कुछ लोगों को तो पता ही नहीं चलता कि उन्हें नये कोरोना वायरस का संक्रमण लग चुका है और कुछ की जान तक चली जाती है. ‘कोविद-सार्स-2’ से जुड़ी अनेक पहेलियों में से यह भी एक ऐसी पहेली है, जिस पर से पर्दा उठना शुरू हो गया है. एक नये अध्ययन से आशा की जा रही है कि जल्द ही यह बताना संभव हो जांयेगा कि कौन कितने गंभीर रूप से बीमार हो सकता है और किस का कुछ नहीं बिगड़ेगा.

चीनी शोधकर्ता अनुमान लगा रहे थे और जर्मनी तथा नॉर्वे के शोधकों को साफ़ संकेत मिले हैं कि कोविड-19 के किसी रोगी की बीमारी कितनी आपद या निरापद सिद्ध होगी, इसे उसके शरीर के रक्त-वर्ग (ब्लड ग्रुप) से जाना जा सकता है. चीनी शोधकों ने पिछले मार्च महीने के आरंभ में अपने यहां देखा कि जिन लोगों का रक्त-वर्ग A , था उनकी बीमारी औसत से अधिक गंभीर रूप धारण कर लेती थी. इसके विपरीत जिनका रक्त-वर्ग O था, वे इस बीमारी को कहीं आसानी से झेल जाते थे.

रक्त-वर्ग A जोखिम-भरा हो सकता है

जर्मनी के कील विश्वविद्यालय और नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय के शोधकों ने कोविड-19 के गंभीर रूप से बीमार रहे 1610 लोगों के रक्त के नमूने लिये. इन सभी लोगों की जान ख़तरे में थी. उन्हें ऑक्सीजन पर रख कर बचाया गया था. वे मुख्य रूप से इटली और स्पेन के निवासी हैं, जहां एक समय सबसे अधिक हाहाकार मचा हुआ था.

उनकी रक्तकोशिकाओं के डीएनए की तुलना इन्हीं दोनों देशों के 2205 ऐसे स्वस्थ लोगों के डीएनए से की गयी, जिन्होंने स्वेच्छा से रक्तदान किया था. दोनों विश्वविद्यालयों के शोधकों ने पाया कि कोविड-19 के जिन बीमारों का रक्त A वर्ग का था, उनकी जान बचाने के लिए उन्हें ऑक्सीजन पर रखे जाने की अनिवार्यता, O वर्ग वालों की अपेक्षा दोगुनी थी. जिनका रक्त-वर्ग AB या B था, उन्हें ऑक्सीजन पर रखने की अनिवार्यता का औसत A और O वर्गों वाले रोगियों के औसत के बीच में था.

इस अध्ययन का औपचारिक प्रकाशन अभी नहीं हुआ है, क्योंकि उसकी अन्य वैज्ञानिकों द्वारा जांच-परख अभी नहीं हो पायी है. चीनी वैज्ञानिकों का भी एक अध्ययन इस बीच यही दिखाता है कि कोविड-19 से पीड़ित जिन रोगियों का रक्त-वर्ग A होता है, उनका उपचार बाक़ी तीनों रक्त-वर्गों वाले रोगियों की अपेक्षा कहीं अधिक जोखिम-भरा और कष्टपूर्ण सिद्ध होता है. इसी प्रकार जो रोगी O वर्ग वाले होते हैं, उन्हें इस बीमारी का संक्रमण लगने का ख़तरा अन्य तीनों वर्गों वालों की अपेक्षा कम होता है.

रक्त-वर्ग और बीमारियों के बीच संबंध

ज्ञातव्य है कि मानवीय रक्त अपनी आनुवंशिक विशेषताओं के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया हैः A, AB, B और O. हमारे रक्त की एक और विशेषता है, जिसे ‘रीज़स फ़ैक्टर पॉज़िटिव/नेगेटिव ‘ कहा जाता है. इसे भी दृष्टिगत रखने पर हमारे रक्त का वर्गीकरण A+, B+, AB+, O+ तथा A-, B-, AB- और O- के रूप में होगा. मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि यूरोप और अमेरिका के श्वेत (गोरे) लोगों के 85 प्रतिशत का, तथा भारतीयों सहित शत-प्रतिशत एशियाई, अफ़्रीकी और उत्तरी अमेरिका के रेड इंडियन लोगों का ‘रीज़स फ़ैक्टर’ पॉज़िटिव(धनात्मक) होता है. दूसरे सभी लोगों का ‘रीज़स फ़ैक्टर’ नेगेटिव (ऋणात्मक) पाया गया है.

चिकित्सा विज्ञान में काफ़ी पहले से यह खोज होती रही है कि हमारे रक्त-वर्ग और हमें बीमार करने वाले रोगाणुओं-विषाणुओं के बीच भी क्या कोई संबंध है. समय के साथ ऐसे कई संबंधों का पता चला है. उदाहरण के लिए, हृदयरोगों के मामले में देखा गया है कि जिन लोगों का रक्त A, B या AB वर्ग का हो, उनके हृदय के पास की रक्तवाही नलिकाओं में बीमारियों की अधिक संभावना होती है. जर्मनी के हृदयरोग विशेषज्ञों की संस्था का कहना है कि हृदय संबंधी छह प्रतिशत बीमारियों का संबंध किसी न किसी ऐसे रक्त-वर्ग से होता है, जो बीमार व्यक्ति के लिए समस्य़ाजनक है.

थ्रॉम्बोसिस के ख़तरे

देखा गया है कि जिन लोगों का रक्त A, B या AB वर्ग का होता है, उनके रक्त में रक्त को गाढ़ा बनाने वाले कारक अन्य रक्त-वर्गों की अपेक्षा अधिक होते हैं. ये कारक ऐसे प्रोटीन हुआ करते हैं, जो रक्तवाहिकाओं को कोई क्षति पहुंचने पर, उसे सीमित करने के लिए, रक्त की तरलता और उसके प्रवाह में कमी लाते हैं. किंतु ‘रक्तस्कंदन’ कहलाने वाली इस क्रिया के कारण रक्त में ऐसे छोटे-छोटे थक्के बनने की संभावना बढ़ जाती है, जो किसी पतली-संकरी रक्तवाहिका में फंस कर रक्तप्रवाह को बाधित करने वाली घनास्रता (थ्रॉम्बोसिस) की स्थित पैदा कर दें.

ऐसा कोई थक्का होने पर मस्तिष्क तक पहुंचने वाले रक्त तथा उसके माध्यम से मिलने वाली ऑक्सीजन में भी भारी कमी आ सकती है. इससे लकवा मारने, स्मरण शक्ति खोने या दूसरी मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं. थ्रॉम्बोसिस की स्थिति में हृदय का कार्यभार बहुत बढ़ जाने से कई बार ऐसा भी हो सकता है कि वह उसे संभाल न पाये और धड़कना बंद कर दे. कोविड-19 से मरने वालों में ऐसे लोगों का अनुपात भी चिंताजनक पाया गया है जिनके शरीर के किसी अंग में थ्रॉम्बोसिस के कारण रक्तसंचार बाधित हो गया था.

दो प्रकार की रोगप्रतिरक्षी कोशिकाएं

हमारे रक्त में दो प्रकार की ऐसी रोग-प्रतिरक्षक कोशिकाएं भी होती हैं, जो शरीर में पहुंच गये बैक्टीरिया और वायरसों से लड़ कर उन्हें निरापद बनाने का काम करती हैं. रक्त में उनकी मात्रा जान कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कोरोना वायरस का संक्रमण कितना गंभीर या हल्का रूप लेगा.

चीन के वूहान में कोविड-19 के 40 रोगियों के साथ हुए एक अध्ययन में इसे देखा गया और जर्मनी के एसन विश्वविद्यालय अस्पताल में इसकी पुष्टि हुई है. इन दो प्रतिरक्षी कोशिकाओं में से एक को ‘किलर-टी-सेल’ कहा जाता है. यह टी-सेल शरीर की उन कोशिकाओं को मार डालता है, जिनमें कोरोना वायरस सार्स-कोव-2 घुस गया हो. रक्त में ‘किलर-टी-सेल’ जितने अधिक हों, उतना ही अच्छा है.

किलर-टी-सेलों द्वारा शरीर की संक्रमित कोशिकाओं को मार देने का लाभ यह है कि उनमें घुस गये वायरस इन कोशिकाओं को बंधक बना कर उनके द्वारा अपनी संख्या नहीं बढ़ा सकते. जर्मनी के एसन विश्वविद्यालय अस्पताल में वायरस विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ. उल्फ़ डिटमर का कहना है, ‘’जिन रोगियों के रक्त में किलर-टी-सेल की मात्रा बहुत कम होगी, उनके मामले में गंभीर न्यूमोनिया या रक्तस्कंदन होने का ख़तरा बहुत बढ़ जायेगा.’’

न्यूट्रोफिल-सेल

रक्त में रहने वाली दूसरी प्रतिरक्षक कोशिकाओं को ‘न्यूट्रोफिल-सेल’ कहा जाता है. उनका मुख्य काम बैक्टीरिया से लड़ना है. किंतु, डॉ. उल्फ़ डिटमर के अनुसार, ‘न्यूट्रोफिल-सेल’ किलर-टी-सेल कहलाने वाली प्रतिरक्षी कोशिकाओं को भी अपना निशाना बना सकती हैं. इसी कारण कोविड-19 से पीड़ितों के रक्त में ‘न्यूट्रोफिल-सेलों’ की संख्या कई बार किलर-टी-सेलों से कहीं अधिक होती है. परिणाम यह होता है कि तब बीमारी बहुत गंभीर और जटिल हो जाती है. रोगी को बचाने के लिए लंबा संघर्ष करना करना पड़ता है.

ऐसे लोग, जिन्हें पहले से कोई बीमारी रही हो, या जिनका कोई अंग-प्रतिरोपण हुआ हो और वे शरीर द्वारा प्रतिरोपित अंग को ठुकराए जाने की क्रिया को दबाने के लिए कोई दवा लेते रहे हों, वे इस जटिलता के आसानी से शिकार बन सकते हैं. यह चुनौती उन लोगों के मामले में भी पैदा हो सकती है, जिन्हें कैंसर की कोई बीमारी रही हो और कोविड-19 की चपेट में आने से पहले उनकी कीमोथेरैपी चलती रही हो. जहां तक किलर-टी-सेल का प्रश्न है, यह पहले से ही ज्ञात है कि मोटापे से पीड़ित अधिक वज़न वाले लोगों में उनकी मात्रा कम होती है.

वज़न अधिक तो किलर-टी-सेल कम

डॉ. उल्फ़ डिटमर का कहना है कि उनके विश्वविद्यालय अस्पताल में कोविड-19 के जिन रोगियों का इलाज़ हुआ है, उनमें से 70 प्रतिशत से अधिक ऐसे पुरुष रोगी रहे हैं, जिनका वज़न उचित से कहीं अधिक था. उनका सुझाव है कि ऐसे लोगों के उपचार में कुछ ख़ास टीकों द्वारा किलर-टी-सेलों की मात्रा बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिये. विटामिन A और C देने से किलर-टी-सेलों की कारगरता बढ़ायी जा सकती है. जिनका अंगप्रतिरोपण हुआ रहा हो, उनके मामले में प्रतिरोपण के अस्वीकार को दबाने के लिए दी जा रही दवा या दवाओं की ख़ूराक कम की जा सकती है. कैंसर के रोगियों के प्रसंग में कीमोथेरैपी को कुछ समय के लिए स्थगित किया जा सकता है.