कश्मीर के प्रमुख अलगाववादी नेता सैयद अली शाह ने घाटी के सबसे बड़े अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को छोड़ दिया है. पिछले तीन दशक से कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे गिलानी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के आजीवन चेयरमैन थे. अपने इस्तीफ़े के बारे उन्होंने एक ऑडियो मैसेज जारी किया है. इसमें उन्होंने कहा है, ‘हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की मौजूदा स्थिति के मद्देनज़र मैं इस मंच से पूरी तरह अलग हो जाने की घोषणा करता हूं... इस संदर्भ में मंच के सभी जिम्मेदार लोगों को विस्तृत ख़त पहले ही भेजा जा चुका है...’

अगस्त-2019 में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद अलगाववादी खेमे में यह पहली बड़ी राजनीतिक गतिविधि है. अपने ऑडियो के साथ ही सैयद अली शाह गिलानी ने हुर्रियत पदाधिकारियों को लिखा गया दो पन्नों का पत्र भी जारी किया है. इसमें उन्होंने हुर्रियत पर जम्मू-कश्मीर मामले में उदासीन रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए लिखा है, ‘हमारा अगला क़दम क्या होना चाहिए, इसे लेकर मैंने अलग-अलग तरीके से कई बार संदेश भेजे. लेकिन मेरी सारी कोशिश बेकार गई. अब वित्तीय समेत अन्य तमाम गड़बड़ियों को लेकर आप लोगों की विश्वसनीयता ख़तरे में है.’

सूत्रों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्ज़ा वापस लिए जाने के बाद से सैयद अली शाह गिलानी को उनकी चुप्पी के लिए पाकिस्तान में मौजूद कुछ संगठनों की तरफ़ से आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. कहा जा रहा है कि सीमा पार के संगठन उनको धारा 370 हटाने के भारत सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ कोई प्रभावशाली आंदोलन खड़ा कर पाने में नाकाम मान रहे हैं. सैयद अली शाह सोपोर क्षेत्र से तीन बार विधायक रह चुके हैं. लेकिन कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में बढ़ोतरी होने बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली थी. 2010 के बाद से वे अधिकतर समय घर में नज़रबंद ही रहे हैं. 90 साल के सैयद अली शाह लंबे समय से अस्वस्थ भी चल रहे हैं.