ख़बर है कि पाकिस्तानी सेना कोरोना वायरस से संक्रमित वहां के पंजाबियों को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर व गिलगित-बाल्टिस्तान में भेज रही है. स्थानीय जनता इसका भारी विरोध कर रही है, तब भी मीरपुर सहित कई प्रमुख शहरों में इन संक्रमितों के लिए कई क्वारंटीन शिविर बनाये गये हैं. पाकिस्तानी सेना चाहती है कि पंजाब में जहां कहीं सैन्य प्रतिष्ठान या सेना वालों के घर-परिवार हैं, उनके आस-पास कोरोना वायरस का कोई संक्रमित या पीड़ित नहीं होना चाहिये. गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों का मानना है कि उनके मानवाधिकारों को धता बताने वाली यह कार्रवाई उन्हें कोविड-19 का निशाना बनाने के लिए भी की जा रही है.

गिलगित-बाल्टिस्तान भारत की आजादी से पहले जम्मू-कश्मीर रियासत का ही हिस्सा था. 1947 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया तब गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरे कश्मीर का भारत में विलय हो गया. लेकिन उस समय से ही यह पाकिस्तान के कब्जे में है जबकि भारत इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है.

फिलहाल गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर का भी हिस्सा नहीं है और सिर्फ नाम के लिए ही पाकिस्तान का एक स्वायत्त इलाका है. इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें तो दक्षिण में यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जुड़ा हुआ है, पश्चिम में पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा प्रांत से, उत्तर में अफगानिस्तान से, पूर्व में चीन से, उत्तर-पूर्व में जम्मू-कश्मीर से और दक्षिण-पूर्व में लद्दाख से.

आरिफ़ आजाकिया मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले एक पाकिस्तानी हैं. 1980 वाले दशक में उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था. उनके पास फ्रांस की नागरिकता है, पर वे अब लंदन में रह कर अपना संघर्ष चलाते हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के इस वर्ष जेनेवा में हुए 43 वें सम्मेलन के दौरान उन्होंने वॉशिंगटन स्थित ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज़’ के निदेशक सेंगे सेरिंग से, जो स्वयं गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी और वहां होने वाले अत्याचारों के भुक्तभोगी रहे हैं, वहां की स्थिति के बारे में एक इंटरव्यू किया. इस इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण अंश.

गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तानी आधिपत्य को लेकर इस समय क्या ज़मीनी स्थिति है?

सेंगे सेरिंग वहां की जनता संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं. उसके पास आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं है. ऐसा कोई सरकारी ढांचा भी नहीं है जो उसे किसी प्रकार की स्वायत्तता देता हो. संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में उसे आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया था. बल्कि, एक प्रकार से गारंटी दी गयी थी कि जब तक समस्या हल नहीं हो जाती, वहां एक स्थानीय प्राधिकरण होगा. उस समय वहां पाकिस्तान का कोई अमल-दखल नहीं था. संयुक्त राष्ट्र ने तो पाकिस्तान से कहा कि आप वहां से जायें. हम भी जानते थे कि हमारा विलय भारत के साथ हुआ है. हम भारत के नागरिक हैं. हम समझते हैं कि अगर इसका कोई विलंबित हल है तो वह गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों और भारत की केंद्र सरकार के बीच से ही निकल सकता है. यह तो हुआ संक्षेप में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का सार.

लेकिन, हमारा तो सफ़ाया हो रहा है. हमारे बिना तो पाकिस्तान और चीन के बीच कोई ज़मीनी रास्ता ही नहीं है. दोनों की कोई साझी सीमा तो है नहीं. इस वजह से पाकिस्तान हताशा का शिकार है कि यदि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अमल हो गया और पाकिस्तान को वहां से निकलना पड़ा, तो उसके और चीन के बीच की जो आपसी मिलीभगत है, वह ख़त्म हो जायेगी. पाकिस्तान की इस कारण यही कोशिश होती है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों का दमन करते हुए उन्हें फौलादी मुट्ठियों में जकड़ कर रखा जाये. उनके प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम शोषण किया जाये. लोगों की अपेक्षाओं-आकाक्षांओं को मान्यता दिये बिना लूट-मार की जाये.

पाकिस्तान और चीन मिल कर यही कर रहे हैं. स्थानीय लोग जब भी विरोध का स्वर उठाते हैं तो उन पर आतंकवाद के मुक़दमे थोप दिये जाते हैं. आतंकवाद-निरोधक क़ानून लगा दिया जाता है. एक तरह का आपातकाल है वहां पर. लोगों को लगता है कि वे जेल में बंद हैं. पाकिस्तान तो एक ऐसा देश है, जो तालिबान को अमनपसंद कहता है और जो आम लोग अपने संसाधनों के लिए आवाज़ उठाते हैं, उनको आतंकवादी बताता है. पाकिस्तान अपने बलूचों और पख्तूनों के साथ जो कर रहा है, वही गिलगित-बाल्टिस्तान में भी कर रहा है.

गिलगित-बाल्टिस्तान में कई जातियों-धर्मों के लोग रहा करते थे, उनका क्या हाल है?

सेंगे सेरिंगहमारी जो इस्माइली बिरादरी है, उसे वहां रहने वाले पाकिस्तानियों द्वारा डराया-धमकाया गया कि गिलगित-बाल्टिस्तान के जो इस्माइली और शिया हैं, उन्हें मालूम है कि किस तरह से हमने उनके क़त्लेआम किये हैं. हम उन पर दुबारा हमला करेंगे. इस धमकी के पीछे इतिहास यह है कि गिलगित में ज़मीन पर अनधिकृत क़ब्ज़ा जमाए बैठे पाकिस्तानी नागरिकों का स्थानीय लोगों ने जब विरोध किया, तो उन्होंने हमारे कुछ स्थानीय लोगों का अपहरण कर लिया और उन्हें ख़ूजिस्तान में ले गये. गिलगित की स्थानीय पुलिस ने बाद में उन लोगों को गिरफ़्तार किया, जिन पर अपहरण करने का शक था.

इस गिरफ़्तारी के खिलाफ़ पूरा कोहिस्तान क़त्लेआम की धमकियां देने लगा. तो, हमारे लोग तो बेचारे एक तरह से जेल में रह रहे हैं. उनका ज़मीनी रास्ता पाकिस्तान से ही होकर गुज़रता है. वे खाने-पीने के सामान के लिए उसी रास्ते पर निर्भर हैं. रोज़मर्रा की ज़रूरतें पाकिस्तान से ही आती रही हैं. भारत के साथ वाले रास्ते जान-बूझ कर बंद रखे गये हैं, ताकि हमें पाकिस्तान का मुंह जोहने के सिवाय कोई दूसरा चारा न रहे. अफ़ग़ानिस्तान के साथ के हमारे रास्ते भी बंद हैं. सिर्फ चीन और पाकिस्तान के बीच के रास्ते खुले हैं, ताकि हमें ब्लैकमेल कर के और एक प्रकार से जेल में बंद रख कर हमारे ऊपर अपनी मनमर्ज़ी और धौंस चला सकें. हमारा शोषण कर सकें.

गिलगित-बाल्टिस्तान की जनसंख्या में इस्माइली बिरादरी का, शिया-सुन्नी का क्या अनुपात है और क्या ग़ैर-मुस्लिम भी वहां रहते हैं?

सेंगे सेरिंगमुझे याद है कि अरगनोख़ हमारा एक गांव है, जहां पर स्थानीय आबादी ग़ैर-मुस्लिमों की होती थी. लेकिन 1971 के युद्ध के आस-पास वे भारत की तरफ पलायन कर गये. जहां तक मुझे पता है, इस समय वह शतप्रतिशत एक मुस्लिम इलाका है. अगर आप पाकिस्तान से आकर बस गयों को ना देखें, तो जो मूल निवासी हैं और उनमें उन लोगों को भी जोड़ लें, जो रोज़मर्रा की अपनी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए या शिक्षा-व्यापार जैसे अवसरों के लिए अस्थायी तौर पर पाकिस्तान में रह रहे हैं तो हमारी कुल क़रीब दो-ढाई लाख की जनसंख्या है. इस्लामाबाद-रावलपिंडी में भी एक लाख से ऊपर हमारे लोग हैं. ये सारे मिला कर कह सकते हैं कि जो स्थानीय शिया आबादी है जिसमें बारेइमामी हैं, सूफ़ी नूरबख़्शी हैं, जाफ़ीशिया हैं, ईशशिमामी और इस्माइली हैं इन सबको मिलाकर कह सकते हैं कि इनकी क़रीब 70-75 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या है. यह अनुपात क़रीब 80 प्रतिशत हो जायेगा, यदि मूल स्थानीय निवासियों को भी इसमें मिला लें.

लेकिन, अब पाकिस्तान से आये लोगों की बाढ़ के चलते मिली-जुली जनसंख्या काफ़ी बढ़ गयी है. अकेले गिलगित शहर में ही लगभग 115 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इसी प्रकार चित्राल, स्वात और कोहिस्तान में भी आबादी बढ़ी है. सभी लोगों को जोड़ कर देखें, तो कह सकते हैं कि अब सुन्नी कम से कम 35 प्रतिशत हो गये होंगे. ये पाकिस्तान की बदनीयती है, बेईमानी है कि वह स्थानीय शियों को निष्ठावान नहीं मानता. वह समझता है कि जब आप शियों को अल्पसंख्यक बना देंगे, जैसा कि पारेचेनार में किया गया है पारेचेनार में किसी ज़माने में 80-85 प्रतिशत शिया होते थे तो उनकी तरफ़ से विरोध भी कम हो जायेगा. तालिबान को भी ला कर वहां आबाद किया गया है. तो इस तरह शियों का अनुपात घटते-घटते अब क़रीब 40 प्रतिशत पर आ गया है. पाकिस्तान की यही कोशिश है कि शिया, इस्माइली, नूरबख़्शी जब 50 प्रतिशत से कम हो जायेंगे, यानी अल्पसंख्यक बन जायेंगे, तो वहां के स्थानीय लोगों को नियंत्रित करना आसान हो जायेगा. स्थानीय लोगों को पाकिस्तान अपने लिए ख़तरा समझता है.

क़ाफ़िरिस्तान एक शब्द है, जिसे गिलगित-बल्टिस्तान से जोड़ा जाता है. इस काफ़िरिस्तान के बारे में कुछ बतायें, वहां ग़ैर-मुस्लिम तो अब हैं नहीं?

सेंगे सेरिंगजो ड्यूरंड लाइन है अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच, उसके ऊपर जो इलाक़े और घाटियां हैं, उनको मिलाकर क़ाफ़िरिस्तान कहा जाता है. ये चित्राल का कुछ इलाका़ है, लेकिन अधिकतर अफ़ग़ानिस्तान में है. तो, ज्यों-ज्यों वहां के लोग मुसलमान होते गये, उनको काफ़िर कहना छोड़ दिया गया. इसी तरह जो नूरिस्तान है, वह पहले क़ाफ़िरिस्तान का हिस्सा था. वहां के लोग जब मुसलमान हो गये, तो उसे नूरिस्तान कहना शुरू कर दिया. वे दरअसल एक स्थानीय दार्दिक क़बीला हैं, जिनका भाषायी और जातीय (एथनिक) मेल गिलगित के लोगों के साथ है, चलास के लोगों के साथ है. लद्दाख में इस तरह के बहुत से लोग दाहनू में भी हैं. कश्मीर में भी हैं. हमारे दार्दिक समुदाय की जड़ें मध्यप्रदेश में हैं. वहीं से वे आये थे. वे अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान में भी बस गये.

दुर्भाग्य से इन लोगों पर बहुत अत्याचार होता है. उन्हें ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है. पाकिस्तान में ‘जमाते इस्लामी’ के जो जत्थे हैं, और हमारे केलाश में जो लोग हैं, वे उनको तंग करते हैं. उनकी लड़कियों को तंग करते हैं. ज़बर्दस्ती धर्मांतरित करते हैं. उन्हें अपनी संस्कृति के लिए शर्मिंदा किया जाता है. उन्हें एक सामजिक कलंक बना दिया गया है. यह घुट्टी पिला दी गयी है कि जो मुलमान नहीं है, वह कोई सच्चा एथनिक या धार्मिक समुदाय नहीं हो सकता. उन पर धर्मांतरण करने का भारी दबाव है. बताया जाता है कि इन लोगों की संख्या अब डेढ़-दो हज़ार से भी कम रह गयी है.

धारा 370 भारत में हटा दी गयी है. इसका आप से सीधा संबंध है. गिलगित-बल्टिस्तान महाराजा हरि सिंह के कश्मीर का हिस्सा हुआ करता था. इससे आपके लोगों को कोई लाभ-हानि हो सकती है?

सेंगे सेरिंगहम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत आभारी हैं कि उन्होंने इतना बड़ा क़दम उठाया. इसे तो 70 साल पहले ही हो जाना चाहिये था. प्रधानमंत्री नेहरू ने जब इसे शब्दबद्ध किया और भारत के संविधान का एक अनुच्छेद बनाया, तब उन्होंने कहा था कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है, समय के साथ ख़त्म हो जायेगी. लेकिन, राजनैतिक दबाव के कारण वे ऐसा नहीं कर पाये. प्रधानमंत्री मोदी का यह बहुत ही अच्छा क़दम है. इसमें गिलगित-बल्टिस्तान के लिए जो सबसे बड़ा आशीर्वाद है, वह यह कि हम हमेशा से कहते आये हैं कि जम्मू-कश्मीर के जो एथनिक ग्रुप हैं, उनके साथ हमारा संबंध नहीं है. हमारी लद्दाख़ से जुड़ी अपनी एक अलग पहचान है. अनुच्छेद 370 को हटा कर लद्दाख को एक अलग प्रदेश का, संघीय क्षेत्र का जो दर्जा दिया गया है, वह बहुत अच्छी बात है. अब हम क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर लद्दाख का हिस्सा बन गये हैं. भारत का हिस्सा तो हम पहले भी थे.

1949 में भारत का जो संविधान बना था, उसने हमें भारत का हिस्सा बना लिया था, लेकिन कश्मीर से जोड़ रखा था. अब हमें कश्मीर से निकाल कर लद्दाख का हिस्सा बनाया गया है. इस प्रकार हमारी पहचान को पुनर्स्थापित किया गया है. मनुष्य अपने इतिहास में जिस बात के लिए सबसे अधिक संघर्ष करता है, वह है उसकी अपनी पहचान. लद्दाख के साथ जोड़कर हमारी पहचान को बहाल करने के लिए हम मोदी जी को सैल्यूट करते हैं.

इस क़दम के बाद हम यह भी देख रहें हैं उनके ऊपर कितने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ रहे हैं. लेकिन हम उनको सैल्यूट करते हैं कि वे हिम्मत के साथ अडिग हैं. चुनाव-घोषणापत्र के अपने वादे को पूरा किया है. हम यहां संयुक्त राष्ट्र की बिल्डिंग में हैं. संयुक्त राष्ट्र से हमारी यही मांग और उससे यही अनुरोध है कि पाकिस्तान पर दबाव डाला जाये कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अब अमल करे. हमारे इलाके से पीछे हटे, ताकि भारत के संविधान के अधीन हमें जो लाभ मिलने हैं, भारत का नागरिक होने के हमें जो अधिकार मिलने हैं, उन्हें हम पा सकें.

धारा 370 हटाने के साथ कश्मीर में जो पाबंदियां लगाई गयीं, जो सख़्तियां हुयीं, भारत के लिए क्या यह सब ज़रूरी था?

सेंगे सेरिंगदेखिये, 370 को हटाते समय पाकिस्तान की ओर से बहुत-सी धमकियां आयी थीं. इमरान ख़ान ने कहा था कि वहां खून की नदियां बहेंगी. जनसंहार होगा. पाकिस्तान के पाले हुए सारे आतंकवादी तैयार बैठे थे कि स्थानीय लोगों के साथ, जमाते इस्लामी के जो ग्रुप दक्षिणी कश्मीर में हैं, उनके साथ मिल कर वे मारकाट करेंगे, ताकि दुनिया में यह संदेश जाये कि जम्मू-कश्मीर में जो हो रहा है, वहां की पूरी जनता उसके खिंलाफ है. पाकिस्तान को इसका बहुत ज़्यादा रणनीतिक लाभ मिलना था.

लेकिन, अपने नागरिकों की जान बचाना हर सरकार का पहला कर्तव्य होता है. दिल्ली की सरकार हो या श्रीनगर की, दोनों की यही सबसे पहली ज़िम्मेदारी थी. संयुक्त राष्ट्र ने भारत से कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान में, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आपकी ज़िम्मदारी है कि वहां के लोगों के जीवन, सम्मान और माल-सामान की रक्षा हो. यह तो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भी लिखा है कि किसी भी सरकार की मूल जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों के जीवन, मान-सम्मान और माल-सामान की रक्षा करे. पाकिस्तान एक बहुत बड़ी साज़िश के तहत वहां नरसंहार करना चाहता था.

भारत सरकार ने बड़ी सावधानी व सफलता के साथ स्थिति को संभाला. लोगों की हरकतों को, टेलीफ़ोन द्वारा या सोशल मिडिया द्वारा दंगा-फ़साद फैलाने वालों को काबू में रखा. विरोध-प्रदर्शन हर देश में एक मौलिक अधिकार होता है. लेकिन पाकिस्तान का यह इतिहास रहा है कि वह अपने मनपसंद ग्रुपों द्वारा भारत में हमेशा घेराव-जलाव करवाता है, आगज़नी करवाता है. इन चीज़ों से बचाने के लिए और आम जनता को सुरक्षा देने के लिए भारत ने जो क़दम उठाये, वे बहुत ज़रूरी थे. भारत सरकार इसमें काफ़ी हद तक सफल भी रही.

सीएएवैसे तो भारत का आंतरिक मामला है, पर पाकिस्तान उसका सफलता के साथ जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाभ उठा रहा है, उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सेंगे सेरिंगहाल ही में वाशिंगटन डीसी में एक सेमिनार हुआ था, जिसमें मुझे अपनी बात कहने का मौका दिया गया. उस सेमिनार में हमारे एक दोस्त खंडाराव जी ने इस मुद्दे को उठाया. उन्होने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका नाम ही ग़लत है. इसका नाम ‘रेफ्यूजी प्रोटेक्शन ऐक्ट’ होना चाहिये था. नाम में ‘नागरिक’ शब्द लगाकर कर यह आभास दिया गया कि भारतीय नागरिकों के साथ कोई समस्या है. जबकि ये क़ानून पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आये शरणार्थियों के बारे में है. इसका नाम ही भ्रामक है. इसका नाम यदि शुरू से ही ‘रेफ्यूजी प्रोटेक्शन ऐक्ट’ रहा होता, तो मैं नहीं समझता कि तब भारत के किसी नागरिक को यह बहाना मिलता कि वह उसका ग़लत इस्तेमाल करके पाकिस्तान को लाभ पहुंचा सके. मैं भी मुसलमान हूं और मैं समझता हूं कि इस क़ानून के नाम का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हमारी मुस्लिम बिरादरी ने ही किया है. उसके साथ भारत के वामपंथी भी जुड़ गये हैं. इससे पाकिस्तान में जो बहुत सारी शक्तियां हैं, उनके साथ मिलकर इन लोगों ने एक बहुत बाड़ा भारत-विरोधी बाज़ार बना लिया है. भारत सरकार को दबाव में डाल दिया है.

हमारे-जैसे पाकिस्तानी मुसलमान पाकिस्तान में रहते हुए सदा अल्पसंख्यकों के हितों की पैरवी करते रहे हैं. अपने स्कूल-कॉलेज के ज़माने से ही जब से हमें कुछ समझ आयी, हम कहने लगे कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण व पालन होना चाहिये. यह बड़े दुख की बात है कि बहुत से मुसलमान, जो पहले अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खड़े होते थे, इस समय उनके विरोध में खड़े होकर एक ग़लत सोच में फंस गये हैं; इस सोच में कि यह शायद भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों की नागरिकता से जुड़ा कोई मामला है.

हमें तो भारत सरकार को सैल्यूट करना चाहिये कि वे लोग, जो पिछले 70 साल से सिंध में, पंजाब में, बलोचिस्तान में अपने धर्म के कारण मर रहे थे, क़त्ल हो रहे थे, उनकी लड़कियां उठा ली जाती थीं, उनको भारत में अब एक नया शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा. बंग्लादेश में भी हिंदू अल्पसंख्यक कभी 25 प्रतिशत से भी अधिक होते थे. अब कम होते-होते 7-8 प्रतिशत ही रह गये हैं. ‘सीएए’ ज़बर्दस्ती धर्मांतरण और हत्याओं से अल्पसंख्यकों की जान बचायेगा. अफ़ग़ानिस्तान से भी 30 हज़ार सिक्ख भारत में बैठे हुए हैं. मैं बहुत खुश हूं कि पाकिस्तान में अत्याचार सह रहे बहुत से हिंदुओं को भारत में एक नया जीवन मिल सकता है. दुख इस बात का है कि पाकिस्तान के बहुत से मानवाधिकारवादी भी बिना ठीक से पढ़े-समझे, सिर्फ हिंदू- दुश्मनी में, भारत-दुश्मनी में आकर इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं. वे पाकिस्तान सरकार और इस्टैब्लिशमेंट (सैनिक तंत्र) के साथ खड़े हो गये हैं, जिनका काम ही अल्पसंख्यकों का दमन और शोषण करना है.

हम देखते हैं कि यूएन (संयुक्त राष्ट्र) में, यूरोपीय संसद में, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेन्ट (विदेशमंत्रालय) में या अन्य जगहों पर पाकिस्तान को कोई कुछ नहीं बोलता, जहां मानवाधिकार बिल्कुल हैं ही नहीं, जबकि भारत के बारे में दुनिया तुरंत बोलने लगती है. इसकी क्या वजह है?

सेंगे सेरिंगजहा तक यूएन का संबंध है, तो यूएन तो एक फ़ोरम (मंच) है. यहां जेनेवा में हो, ऑस्ट्रिया में हो, न्यूयार्क में हो या कही भी हो, अलग-अलग देशों के एकसाथ मिल-बैठने की वह एक जगह है. यहां उन लगों की चलती है, जो लॉबीइंग करते हैं. यह नैतिक शक्ति को मनवाने की कोई संस्था नहीं है. पकिस्तान को सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि वह हमेशा अपना इस्लामी कार्ड इस्तेमाल करता है, और इस्लाम के नाम पर मुस्लिम देश उसके साथ हो जाते हैं. इसी तरह जो वामपंथी झुकाव वाले देश हैं, वे मुस्लिम देशों के पक्षकार बनते हैं. चीन उनका साथी बन कर उनके साथ बैठ जाता है.

पाकिस्तान अपने आप को एक अंडरडॉग (शोषित-उपेक्षित) दिखाता है. दुनिया भर में अपना फ़साद फैलाए हुआ है, फिर भी अपने आप को मजलूम (अत्याचार-पीड़ित) के तैर पर पेश करता है. भारत की कमी यह है कि वह एक अंतर्मुखी देश है. गुटनिरपेक्षता आन्दोलन में उसका जो रोल रहा है उसके कारण, 1940 और 50 वाले दशकों में (इस्लामी और पश्चिमी देशों से) उसके जो गठजोड़ बनने चाहिये थे, वे नहीं बन पाये.

भारत नें 1980-90 वाले दशकों में इस की शुरुआत की, तो ज़ाहिर है कि जब आप किसी चीज़ को देर से शुरू करते हैं, तो उसका नतीजा भी उसी तरह देर से ही मिलेगा. भारत अब धीरे-धीरे जाग रहा है. महसूस कर रहा है कि वह जब तक दूसरे देशों के साथ मिल कर लॉबीइंग नहीं करेगा, तब तक अपने बारे में पाकिस्तान द्वारा तुर्की जैसे मुस्लिम देशों में फैलायी गयी ग़लत धारणाओं की और चीन के साथ मिल कर बने उनके भारत-विरोधी गठजोड़ की काट नहीं कर पायेगा. भारत अब जिस रास्ते पर है, उससे आशा बंधती है कि दुनिया के देश भी धीरे-धीरे समझ जायेंगे कि भारत बाकी दुनिया के लिए कोई ख़तरा नहीं है. उसने कभी किसी दूसरे देश में जा कर वैसी कोई तबाही नहीं की है जैसी पाकिस्तान ने की है. पाकिस्तान ने जो भारत-विरोधी माहौल बनाया है, वह बहुत दिनों तक नहीं टिकेगा.