जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त की एक तस्वीर पिछले दिनों खासा चर्चा में रही थी. इस तस्वीर में वे मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर बैठी बुजुर्ग महिला को गले लगाए दिखती हैं. उन बुजुर्ग महिला पर बरखा द्वारा की गई वीडियो रिपोर्ट से पता चलता है कि वे दिल्ली की रहने वाली लीलावती थीं जिन्हें उनके बेटे ने घर से निकाल दिया था. बरखा को अपनी कहानी बताते हुए जब लीलावती रोने लगती हैं तो बरखा पत्रकारिता को किनारे रख, गले लगाकर उन्हें ढाढस बंधाने की कोशिश करती हैं. इसी दौरान ली गई उनकी तस्वीर बाद में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी थी. कोई और समय होता तो शायद ऐसा करने के लिए उनकी सिर्फ और सिर्फ तारीफ की जाती. लेकिन कोरोना-काल में वृद्ध महिला को गले लगाने जैसी सुंदर बात के लिए भी बरखा दत्त की यह कहते हुए जमकर आलोचना की गई कि उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग के नियम को तोड़ा है.

यह वाकया बताता है कि कोरोना वायरस के कहर ने कैसे गले लगाने या हाथ मिलाने सरीखे मैत्री और प्रेम के हाव-भाव को भी असुरक्षा का प्रतीक बना दिया है. गले लगाना तो फिर भी शायद बड़ी बात है, अब तो हम उस सतह या उन चीज़ों को भी छूने से बचना चाहते हैं जिस पर किसी के हाथ पहले पड़ चुके हों. इस तरह की सावधानी हमें कोरोना वायरस के संक्रमण से भले ही थोड़ा बचा रही हो लेकिन एक-दूसरे से दूर करने के साथ-साथ हम सभी के लिए कई तरह की असुविधाओं और असहजता की वजह भी बन गई है.

दरअसल, नए कोरोना वायरस या सार्स-कोव-2 के बारे में मालूम बहुत कम लेकिन ठोस बातों में से एक यह है कि यह वायरस तमाम तरह की सतहों पर अलग-अलग समय के लिए रह सकता है और संक्रमण की वजह बन सकता है. उदाहरण के लिए, कोरोना वायरस कार्ड बोर्ड पर 24 घंटों तक और प्लास्टिक या स्टील की सतह पर 48 से 72 घंटों तक सक्रिय रह सकता है. कुछ और चीजों का जिक्र करें तो कपड़ों पर यह वायरस जहां चार दिनों तक रह सकता है, वहीं कागज पर यह समय पांच और कांच पर नौ दिन है. वायरस के इस व्यवहार को भी अस्थायी बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि तापमान कम होने या बाकी भौतिक परिस्थितियां बदलने पर वायरस के इन्हीं सतहों पर टिके रहने का अधिकतम समय 28 दिन तक भी हो सकता है.

कोरोना वायरस के अलावा कई और तरह के विषाणु और जीवाणु भी हमसे रोज टकराते हैं. आंकड़ों की मानें तो हर साल, दुनिया भर में लगभग सात लाख लोग वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन के चलते मौत का शिकार हो जाते हैं. इनमें ई-कोलाई बैक्टीरिया, राइनोवायरस, इन्फ्लुएंजा, सार्स सरीखे सूक्ष्म जीव शामिल हैं. इनमें से ज्यादातर अक्सर हमारे आस-पास की सतहों जैसे दरवाजों के हैंडल, लिफ्ट के बटन, दुकानों के काउंटर, मेट्रो या बस की सीट जैसी उन जगहों पर बेहद आसानी से मिलते हैं जहां ज्यादा संख्या में लोगों का आना-जाना लगा रहता है. लंदन के इंपीरियल कॉलेज़ में संक्रामक बीमारियों पर शोध कर रहे वैज्ञानिक, डॉ जेरल्ड लैररॉय मौमस अंदाज़ा लगाते हैं कि इन सूक्ष्म जीवों में कोरोना वायरस के शामिल हो जाने के बाद संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों का आंकड़ा हर साल लगभग एक करोड़ तक पहुंच सकता है.

फिलहाल इस भयावह स्थिति से बचने का पहला और सर्वसुलभ उपाय यह है कि इन सतहों को 62-71% अल्कोहल वाले डिसइन्फेक्टेंट, घरों में इस्तेमाल होने ब्लीच (हाइड्रोजन परॉक्साइड या सोडियम हाइपोक्लोराइट) या उच्च-तापमान से सूक्ष्म जीवों को खत्म करने वाली मशीनों से समय-समय पर साफ किया जाता रहे. लेकिन इस तरह की सफाई न सिर्फ बहुत सारी मेहनत और खर्च बढ़ाने वाली है बल्कि क्षणिक भी है यानी सिर्फ एक व्यक्ति के उस सतह को छूते ही उसे दोबारा साफ करने की ज़रूरत फिर पड़ जाएगी. इसलिए डॉ जेरल्ड जैसे वैज्ञानिक कुछ ऐसी सतहों को बनाए जाने पर विचार कर रहे हैं जिनमें हानिकारक सूक्ष्मजीवों को अपने आप खत्म करने की क्षमता हो.

तांबे, चांदी और इनकी मिश्रधातुओं से वैज्ञानिक एंटीमाइक्रोबियल सरफेस या सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी सतहें बनाने की तैयारी कर रहे हैं. इन सतहों में नैनो स्पाइक्स यानी बेहद बारीक कांटों जैसी संरचना होगी. वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि यह कांटेदार संरचना ही घातक वायरसों से लड़ने में कारगर साबित होगी क्योंकि यह उनकी बाहरी परत को भेदकर उन्हें नष्ट कर सकेगी. वायरस की रासायनिक संरचना का अध्ययन करें तो बाहरी परत में लिपिड मेम्ब्रेन यानी तैलीय झिल्ली होती है और किसी वायरस के शरीर में पहुंचने पर यही झिल्ली स्वस्थ कोशिशकाओं से जुड़ती है जिससे संक्रमण की शुरूआत होती है. नैनो स्पाइक्स इसी झिल्ली को भेदने के उद्देश्य से बनाए गए हैं. बताया जा रहा है कि ये इतने बारीक होंगे कि न तो नंगी आंखों से देखे जा सकेंगे और न ही छूकर महसूस किए जा सकेंगे.

डॉ जेरल्ड के मुताबिक सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी सतहें बनाने के लिए तांबा सबसे उपयोगी है क्योंकि यह अपनी सतह पर आने वाले सूक्ष्मजीवों को महज दो घंटे में 99.9 फीसदी तक खत्म कर सकता है. लेकिन तांबे के इस्तेमाल की अपनी चुनौतियां हैं जैसे कि इसका क्षरण बहुत जल्दी होता है या यह नमी के संपर्क में आते ही बहुत तेजी से क्रिया करता है. उदाहरण के लिए, अगर तांबे के हैंडल पर पसीने वाला हाथ लग जाए तो उस पर तुरंत एक परत बन जाती है. वैज्ञानिक बताते हैं कि यह परत बनते ही तांबे की सूक्ष्मजीवों को खत्म करने क्षमता खत्म हो जाती है. तांबे के अलावा वैज्ञानिक तबका चांदी की सतहें बनाने पर भी विचार कर रहा है, लेकिन चांदी के महंगा और अपेक्षाकृत दुर्लभ होने के साथ एक समस्या यह भी है कि इसकी सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी शक्तियों के सक्रिय होने के लिए नमी की भी ज़रूरत होती है. इन चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिक यह उम्मीद जता रहे हैं कि आने वाले कुछ सालों में सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी सतहें न सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाओं और उपकरणों को बदलेंगी बल्कि आम जीवन में फर्क लाने वाली भी साबित होंगी.

सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी सतहों की तरह ही, कोविड-19 से बचने के लिए एक विकल्प नैनो कोटिंग तकनीक भी है. इस तकनीक से धातु (अक्सर तांबे) के आयनों और पॉलीमर (पॉलीथीन, सिंथेटिक रबर वगैरह बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पदार्थ) को मिलाकर लिक्विड स्प्रे बनाया जाता है जिसमें सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी गुण होते हैं. किसी भी सतह पर इसका छिड़काव करके कुछ मिनट के लिए छोड़ दिया जाता है और फिर कपड़े से उसे पोंछ दिया जाता है. ऐसा करने से उस पर एक परत बन जाती है जो 15 दिन से लेकर दो-तीन महीनों तक के लिए उसे वायरस से सुरक्षित बना देती है. भारत में इसी तकनीक से बनाया गया, कोविकोट नाम का एक उत्पाद आजकल चर्चा में है. पिछले दिनों राष्ट्रपति भवन, भारतीय सेना से लेकर कई बड़ी सरकारी और निजी फर्मों में इसका इस्तेमाल किए जाने के चलते यह खबरों में भी रहा था. इस पर आने वाले खर्च की बात करें तो इसकी 200 मिलीलीटर की एक बॉटल की कीमत चार हजार रुपए है.

इसके अलावा, सूर्य की किरणों में मौजूद अल्ट्रा वॉयलेट किरणों (यूवी रेज) में भी कोरोना वायरस का बचाव ढूंढा जा रहा है. बीती अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी यूवी किरणों के जरिए कोरोना वायरस का इलाज करने तक की बात कही थी. हालांकि दुनिया भर में अस्पतालों, हवाई अड्डों और कई तरह की इमारतों के डिसइंफेक्ट करने के लिए तो यूवी किरणों का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे थे, यूवी किरणों को मानव शरीर पर या उसके अंदर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. दरअसल यूवी किरणें हमारी त्वचा के डीएनए को नष्ट करती हैं, इसीलिए लंबे समय तक धूप में रहने के कारण हमारी त्वचा जल जाती है. ऐसा तब है जब सबसे खतरनाक यूवी किरणें - यूवीसी - ओज़ोन परत द्वारा रोक ली जाती हैं और केवल यूवीए और यूवीबी ही हम तक पहुंचती हैं. कोरोना वायरस का संक्रमण होने की स्थिति में वायरस हमारे फेफड़ों तक पहुंचता है और फेफड़ों पर यूवी किरणों का इस्तेमाल, उन्हें वायरल संक्रमण से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला साबित होगा. वैज्ञानिक अब तक इस बात पर तो दृढ़ हैं कि यूवी किरणों का इस्तेमाल इलाज के लिए तो नहीं किया जा सकता लेकिन बचाव या स्टेरलाइजेशन करने के लिए, इससे जुड़ी तकनीक को बढ़ाना फायदेमंद साबित हो सकता है.

यहां पर यह जानना ज़रूरी है कि कोरोना वायरस जैसे सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए यूवीसी किरणों का इस्तेमाल किया जाता है. ये किरणें इतनी घातक होती हैं कि मानव शरीर को जो नुकसान यूवीए और यूवीबी किरणें कई घंटो में पहुंचा पाती हैं, वह काम यूवीसी किरणें कुछ ही सेकंडों में कर सकती है. इसीलिए इनका इस्तेमाल करने वालों को खास तरह के उपकरण और उन्हें चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. फिलहाल, चीन में वाहनों को डिसइन्फेक्ट करने के लिए यूवीसी किरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं कुछ यूरोपीय देश नोटों को रोगाणु-मुक्त करने के लिए बैंको में यूवी मशीनों का उपयोग कर रह हैं. आने वाले समय में नोटों और कागजात के साथ इसके ऐसे ही कई और उपयोग बढ़ते हुए देखे जा सकते हैं.