मानसिक बीमारियों को स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की है. मंगलवार को इस मामले से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय बीमा विनिमायक व विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) को इस बारे में नोटिस भी भेजा है. यह याचिका अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने दायर की थी. इस याचिका में मेंटल हेल्थ केयर एक्ट- 2017 का हवाला दिया गया है. इस क़ानून के तहत बीमा कंपनियों को शारीरिक बीमारियों की ही तरह मानसिक बीमारियों के इलाज के भुगतान के लिए भी प्रतिबद्ध किया गया था. इससे जुड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए आईआरडीए ने 2018 में दिशानिर्देश भी जारी किए थे. लेकिन बीमा कंपनियों द्वारा उन्हें अभी तक अमल में नहीं लाया गया है.

याचिका में कहा गया है कि आईआरडीए ने मेंटल हेल्थ केयर एक्ट- 2017 के निर्देशों का उल्लंघन करने वाली बीमा कंपनियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है. याचिकाकर्ता के मुताबिक आईआरडीए का यह रुख़ समानता के अधिकार के ख़िलाफ़ है और मानसिक रोगियों के प्रति भेदभाव को बढ़ावा देता है. याचिका में यह भी कहा गया है कि आईआरडीए का यह ग़ैरजिम्मेदाराना रवैया हजारों मानसिक रोगियों के पुनर्वास में बाधा बन रहा है. उनकी याचिका पर जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने सुनवाई करते हुए इस बारे में आईआरडीए और केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है.

ग़ौरतलब है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद देशभर में मानसिक तनाव व बीमारियों और उनसे निपटने की हमारी तैयारियों पर एक बहस सी छिड़ गई है. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोविज्ञानी डॉ राजीव मेहता इस बारे में हिंदुस्तान टाइम्स को बताते हैं, ‘देश में मानसिक स्वास्थ्य को मेडिकल आपातकाल के तौर पर लिए जाने की ज़रूरत है. यह बात डराती है कि मानसिक बीमारियों की वजह से हम हमारे नौजवानों को लगातार खोते जा रहे हैं. आत्महत्या के सर्वाधिक मामले किशोरावस्था और अवयस्कों से ही जुड़े होते हैं. इसके बाद बुजुर्गों का नंबर आता है. इस समस्या से पीड़ित लोगों की पहचान और उनके इलाज के लिए उचित राष्ट्रीय नीतियां बनाए जाने की ज़रूरत है.’