पिछले करीब 30 सालों से ग़ुलाम नबी शेख रोज़ फ़जर की नमाज़ मस्जिद में पढ़ने के बाद उनके घर के पास ही स्थित ज़यादेवी (जयदेवी) मंदिर का रुख करते हैं. पूरे मंदिर का जायजा लेकर जब उन्हें संतुष्टि हो जाती है कि हर चीज़ अपनी जगह पर ही है और सही है, तभी वे अपने घर लौट कर नाश्ता करते हैं.

65 साल के शेख और उनका परिवार दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित बिजबेहरा कस्बे में रहता है. वे पिछले करीब तीन दशक से इस मंदिर की देख-रेख करते आ रहे हैं. न केवल वे बल्कि उनका परिवार भी. इस मंदिर की चाबी भी उन्ही के पास है. वे हर महीने दो-तीन बार अपने बेटे के साथ मिलकर इस मंदिर की सफाई भी करते हैं.

इस मंदिर को देखकर ऐसा बिलकुल अनुभव नहीं होता है कि इसमें सालों से किसी ने पूजा-पाठ नहीं किया है. पूजा-पाठ तो दूर शायद सालों से इस मंदिर में कोई हिंदू श्रद्धालु आया भी नहीं है. तो क्यों एक मुसलमान परिवार, कुछ लोगों से दुश्मनी मोलकर लेकर भी इस मंदिर की देख-रेख बिलकुल वैसे ही करता है जैसे कि वह किसी मस्जिद की करेगा.

कहानी कश्मीर में, कुछ दशक पहले तक, सदियों से साथ-साथ रह रहे मुसलमानों और पंडितों की है.

यह कहानी शेख के बचपन से ही शुरू हो गयी थी. ‘यह तब की बात है जब कश्मीर में मुसलमान और पंडित मिल-जुल कर एक परिवार की तरह रहा करते थे” शेख मंदिर के पास ही हुई सत्याग्रह से मुलाकात में बताते हैं.

शेख और बिजबेहारा के दूसरे लोग भी बताते हैं कि उन दिनों इस मंदिर के अहाते में हर त्योहार पर मेला लगा करता था.

“चाहे वो ईद हो, दिवाली हो, होली हो या और कोई त्योहार. यहां हमेशा मेला लगता था और पूरे शहर से बच्चे, जवान, बूढ़े और औरतें यहां आते थे. बच्चे खेलते-कूदते थे और बड़े आपस में गप्पें लड़ाते थे. दुकानें लगती थीं यहां और खूब जश्न होता था. तब मजहब से परे यहां सब इंसान थे” बिजबेहरा में ही रहने वाले 70 साल के ग़ुलाम हसन हजाम सत्याग्रह को बताते हैं.

मंदिर के करीब ही रहने वाले शेख हर ऐसे मेले में हमेशा हिस्सा लेते थे, फिर चाहे वह त्योहार मुसलमानों का हो या पंडितों का. “यूं कह लें कि इस मंदिर से मेरा बचपन जुड़ा हुआ है” गुलाम नबी शेख कहते हैं.

जवानी आई और शेख रोजगार की तलाश में निकल पड़े. यहां-वहां किस्मत आजमाने के बाद उनकी मुलाक़ात वैशव नाथ जुत्शी, से हो गयी. जुत्शी का मंदिर के बगल में ही सेब का बाग था जिसकी देख-रेख करने के लिए उन्हें एक आदमी की ज़रूरत थी. तो शेख जुत्शी के बाग की देख-रेख करने लग गए. कुछ सालों बाद जुत्शी के ही प्रयत्नों से गुलाम नबी शेख को स्वास्थ विभाग में नौकरी मिल गयी.

“लेकिन नौकरी मिलने के बावजूद मैंने उनके बाग में काम करना नहीं छोड़ा” शेख बताते हैं. एक दिन बाग में काम करते-करते ही उनकी नज़र मंदिर के अहाते पर पड़ी जहां काफी बड़ी घास उग आई थी.

शेख ने मंदिर के आस-पास उगी घास काटने के बाद वहां फूलों की क्यारियां लगा दीं. लेकिन जहां एक तरफ मंदिर के सहन में फूलों की क्यारियां लग रही थीं, वहीं कश्मीर घाटी में एक नए दौर की शुरुआत भी हो रही थी. यह दौर अभी तक चल रहा है और हज़ारों लोगों की जान भी ले चुका है.

1988 के अंत में जम्मू कश्मीर लिबेरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ़्फ़) नाम का एक मिलिटेंट गुट कश्मीर में सक्रिय हुआ और जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने के प्रयास में जुट गया.

यह चीज़ कश्मीर के मुसलमानों के लिए भी उतनी ही नयी थी जितनी कि पंडितों के लिए. लेकिन पंडितों में भय ने तब सिर उठाया जब 14 सितंबर,1989 में टीका लाल टपलू नाम के वकील (और भारतीय जनता पार्टी के नेता) की उनके श्रीनगर में स्थित घर में घुस कर हत्या कर दी गयी.

4 नवम्बर 1989 को एक और हत्या हुई, इस बार हाइ कोर्ट के जज नीलकंठ गंजू मारे गए. गंजू ने जेकेएलएफ़ के संस्थापक, मक़बूल भट, को 1968 में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या के आरोप में फांसी की सज़ा सुनाई थी. उस समय वे एक निचली अदालत में जज हुआ करते थे. 1982 में भारत के सूप्रीम कोर्ट ने यह सज़ा सही ठहराई थी और 1984 में भट को फांसी दे दी गयी थी. इस हत्या का बदला लेने के उद्देश्य से जस्टिस गंजू की जम्मू-कश्मीर के हाई कोर्ट के पास ही हत्या कर दी गई.

इन दो हत्याओं को फिर भी राजनीतिक दृष्टि से देखा जा रहा था. लेकिन आने वाले सालों में हालात बिगड़ते ही रहे.

“न सिर्फ पंडित, बल्कि काफी ऐसे मुसलमान भी मारे गए जो सरकार में थे या फिर सरकार के लिए काम किया करते थे, या किसी भी प्रकार सरकार के करीब थे” श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

हत्याओं का सिलसिला चलता रहा और पंडितों में भय का माहौल गहराता गया. जहां सरकारी आंकड़े यह कहते हैं कि 219 पंडित 1989 और 2004 के बीच में मारे गए हैं वहीं अलग-अलग पंडित संस्थाएं अलग-अलग आंकड़ों के दावे करती आई हैं.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इस दौरान मारे गए पंडितों की संख्या 650 बताती है और वहीं पनुन कश्मीर नाम की एक और संस्था यह संख्या 1000 से ऊपर बताती है. इस बात पर लेकिन सभी को इत्तेफाक है कि ज़्यादातर (75 प्रतिशत से ज़्यादा) ऐसी हत्याएं 1989 और 1991 के बीच ही हुई थीं.

कुछ पंडित संस्थाएं यह भी कहती हैं कि 1990 में कई स्थानीय अखबारों में पंडितों को कश्मीर छोड़ कर चले जाने की धमकियां दी गयी थीं. इनके मुताबिक घाटी में रहने वाले पंडितों के घरों के बाहर पोस्टर भी लगाए गए थे जिनमें उन्हें धमकाया गया था और मस्जिदों से ऐसे ऐलान भी किए गए थे जिनमें लोगों को पंडितों के घर लूटने के लिए उकसाया गया था.

“ये ऐसी चीज़ें हैं जो शायद हुई हों या नहीं भी हुई हों या उतनी नहीं हुई हों. इनको कौन सिद्ध या रद्द कर सकता है. लेकिन वो ऐसा वक़्त था जब कश्मीर में मुसलमान भी मारे जा रहे थे और भय चारों तरफ था. ऐसे माहौल में जहां हर किसी को अपनी जान के लाले पड़े हों इन सब चीजों का हिसाब कौन रखता है” एक और पत्रकार, जिन्होंने 90 के दशक में ही पत्रकारिता करना शुरू कर दिया था, सत्याग्रह को बताते हैं.

लेकिन वे यह भी कहते हैं कि उन दिनों कश्मीर में अखबार वाले मिलिटेंट गुटों की प्रेस रिलीज ज़रूर छापा करते थे. “अब उनमें पंडितों को धमकियां मिली या नहीं मैंने अपनी आंखों से नहीं देखा है.”

1991 आते-आते कश्मीर के हालात काफी बिगड़ चूके थे और फिर उसी साल जनवरी में 18 और 19 तारीख के बीच की रात ज़्यादातर कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ कर जम्मू चले गए. कश्मीर छोड़ के जाने वाले पंडितों की संख्या भी विवादित है.

जहां कुछ संस्थाएं मानती हैं कि उस रात करीब एक से डेढ़ लाख पंडितों ने कश्मीर को छोड़ दिया था, वहीं कुछ संस्थाएं इस संख्या को छह से सात लाख तक बताती हैं.

“यह जो सात लाख की संख्या बताई जाती है यह पिछली कई शताब्दियों में कश्मीर छोड़ कर जाने वाले हिंदुओं की है,” ट्रिनिटी कॉलेज डब्लिन में पढ़ाने वाली, मृदु राय अपनी एक किताब “अनटिल माइ फ्रीडम हैस कम’ में लिखती हैं.

अब चाहे मारे कितने भी लोग गए हों और कश्मीर छोड़ कर कितने लोग गए हों, हक़ीक़त यह है कि पंडित कश्मीर से चले गए और उनके घर और मंदिर पीछे छूट गये. उसके बाद से ज़्यादातर पंडित जम्मू में ही रह रहे हैं.

“उस वक्त ज़्यादातर पंडितों को लगा था कि वे तान-चार महीनों में ही वापस आ जाएंगे. किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें सालों बाहर रहना पड़ेगा” पंडित हिन्दू वेलफ़ेयर सोसाइटी के अध्यक्ष, मोतीलाल भट, एक इंटरव्यू में कहते हैं. भट उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो कश्मीर छोड़ कर नहीं गए.

कश्मीर में रहने वाले काफी मुसलमान यह भी कहते हैं कि पंडितों को भारत सरकार ने इसलिए यहां से निकाल दिया था ताकि मुसलमानों को मार सकें. “ऐसा सोचने वाले लोगों के लिए, पंडितों के यहां से जाने के बाद, हुई चीज़ें उनके यकीन को और पक्का करती हैं” कश्मीर में सिविल सेवाओं की तैयारी कराने वाली एक कोचिंग में इतिहास पढ़ाने वाले इम्तियाज़ शेख सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

इम्तियाज़ का इशारा 21 जनवरी 1990 को हुए गौकदल नरसंहार की ओर है जिसमें 150 से अधिक मुसलमान सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए थे. “या फिर जकूरा और टेंगपोरा नरसंहार, जिनमें 33 लोग मारे गए थे; या कुनन पोशपोरा समूहिक बलात्कार. ऐसी कई चीज़ें हुई जिससे लोगों को लगा कि पंडितों का कश्मीर से जाना एक सोची समझी साजिश थी” इम्तियाज़ कहते हैं.

आने वाले सालों में हजारों कश्मीरी मुसलमानों की जानें गयीं और कश्मीरी पंडित अपने घरों में लौटने को तरसते रहे.

पंडित अब चले गए थे. वहीं शेख की ज़िंदगी भी कोई मजे से नहीं कट रही थी. हर जगह फ़ाइरिंग, धमाके और फिर सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले लगभग रोज़ के “क्रैकडाउन” जिनमें लोगों को अपने घरों से निकाल कर एक जगह जमा कर लिया जाता था और मिलिटेंट्स को ढूंढ़ने के लिए उनके घरों की तलाशी ली जाती थी. बाहर निकाले गए लोगों की भी शिनाख्ती परेड होती थी और कइयों को शक की बिना पर भी गिरफ्तार कर लिया जाता था.

“और अगर सुरक्षा बालों पर कभी फ़ाइरिंग होती थी तो वे घरों में घुस कर भी मार-पीट करते थे” बिजहेबरा के कुछ लोग सत्याग्रह को बताते हैं.

ग़ुलाम नबी शेख भी इस सब से परेशान होकर अपना घर छोड़ कर पास के एक मोहल्ले में अपने रिश्तेदारों के पास रहने चले गए थे. “ऐसा नहीं था कि वहां ये सब नहीं था, लेकिन साथ रह के एक दूसरे को हिम्मत और दिलासा देके दिन कट रहे थे,”

शेख ने अपना घर इसलिए भी छोड़ दिया क्योंकि वह हाइवे के काफी नजदीक था और वहां आए दिन कुछ न कुछ होता ही रहता था, “मैं चाहता था कि मैं अपने बच्चों को सुरक्षित रखूं. मुझे डर था किसी दिन कुछ ऐसा न हो जाये जिसके बाद मुझे पछताना पड़े,”

हुआ भी बिलकुल वही जो शेख सोच रहे थे. 22 अक्टूबर, 1993 को सीमा सुरक्षा बल की फ़ाइरिंग में 33 लोग, शेख के घर के पास ही मारे गए थे. फ़ाइरिंग वहां प्रदर्शन कर रहे कश्मीरियों पर हुई थी. इसमें 200 से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे.

“मैं दो तीन साल अपने रिश्तेदारों के घर पर ही रहा, लेकिन उस बीच भी में जुत्शी के बाग को देखने ज़रूर आता था. साथ ही साथ, धीरे-धीरे, में मंदिर की भी देखभाल करने लगा” शेख बताते हैं.

जब शेख 1994 में अपने घर वापिस लौटे तो उन्होने पूरी तरीके से मंदिर की देखभाल अपने ज़िम्मे ले ली. जहां कश्मीर में कई मंदिर देख-रेख न होने के चलते असामाजिक तत्वों के हत्थे चढ़ गए थे वहीं ज़यादेवी (जयदेवी) मंदिर, शेख के रख-रखाव की वजह से बिलकुल बिलकुल सही हालत में है.

“भले ही जुत्शी जी ने अपना बाग बेच दिया लेकिन मैंने मंदिर की देख-रेख करना नहीं छोड़ा. मैंने मंदिर के दरवाजे और इसके अहाते पर लगे दरवाजे पर ताला लगा दिया. इनकी चाबी मेरे पास ही रहती है, सालों से. हर महीने में और मेरा बेटा पूरे मंदिर को धोते हैं और वहां उग आई घास वगैरह साफ करके इसको वैसे ही रखते हैं जैसे हमारे पंडित भाई रखते थे, जो अब यहां नहीं हैं” शेख थोड़ा दुखी होकर कहते हैं.

कुछ स्थानीय पंडित परिवार, जो अब जम्मू में रहते हैं, पहले कभी-कभार आया यहां करते थे और शेख का शुक्रिया अदा करते थे, लेकिन अब सालों हो गए यहां कोई नहीं आया है. लेकिन शेख और उनका परिवार इस मंदिर की पूरी ज़िम्मेदारी उठाने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं. लेकिन ऐसा करना सिर्फ इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि वे हिंदू नहीं हैं.

लेकिन सुनने में यह जितना आसान है उतना करने में है नहीं. शेख को बीते सालों में इस मंदिर की देखभाल करने की वजह से बहुत सी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा है.

90 के दशक के आखिरी सालों में पास में तैनात सुरक्षा बल इस मंदिर के बारे में सुन कर यहां आने लगे थे और कभी-कभार उसमें पूजा भी किया करते थे.

“एक दिन वो लोग आए और देखा कि किसी ने मंदिर कि छत्त पे भेड़ का फेफड़ा फेंका हुआ था. इससे वो बहुत उत्तेजित हो गए थे और में उन्हें समझा-समझा के थक गया था कि कश्मीरी पंडित इस चीज़ को बुरा नहीं समझते थे. वे लोग भी कभी-कभी ऐसी चीज़ें परिंदों के खाने के लिए डाल दिया करते थे. लेकिन वे सुरक्षा कर्मी बाहर के थे और कश्मीरी पंडितों की संस्कृति से बेखबर. तो जब मुझे लगा कि अब वे लोग मेरी पिटाई करने वाले हैं तो मैंने छत्त पे चढ़ के खुद वो फेफड़ा उतारा” शेख ने बताया.

अब सुरक्षाकर्मी नहीं आते. लेकिन परेशानियां जब-तब दूसरे रूपों में उनके सामने आती ही रहती हैं. शेख को परेशान करने वालों में सबसे आगे इलाक़े के नशेड़ी हैं, जिन्हें यह लगता है कि मंदिर वाली जगह उनके बैठने के लिए एक सुरक्षित स्थान हो सकता था, जहां वे आराम से बैठकर नशा कर सकते थे.

“दूसरी तरफ उनको लगता है कि मंदिर में शायद बेचने लायक कोई चीज़ हो जिसको चुरा कर वो अपने नशे का इंतजाम कर सकते हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं होने देता और इसके चलते इस इलाक़े के सारे नशेड़ियों से मैंने दुश्मनी मोल ले रखी है” शेख बताते हैं.

उधर मंदिर के पास खूबनी के कुछ पेड़ भी हैं और काफी छोटे छोटे लड़के हर वक़्त उसका फल चुराने की ताक़ में रहते हैं. “और फिर वो पड़ोसी जिनको लगता है कि मैंने शायद मंदिर की ज़मीन पे कब्जा कर लिया है” शेख कहते हैं, “वो लोग भी मुझे शक की निगाह से देखते हैं और फिर सबका एक ही सवाल कि मैंने किस हक़ से मंदिर पे ताला लगा के चाबी अपने पास रखी है.”

शेख इन सब चीजों को नज़रअंदाज़ करते हुए मंदिर की देखभाल कर रहे हैं, लेकिन अब उनको कुछ और भी चीजों से डर लगने लगा है.

“मैंने काफी लोगों से इस मंदिर के चलते दुश्मनी मोल ले रखी है और हर इंसान एक ही सोच का नहीं होता. मान लो कल को किसी ने इस मंदिर को कोई नुकसान पहुंचाया तो शायद सबसे पहले पुलिस मुझे ही पकड़ कर ले जाएगी. फिर मेरी कौन सुनेगा” शेख पूछते हैं.

वहीं अब उनकी उम्र भी ढल रही है, और वो चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी मंदिर के असली हकदार आकर इसको अपने हाथों में लें और उनको इस ज़िम्मेदारी से मुक्त करें.

“अब जो मैंने कर लिया शायद मेरे बच्चे न कर पाएं. मैंने कई फोन किए, जितने भी पंडितों को मैं जानता हूं और उनसे विनती की इस मंदिर को अपने हाथों में लेने की. लेकिन अभी तक कोई सामने नहीं आया है” शेख बताते हैं.

अब पता नहीं पंडित कश्मीर कब लौटेंगे और कब शेख अपनी इस पवित्र जिम्मेदारी से मुक्त होंगे, लेकिन इतने साल इस मंदिर की देखभाल करके शेख ने सांप्रदायिक सौहार्द्र की एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो आज-कल विलुप्त होने के कगार पर खड़ी दिख रही है.

लेकिन शेख कहते हैं उन्होने वही किया जो सही था. “वही जो एक पंडित करता अगर मुसलमान कश्मीर से चले गए होते.”