अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर (साउथ चाइना सी) में परमाणु शक्ति से लैस दो विमानवाहक युद्धपोत भेजे हैं. वाल स्ट्रीट जरनल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार से इस इलाके में अमेरिकी नौ सेना अपने सबसे शक्तिशाली एयरक्राफ्ट कैरियर, यूएसएस निमित्ज़ (सीवीएन 68) और यूएसएस रोनाल्ड रीगन (सीवीएन 76) के साथ युद्ध अभ्यास करेगी. बताया जा रहा है कि अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में अपनी मौजूदगी इस इलाके में चीन की बढ़ती गतिविधियों के चलते बढ़ाई है. नौ सेना का कहना है कि यह युद्ध अभ्यास ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसेफिक’ रणनीति को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है. अमेरिका की इस रणनीति का उद्देश्य इस जलक्षेत्र में व्यापारिक परिवहन को सुगम बनाए रखना है.

बीते कुछ समय से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) इस विवादित जल क्षेत्र में लगातार सैनिक अभ्यास कर रही है जिस पर पड़ोसी देश आपत्ति जताते रहे हैं. बीते हफ्ते फिलीपीन्स और वियतनाम ने आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशन्स) के एक आयोजन में दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के कारण असुरक्षा और तनाव का माहौल बनने को लेकर चिंता जताई थी. इनका कहना था कि चीन कोरोना वायरस के चलते पैदा हुए संकट का फायदा उठाकर विवादित जल क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है.

एक जुलाई से भी पीएलए ने पांच दिन का एक और सैन्य अभ्यास शुरू किया है. यह अभ्यास पैरसल द्वीप पर किया जा रहा है. इस द्वीप पर वियतनाम और फिलीपीन्स अपना अधिकार बताते रहे हैं. इस मामले को लेकर वियतनाम चीनी विदेश मंत्रालय में अपनी आपत्ति भी दर्ज करवा चुका है.

दरअसल चीन, दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी इलाके पर अपना अधिकार जताता है जहां से लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर (लगभग ढाई लाख करोड़ रुपए) का व्यापार होता है. बीते एक दशक में चीन यहां के कई इलाकों में कृत्रिम द्वीप और मिलिट्री ग्रेड एयरफील्ड्स बनाने की तैयारी करता दिखाई दिया है. वहीं, दक्षिण चीन सागर के कई हिस्सों पर ताईवान, वियतनाम, फिलीपीन्स, ब्रूनेई और मलेशिया भी अपना अधिकार जताते रहे हैं.