गोधूलि में फंसे

हर उस लेखक को, जो लिखने को अपना सबसे मानवीय और महत्वपूर्ण काम मानता है, हमारे युग में यह लगता है कि वह अपने समय से, समाज से और परंपरा से संघर्ष कर रहा है. इसमें कुछ तो सचाई होती है और कुछ कल्पना. लिखने के लिए दोनों की दरकार होती है. कुछ ऐसे भी होते हैं, कम और बिरले, जिन्हें लगता है कि वे भाषा के साथ भी संघर्षरत हैं. कुल मिलाकर स्थिति सामान्य रूप से यही बनती है कि लिखना किसी शान्त, समरस, समंजस स्थिति में लगभग सम्भव ही नहीं रह गया. महत्वपूर्ण लेखक वे होते हैं जिनके लेखन में इस संघर्ष के बहुत सारे ब्यौरे जाने-अजाने आते रहते हैं और उनका लेखन उनके ऐसे संघर्ष की अन्तर्कथा भी बन जाता है. इस संघर्ष में हार या जीत का कोई अर्थ नहीं होता. कम से कम ऐसे सर्जनात्मक संघर्ष में कई बार हार भी उतनी ही सार्थक होती है जितनी जीत. जैसे जीवन में, वैसे ही साहित्य में, हारते अधिक हैं, जीतते कम ही हैं.

प्रसंगवश यह अमरीकी आलोचक और बुद्धिजीवी इरविन हाव की जन्मशती का वर्ष है. मैं संयोगवश उनके निबन्धों का एक संचयन पढ़ रहा था और मुझे यह बात सूझी. हाव अमरीका में स्टालिन-विरोधी वाम के पक्षधर लेखक थे और प्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘डिसेण्ट’ के संस्थापक-सम्पादक थे. वे बीसवीं शताब्दी में सभ्यता के विपथगामी हो जाने से त्रस्त थे और मानते थे कि ऐसी कई मानवीय समस्याएं और मुद्दे हैं जो राजनीति से परे हैं और जिन्हें परे ही होना चाहिये. एक कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्य में युवाओं के यूटोपिया से आक्रान्त होने को वे क्षम्य मानते थे. उनकी मान्यता थी - ‘हमने सीखा है कि मनुष्य को यूटोपिया में घसीटना बर्बरता में परिणत हो जाता है लेकिन हम यह भी जानते हैं कि बिना यूटोपिया के रहना कल्पना की मृत्यु का ख़तरा मोल लेना है.’

आज का हमारा समय इतना साफ़-सुथरा नहीं है कि उसे किन्हीं सामान्य द्वैतों में बांटकर देखा-समझा जा सके. कई बार लगता है कि हम एक लम्बी गोधूलि में फंस गये हैं. हम न सचाई देख पा रहे हैं और न ही हमारे कल्प-स्वप्न, हमारे यूटोपिया इस धुंधलके में प्राप्य तो क्या दृश्य भी नहीं हैं. जैसे जीवन में, वैसे ही साहित्य में, हम जहां के लिए निकले थे वहां शायद ही कभी पहुंच पाते हैं. हम भटकते हैं, ग़लत या अवांछित पगडण्डियों पर बहक जाते हैं. कोई अन्तरिम मुक़ाम हमें ललचा लेता है. कई लेखक ऐसे लोग हो जाते हैं जिन्हें याद ही नहीं रहता कि वे कहां पहुंचने के लिए निकले थे. उनमें से कुछ के लिए चलना ही रचना बन जाता है और उन्हें कहीं पहुंच पाने के भ्रम से निजात मिल जाती है. ऐसे भी होते हैं कि जो अपनी मंज़िल अधरास्ते, किसी सच्चे तर्क से या कि किसी तात्कालिक प्रलोभन से, बदल देते हैं और न यहां के रहते हैं, न वहां के. उनके लिए चलते रहना बोझ बनता जाता है और वे धीरे-धीरे अपने लिखे को इकहरा सोद्देश्य बनाकर सुखा डालते हैं. फिर न उसमें मानवीय ऊष्मा रह जाती है, न अप्रत्याशित का रमणीय.

पुरखों के बनाये छांहुर पर

आदिवासी स्त्री कविता का एक संचयन ‘कवि मन जनी मन’ वन्दना टेटे के संपादन में राधाकृष्ण प्रकाशन से आया है. बावजूद इसके कि हिन्दी प्रदेश में आदिवासी बोलियों और लोक सम्पदा की विपुलता है, हिन्दी कविता में आदिवासी कविता की आनुपातिक उपस्थिति नहीं रही है. आदिवासी कवियित्रियों की आवाज़ें तो पहली बार एकत्र और समवेत इस संचयन के माध्यम से ही सुनायी दे रही हैं. यह सांस्कृतिक क्षतिपूर्ति की तरह है. इन कविताओं का प्रमुख गुण उनकी बेहद जीवन्त और स्पन्दित स्थानीयता है. इसमें समय आता है अकसर अत्याचार और अन्याय, शोषण और अनाचार के रूप में पर स्थान अधिक ऐन्द्रिक रूपों में प्रगट होता है. अलबत्ता कविता में ऐसा साफ़ विभाजन नहीं है. वहां समय और स्थान मिले-जुले हैं:

‘मेरी जमात में शामिल होने से पहले/सोचो, क्या लौटा सकोगे?/मेरे गांव की नदी की निश्चलता/मेरे जंगल महुए और/आम के बौरों की खुशबू/वह कच्ची पगडण्डी/और/सूरज की रोशनी में/मेरे खेतों की/मिट्टी की चमक/मेरी भाषा में छिपी मिठास: (जसिंत केरकेट्टा)

‘मिट गयी जैसे/बगल की टोंगरी/कोनजोगा मिट जायेगा/और तुम/ओ खड़िया लोग/तुम्हारी धरोहर भी मिट जायेगी’. (वन्दना टेटे).

इन कविताओं में पुरखे और धरोहर के ध्वस्त होने का तीख़ा अहसास है:

‘सीधा, पुरखों के/बनाये छांहुर पर चली./जंगल के सीमाने में पहुंचते ही ठेस लगी/मुंह से निकला– हाय गयो,/और खूऩ निकल आया अंगुली से.’ (वन्दना टेटे).

जसिंता धरोहर और अन्याय को एक साथ पहचानती हैं:

‘इस बार ये बांस बाज़ार नहीं जायेंगे/जंगलों के अन्दर अब बांस/बनेंगे हर हाथ का तीर-धनुष और तब/पहली बार समझ में आया/मेरे पूर्वजों के रक्त से सिंचित/पहाड़ों पर उगे/असंख्य बांसों का रहस्य....’

अगर कविता का एक ज़रूरी काम सचाई भर नहीं सपना देखना भी है तो यहां यह सपना स्पष्ट है:

‘यह बात वह बांस की टहनी/जानती है शुरू से ही/इसलिए रहती है निश्चिन्त/कि तयशुदा वक़्त के बाद/उसका भी समय बदलेगा/कि रखेगी वह भी क़दम/रोशनी की दुनिया में किसी दिन/और अपने लचीलेपन पर मजबूत/इरादों से रचेगी एक/अद्भुत दुनिया/वह कमज़ोर नाजुक मुलायम-सी टहनी.’ (उज्ज्वला ज्योति तिग्गा)

सचाई का रूमान आदिवासी कविता को उतना ही लुभाता है जितना उसके घाव उसे घायल करते हैं: ग्रेस कुजूर कहती हैं:

गांव की मिट्टी

पगडंडियों से होकर चलते वक़्त

पांवों से लिपटी

गाँव की मिट्टी ने कहा था

बेटे,

रहने देना चरणों में यह धूल

शहर की कोलतार भरी सड़कों पर

चलते वक़्त

यह बचायेगी तुम्हें

कालिख चिपकने से.

राहत और सहायता

सत्ताधारी सरकार और दल ने मनरेगा को पहले लगातार बदनाम किया और ग़ैर-सरकारी संगठनों एनजीओज़ को तरह-तरह से त्रस्त किया. कोरोना प्रकोप के दौरान सख़्त लॉकडाउन में अब यही योजना और संस्थाएं सबसे अधिक और समय पर राहत और सहायता करने सामने आयी हैं. बहुनिन्दित मनरेगा से बेरोज़गार होकर लौटते प्रवासी मज़दूरों में से करोड़ों अब अपनी जीविका कमा पा रहे हैं. लगातार यह सूचना भी तरह-तरह के माध्यमों से आती रही हैं कि अनेक लोग निजी स्तर पर और ग़ैरसरकारी संस्थाएं सामूहिक स्तर पर, कष्ट उठाकर, अपने सीमित साधनों से भी ग़रीबों और ज़रूरतमन्दों को राहत पहुंचा रहे हैं.

कुछ उदाहरण दिये जा सकते हैं: पुणे के व्यवसायी भुवनेश देसाई ने ग़रीबी रेखा के नीचे के 3500 देहाती परिवारों को दो सप्ताहों का राशन पहुंचाया जब कि सरकारी सहायता अधिकतर शहरों तक महदूद है. सीआईएसएफ़ के एक युवा अधिकारी वर्तुल सिंह ने तेलंगाना और महाराष्ट्र से उत्तर-प्रदेश और बिहार लौटने वालों को भोपाल में मुफ़्त भोजन के पैकेट दिये हैं. कवि युगल तेजी ग्रोवर और रुस्तम सिंह ने सैकड़ों प्रवासियों की कई तरह की मदद के साधन जुटाये और समय पर उपलब्ध कराये हैं.

उधर ‘व़क्फ़’ अमन बिरादरी’ आदि ने सहायता उत्तर-पूर्व में की है तो ‘डेवेलपमेण्ट आल्टर्नेटिव्ज़’ ने दिल्ली-नोएडा-सुमेरपुर, पूर्वी-उत्तरी दिल्ली में नौ हज़ार लोगों को भोजन और हाथों के लिए सैनीटाइर्ज़ की व्यवस्था की है. नेवान ने 400 लोगों की मदद की है. एलायन्स इण्डिया ने दिल्ली के किन्नर समुदाय की सहायता की है और ‘साथी’ संस्था ने बस्तर अंचल में 140 गांवों में रहने वाले 1042 बहुत ग़रीब परिवारों को चावल-तेल-नमक-मसाले-सोयाबीन-साबुन-मास्क-सेनेटाइज़र्स की सहायता की है. ‘जनसाहस’ नामक एनजीओ ने 10 राज्यों के लगभग डेढ़ हजार लोगों की राशन की व्यवस्था की है. उसने 12 हज़ार से अधिक लोगों को सेफ़्टीकिट्स, साढ़े 6 हज़ार को पीपीई-किट्स, 11 हज़ार से अधिक लोगों को मोबाइल बैलेन्स कैश ट्रांसफर आदि, 19 राज्यों के 102 ज़िलों में किया है. ‘गूंज’ संस्था सक्रियता से सहायतारत है. और अशोक फ़ाउण्डेशन के कई फेलो देश भर में कोरोना के उत्तरराग की स्थिति से निपटने के उपायों पर गंभीर विचार कर और उपाय सोच रहे हैं.

यह एक अधूरी, बहुत अधूरी सूची है. सूची तो कई पृष्ठों पर होगी. सत्ता-निर्मम दिनों में सहायता का यह भूगोल आश्वस्त करता है कि सच्ची भारतीयता और मनुष्यता व्यापक समाज में अभी बची और सक्रिय-सचेत है. वह सत्ताओं में लगभग सूख गयी है और उसका निर्लज्ज इज़हार हमने पिछले तीन महीनों में लगातार देखा है. अगर यही राहत का काम हमारी अनेक धनाढ्य धार्मिक संस्थाएं भी उदारता और सहानुभूति से कर पातीं तो राहत का भूगोल और व्यापक हो सकता था, हो सकता है. अभी राहत और सहायता की ज़रूरत कम नहीं हो गयी है और आगे काफ़ी समय तक रहने वाली है.