भारत में साठ के दशक में शुरू हुआ अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, एक ऐसा आंदोलन था जिसने भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव किया. प्रख्यात समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया इस आंदोलन के प्रणेता थे. वे चाहते थे कि राजकाज के लिए अंग्रेजी की जगह पूर्ण रूप से भारतीय भाषाओं को अपनाया जाए. वैसे भारतीय संविधान जब लागू हुआ तब उसमें भी यह व्यवस्था दी गई थी कि 1965 तक सुविधा के हिसाब से अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन उसके बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया जाएगा.

इससे पहले कि संवैधानिक समयसीमा पूरी होती, लोहिया ने 1957 में अंग्रेजी हटाओ मुहिम को सक्रिय आंदोलन में बदल दिया. वे पूरे भारत में इस आंदोलन का प्रचार करने लगे. लेकिन इस दौरान दक्षिण भारत के राज्यों खासकर तमिलनाडु में इस आंदोलन का विरोध होने लगा. यहां लोगों को लग रहा था कि अंग्रेजी हटाने की आड़ में उनके ऊपर हिंदी थोपे जाने की कोशिश हो रही है. इसका असर यह हुआ कि राज्य में अन्नादुराई के नेतृत्व में डीएमके पार्टी ने हिंदी विरोधी आंदोलन को और तेज कर दिया.

1962-63 में जनसंघ भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गया. इसके बाद कुछ शहरों में आंदोलन का हिंसक रूप भी देखने को मिला. कई जगह दुकानों के ऊपर लिखे अंग्रेजी के साइनबोर्ड तोड़े जाने लगे. 1965 की समयसीमा नजदीक होने की वजह से तमिलनाडु में भी हिंदी विरोधी आंदोलन काफी आक्रामक हो गया. यहां दर्जनों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया. इस आंदोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1963 में संसद में राजभाषा कानून पारित करवाया. इसमें प्रावधान किया गया कि 1965 के बाद भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का इस्तेमाल राजकाज में किया जा सकता है.

सरकार के सर्कुलर के कारण फिर भी हिंदी की वरीयता संबंधी कुछ नियम बने रहे फलस्वरूप डीएमके का आंदोलन चलता रहा. इसका एक बड़ा असर यह हुआ कि आज़ादी के बाद से तमिलनाडु में शासन कर रही कांग्रेस 1967 में विधानसभा चुनाव हार गई और फिर कभी पार्टी को राज्य में उबरने का मौका नहीं मिला. इसी साल राजभाषा कानून में एक और संशोधन हुआ जिसके तहत अंग्रेजी को हिंदी के साथ अनिश्चित काल के लिए इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई. कुछ जगहों पर हिंदी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई.