ही भाजपा ने ओंकार सिंह लखावात को मैदान में उतारा था.

तीसरे, सब कुछ सही रहने पर कांग्रेस उन सभी बाहरी विधायकों का महत्व समझ चुकी होगी जिन्होंने गहलोत की वजह से पार्टी को समर्थन दिया. ऐसे में हाईकमान उनमें से कुछ को मंत्रिमंडल में शामिल करने और बाकियों की वाज़िब मांगों को मानने के लिए हरी झंडी दिखा सकता है. पायलट खेमा भी इस बात का विरोध नहीं कर पाएगा.

चौथा, इस पूरी उठापटक के बीच अकेले ही पूरा मोर्चा संभालने की वजह से गहलोत ने हाईकमान की नज़रों में ख़ुद को न सिर्फ़ पायलट बल्कि कांग्रेस के कई अन्य दिग्गज़ नेताओं से आगे ला खड़ा किया है. क्योंकि भारतीय जनता पार्टी कई प्रदेशों में कांग्रेस का तख़्तापलट करने या उसे बड़ा नुकसान पहुंचाने में अब तक कामयाब रही है. फ़िर चाहे वो अहमद पटेल का गुजरात हो, कमलनाथ का मध्यप्रदेश या फ़िर एचडी कुमारस्वामी का कर्नाटक. लेकिन राजस्थान में गहलोत भाजपा को उसी के पसंदीदा खेल में धूल चटाकर उस अपमान का हिसाब पूरा करते दिखाई दे रहे है जो उनकी पार्टी को दूसरे राज्यों में झेलना पड़ा था.

हालांकि ये बात तो अभी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही बता सकते हैं कि इस बार खेल में भाजपा क़ायदे से शामिल हुई भी थी या नहीं!