कोरोना वायरस महामारी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए गांव की स्थिति पर रिपोर्ट करने पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ की है. यह एफआईआर 13 जून को वाराणसी के रामपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज़ हुई है. सुप्रिया शर्मा हमारी सहयोगी न्यूज़ वेबसाइट स्क्रोल डॉट इन की कार्यकारी संपादक हैं. पुलिस के मुताबिक उनके ख़िलाफ वाराणसी के डोमरी गांव की रहने वाली माला देवी ने शिकायत दर्ज़ करवाई है. माला देवी का आरोप है कि शर्मा ने उनकी पहचान और बयानों को बदलकर प्रस्तुत किया है.

सुप्रिया शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी पर कोरोना वायरस और उससे निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन के प्रभाव से जुड़ी रिपोर्टों की एक सीरीज़ की थी. इसमें उन्होंने सांसद ग्राम योजना के तहत प्रधानमंत्री द्वारा गोद लिए गांव डोमरी की निवासी माला देवी का भी इंटरव्यू लिया था. इस बातचीत में माला देवी ने बताया था कि वे लोगों के घरों में काम करती हैं और राशन कार्ड न होने की वजह से उन्हें लॉकडाउन के दौरान भोजन जुटाने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

लेकिन जो शिकायत पुलिस को मिली है उसके मुताबिक माला देवी का कहना है कि वे एक घरेलू कामगार नहीं बल्कि वाराणसी नगर निगम में आउटसोर्सिंग सफाई कर्मचारी हैं. इस एफआईआर में माला देवी के हवाले से यह भी लिखा गया है कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें या उनके परिवार में किसी को भी खाने-पीने की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन सुप्रिया शर्मा ने अपनी रिपोर्ट में उनके और उनके बच्चों के भूखे रहने की बात कहकर उनकी ग़रीबी और जाति का मजाक बनाया है.

इस मामले में पुलिस ने सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम- 1989, किसी की मानहानि करने से जुड़ी आईपीसी की धारा 501 और किसी महामारी को फैलाने में बरती गई लापरवाही से जुड़ी आईपीसी की धारा 269 के तहत मामला दर्ज़ किया है. इस रिपोर्ट में स्क्रोल के एडिटर-इन-चीफ़ के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करने की मांग की गई है.

इस पूरे मामले पर स्क्रोल ने बयान जारी कर प्रतिक्रिया दी है. इसमें कहा गया है, ‘5 जून 2020 को हमने डोमरी गांव (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) की रहने वाली माला देवी का इंटरव्यू लिया था. उसमें उन्होंने बिल्कुल वही बातें कहीं जैसा कि हमारी इस रिपोर्ट का शीर्षक है ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए गांव में लोग लॉकडाउन के दौरान भूखे रहे’. हम अपने इस आर्टिकल पर पूरी तरह कायम हैं. लॉकडाउन के दौरान समाज के पिछड़े वर्ग की रिपोर्टिंग के चलते की गई ये एफआईआर स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने और उस पर हमला करने का प्रयास है.

बीते कुछ समय के दौरान उत्तर प्रदेश में कई पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ की गई हैं. ऐसे दो मामले फतेहपुर ज़िले के हैं. इनमें से एक में स्थानीय पत्रकार अजय भदौरिया (57) ने ग़रीबों के चलाए जा रहे सामुदायिक रसोईघर बंद होने की ख़बर की थी. इस पर जिला प्रशासन ने उन्हें पत्रकार मानने से इन्कार करते हुए उनके ख़िलाफ़ कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज़ किया था. सामुदायिक रसोई के बंद होने से ज़िले के क्वारंटीन सेंटरों में अव्यवस्था फैल गई थी. वहीं, एक अन्य पत्रकार विवेक मिश्रा ने स्थानीय गौशालाओं में लगातार मर रही गायों से जुड़ी एक रिपोर्ट की थी. इन पत्रकारों पर प्रशासन की कार्रवाई के विरोध में ज़िले के सभी पत्रकारों ने बीती सात जून को जल सत्याग्रह भी किया था.