इस सस्ती व सर्वसुलभ दवा का नाम है डेक्सामेथासोन.1960 वाले दशक से दमा और गठिया रोग के इलाज़ में इसका उपयोग होता रहा है. किसी ने नहीं सोचा था कि एक इतनी पुरानी और सुपरिचित दवा कोविड-19 नाम की सबसे आधुनिक और अबूझ बीमारी के उपचार में भी किसी काम आ सकती है. ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकों की यह खोज यदि इस दवा के बड़े पैमाने पर उपयोग में भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर देती है, तो इससे कोविड-19 का कोई टीका बाज़ार में आने से पहले, उसके गंभीर मामलों के उपचार में बहुत उपयोगी सहायता मिल सकती है.
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता बाज़ार में पहले से ही उपलब्ध विभिन्न प्रकार की दवाओं को कोविड-19 के रोगियों पर आजमा कर देख रहे थे कि क्या उनमें कोई ऐसी दवा भी हो सकती है,जो रोगियों को उल्लेखनीय राहत पहुंचा सकती है. ब्रिटेन के 175 अस्पतालों के कोविड-19 के 11,500 से भी अधिक रोगियों पर यह अध्ययन किया गया. उनमें से 2,104 ऐसे थे, जिन्हें 10 दिनों तक हर दिन 6 मिलीग्राम डेक्सामेथासोन दिया गया. दूसरी ओर, तुलना के लिए कोविड-19 के ही 4321 दूसरे रोगियों को यह दवा नहीं दी गयी.
मृत्युदर एक-तिहाई तक घट सकती है
आम तौर पर जिन गंभीर बीमारों की सांस वेंटीलेटर की सहायता से कृत्रिम रूप से चालू रखनी पड़ती है, 28 दिनों बाद उनकी मृत्यु दर सबसे अधिक हुआ करती है. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन में देखा गया कि ऐसे गंभीर बीमारों को वेंटिलेटर पर रखने के साथ-साथ डेक्सामेथासोन देने पर उनकी मृत्यु का अनुपात एक-तिहाई तक घटाया जा सकता है. दूसरी ओर, जिन्हें वेंटिलेटर पर तो रखा गया, पर यह दवा नहीं दी गयी, उनकी मृत्यु दर 41 प्रतिशत रही. जिन्हें वेंटिलेटर के बदले केवल ऑक्सीजन की जरूरत थी, उनकी मृत्यु की संभावना डेक्सामेथासोन देने पर 20 से 25 प्रतिशत तक कम पायी गयी. कहा जा रहा कि यह दवा कोविड-19 के हर आठ मरणासन्न रोगियों में से कम से कम एक की जान बचा सकती है.
वैसे कोविड-19 के लगभग 20 में से 19 संक्रमित किसी अस्पताल में भर्ती हुए बिना भी ठीक हो जाया करते हैं. उन्हें डेक्सामेथासोन देने का कोई लाभ नहीं है. इस दवा का लाभ तभी है, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो. उसकी जीवनरक्षा के लिए ऑक्सीजन या फिर वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही हो. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पीटर हॉर्बी ने पत्रकारों से कहा, ‘’डेक्सामेथासोन ऐसी पहली दवा है, जिसकी सहायता से दिखाया जा सका है कि वह कोविड-19 के किसी बीमार में सुधार ला सकती है.’’
सस्ती दवा है
ब्रिटिश शोधकर्ताओं का अनुमान है कि डेक्सामेथासोन का उपयोग ब्रिटेन में यदि कोरोना वायरस फैलने के आरंभ से ही किया गया होता, तो करीब पांच हजार लोगों का जीवन बचाया जा सकता था. यह दवा सस्ती भी है, इसलिए गरीब देशों के भी काम की है. बताया जा रहा है कि उससे किसी बीमार के दस दिन के इलाज़ का ख़र्च करीब पांच सौ रूपये ही पड़ेगा. इस तरह मात्र साढ़े तीन हजार रुपये में किसी की जान बचाई जा सकती है. यह दवा सर्वसुलभ है, हर जगह मिल सकती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूटीओं) के निदेशक इथियोपिया के डॉ. तेद्रोस ने ब्रिटेन की सरकार, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं और उन अस्पतालों तथा उनके सभी मरीज़ों को बधाई दी है, जिनके सहयोग से यह सफलता मिल पायी है. ब्रिटेन में इस सफलता को लेकर भारी खुशी है, पर जर्मनी के महामारी विशेषज्ञ इसका निःसंकोच स्वागत नहीं कर पा रहे हैं. उनका कहना कि वे इस बारे में अपनी राय तभी दे सकते हैं, जब इस अध्ययन के सभी मूल आंकड़े सामने आ जायेंगे. उल्लेखनीय है कि इस अध्ययन की तथाकथित ‘रिकवरी रिपोर्ट’ अभी प्रकाशित नहीं हुई है, क्योंकि अन्य विशेषज्ञ इस अध्ययन की स्वतंत्र जांच अभी नहीं कर पाये हैं.
उल्लेखनीय, फिर भी छोटी-सी सफलता!
जर्मनी में म्यूनिक के संक्रामक एवं उष्णकटिबंधीय रोग वाले अस्पताल के मुख्य डॉक्टर क्लेमेंस वेन्टनर का जर्मन टेलीविज़न ‘एआरडी’ से कहना था कि हमें देखना होगा कि डेक्सामेथासोन जैसे स्टेरॉइडों के लाभ के लिए – ‘सुपर इन्फ़ेक्शन’ कहलाने वाले गंभीर क़िस्म के संक्रमणों की मृत्यु दरों के रूप में – हमें क्या क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. स्टेरॉइडों द्वारा मत्यु दर में भले ही एक उल्लेखनीय, पर कुल मिलाकर फिर भी छोटी-सी ही कमी को देखते हुए कोविड-19 की रोकथाम की सर्वोत्तम दवा अंततः किसी कारगर टीके को ही माना जा सकता है.
जर्मनी के ही एक दूसरे विशेषज्ञ क्रिस्टोफ़ स्पेश्त ने, मुख्यतः एबोला वायरस से पीड़ितों के उपचार के लिए अमेरिका में बनी और कोरोना वायरस से पीड़ितों के लिए भी सुझाई जा रही एक दूसरी दवा ‘रेमडेसीविर’ के साथ तुलना करते हुए कहा कि रेमडेसीविर कोविड-19 के आरंभ में अपना असर दिखाती है, जबकि डेक्सामेथासोन का असर बाद की अवस्था में दिखायी पड़ता लग रहा है. रेमडेसीविर भी अच्छे परिणाम देती है, पर उसे संक्रमण लगने के एक सप्ताह के आस-पास ही दिया जाना शुरू हो जाना चाहिये. उस समय तक यह पता नहीं चल पाता कि बीमारी क्या मोड़ लेगी. डेक्सामेथासोन के रूप में अब एक ऐसी दवा हमारे हाथ में है, जो बीमारी की विलंबित अवस्था में जीवन-मरण के बीच अंतर कर सकती है.
भारत में कौन सी दवा दौड़ जीतेगी
भारत के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि रेमडेसीविर को बनाने वाली अमेरिकी कंपनी ‘गिलीएड’ भारत की चार कंपनियों सिप्ला लिमिटेड, हेटेरो लैब्स, जुबिलंट लाइफ़साइन्सेस और मायलन के मिले-जुले कंसोर्टियम को रेमडेसीविर के उत्पादन का लाइसेंस देने जा रही है. ये कंपनियां कम से कम 2022 तक यूरोप, एशिया तथा विकासशील जगत के कुल 127 देशों के लिए इस दवा का उत्पादन करेंगी. ‘गिलीएड’ इन भारतीय कंपनियों को अपना तकनीकी ज्ञान भी हस्तांतरित करेगी. किंतु अब देखना होगा कि डेक्सामेथासोन की कार्यकुशलता और सस्तेपन की धूम से इस समय जिस तरह बाज़ार गर्म है, उससे भारतीय कंपनियों का उत्साह कहीं ठंडा तो नहीं पड़ जायेगा.
रेमडेसीविर रोगी के शरीर की कोशिकाओं में उस एन्ज़ाइम को निरस्त करने के काम आती है, जिसकी सहायता से वायरस कोशिका के भीतर घुस कर उससे अपनी हू-बहू नकलें बनवाते हुए अपनी संख्या बढ़ाता है. ‘गिलीएड’ और भारतीय कंपनियों के बीच हुए समझौते के अनुसार रेमडेसीविर के उत्पादन को जल्द से जल्द शुरू करने का प्रयास किया जाना है.
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