बताते हैं कि सागर मंथन के दौरान कई चीज़ों की प्राप्ति हुई थी. देवताओं के हाथ अमृत लगा और वे असुरों से अधिक शक्तिशाली हो गए. कोरोना का काल दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए सागर मंथन जैसा ही रहा है. कुछ इंडस्ट्रियल सेक्टर मालामाल हो गए और कुछ बेहाल.

कोविड 19 के दिनों में टेलिकॉम सेक्टर में जिस तरह से हलचल मची है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि टेलिकॉम सेक्टर के हाथों अमृत लग गया है और फिर से इसमें बहार आने वाली है.

कोविड से पहले, कोविड के दौरान

रिलायंस जिओ ने लंबे समय से इस क्षेत्र में टिके कई दिग्गजों को उखाड़ फेंका था. वोडाफ़ोन और आईडिया सेलुलर जैसे महारथी हाथ मिलाकर उससे मुकाबला करने की कोशिश कर रहे थे. भारतीय टेलिकॉम सेक्टर की कभी पोस्टर बॉय कंपनी रही एयरटेल भी जिओ के सामने नहीं टिक पा रही थी. बीएसएनएल और एमटीएनएल तो कब से मैदान छोड़कर दर्शक दीर्घा में बैठे थे. लग रहा था कि कुछ कंपनियों की दुकान बंद होने ही वाली है कि तभी कोविड-19 आ धमका.

कोविड-19 के दौरान देश भर में तालाबंदी रही. टेलिकॉम के दुकानदारों और डिस्ट्रीब्यूटरों का धंधा लगभग ठप रहा. नए कनेक्शन्स और रिचार्ज का बिज़नेस नहीं हो पाया. रही सही कसर ऑनलाइन पेमेंट्स ने पूरी कर दी. बहुत तेज़ी से अब रिचार्ज बिज़नेस ऑनलाइन होता जा रहा है.

लेकिन यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है. इसके दूसरे पहलू को समझने के लिए टेलिकॉम सेक्टर के स्टॉक्स पर नज़र डालनी होगी. यहां दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है. यहां तो टेलिकॉम शेयर्स में बहार आयी हुई है! 2018 में स्टॉक मार्किट छह फीसदी बढ़ा था पर टेलिकॉम स्टॉक्स 41 प्रतिशत गिर गए थे. इस साल मई के महीने में स्टॉक मार्किट 17 फीसदी टूटा पर टेलिकॉम स्टॉक्स में 15 फीसदी का उछाल है!

जून के महीने भी में लगभग यही ट्रेंड देखा गया. भारती एयरटेल का शेयर 559 रुपये के आसपास है जो लगभग 52 हफ़्ते, यानी एक साल में सबसे ऊंचे स्तर पर ट्रेंड कर रहा है. वहीँ, वोडाफ़ोन-आईडिया का शेयर जून के महीने में लगभग 20 फीसदी बढ़कर 10.50 रूपये पर चल रहा है. जिओ की अभी लिस्टिंग नहीं हुई है. लेकिन उसके हाल तो ठीक होने ही थे. बल्कि उसकी वजह से दूसरी कंपनियों के हाल बिगड़े थे.

फ़ौरी तौर पर आप यह कह सकते हैं कि कोविड के दौरान लोगों ने जमकर नेटफ्लिक्स और एमेज़ॉन प्राइम देखा है. ज़ूम कॉल और अन्य कांफ्रेंसिंग टूल्स के ज़रिये विडियो चैटिंग की है. पढ़ाई भी अब ऑनलाइन ही हो रही है. और आगे यह सब और ज्यादा होने और होते ही रहने की संभावना है. तो इसके चलते सारी टेलिकॉम कंपनियों की बल्ले-बल्ले हो गई है. पर बात इससे कहीं गहरी है.

क्यूं है ये हलचल

हाल ही में रिलायंस जिओ ने अपनी 10 फीसदी हिस्सेदारी फ़ेसबुक को 43,574 करोड़ रूपये में बेची है. फ़ेसबुक जो कि सोशल मडिया जायंट है, मोबाइल सर्विस में क्यूं एंट्री कर रही है? इस कहानी को टेलिकॉम कंसल्टेंट कंपनी मिंट इवेंटस के फाउंडर और सीईओ जीतू राही सिर्फ एक लाइन में ही साफ़ कर देते हैं. वे कहते हैं. ‘दिस इस अ मैरिज ऑफ़ कंटेंट एंड कनेक्टिविटी’.

अब इसको ऐसे समझिये. जिओ देश की सबसे बड़ी टेलिकॉम कंपनी बनने जा रही है. विशाल नेटवर्क और नेटवर्क की उम्र भी कम है, यानी जवान है. इसकी पेरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसा विशाल हाथी है. और सरकार भी उस पर मेहरबान ही दिखती है.

उधर फ़ेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है. उसे भारत में डाटा का विशाल मार्किट नज़र आता है. उसे एक ऐसे नेटवर्क यानी प्लेटफार्म की ज़रूरत है जहां से वह अपना कंटेंट लोगों तक पंहुचा सके. वहीं जिओ की स्ट्रेटेजी भी कंटेंट आधारित ही है और फेसबुक कंटेंट की दुनिया का किंग है. तो दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया है. लेकिन, ध्यान रहे कि इस तरह की यह अकेली घटना नहीं है.

गूगल भी वोडाफ़ोन-आईडिया के कुछ स्टॉक्स ख़रीदना चाह रहा है. ख़बर है कि वह लगभग इसके पांच फीसदी स्टॉक्स ख़रीद सकता है. अब गूगल की एंट्री समझिये. कोविड की वजह से चीजों के तेजी से हो रहे ऑनलाइनीकरण के साथ-साथ 5जी के आने पर क्लाउड कंप्यूटिंग बहुत ज़ोर पकड़ लेगी. इन्टरनेट ऑफ़ थिंग्स, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला होगा. ऐसे में सॉफ्टवेयर कंपनियों के पास एक टेलिकॉम प्लेटफ़ॉर्म भी होना सोने पर सुहागा जैसा होगा. वेब सर्विसेस यानी क्लाउड कंप्यूटिंग में गूगल माइक्रोसॉफ्ट के अज्योर और एमेजॉन वेब सर्विसेज से पीछे है. और अगर हिंदुस्तान में उसने एंट्री नहीं मारी तो फिर यह मान लीजिये कि उसकी आगे की लड़ाई मुश्किल हो जायेगी.

एमेजॉन भी एयरटेल में पांच प्रतिशत की हिस्सेदारी की प्लानिंग कर रहा है. यानी, दुनिया की तीन सबसे बड़ी कंपनियां भारत की टेलिकॉम कंपनियों की तरफ़ मोहब्बत की नज़रों से देख रही हैं. इसमें पहली बाज़ी फ़ेसबुक ने मार ली है और उसे सबसे जवान और ख़ूबसूरत कंपनी मिली है.

तो अब बात समझ में आ जाती है कि आख़िर क्यूं मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज में टेलिकॉम कंपनियों के शेयर्स में बहार आई हुई है.

इस बहार के तार चीनी कंपनियों से भी जुड़ते हैं लेकिन थोड़ा अलग तरीके से. भारत के मोबाइल हार्डवेयर मार्किट पर अब तक एकतरफ़ा कब्ज़ा रहा है. आंकड़ों के मुताबिक़ चीनी हैंडसेट कंपनियों की भारत में कुल हिस्सेदारी 71 फीसदी है. संभव था कि वे भी भारतीय मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों में पैसा लगाकर अपनी स्थिति और मज़बूत बनाना चाहतीं. लेकिन इतनी बड़ी तीन अमेरिकी कंपनियों के आने या आने का खबर से भारत की टेलिकॉम सेवा प्रदाता कंपनियों में घुसपैठ करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो गया.

ऊपर से लदाख में चीनी दखलंदाज़ी और गलवान घाटी में हुए संघर्ष और उसके बाद के हालात ने रही-सही कसर पूरी कर दी. इस वजह से आत्मनिर्भर या दूसरे शब्दों में बॉयकाट चाइना कैंपेन ने चीन की मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर मार्किट में एंट्री का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया है.

आगे क्या होगा

टेलिकॉम अत्यधिक निवेश वाला सेक्टर है. दुनिया भर में 4 जी के बाद 5 जी को लांच करने की तैयारी बहुत ज़ोर-शोर से हो रही है. इसके लिए कंपनियों को मोटे निवेश की ज़रूरत पड़ने वाली है. जीतू राही बताते हैं कि टेलिकॉम कंपनियों को अब नेटवर्क प्रोवाइडर की बजाय प्लेटफ़ॉर्म प्रोवाइडर बनना होगा ताकि आने वाले दिनों में मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर्स में इसका इस्तेमाल हो सके.

नाम न छापने की शर्त पर रिलायंस जिओ के एक अधिकारी कहते हैं “टेलिकॉम में फिर से बहार आने को है. ये दोबारा सनराइज इंडस्ट्री होने जा रही है और नेटवर्क और कंटेंट का मेल गुल खिलायेगा.’’ ऐसे में फ़ेसबुक, एमेजॉन और गूगल आगे की राह बनायेंगे. दुनिया की तीन सबसे बड़ी कंपनियों द्वारा किया गया भारतीय टेलिकॉम कंपनियों में निवेश सूरज का वह सातवां घोड़ा होगा जो टेलिकॉम के रथ को अब आगे लेकर जायेगा.