1-अंग्रेजी का ‘चिंट्ज़’ शब्द हिंदी के ‘छींट’ शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है चित्तीदार. हजारों साल पहले यह कपड़ा आधुनिक भारत और पाकिस्तान के इलाकों में बनाया गया और दुनिया पर छा गया. चिंट्ज़ की कहानी बहुत बड़ी और दुखद है. यह सशस्त्र व्यापार, उपनिवेशवाद, गुलामी और देसी लोगों को बेदखल करने की कहानी है. बीबीसी पर जूबिन बेखराड की रिपोर्ट.

भारत में बने छींट के कपड़े जिन पर यूरोप में पाबंदी लगा दी गई थी

2-कोरोना वायरस के प्रभाव ने हमें अचानक ही ‘डिजिटल’ की राह पर धकेल दिया है. शिक्षा के दूसरे क्षेत्रों की तरह शास्त्रीय संगीत की भी ऑनलाइन शिक्षा पर जोर बढ़ता दिखाई देने लगा है. इसका क्या असर हो रहा है? द प्रिंट हिंदी पर चित्रा शंकर की टिप्पणी.

कोरोना काल क्या शास्त्रीय संगीत की तबीयत को भी बिगाडे़गा

3-भारत में कोविड-19 को देखते हुए एक अस्थायी और आपातकालीन प्रतिक्रिया के रूप में वर्चुअल अदालतों को अपनाया गया. यह मजबूरी में एक नया प्रयोग है. लेकिन क्या महामारी के खत्म होने के बाद भी अदालतों की कार्यवाही में वर्चुअल अदालतों को शामिल किया जाना संभव हो सकेगा? डॉयचे वेले पर धारवी वेद की रिपोर्ट

कोरोना की वजह से भारत में ऑनलाइन अदालतों का चलन बढ़ रहा है

4- कोरोना वायरस के चलते घोषित लॉकडाउन के बीच जब लाखों की संख्या में मजदूर बिहार के अपने गांवों की तरफ लौट रहे थे, तो राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि अब यहां लाचारी में किसी को जाने की जरूरत नहीं. उन्होंने मनरेगा के जरिये 24 करोड़ श्रमदिवस रोजगार का दावा किया था. लेकिन हालात जस के तस होते दिख रहे हैं. डाउन टू अर्थ पर पुष्य मित्र की रिपोर्ट.

पलायन रोकने का दावा फेल, फिर बिहार छोड़कर बाहर जा रहे मजदूर

5- केंद्र सरकार फ़सल लागत के औसत मूल्य के आधार पर एक न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी तय करती है. इसका मकसद किसान को घाटे से बचाना होता है. एमसपी के कारण कुछ राज्यों के किसानों को तो ठीक-ठाक दाम मिल जाता है लेकिन, कई सारे राज्यों के किसानों की फसल की लागत भी वसूल नहीं होती. द वायर हिंदी पर धीरज मिश्रा की रिपोर्ट.

क्यों पूरे देश में फ़सलों का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य होने से किसानों का नुकसान है