प्रकोप की विडम्बनाएं

हम एक महामारी के प्रकोप में, थोड़ा सा नरम किये गये लॉकडाउन में जी रहे हैं. एक तरह से सब पर काल की छाया है. सब संकट में हैं, सब एक-दूसरे से अलग-अलग पड़ गये हैं. ऐसे समय में हम सभी मिलकर एक-दूसरे के, सकल संसार के, जो सबसे अधिक बेध्य और वंचित है उनके कल्याण की स्वस्तिकामना करें. जितना बन पड़े दूसरों की मदद करें, राहत और दिलासा दें. लॉकडाउन की आड़ में सत्ताएं क्रूरता, निमर्मता, अनाचार आदि कर रही हैं उन पर नज़र रखें और जैसे भी सम्भव हो उनका प्रतिरोध करें.

थोड़ा-बहुत ऐसा सोशल मीडिया पर हो भी रहा है, तमाम गाली-गलौज के बावजूद. ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो इस अभागे समय में जोखिम उठाकर मदद और राहत देने की हरचन्द कोशिश में लगे हुए हैं. उनमें से अधिकांश साधारण लगभग नामहीन नागरिक हैं और वे सजग-संवेदनशील मानवीय नागरिकता की उजली शबीहें हैं. पर दुर्भाग्य से ऐसे लोग भी हैं ही जो इन दिनों भी अपनी भड़ास निकालने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. वे सोशल मीडिया पर अपनी क्षुद्र दुश्मनियां निभा रहे हैं, अपनी कल्पित वीरगाथा रच रहे हैं और अपने सही-ग़लत शत्रुओं को, अपने जाने, अपने वाग्तीरों से परास्त करने के प्रयास कर रहे हैं. ऐसी वीरगाथाएं तो भंगुर हैं ही, ऐसी कीचड़-उछाल से भी कुछ हासिल नहीं हो सकता. कोई भी लेखक या कृति अपने से मरती है या जीवित रहती है, किसी के कोसे या चाहे वह न तो मृत न उत्तरजीवी हो सकती है.

साहित्य और कलाओं में विवाद या मत-भिन्नता किसी महामारी से समाप्त या स्थगित हो जायेंगे यह दुराशा ही होती है. जब चारों ओर भीषण असुरक्षा का माहौल हो तो ऐसे बहुत होते हैं जिन्हें अपनी सुरक्षा दूसरों को ध्वस्त करने में लगती है. शायद यह भ्रम भी उन्हें हो जाता है कि ऐसा ध्वंस उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा. अलबत्ता यह चिन्तनीय है कि ऐसा हो रहा है. मिर्ज़ा का मिसरा फिर याद आता है: ‘आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना’.

किसी ने मुझे फ़ोन कर कहा कि क्या ऐसा व्यवहार उसी तरह का कदाचार नहीं है जैसा सत्ताएं इस समय पूरी बेशर्मी से कर रही हैं? मैंने उत्तर में यह कहने की कोशिश की कि जब राजनीति, सत्ता, न्याय संस्थाओं, मीडिया के अधिकांश में विवेक और संयम न बचा हो तो उसकी उम्मीद साहित्य-समाज से कैसे की जा सकती है? उन सज्जन ने कहा कि क्या साहित्य उदात्त का क्षेत्र नहीं रह गया है? मैंने उनसे कहा कि हमें लेखकों और साहित्य में अन्तर करना चाहिये. साहित्य तो उदात्त और उस पर लगातार मंड़राते संकटों का क्षेत्र बचा हुआ है, कुछ लेखक अगर उससे दूर जा रहे हैं तो उसे एक विडम्बना की तरह देखना चाहिये. उन्होंने कहा कि साहित्य हमें मनुष्य के एक दर्ज़ा कम होने से कैसे बचा सकता है अगर लेखक ही अपनी मनुष्यता से स्खलित होते हैं? मैंने यह कहकर संवाद ख़त्म किया कि साहित्य टुच्चेपन से बचता है, कुछ लेखक कई बार नहीं बच पाते. कुछ टुच्चे व्यक्ति भी अपने लेखन में टुच्चेपन से बच जाते हैं, भले अपने व्यवहार में नहीं.

पुनर्वितरण

कोशिश मैंने की थी ललित कला अकादेमी का अध्यक्ष रहते कि उनके लेखन का एक बड़ा संचयन निकल सके उनके जीवित रहते पर ऐसा, दुर्भाग्य से, हो नहीं पाया. केबी गोयल ऐसे कलालोचक थे जिन्होंने बहुत गम्भीरता, ज़िम्मेदारी, कुशाग्रता और अध्यवसाय से साठ के दशक से नब्बे के दशक तक अधिकतर अख़बारों में छपने वाली समीक्षाओं के रूप में कलालोचना लिखी. उसका एक संचयन ‘केबी गोयल: क्रिटिकल राइटिंग्ज़ आन आर्ट’ शीर्षक से श्रुति पार्थसारथी के संपादन में गीता कपूर के प्राक्कथन के साथ शेर-गिल सुन्दरम फ़ाउण्डेशन के लिए तूलिका बुक्स ने हाल ही में प्रकाशित किया है. कुछ वर्ष पहले ऐसा ही एक संचयन रिचर्ड बार्थोलोम्यू के कला-लेखन का, रज़ा फ़ाउण्डेशन के सहयोग से, प्रकाशित हुआ था.

गोयल ने मुख्यतः आधुनिक भारतीय चित्रकला पर लिखा, उन कलाकारों के माध्यम से जिनकी एकल या सामूहिक प्रदर्शनियां, ज़्यादातर दिल्ली में, आयोजित हुई. पर वे पश्चिमी कला-जगत्, उसके कलाकारों और चिन्तन से भलीभांति वाकिफ़ थे. कह सकते हैं कि उन्होंने निरंतर भारतीय कला को विश्व कला के सन्दर्भ में रखकर देखने-समझने की चेष्टा की. कहना न होगा कि एक तरह से यह विश्व-सन्दर्भ भारतीय कला ने इस दौरान स्वयं अपने लिए चुना था और गोयल का लेखन इसे बखूबी हिसाब में ले रहा था.

पुस्तक पांच खण्डों में विभाजित है: कलाकार, संस्थान, कला और विचार, समीक्षाएं, कैटलाग. गोयल का रेंज विस्तृत है और वे राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, पिकासो से लेकर हुसेन, सूज़ा, आरा, शंख चौधुरी, सतीश गुजराल, मनसा राम, केएस कुलकर्णी, जगदीश स्वामीनाथन, मनजीत बावा, विवान सुन्दरम तक पर लिखते हैं. उनकी रूचि का भूगोल अनेक परस्पर विरोधी वृत्तियों को आसानी से समो लेता था. गोयल की निजी घनिष्ठता सूज़ा, स्वामीनाथन और विवान से रही और तीनों एक-दूसरे से बिलकुल अलग दृष्टि के कलाकार थे: सूज़ा पश्चिमी सौन्दर्य शास्त्र में रमे थे, स्वामी पश्चिमी इतिहास की एकरैखिक धारणा को अस्वीकार कर कला की सर्वत्र तात्कालिकता में यक़ीन करते थे और विवान इतिहास-बोध से लैस.

गोयल की समीक्षाओं के शीर्षकों से पता चल सकता है कि वे उसके कलाकारों के काम में क्या खोज पा रहे थे: ‘रोमेण्टिक कलाकारों में अन्तिम’ (गायतोण्डे), ‘कई हुसेनों का जन्म’ (हुसेन), ‘चेतना का चमत्कार’ (कृष्ण खन्ना), ‘अपनी भूलभुलैया में कलाकार’ ‘तर्कशील मानस का अफ्रीका’ (जगदीश स्वामीनाथन), ‘जब कला सिर्फ़ कला जैसी दिखती है’ (विवान सुन्दरम).

गोयल ने अपने कला-चिन्तन को कई पश्चिमी आधुनिकों के साथ संवाद के रूप में रूप में रखा और उनमें लूकाच, अर्न्स्ट फ़िशर, मार्सेल दूशां, आरवी कीटाई, कांज़ीमीर मालेविच आदि शामिल हैं. पर थोड़ा अचरज हो सकता है कि ऐसा ही संवाद गोयल ने भारतीय आधुनिक चिन्तकों या परंपरा से नहीं किया. पर उन्होंने जो किया वह निश्चय ही भारतीय कलालोचना को समृद्ध करता है. इन दिनों लॉकडाउन के कारण इस पुस्तक पर व्यापक बौद्धिक चर्चा शायद स्थगित है पर यह देर-सबेर होगी, होना चाहिये इसमें कोई संदेह नहीं. इसमें भी नहीं कि यह एक ज़रूरी और उत्कृष्ट सन्दर्भ-ग्रन्थ भी है.

अपना आप लखावा

इस बीच कबीर जयन्ती पड़ गयी. उनका एक पद याद आया :

हम सब माहीं सकल हम माहीं

हम ते और दूसरा नाहीं

तीन लोक में हमारा पसारा

आवागमन सब खेल हमारा

खट दरसन हम करियत भेखा

हम ही अतीत रूप नहीं रेखा

हम ही आप कबीर कहावा

हम ही अपना आप लखावा

यह सोचने की बात है कि क्या इस बीच अपने घर बार में क़ैद रहने के बाद - 75 दिन हो गये लॉकडाउन के - क्या हमारा कुछ आत्मविस्तार हुआ है? क्या इसका अहसास बढ़ा या फैला है कि हम सबमें हैं और सकल हममें हैं? ऐसी लाचार हालत में, जिसमें सब दूसरे दूर और लगभग अदृश्य हो गये हैं, इसमें से कितने हैं जो महसूस करते हैं ‘और दूसरा नहीं?’ कबीर जैसे तादात्म्य और सर्वसमावेशी विराट्ता के क्षण शायद हरेक के जीवन में कभी-न-कभी ज़रूर आते हैं: क्या इस दौरान, जब समय ही समय था, ऐसे क्षण आये? क्या इस अवधि में कभी लगा कि ‘हम ही अपना आप लखावा’? इसका उत्तर कबीर को नहीं, हम ही को अपने से चाहिये या शायद नहीं चाहिये?