सैन्य इतिहासकारों के लिए बालाकोट वह जगह है जहां मई 1831 में महाराजा रणजीत सिंह और सैयद अहमद बरेलवी की फौजों के बीच एक बड़ा युद्ध हुआ था. उधर, आम आदमी बालाकोट को एक ऐसी जगह के तौर पर जानता है जहां फरवरी 2019 में भारतीय वायु सेना ने जैश-ए-मोहम्मद के एक ट्रेनिंग कैंप पर हमला किया था.

इस लेख का विषय भी बालाकोट ही है, हालांकि उसका संबंध एक तीसरी घटना से है जो बाकी दोनों घटनाओं के दरम्यान घटी थी. मई 1939 में एक महान भारतीय देशभक्त ने बालाकोट और इसके आसपास की जगहों की यात्रा की थी. इस भारतीय ने अपनी डायरी में यहां के भूगोल और लोगों का एक विवरण भी लिखा था. इस अप्रकाशित डायरी की एक प्रति हाल ही में मुझे आर्काइव्स में मिली.

इस भारतीय देशभक्त का नाम कभी मेडलिन स्लेड हुआ करता था. वे एक ब्रिटिश एडमिरल की बेटी थीं जो बाद में महात्मा गांधी की अनुयायी बन गईं और अहमदाबाद और सेवाग्राम स्थित उनके आश्रमों में रहीं. उन्होंने अपना नाम मीरा रख लिया था. भारत से उन्हें इतना प्रेम था कि वे आजादी की लड़ाई में शामिल हुईं और उन्होंने लंबे समय तक जेल भी काटी. मीरा बेन ने शोषितों का पक्ष लेने के लिए देश और नस्ल की दीवार तोड़ दी थी. स्वाधीनता संग्राम से जुड़े साहित्य में उनका उल्लेख आदर के साथ किया जाता है.

मैं मीरा बेन के बारे में काफी कुछ जानता हूं, लेकिन यह मुझे हाल ही में पता चला कि उन्होंने 1939 में बालाकोट की यात्रा की थी. तब भारत और पाकिस्तान दो अलग मुल्क नहीं थे. बालाकोट ब्रिटिश भारत के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविसेंज (एनडब्लूयएफपी) में पड़ता था. यह सूबा खुदाई खिदमतगार नाम के एक समूह का भी इलाका था. इसकी कमान एक ऐसे शख्स के हाथ में थी जो गांधी के मीरा बेन से भी बड़े अनुयायी थे. उनका नाम था खान अब्दुल गफ्फार खान. उन्होंने अपने नैतिक बल से आक्रामक पठानों में अहिंसा और सहिष्णुता भर दी थी.

1939 के बसंत की बात है. गांधी जी ने मीरा बेन को फ्रंटियर प्रोविंस भेजा. मकसद था इस इलाके में चरखा कताई और बुनाई का प्रचार. इसी यात्रा के दौरान मीरा बेन एबटाबाद (जहां अमेरिकी नेवी सील्स ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था) से सड़क के जरिये बालाकोट गई थीं. मीरा बेन ने अपनी डायरी में इस यात्रा का वर्णन कुछ ऐसे किया है: ‘गांवों-खेतों के चारों ओर और नालों के किनारे हरे-भरे पेड़ दिखते हैं. पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीदार खेत समुंदर की लहरों की तरह नजर आते हैं जिनमें भूरे और हरे रंग की विविधिता के दर्शन होते हैं. इस छोटी सी दुनिया को नीली पहाड़ियां घेरे हैं जिनके पार विशाल हिमशिखर हैं.’

बालाकोट का रास्ता आधा तय कर चुकने के बाद मीरा बेन और उनके खुदाई खितमतगार साथी एक जगह पर रात बिताने के लिए रुके. अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मीराबेन ने थोड़ी सैर की. उन्होंने लिखा है, ‘खेतों में काम शुरू हो चुका था. मक्का की फसल खलिहान में थी और साथ ही साथ बुआई का काम भी चल रहा था. जब मैं अपने ठिकाने पर लौट रही थी तो मुझे कोयल की मीठी कूक सुनाई दी.’

नाश्ते के बाद मीराबेन और उनके साथी बालाकोट की तरफ रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने वन विभाग का एक बंगला दिखा जिसे देखकर मीरा बेन को ख्याल आया कि ‘इस जगह बापूजी थोड़ा विश्राम कर सकते हैं.’ यह बंगला 3900 फीट की आरामदायक ऊंचाई पर था: ‘जंगल में अकेली इमारत जिसके पीछे हिम शिखर थे और नीचे पर्वत और घाटियां. यह निश्चित तौर पर एक आकर्षक ठिकाना है, पर यहां पर पानी की कमी है.’ (गांधी इससे पिछले साल ही फ्रंटियर प्रोविंस आए थे और फिर से यहां की यात्रा के बारे में सोच रहे थे. हालांकि ऐसा हो न सका, लेकिन आज यह सोचना ही अजीब लगता है कि वे बालाकोट के इतने नजदीक स्थित किसी बंगले में स्वास्थ्य लाभ कर सकते थे.)

बालाकोट गांव का रास्ता कुनहर नदी की घाटी से होकर जाता था. सड़क ‘संकरी’ और ‘खराब’ थी. ‘खड़ी चढ़ाई और मोड़’ थे. गड्ढों और मोड़ों वाली इस सड़क पर गाड़ी बहुत दिक्कत के साथ चल रही थी. मीरा बेन ने लिखा है कि वे इस जगह की खूबसूरती में खो गई थीं. उनके शब्द हैं, ‘हालांकि सड़क नदी के दाएं किनारे के साथ-साथ ही चल रही है और बर्फीले पहाड़ों से नीचे आ रही इस नदी का रूप बहुत रौद्र है. पहाड़ी ढलानों से तेजी से नीचे उतरती और कई मोड़ों से टकराती इस नदी में वैसी ही विशाल लहरें उठ रही हैं जैसी साबरमती में बाढ़ के समय उठा करती हैं. इसके किनारों पर जहां-तहां उन विशाल पेड़ों के तने पड़े हैं जो इसके रास्ते में आ गए.’

अपनी मंजिल पर पहुंचने के बाद मीरा बेन ने उस जगह का भी सजीव वर्णन किया है. उन्होंने लिखा है, ‘बालाकोट एक छोटी से पहाड़ी के एक तरफ बसा एक बड़ा और घना गांव है जो किसी मधुमक्खी के छत्ते जैसा लगता है. यह कंगन घाटी के ठीक मुहाने पर बसा है. यहां कोई सड़क नहीं है. सिर्फ पत्थरों से बने पैदल रास्ते हैं जो सीढ़ियों जैसे ज्यादा लगते हैं. अक्सर इन रास्तों से पानी की कोई धारा भी गुजर रही होती है. बाजार भी घना बसा है और नीचे के घर की छत ऊपर वाले घर के लिए छज्जे का काम करती है. दुकानदारों में से कई हिंदू और सिख हैं.’

मीरा बेन को बताया गया कि बालाकोट में रहने वाले गुज्जर कताई और बुनाई करते हैं और बहुत अच्छे कंबल बनाते हैं. लेकिन यह जानकर उन्हें निराशा हुई कि ये गुज्जर अभी वहां नहीं थे. वे हर बार की तरह साल के इस वक्त ऊंचे पहाड़ों में स्थित चरागाहों की तरफ जा चुके थे. यह जानकर मीरा बेन निराश हो गईं. इस पर उनके साथ आए खुदाई खिदमतगार के एक नेता अब्बास खान ने कहा कि वे किसी को गुज्जरों के पास भेजेंगे ताकि उनमें से कुछ अगले दिन तक नीचे यानी गांव में आ जाएं. ऐसा ही हुआ. गुज्जरों के गांव में आने के बाद मीरा बेन ने उनसे ऊन के उनके काम के बारे में कई सवाल किए.

बालाकोट से मीरा बेन और उनके साथी और भी ऊंचे पहाड़ों की तरफ गए. वे भोगरमंग नाम के एक गांव में रुके. यहां करीने से बनाए गए धान के खेत थे और गांव वाले बुनाई और मधुमक्खी पालन का काम भी कर रहे थे. मीरा बेन इससे बहुत प्रभावित हुईं. लेकिन इससे भी ज्यादा खुशी उन्हें एक दूसरी चीज से हुई. जैसा कि उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है, ‘जिस चीज ने इस गांव में मुझे सबसे ज्यादा खुशी दी वह थी हिंदू-मुस्लिम एकता... एक हिंदू परिवार, जिसका मुखिया, सफेद बालों वाला एक छोटे कद का शख्स था, गांव के नौजवान खान समुदाय के लोगों के साथ बहुत प्रेम से रह रहा था. इन लोगों का कहना था कि यह शख्स उनके पिता और दादा का दोस्त रहा है और दोनों समुदायों के बीच हमेशा आपसी सहयोग और एक-दूसरे की फिक्र का संबंध रहा है.’ यह सुनकर मीरा बेन ने आगे लिखा, ‘स्वाभाविक ही है कि मेरे हृदय में प्रार्थना उठी कि कोई नेता इस छोटे से गांव में न पहुंचे और इसके मधुर और सहज जीवन पर ग्रहण न लगे.’

हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल यह गांव मीरा बेन की यात्रा का आखिरी पड़ाव था. अगली सुबह वे एबटाबाद लौट आईं. कुछ ही हफ्ते बाद वे सेवाग्राम आश्रम में थीं. सितंबर 1939 में यूरोप में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया जिसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया. भारत और इसके लोगों के लिए इस लड़ाई के जो नतीजे रहे उनमें से एक हिंदू और मुसलमानों के बीच मौजूद दरार का चौड़ा होना भी था. मीरा बेन को आशंका थी कि इस आग को नेता और भड़का रहे थे जो दोनों समुदायों में अच्छी-खासी तादाद में थे. युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, फ्रंटियर प्रोविंस में गफ्फार खान की पार्टी का आधार तेजी से सिमटता गया और मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ता गया. इसके साथ ही यहां सांप्रदायिक सहिष्णुता पूरी तरह ध्वस्त हो गई. हालांकि यहां अगस्त 1947 के बाद वैसे खूनी दंगे नहीं हुए जैसे पंजाब में हुए थे, लेकिन यहां रह रहे हिंदुओं और सिखों को भी पाकिस्तान छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी.

जिस बालाकोट में मीरा बेन 1939 में गई थीं वह आज पूरी तरह बदल चुका है. अब यहां का ताना-बाना बहुधार्मिक नहीं है. इसके बजाय यहां इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाले जिहादियों का ट्रेनिंग कैंप है. बालाकोट के नजारे भी अब काफी बदल चुके होंगे जैसा कि दक्षिण एशिया के दूसरे पर्वतीय इलाकों में हुआ है, जहां जंगल तेजी से घटे हैं और पत्थर और लकड़ी के सुंदर मकानों की जगह कंक्रीट के बदसूरत ढांचों ने ले ली है. बालाकोट की स्थानीय शिल्प कलाएं भी विलुप्ति के कगार पर होंगी.

इस लेख में हमने ऐतिहासिक स्मृति के एक टुकड़े की बात की, लेकिन आखिर में मैं इस बारे में विचार करना चाहूंगा कि उस अतीत से हमारा वर्तमान क्या सीख ले सकता है? नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंसेज को आज खैबर पख्तूनख्वा कहा जाता है और यहां मुट्ठी भर ही हिंदू और सिख बचे हैं. दूसरी तरफ, भारत के ज्यादातर राज्यों में मुस्लिम अल्पसंख्यक काफी संख्या में हैं. क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस देश के गांवों में हिंदुओं और मुसलमानों में वही आपसी सहयोग और एक-दूसरे की फिक्र का माहौल बनाया जा सकेगा? या हमारे ‘नेता’ ऐसा नहीं होने देंगे?