दूरियों की दुनिया

शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता में टेक थी: ‘इतने पास अपने’. हमने इसे ‘पूर्वग्रह’ के एक कविता-विशेषांक का शीर्षक बनाया था. यह सत्तर के दशक की बात है. अब हम अप्रत्याशित रूप से एक ऐसे समय में आ गये हैं कि पास आने के बजाय दूर रहना ज़रूरी हो गया है. हम अपने को दूसरों से दूर रखने को विवश हो गये हैं और दूसरे हमें अपने से दूर. 21वीं शताब्दी का दूसरा दशक पूरा नहीं हुआ है और हमारी दुनिया, विचित्र और दुखद ढंग से, दूरियों की दुनिया हो गयी है. हम इन दिनों दूरियों का आचार-शास्त्र रचने और उसका पालन करने में लगे हैं. हमारे संवाद, दैनिक आचरण, व्यवहार आदि सब दूरियां बनाये रखने के जतन और उत्सकुता से नियमित हो रहे हैं. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हम दूरियां बनाये रखकर किस तरह की सामुदायिकता संरचेंगे. अब तक जो लगाव और निकटता से सम्भव होता था, वह अब अलगाव और दूरी से कैसे सम्भव होगा?

हमारे यहां न सिर्फ़ भौतिक दूरी को सामाजिक दूरी कहा जा रहा है, कोरोना प्रकोप ने कुछ और बढ़ती या जान-बूझ कर बढ़ायी जा रही दूरियों को भी उजागर कर दिया है. हम तो महामारी के प्रकोप के कारण और उसके आतंक में एक-दूसरे से मुनासिब दूरी बरत रहे हैं लेकिन जो दूसरी दूरियां सामने आ रही हैं उनका ऐसा कोई औचित्य या आधार नहीं है. यह साफ़ देखा और महसूस किया जा सकता है कि हमारे लोकतंत्र में तंत्र लगातार लोक से दूर हो रहा है; पुलिस सुरक्षा से दूर जा रही है; धर्म अपने अध्यात्म से दूर जा रहे हैं; मीडिया सचाई से दूर जा चुका है; सत्ता नागरिकता से दूर चली गयी है; न्यायालय न्याय से दूर जा रहे हैं और राजनीति नीति से. ये दूरियां प्रकोप के कारण पैदा नहीं हुई हैं. लेकिन उसने इनके और बढ़ने का बहाना दे दिया है. ये दूरियां समाज में हिंसा-अन्याय-अत्याचार की प्रवृत्तियों को खुल्लमखुल्ला प्रोत्साहित और सक्रिय कर रही हैं.

इन दूरियों को मौन-मुखर समर्थन देने या उनकी अनदेखी कर अपने में आत्मतुष्ट रहने वाला मध्यवर्ग इस समय इन बढ़ती दूरियों के कारण तरह-तरह की व्यवस्थाओं में जो संकट उत्पन्न हो गया है, उसे झूठी ख़बर मान रहा है. उसके लिए यह संकट कुछ विघ्नसन्तोषियों द्वारा फैलायी गयी अफ़वाह भर है. यह तटस्थता, उदासीनता, संवेदनहीता हमें, हमारी राजनैतिक-आर्थिक-नैतिक व्यवस्थाओं को कहां ले जायेंगी इसका अनुमान फिलवक्त लगाना मुश्किल है. पर इतना तो, फिर भी, साफ़ है कि हम निर्लिप्त नहीं रह पायेंगे: दूरियां बढ़ाकर हम न बचेंगे, न दूसरे. भारतीय समाज टूट के कगार पर है यह हमारे समय की सबसे भयानक ख़बर है.

उम्मीद की सरहद

ऐसे लोग तो बहुसंख्यक हैं जो साहित्य न तो पढ़ते हैं, न ही उससे कोई उम्मीद लगाते हैं. उनके व्यस्त जीवन में साहित्य कभी-कभार कुछ मनोरंजन कर देता हो तो ठीक है वरना उसकी कोई ज़रूरत उन्हें नहीं लगती. इस बड़े वर्ग में वे लोग भी होते हैं जिनकी भूमिका कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे राजनीति, आर्थिकी, विज्ञान, व्यापार, मीडिया, धर्म, शिक्षा आदि में बड़ी निर्णायक होती है. इस का सीधा आशय यह है कि समाज और दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा अपना काम बिना साहित्य के बखूबी चला लेता है.

मैं एक हाउसिंग सोसायटी में रहता हूं जिसमें 100 फ़्लैट हैं और उनके प्रायः सभी रहवासी यह जानते हैं कि मैं एक लेखक हूं और मेरे पास पुस्तकों का एक बड़ा संग्रह है. उनमें से आज तक किसी ने - मैं 2003 से यहां हूं - न तो कोई जिज्ञासा प्रगट की, न समय गुज़ारने या मनोरंजन के लिए कभी कोई पुस्तक मांगी. कोविड 19 के लॉकडाउन के दौरान भी नहीं. यह भारत के अधिकांश मध्यवर्ग की हालत है. उस पर तरस खाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि वे, साहित्य के बिना भी, सुखी और सन्तुष्ट, सफल और सम्पन्न हैं. भले और मददगार हैं. उनके पास आधुनिक जीवनशैली के सभी उपकरण अच्छी हालत में हैं. अभी कल ही उनमें से एक को दूसरे से यह कहते सुना कि जो लोग गांव-घर वापस गये हैं मज़े में हैं - उन्हें मुफ़्त राशन और मनरेगा में रोज़गार मिल रहा है. दूसरा मुखर हामी भर रहा था.

यह वह परिवेश है जिसमें हम जैसे सिरफिरे कुछ लेखक साहित्य लिखते-पढ़ते और उससे उम्मीद लगाते हैं. यह उम्मीद अकसर हम शायद अपना मनोबल बढ़ाने के लिए अतिरंजित करते हैं, इसे नज़रअंदाज़ कर कि हमारे आसपास और कई बार तो अपने परिवार में ही साहित्य की कोई जगह और ज़रूरत नहीं है. अगर हिन्दी का बड़ा अंचल ही लें तो पिछले साठ-सत्तर बरस के साहित्य ने अपने ही लोकतंत्र का मानवीय सघन क्रिटीक तरह-तरह से प्रस्तुत किया है: इस दौरान जो बड़े हिन्दी लेखक हुए हैं उनमें से अधिकांश राजनैतिक-धार्मिक-आर्थिक सत्ताओं से असहमत, उसके आलोचक रहे हैं. फिर भी, आज हिन्दी समाज सबसे अधिक धर्मान्धता, जातिविद्वेष, साम्प्रदायिकता, हिंसा, क़ानून के खुल्लमखुल्ला अतिक्रमण, घृणा आदि की चपेट में हैं.

इस विपर्यय को कई ढंग से देखा-परखा जा सकता है. यह कहने का प्रलोभन हो सकता है कि हमारा साहित्य हमारे सामाजिक यथार्थ को प्रभावित करने में विफल रहा है. यह भी लग सकता है कि साहित्य से इतनी अधिक उम्मीद करना उचित नहीं है - आधुनिक समाज में साहित्य की वह स्थिति और ज़रूरत नहीं है जोकि, उदाहरण के लिए, भक्तिकालीन समाज में थी. यह भी नोट किया जा सकता है कि हाशिये पर रहकर ही शायद साहित्य थोड़ा-बहुत प्रभाव उत्पन्न कर सकता है. उसकी अल्पसंख्यकता हमारे समय में लगभग जैविक है और उसे इससे अधिक की उम्मीद नहीं करना चाहिये. लेखकों के अपने समाज में हम भले अपनी स्थिति और क़द पर इतरा लें, नागरिक समाज में हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वहां हमारी हैसियत बहुत कम है.

और यह भी दावा किया जा सकता है, जो मैं कुछ दशकों से करता रहा हूं, कि हिन्दी साहित्य हिन्दी समाज का राजनैतिक विपक्ष है.

पातौं पातौं दुःख

इस पर ध्यान जाना चाहिये कि भले हमारे भक्त कवि आस्था में निमग्न रहते थे, उनमें जीवन-समाज, अन्तः और बाह्य जगत की सचाई का गहरा और तीख़ा अहसास कम नहीं था. उनके आस्था-पगे नयन सचाई को देखने से कभी विरत या उदासीन नहीं होते थे. यह कबीर, तुलसी, सूर, रैदास आदि सभी के बारे में सही है. इन दिनों कबीर को अकसर उलटता-पुलटता रहता हूं तो इस बार ध्यान गया इन दोहों पर:

जदि का माई जनमियां, काहू पाया सुख.

डाली डाली मैं फिरौं, पातौं पातौं दुःख...

स्वामी होना सोहरा, दोहरा होना दास.

गाड़र आनी ऊन को, बांधी चरै कपास...

कबीर मन पंखी भया, उड़िकै चढ़ा अकासि.

उहां ही तै गिरि पड़ा, मन माया के पासि...

पानी हू तें पातरा, धूंवां हू ते छीन.

पवना बेगि उतावला, सो दोस्त कबीरै कीन...

कबीर कलि खोटी भयी, मुनि भर मिलै कोई.

कामी लोभी मसखरा, तिनका आदर होइ...

मैं मैं बड़ी बलाइ है, सकै तौ निकसो भागि.

कब लग राखौं हे, सखी, रूइ पलेटी आगि...

इस कविता की सचाई इतनी स्पष्ट और उजली है कि उस पर कुछ और कहना ज़रूरी नहीं.