मैं बीमार हूं

रस्ते में एक मासूम-से लड़के को कुछ लोग रस्सियों से बांध मारे जा रहे थे
वह बार-बार कह रहा था मेरा कसूर तो बताया जाये
मेरा बीपी नार्मल है

एक बच्ची भागी भागी आयी लिपट गयी मेरे पैरों से
रिस रहा था उससे खून
गहरी लकीरें थीं उसके चेहरे पर
उसका पीछा करने वाले दिख नहीं रहे थे
वह किसी अदृश्य से डर रही थी
और कांप रही थी
उसका चाचा उसे घसीटते हुए ले गया
मेरे खून में हिमोग्लोबिन का स्तर सन्तोषजनक है

बिखर-से गये घर के दरवाज़े पर झिलगी खटिया पर जर्जर वृद्ध ने
तरल-सी सब्ज़ी में रोटी तोड़ते हुए कहा
बेटा खा लो
फिर वह कहीं डूब गया अपने में
जो कुछ खाता हूं पच जाता है

नुक्कड़ पर एक बड़े-से चमकदार झूठ के आसपास
तमाम सच्चाईयों के कंधे झुके हुए मुझे मिले
बंधे थे उनके हाथ खुद से
शुगर ठीक है मेरा, इसे कंट्रोल में रखना है

भागा जा रहा था एक युवा
उसके पीठ पर कोड़े की मार के उभार दिख रहे थे
छिल गयी थी पूरी पीठ रक्त बह कर वहीं जम गया था
उसे कोई नौकरी चाहिये होगी
मैंने देख लिये उसके गुम चोट
मेरी आंखों का लेंस उम्र के हिसाब से ठीक है

पर दूर दृष्टि खराब हो चली है
यह कोई बड़ी बात नहीं, क्या कीजियेगा दूर तक देखकर
डॉक्टर ने कहा
पैथोलॉजी में कॉलेस्ट्राल के टेस्ट की रिपोर्ट देख रहा था
एक फीकी-सी युवा स्त्री
पूछ रही थी कि उसके पति के हर्ट अटैक की आशंका चेकअप में क्यों नहीं दिखी थी
जब बचना असम्भव था
क्यों आईसीयू में उन्हें इतने दिनों तक रखा गया
कहां से भरेगी वो यह कर्ज
एचडीएल सही निकला एलडीएल कम हो रहा है

सगीर ने कहा भाईजान अब घूमने टहलने की हिम्मत न रही
क्या रखा है मेल मुलकात में
मैंने अपने घुटने देखे, ठीक हैं दोनों
पर इधर रीढ़ झुकती जा रही है
और तनकर कर खड़े होने की हिम्मत छूटती जा रही है
अब तो किसी पर तमतमाता भी नहीं हूं
ठीक हूं मैं, वैसे तो...


फेसबुक की लत

जन्म दिन की बधाई भेजता हूं
कि कहीं खटकता है, ये तो पिछले वर्ष ही दिवंगत हो गये थे
होने न होने के बीच, इतना कम फ़ासला कभी नहीं था
रहते हुए रहना, जैसे निरर्थक हो
चले जाने पर भी दुनिया वैसी ही चलती रहती है
फेसबुक की दुनिया
बरसों बरस मिलती रहती हैं सालगिरह की बधाईयां
कोई पुरानी पोस्ट फिर से जीवित कर देती है
लोग देते हैं, अनश्वर मानकर अपनी प्रतिक्रियाएं
आत्माएं प्रतिक्रियाओं को लाइक करने के लिए बहुत ललकती होंगी
आदतन...


मज़दूर

हमें यह याद रहता है कि वे बहुत नागा मारते हैं
हालांकि यह बहुत
कुछ दिनों का ही होता है
उनका कभी देर से आना
किसी दिन जल्दी चले जाना
बहुत खलता है
ऐन काम के बीच वे सुलगा लेते हैं बीड़ी
हिया खुद का जलता है
उनकी थोड़ी-सी लापरवाही
चुभती है
पसीने से भीगी घिसी शर्ट और एक पैबन्द लगे थैले में उनका बदरंग टिफिन
उसमें कुछ रोटियां अचार
मांगते हैं बार-बार ठण्डा पानी
दो बार चाय खूब मीठी
दोपहर में थोड़ा उठंग लेते हैं
पूरा करके अपना काम
वे फिर चले जाते हैं हमेशा के लिए
उनका काम नहीं दीखता
उनकी कोई छोटी-सी झूठ याद रह जाती है।


ये कविताएं मूलरूप से रज़ा फाउंडेशन की त्रैमासिक पत्रिका समास में प्रकाशित हुई हैं.