भारत के प्राचीन ऋषि-मुनी जंगलों-पहाड़ों में रहते थे और ध्यान-साधना (मेडिटेशन) किया करते थे. इससे उन्हें लौकिक जगत के बारे में न केवल अलौकिक ज्ञान मिलता था, वे निरोग रहते और दीर्घजीवी भी बनते थे. भारत की पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में इसीलिए योग और ध्यान का भी अभिन्न स्थान है. किंतु पश्चिम की कथित वैज्ञानिक शोधों पर आधारित आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद, योग और ध्यान को न केवल अज्ञान बता कर उनकी खिल्ली उड़ायी जाती रही, उन्हें अंधविश्वास तक कहा जाता रहा. भारत में भी यही धारणा बन गयी कि सच्चा चिकित्सा विज्ञान तो वही है, जो पश्चिम से आया है. ऋषि-मुनी भला क्या जानें विज्ञान की बातें!

उसी पश्चिम की प्रयोगशालाओं में ध्यानसाधना का अभ्यास अब हठयोग या धर्म के दायरे से बाहर निकल कर चिकित्सा विज्ञान में नयी खोजों का बहुचर्चित विषय बन गया है. मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट), तंत्रिका वैज्ञानिक (न्यूरोलॉजिस्ट) और आणविक जीववैज्ञानिक (मॉलेक्युलर बायॉलॉजिस्ट) जानने में लगे हुए हैं कि ध्यानयोग का मानवीय तन और मन पर क्या प्रभाव पड़ता है? उससे कौन सी बीमारियां ठीक की जा सकती हैं?

ऐसे प्रयोगों में मिली आश्चर्यजनक सफलताओं से यूरोप और अमोरिका के कई अस्पतालों में योग और ध्यान का भी नियमित अभ्यास करवाया जाने लगा है. वैज्ञानिक ध्यानावस्था की उन जैविक क्रियाओं को अब बेहतर समझने लगे हैं, जिनकी किसी बीमारी के उपचार में प्रमुख भूमिका होती है. उन्होंने पाया है कि ध्यानसाधना हमारे मस्तिष्क और स्वास्थ्य पर बहुत ही अनुकूल प्रभाव डालती है.

साक्षीभाव या विपश्यना ध्यान या माइन्डफुलनेस मेडिटेशन

बीमारियों के नये उपचारों की खोज कर रहे पश्चिमी चिकित्सक और वैज्ञानिक अब मानने लगे हैं कि ध्यान और चिकित्सा विज्ञान ‘’एक ही सिक्के के दो पहलू’’ हैं. उन डॉक्टरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो स्वस्थ रहने की प्राचीन भारतीय विधियों को भी अपनी उपचार योजना में शामिल करने लगे हैं. किंतु एक दुराव अब भी बना हुआ है भारतीय ऋषियों-मुनियों के आश्रमों वाला ध्यानसाधना का आध्यात्मिक पक्ष इन डॉक्टरों की वैज्ञानिकता को स्वीकार्य नहीं है. सारी दिलचस्पी केवल उसकी चिकित्सकीय उपयोगिता में है. इन शोधकों-चिकित्सकों का कहना है कि आध्यात्मिक प्रभामंडल से मुक्त किये बिना मेडिटेशन को अन्य धर्मावलंबियों और नास्तिकों के लिए स्वीकार्य नहीं बनाया जा सकता. योगाभ्यास को सब के लिए स्वीकार्य बनाने में भी प्रायः ऐसा ही करना पड़ता है.

चिकित्सकीय उपयोग के लिए यूरोप और अमेरिका के डॉक्टर और वैज्ञानिक ध्यानसाधना की जिस विधि को अपनाते हैं, उसे साक्षीभाव या विपश्यना ध्यान (माइन्डफुलनेस मेडिटेशन) कहा जाता है. इस विधि में व्यक्ति को किसी वस्तु या कार्य के प्रति व्यवहारतः अपने भीतर आती-जाती सांस के प्रति पूरी तरह सचेत रहते हुए एकाग्रचित्त होना पड़ता है. यह भी हो सकता है कि व्यक्ति से कहा जाये कि वह मन-ही-मन अपने भीतर जाये. शरीर के भीतर की सबसे गहरी संवेदनाओं को एकाग्रचित्त होकर महसूस करे.

पेरिस में ‘साँ अन’ अस्पताल के डॉ. क्रिस्टोफ़ आंद्रे ने जर्मन-फ्रांसीसी टीवी चैनल ‘आर्टे’ के एक कार्यक्रम में कहा, ‘’ध्यान लगाना शुरू करने से पहले अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि मेडिटेशन एक शारीरिक अनुभूति भी है. ध्यानावस्था में हम सुन सकते हैं कि हमारे शरीर के भीतर क्या हो रहा है. हम कैसे सांस ले रहे हैं. विचार कैसे प्रवाहित हो रहे हैं. यानी हम वस्तुतः अपने आप को ही देख-सुन रहे एक मौन प्रेक्षक होते हैं.’’

मानसिक रोगों के उपचार में घ्यान की भूमिका

डॉ. आंद्रे ने ध्यानधारण के बारे में कई पुस्तकें तो लिखी ही हैं, वे फ्रांस के ऐसे पहले डॉक्टर भी हैं, जिसने ध्यान का रोगोपचार के लिए उपयोग किया है. अपने अस्पताल में वे कम से कम डेढ़ दशक से विषाद (डिप्रेशन) और भय के लंबे समय के मानसिक रोगियों के उपचार में ध्यान का उपयोग कर रहे हैं. रोगियों को दी जाने वाली दवाओं से जब बात नहीं बनती, तब वे उन्हें साक्षीभाव ध्यान लगाना सिखाते हैं. रोगियों को आठ सप्ताहों तक घर पर अभ्यास करना और बातचीत के लिए सप्ताह में एक बार अस्पताल में जाना होता है.

डॉ. आंद्रे का कहना है कि उनके अपने अनुभव और तंत्रिका वैज्ञानिकों के अध्ययन यही दिखाते हैं कि विषाद से बार-बार पीड़ित होने वाले लोग यदि ध्यान लगाना सीख लेते हैं, तो भविष्य में विषाद की वापसी का ख़तरा बहुत कम हो जाता है. यूरोप और अमेरिका के अस्पतालों में हुए अध्ययन भी डॉ. आंद्रे के कथन की पुष्टि करते हैं. इन अध्ययनों में पाया गया है कि विषाद के दो गंभीर दौर झेल चुके लोग, प्रतिदिन केवल 20 मिनट ध्यानसाधना के बाद, दुबारा ऐसा होने का ख़तरा 50 प्रतिशत तक घटा सकते हैं.

फ़्रांस की ही तंत्रिका वैज्ञानिक डॉ. गायेल देवार्त ने बोस्टन, अमेरिका में मस्तिष्क के एक ऐसे हिस्से में, जिसकी मनोदशा (मूड) और भय के समय बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती है, ध्यानसाधना के प्रभावों का अध्ययन किया है. भाषा और ध्वनि को चित्र-रूप देने वाले मस्तिष्क के टेम्पोरल लॉब (शंखपाली) के अग्रभाग में स्थित इस हिस्से को अमिग्दला कहा जाता है. हमारी भावनाओं का वशीकरण सामान्यतः अमिग्दला में ही होता है.

डॉ. गायेल देवार्त के अनुसार, अमिग्दला को हमारी भावनाओं का केंद्र होने के कारण हमारे भय का केंद्र भी माना जाता है. जो लोग भय-विकार या मानसिक आघात से पीड़ित होते हैं, उनकी अमिग्दला की सक्रियता एवं आकार बढ़ जाता है. मेडिटेशन के द्वारा इसे घटाया जा सकता है. डॉ. देवार्त ने इससे पीड़ितों के लिए आठ सप्ताह का एक ध्यानसाधना कोर्स रचा. कोर्स के आरंभ व अंत में ‘एमआरटी’ द्वारा प्रतिभागियों के मस्तिष्क के स्कैन-चित्र लिये. डॉ. देवार्त ने पाया कि कोर्स के बाद अमिग्दला की सक्रियता सचमुच घट गयी थी. यानी ध्यानसाधना से मस्तिष्क की या कम से कम हमारे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी उसके कुछ भागों की बनावट अनुकूल ढंग से बदली जा सकती है.

डॉ. गायेल देवार्त को आशा है कि उनकी शोध-परियोजना के अंत में जब सारे परिणाम आ जायेंगे, तब अवसाद-विषाद के पीड़ितों को पूरी तरह ठीक करना भी संभव हो जायेगा. तब यह पता चल जायेगा कि मस्तिष्क में पैदा हो गये कतिपय विकारों को मस्तिष्क द्वारा स्वयं ही दूर करने के लिए उसे किस तरह से साधा जाना चाहिये. ‘एमआरटी’ (मैग्नेटिक रेज़ोनैन्स टोमोग्राफ) स्कैन दिखाते हैं कि ध्यानसाधना के अभ्यास से मस्तिष्क की कार्यक्षमता अथवा बनावट में दीर्घकालिक परिवर्तन भी लाये जा सकते हैं.

तंत्रिकाविज्ञान के इन अध्ययनों का मूल उद्देश्य ऐसे तथ्य और आंकड़े जुटाना है, जो ध्यान में छिपी रोगनिवारक शक्ति की पुष्टि कर सकें. वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि वे कौन-सी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं हैं, जिन्हें जानने-समझने के बाद ध्यानसाधना को संभवतः एक विज्ञानसम्मत मान्यताप्राप्त उपचारविधि घोषित किया जा सकता है. अभी यह भी जानना बाक़ी है कि रोगियों को कितनी देर तक ध्यान लगाना चाहिये. ध्यान लगाने के लिए उन्हें प्रतिदिन बैठना चाहिये, या किसी निश्चित अवधि तक ही उन्हें ध्यान लगाना चाहिये.

न्यूरोप्लस्टिसिटी

कुछ दूसरे अध्ययनों में देखा गया है कि नियमित रूप से आजीवन ध्यानसाधना करने से मस्तिष्क में इतने सारे परिवर्तन होते हैं कि उनकी पहचान और गिनती करना बहुत कठिन है. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ध्यानावस्था में मस्तिष्क सर्वथा निष्क्रिय होता है. अमेरिका में विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रिचर्ड डेविडसन का कहना है कि ध्यानावस्था में मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में एक ऐसी गतिविधि शुरू हो जाती है, जिसे ‘न्यूरोप्लस्टिसिटी’ कहा जाता है.

‘न्यूरोप्लस्टिसिटी’ मस्तिष्क की, पिछले अनुभवों और अभ्यासों के आधार पर, अपने आप को स्वयं ही बदलने की क्षमता है. प्रोफ़ेसर डेविडसन के अनुसार, हमारा मस्तिष्क अधिकतर समय बाहरी प्रभावों से निपटने में ही व्यस्त रहता है. मेडिटेशन ही वह अवस्था है, जब मस्तिष्क अपने आप को स्वयं व्यवस्थित कर सकता है. ध्यानसाधना और कुछ नहीं, अपने चंचल मन को साधने की विधि है.

प्रोफ़ेसर डेविडसन तंत्रिकाविज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा नाम हैं. वे पिछले कई दशकों से प्रसिद्ध ध्यानसाधकों के मस्तिष्कों की बनावटों का अध्ययन-विश्लेषण करते रहे हैं. बौद्ध धर्मगुरुओं और उनके शिष्यों के मस्तिष्कों के अध्ययन से उन्होंने पाया कि मन को साधने में, मानसिक बीमारियों के उपचार की अपेक्षा, कहीं अधिक क्षमता छिपी हुई है. उनका कहना है कि आरंभ में जो वैज्ञानिक ध्यानसाधना को समझने में रुचि रखते थे, वे मनोवैज्ञानिक होते थे या मनोचिकित्सक. समय के साथ तंत्रिका-वैज्ञानिक, रोगप्रतिरक्षण वैज्ञानिक, हृदयरोग विशेषज्ञ और अंतःस्रावी ग्रंथियों के विशेषज्ञ भी इस पांत में शामिल हो गये हैं.

पश्चिमी देशों में पिछले 20 वर्षों से ध्यानसाधना संबंधी पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओं में लेखों आदि की झड़ी लग गयी है. अकेले अमेरिका में ही ढाई सौ से अधिक ऐसे क्लीनिक और अस्पताल हैं, जहां रोगियों के लिए ध्यानसाधना के आरंभिक कोर्स चलाये जा रहे हैं. सबसे चर्चित कोर्स यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसैच्यूसेट्स के चिकित्सा विज्ञान विभाग की ओर चलाया जा रहा है. इन कोर्सों में प्रायः ऐसी अभ्यास-विधियां सिखायी जाती हैं, जो भारत में प्रचलित विधियों से बहुत अलग हैं. लोग मंदगति से चलते-फिरते, हाथ-पैर खींचते-तानते, उकडूं बैठे या लेटे हुए तरह-तरह की गतिविधियां करते दिखते हैं.

ध्यानसाधना मुख्यधारा का अंग

अमेरिका में ही 1979 से चल रहे वोर्सेस्टर के ‘सेंटर फ़ॉर माइन्डफुलनेस मेडिसिन’ के प्रोफ़ेसर सान्तोरेलि बताते हैं कि उनके पास हर तरह की बीमारियों वाले लोग आते हैं. वे जानना चाहते हैं कि ध्यानसाधना क्या है? कैसे की जाती है? वे कैंसर के रोगी होते हैं. लंबे समय से किसी दर्द से पीड़ित होते हैं. पेट और आंत की बीमारियों वाले होते हैं. अधकपारी या उच्च रक्तचाप से परेशान होते हैं. ध्यानसाधना इन सब के लिए चिकित्सा-विज्ञान का ही हिस्सा बन गयी है. वह कोई वैकल्पिक पद्धति नहीं रही, बल्कि मुख्यधारा का अंग बनती जा रही है. वोर्सेस्टर के इस केंद्र में इस बीच हर साल 15 हज़ार लोग ध्यानसाधना सीखने आते हैं.

‘सेंटर फ़ॉर माइन्डफुलनेस मेडिसिन’ की स्थापना प्रोफ़ेसर जॉन कैबट-ज़िन ने की थी. वे अमेरिका के संभवतः ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जिसने भारत के योग और ध्यान को पश्चिमी जगत की चिकित्सा पद्धति से जोड़ा. उनका कहना है कि पश्चिमी जगत को योग-ध्यान की उपयोगिता से परिचित कराना आज भी एक दांव खेलने के समान है. 1979 में तो यह पूरी तरह पागलपन ही था. किसी नशेड़ी हिप्पी को ही ऐसा सूझ सकता था.

प्रोफ़ेसर कैबट-ज़िन ने जगप्रसिद्ध ‘मैसैच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेकनॉलॉजी’ (एमआईटी) से आणविक जीवविज्ञान में डॉक्टरेट किया है. वहीं उन्होंने साक्षीभाव ध्यान सिखाने का आठ सप्ताहों का एक कोर्स तैयार किया था. उसी कोर्स की आज बोस्टन से लेकर पेरिस तक धूम है. कोर्स के शुरू में वे सबको केवल एक मुनक्का हाथ में देते हैं और कहते हैं कि इसे कुछ देर तक हर तरफ़ से ऐसे देखें-टटोलें और मुंह में भी डालें, मानो आपने मुनक्का कभी देखा-सुना या चखा नहीं था. उनकी यह तरक़ीब ऐसी चली कि आज तक चल रही है. इसी तरह की युक्तियों से वे लोगों को अपना सारा ध्यान, बिना किसी तनाव के, किसी एक ही चीज़ या किसी ऐसी क्रिया के अवलोकन पर केंद्रित करना सिखाते हैं जो मस्तिष्क को तनाव से मुक्त कर देती है.

तनावमुक्ति है मूलमंत्र

तनावमुक्ति ही कैबट-ज़िन की तकनीक का मूलमंत्र है. यह विचार उन्हें 1979 में तब आया, जब उन्होंने देखा कि उसी वर्ष अमेरिकी जनता के स्वास्थ्य के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट में तनाव (स्ट्रेस) को पहली बार ‘’जनता की बीमारी’’ बताया गया था. इस बीच तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) भी तनाव को लगभग सभी बीमारियों की जड़ मानता है.

पश्चिम के वैज्ञानिकों को भी आरंभ में विश्वास नहीं हो पा रहा था कि केवल कुछ मिनट के नियमित ध्यान जैसी तुच्छ चीज़ से हमारे स्वास्थ्य और शरीर को इतने बड़े लाभ कैसे मिल सकते हैं! प्रो. रिचर्ड डेविडसन ने अमेरिका के मेडिसन पार्क विश्वविद्यालय में हुए प्रयोगों में देखा कि ध्यानसाधना तनाव के दुष्प्रभावों को ही नहीं घटाती. वह हमें अपनी रोगप्रतिरक्षण प्रणाली की ऐसी अनावश्यक सक्रियता से भी बचाती है, जिससे हमारे अंगों में चिरकालिक बीमारियों का रूप लेने वाली सूजन और जलन पैदा होती है.

प्रो. डेविडसन का कहना है कि रक्तसंचार की बीमारियां, मधुमेह, गठिया रोग, यहां तक कि अल्त्सहाइमज़ (Alzheimer’s) रोग भी अपनी ही रोगप्रतिरक्षण प्रणाली की अतिसक्रियता के अवांछित उदाहरण हैं. ऐसे कई संकेत हैं कि ध्यानसाधना हमारे शरीर में इन प्रदाही तत्वों को घटाती है. कोर्टिज़ोल एक ऐसा ही हार्मोन है, जिसका स्राव डर, चिंता, घबराहट या तनाव की अवस्था में बहुत बढ़ जाता है, और इसकी अधिक मात्रा हानिकारक होती है.

एक प्रयोग के प्रतिभागियों के लिए पहले तीव्र तनाव की परिस्थितियां पैदा की गयीं और उनमें कोर्टिज़ोल की मात्रा नापी गयी. बाद में उन्हें आठ सप्ताह तक साक्षीभावी ध्यानसाधना सिखायी गयी. उन्हें एक बार फिर तीव्र तनाव से गुज़ारा गया और कोर्टिज़ोल की मात्रा पुनः नापी गयी. इस बार कोर्टिज़ोल का ग्राफ़ पिछली बार की अपेक्षा कहीं कम ऊंचाई तक जा रहा था और बहुत जल्द ही अपनी सामान्य अवस्था में लौट भी आया. साथ ही यह भी देखा गया कि शरीर में जलन-सूजन जैसी प्रदाही प्रतिक्रिया का स्तर बहुत मामूली हो गया था.

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शारीरिक स्वास्थ्य दिमाग़ में शुरू होता है

साक्षीभाव ध्यानसाधना इस ज्ञान को विज्ञान प्रमाणित कर रही है कि शारीरिक स्वास्थ्य दिमाग़ में शुरू होता है. बीमारी कोई भी हो, उसके इलाज़ की सफलता-विफलता में मन की दशा निर्णायक होती है. पेरिस के ‘पिप्ये सौं पेत्रियेख़’ अस्पताल में प्रो. कोरीं इनार-बानीस नेफ्रोलॉजी (मूत्रविसर्जन प्रणाली), हृदयरोग और कैंसर के रोगियों की देखभाल करती हैं. इन रोगियों के बहुत ही कष्टदायक उपचार को यथासंभव सहनीय बनाने के लिए वे ध्यानसाधना का सहारा लेती हैं. उनका कहना है कि उनके मरीज़ उन्हें अक्सर बताते हैं कि ध्यानसाधना की कृपा से वे अपने शरीर के ऐसे कई अंगों को भी अनुभव करने लगे हैं, जिनके प्रति वे पहले अनजान थे. इस अनुभव के बाद वे अपने उपचार में सक्रिय सहयोग देने लगते हैं. लंबी बीमारी वाले रोगियों को अपनी बीमारी से छुटकारा पाने में तब मदद मिलती है, जब वे लक्षणों को समझना, अपने शरीर की प्रतिक्रय़ाओं को वश में करना और कोई दर्द उठने से पहले ही उससे बचाव करना सीख लेते हैं.

पश्चिमी डॉक्टर व वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते थे कि मेडिटेशन क्या तब भी काम करता है, जब सिर और शरीर यानी तन और मन दुख रहे होंते हैं? क्या नियमित ध्यानसाधना से दर्द को भी कम किया जा सकता है?

अमेरिका में मेडिसन पार्क विश्वविद्यालय के प्रो. रिचर्ड डेविडसन का कहना है कि पश्चिमी देशों की आधुनिक उपचारविधियों में वेदनाहरण के लिए अधिकतर मादकताकारी ओपिएटों का प्रयोग किया जाता है. किंतु समय के साथ लोगों को ओपिएटों की लग गयी लत एक नयी गंभीर समस्या बन जाती है. इस बीच दर्द के समय तंत्रिका-तंतुओ के आपसी संयोजनों के बारे में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है. आज के विशेषज्ञ पता लग सकते हैं कि शरीर में ध्यानसाधना के प्रभावों को कहां और कैसे देखा जा सकता है.

वेदना या दर्द शरीर के चेतावनी-अलार्म के समान है. हमारे शरीर में ऐसे असंख्य अति महीन वेदनावाहक सूत्र होते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों की परिधि पर शुरू होकर मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) से होते हुए मस्तिष्क तक जाते हैं और वहां एक प्रकार का वेदना-विस्फोट करते हैं. जैसे ही कोई वेदना-संकेत हमारे मतिष्क में पहुंचता है, हमारे पिछले अनुभवों, हमारे भय, हमारी वर्तमान दशा और हमारे मूड इत्यादि का ध्यान रखते हुए, किसी बड़े कंप्यूटर की तरह, मतिष्क में उसका विविध प्रकार का विश्लेषण शुरू हो जाता है. इस सबके प्रकाश में शरीर के किसी अंग में महसूस हो रहे दर्द की तीव्रता बढ़ भी सकती है और घट भी सकती है.

शोधक पहले तो लंबे समय तक हमारे मस्तिष्क में वाक या दृष्टि-केंद्र के जैसे किसी वेदना-केंद्र को ढूंढते रहे. वे अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमारे मस्तिष्क में वेदना-केंद्र जैसी कोई निश्चित जगह नहीं है. किसी केंद्र के बदले ‘पेन-मैट्रिक्स’ कहलाने वाला वेदना-अनुभूति का एक पूरा संजाल इसके लिए ज़िम्मेदार होता है.

जितना अधिक डर, उतना ही अधिक दर्द

कुछ समय पहले तक दर्द को किसी बाहरी उत्तेजना के प्रति शरीर की एक ऐसी प्रतिक्षेपक्रिया (रिफ्लेक्स ऐक्शन) माना जाता था, जिस पर हमारा वश नहीं था. आज हमें भलीभांति पता है कि हमारी अप्रिय यादें, आशंकाएं और कल्पनाएं अनचाहे ही ऐसी प्रतिक्रिया को और भी बढ़ा-चढ़ा सकती हैं. दूसरे शब्दों में, दर्द का हमें जितना डर होता है, उतना ही अधिक वह हमें महसूस भी होता है. प्रो. डेविडसन कहते हैं कि किसी वेदना से हो रही पीड़ा स्वयं वेदना से नहीं, उसकी आशंका से होती है. उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति यदि पहले से ही जानता है कि उसका आगामी उपचार बहुत दर्द भरा होगा, तो उस दर्द के भय से उपचार के समय उसकी पीड़ा असली दर्द की मात्रा से कहीं अधिक हो सकती है.

ध्यानसाधना भावी दर्द की आशंका को किस तरह प्रभावित कर सकती है, इसे जानने के लिए, प्रो. डेविडसन के निर्देशन में, ध्यानसाधना के अनुभवियों और अनुभवहीनों को ‘एमआरटी’ में रख कर उनकी बांह को कुहनी के पास हल्का-सा जलाया गया. दोनों तरह के लोगों को केवल 10 सेकंड पहले बताया गया कि उन्हें एक अप्रिय गर्मी सहनी पड़ेगी. ‘एमआरटी’ ने दिखाया कि ध्यानसाधना के अनुभवहीनों को 10 सेकंड पहले वाले उसी क्षण दर्द महसूस होने लगा, जब उन्होंने सुना कि उन्हें अप्रिय गर्मी सहनी पड़ेगी. ‘एमआरटी’ उनके ‘पेन-मैट्रिक्स’ के कई हिस्सों में इसे दिखा रहा था. दूसरी ओर, ध्यानसाधना के अनुभवियों के मामले में ऐसा लगभग कुछ भी देखने में नहीं आया.

प्रश्न उठता है, मेडिटेशन करने वाले यदि अपने मस्तिष्क की संभावित प्रतिक्रिया को दबा सकते हैं, तो इसका क्या यह अर्थ है कि वे दर्द महसूस ही नहीं करते? प्रो. डेविडसन का कहना है कि अजीब बात तो यह है कि ध्यानसाधना के अनुभवियों के मस्तिष्क वाले किन्हीं हिस्सों में, दर्द पैदा होने के ठीक सही क्षण में, कोई क्षीण नहीं, बल्कि कहीं प्रबल प्रतिक्रिया दिखायी पड़ती है. किंतु तुरंत बाद के आराम वाले क्षणों में इस प्रतिक्रिया का ग्राफ़ तेज़ी से नीचे गिर जाता है. अनुभवहीनों के मामले में मस्तिष्क के ऐसे हिस्से बाद में भी दर्द की अनुभूति से उत्तेजित रहते हैं.

वेदना से दूरी

यानी, नियमित रूप से ध्यान लगाने वालों का मस्तिष्क किसी ख़तरे के क्षण में वह तुरंत और उतनी ही प्रतिक्रिया भी दिखाता है. लेकिन किसी ख़तरे के ठीक पहले और बाद में वह पूर्णतः तनावमुक्त रहता है. प्रो. डेविडसन के सहयोगी डॉ. अंत्वां लुत्स फ्रांस में इस दिशा में आगे काम कर रहे हैं. वे अब तक के डॉक्टरी उपचारों के परिणामों की हमारे तंत्रिकातंत्र के स्तर पर वैज्ञानिक व्याख्या ढूंढ रहे हैं. मस्तिष्क के कोर्टेक्स (बल्कुट) क्षेत्र में स्थित ‘इन्सुला’ उनके शोधकार्य का केंद्र है. ‘इन्सुला’ मस्तिष्क का एक ऐसा हिस्सा है, जिसको अभी पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है लेकिन यहीं यह तय होता है कि शरीर में कहां, किस अंग में दर्द महसूस किया जायेगा.

डॉ. अंत्वां लुत्स के अध्ययनों से यह पता चल सकता है कि उन लोगों का मस्तिष्क किस तरह अपने आप को बदलता है, जो नौसिखिया ध्यानसाधक हैं. आरंभिक अवलोकन दिखाते हैं कि अनुभवी ध्यानसाधकों के ‘इन्सुला’ तथा कोर्टेक्स के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी तथाकथित ‘ग्रे-मैटर’ की मात्रा बढ़ जाती है. डॉ. लुत्स का मत है कि ध्यानसाधना से वेदना की मूल अनुभूति नहीं बदलती लेकिन पीड़ा या वेदना के प्रति हमारा रिश्ता पहले जैसा नहीं रह जाता. एक दूरी-सी बन जाती है. नियमित ध्यानसाधना से हमें अपने शरीर की कतिपय आकस्मिक, स्वचालित अप्रिय प्रतिक्रियाओं को अपने नियंत्रण में रखने की एक नयी क्षमता मिल जाती है. हमारे भीतर दवाओं की एक ऐसी दुकान-सी खुल जाती है, जो पहले बंद थी.

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अब तक की सबसे बड़ी शोध परियोजना

सन 2000 के आरंभ में अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. क्लिफ़र्ड सैरन की एक टीम ने ध्यानसाधकों के शरीर और मस्तिष्क पर उनकी साधना के प्रभावों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करना शुरू किया. ध्यानसाधना और स्वास्थ्य के बीच संबंधों की वह अब तक की सबसे बड़ी शोध परियोजना थी. 30-30 लोगों के दो ग्रुप बनाये गये. उन में से एक को रॉकी माउन्टेन में स्थित एक मकान में तीन महीनों तक ध्यानसाधना करनी थी. भावावेशों के विभिन्न पक्षों को जानने के लिए कंप्यूटर आधारित विविध प्रकार के 15 कार्य तैयार किये गये थे.

शोधकों की टीम में आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) और आणविक जीवविज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिकों को शामिल किया गया था. पहली बार इस प्रश्न का उत्तर भी खोजा गया कि ध्यान क्या हमारे शरीर की असंख्य कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है? कैलिफ़ोर्निया में हुए इस अध्ययन से पहले कोई शोधक यह नहीं दिखा सका था कि किसी कोशिका के केंद्रक की कार्यविधि को भी ध्यानसाधना की मानसिक शक्ति से प्रभावित किया जा सकता है. इसे नितांत अविश्वसनीय माना जाता था कि ध्यानसाधना से हमारे शरीर की एक-लाख-अरब कोशिकाओं के हर केंद्रक में स्थित डीएनए भी प्रभावित होता है.

ध्यानसाधना से डीएनए भी प्रभावित होता है

लेकिन कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की प्रो. एलिसा एपल ने यही निष्कर्ष निकाला है. वे कोशिका-केंद्रक में स्थित गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) की विशेषज्ञ हैं. ‘’हर मानवीय कोशिका में 23 गुणसूत्र-जोड़े होते हैं. हर गुणसूत्र के दोनों सिरों पर (जूते के फ़ीते जैसा) एक छोटा-सा आवरण होता है, जिसे टेलोमर कहा जाता है. बढ़ती आयु के साथ (बार-बार के कोशिका विभाजनों के कारण) ये टेलोमर छोटे होते जाते हैं. जब वे बहुत छोटे हो जाते हैं, तब कोशिका विभाजन नहीं हो पाता और कोई नया ऊतक भी नहीं बन पाता. यही तब हमारी बीमारी का कारण बनता है और अंततः मृत्यु आ जाती है.’’

फोटो: फैंसी टॉपिक्स/ शटरस्टॉक

यानी, हमारे शरीर के स्वस्थ रहने और लंबी आयु के लिए गुणसूत्र वाले टेलोमर बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. उनके छोटा होने से हमारे जीनों का क्षय होता है. हमारे बाल सफ़ेद हो जाते हैं. त्वचा में झुर्रिया पड़ जाती हैं. बुढ़ापे की बीमारियां घेरने लगती हैं. टेलोमर की लंबाई का घटना हमारे बूढ़े होने की प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन, यह सब हर व्यक्ति में एकसमान गति से नहीं होता. प्रो. एलिसा एपल कहती हैं कि हमारे जीन, हमारी जीवनशैली, सामाजिक परिवेश–– यह सब कोशिकाओं में टेलोमर की लंबाई घटने की गति को प्रभावित करता है.

इस बात में अब कोई संदेह नहीं रहा कि नियमित ध्यानसाधना हमारे शरीर को तनावों के दुष्प्रभावों से बचाती है. इसी तरह, क्या यह संभव नहीं है कि वह हमारे आनुवंशिक कोड वाले गुणसूत्रों के टेलोमरों को भी बचाती हो? कैलीफ़ोर्निया के शोधकर्ता इसे भी जानना चाहते थे. तीन महीनों के ध्यानसाधना प्रयोग के आरंभ और अंत में उन्होंने कोशिकाओं में ‘टेलोमरेज़’ नाम के उस एन्ज़ाइम (किण्वक) को मापा, जो गुणसूत्रों के टेलोमर छोटे होते जाने की गति को घटाता है. उन्होने पाया कि इन तीन महीनों में ‘टेलोमरेज़’ की मात्रा 30 प्रतिशत, यानी लगभग एक-तिहाई बढ़ गयी थी.

संपू्र्ण शरीर पर अनुकूल प्रभाव

तीन ही महीनों में कोशिकाओं के आयुवर्धक ‘टेलोमरेज़’ एन्ज़ाइम की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ जाना इस बात में कोई संदेह ही नहीं रहने देता कि ध्यानसाधना हमारी कोशिकाओं तक को, यानी हमारी संपूर्ण काया को, बहुत ही अनुकूल ढंग से प्रभावित करती है. शोधकों को यह आशा नहीं थी कि उन्हें इतना सशक्त अनुकूल परिणाम मिलेगा. पर यह भी अध्ययन का पहला चरण ही था. दूसरा चरण यह देखना था कि क्या ‘टेलोमरेज़’ एन्ज़ाइम की मात्रा बढ़ने के साथ टेलोमरों की लंबाई भी बढ़ती है? सुझाव दिया गया कि इसे एक गहन ध्यान-शिविर लगाकर देखना चाहिये.

अतः तीन सप्ताह की एक सघन कार्यशाला में उसके सहभागियों के टेलोमरों की लंबाई कार्यशाला के आरंभ में और अंत में नापी गयी. एक बार फिर एक आश्चर्यजनक परिणाम सामने आया. तीन सप्ताहों के भीतर ही कुल 26 सहभागियों के टेलोमरों की लंबाई स्पष्ट रूप से बढ़ गयी थी! इसकी एक व्याख्या यह सुझायी गयी कि हमारी आयु की लंबाई शायद किसी (क्वांटम) यांत्रिकी के द्वारा हमारी मनोदशा पर निर्भर करती है. हर हाल में, इन दोनों चरणों के आंकड़े बहुत ही चमत्कारिक थे. कहा गया कि इन आंकड़ों की पुष्टि यदि भावी अध्ययनों में भी होती है, तो इसका मतलब यही हुआ कि ध्यानसाधना करने से बुढ़ापा आने की गति को धीमा किया जा सकता है, क्योकि हमारे गुणसूत्रों के टेलोमरों की लंबाई का घटना या तो धीमा पड़ जाता है, ठहर जाता है, या लंबाई संभवतः बढ़ जाती है.

अंतिम रूप से यह जानने के लिए कि टेलोमरों में ठीक-ठीक क्या होता है, और अधिक अध्ययनों की आवश्यकता है. जब यह कहा जाता है कि हमारी कोशिकाएं भी हमारे विचारों व संवेदनाओं को सुनती हैं, तो आशय यही होता है कि मेडिटेशन के द्वारा हम अपने जैवरासायनिक परिवेश को व्यवस्थित करने की अपनी संभावनाएं बढ़ा सकते हैं. टेलोमर अंततः जैवरासायनिक परिवेश के प्रति ही प्रतिक्रिया दिखाते हैं. सच यह भी है कि योग- ध्यान से अपना जीवनकाल सुखद बनाया व बढ़ाया तो जा सकता है, पर चिरयौवन या अमरत्व नहीं पाया जा सकता.

फ्रांसीसी विश्वविद्यालय देता है ध्यानसाधना की डिग्री

इन शोधकार्यों का ही फल है कि पश्चिम के अधिकाधिक डॉक्टर भी अब योग-ध्यान की ओर झुकने और उसे सीखने लगे हैं. फ्रांस का श्त्रासबुर्ग विश्वविद्यालय ध्यानसाधना की डिग्री तक देने लगा है. डॉक्टर जौं-जेरार्द ब्लोख़ इस डिग्री के लिए पढ़ाई करने वालों डॉक्टरों और मनोरोग चिकित्सकों को ध्यानसाधना का अभ्यास कराते हैं. वे कहते हैं, ‘’लंबे समय तक मेडिकल विषयों वाले विभाग एक-दूसरे से अलग रहे हैं. सभी जानते थे कि यह पृथकता बनावटी है. आजकल इन बनावटी सीमाओं के आर-पार एक सर्वांगी चिकित्सा विज्ञान उभरने लगा है. तन और मन, दोनों के इस मेल को मैं जीवन-विज्ञान की संज्ञा देता हूं.’’ कह सकते हैं कि पश्चिम में मशीन की प्रधानता वाले तकनीकी चिकित्सा विज्ञान में अपूर्व प्रगति के बाद अब एक मानवीय चिकित्सा विज्ञान के संवेदनशील युग का सूर्योदय हो रहा है.

विज्ञान अंततः पुष्टि करने लगा है कि ध्यानसाधना और योगाभ्यास का हमारे जीनों तथा असंख्य कोशिकाओं तक पर बहुत ही हितकारी प्रभाव पड़ता है. ध्यानयोग भी एक विज्ञान है, न कि कोई तंत्र-मंत्र, गूढ़ज्ञान या बकवास. भारत के ऋषियों-मुनियों ने सुखी और दीर्घायु होने की अपनी खोजें, बिना किसी प्रयोगशाला के, प्रकृति के अवलोकन, चिंतन-मनन और तपस्या के बल पर की थीं. खेद इसी बात का है कि भारत के इस प्राचीन विज्ञान को भारत के ही एक धर्म विशेष से जोड़ कर देश-विदेश में या तो नकारा या फिर धर्मनिरपेक्षता की सूली पर चढ़ा दिया जाता है. लोग रासायनिक दवाओं के लिए गाढ़े पसीने की कमाई लुटाते हैं, पर उन पूर्वजों से सीख नहीं लेते जो मात्र योग-ध्यान और शाकाहार से शतायु हुआ करते थे.