1-बीते महीने तमिलनाडु पुलिस की हिरासत में एक पिता-पुत्र की निर्मम हत्या के बाद पुलिस के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश है. लेकिन इसके लिए अकेले पुलिस बल जिम्मेदार नहीं है. इस मामले में बहुत कुछ ऐसा है कि जिस पर भारतीय न्यायपालिका को भी जवाब देना है. द प्रिंट हिंदी पर मनीष छिब्बर की टिप्पणी.

जयराज-बेनिक्स की हिरासत में मौत के लिए सिर्फ पुलिस पर सवाल न उठाएं, अदालतें भी हैं जिम्मेदार

2-पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों में कुत्ते का मांस खाने का चलन काफी पुराना है. यहां लोग चिकन और मटन की तरह स्वादिष्ट भोजन के तौर पर कुत्ते का मांस नियमित तौर पर खाते रहे हैं. लेकिन हाल में मिजोरम के बाद अब नगालैंड में भी इस पर रोक लगा दी गई है. इस मुद्दे को लेकर बीबीसी पर दिलीप कुमार शर्मा की रिपोर्ट.

मिज़ोरम के बाद नगालैंड में कुत्ते के मांस पर लगा प्रतिबंध, क्या कहते हैं लोग?

3-विकसित हों या विकाशील, सभी देशों में कोरोना वायरस संक्रमितों की तादाद बढ़ती जा रही है. अस्पतालों से महज मरीज़ों की ही नहीं बल्कि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के भी गुजरने की खबरें आम हो रही हैं. ऐसे समय से क्यूबा सरीखे छोटे-से मुल्क़ ने इस संकट से निपटने के मामले में एक गहरी छाप छोड़ी है. वायर हिंदी पर सुभाष गाताडे का लेख.

कोविड-19 संकट के दौरान मिसाल बनकर उभरा क्यूबा

4-सरकार ने कोयला खनन को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया है. इसे समय की जरूरत बताते हुए कहा जा रहा है कि इससे देश के विकास का रास्ता खुलेगा. लेकिन कोयला खनन से उस क्षेत्र का क्या हाल होता है जहां यह खनन होता है? इसे कोरबा के उदाहरण से समझा जा सकता है. डाउन टू अर्थ पर रमेश शर्मा की टिप्पणी.

कोयला उत्खनन का अर्धसत्य

5-सियाचिन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र भी कहा जाता है. बीते तीन दशकों में यहां तैनात सैकड़ों जवान सिर्फ यहां के मौसम के चलते ही अपनी शहादत दे चुके हैं. माइनस 50 डिग्री तक गिर जाने वाले तापमान में तैनात जवानों को ज्यादा मुश्किल लड़ाई मौसम से ही लड़नी होती है. ऐसे में इन जवानों के लिए अत्यधिक ठंड में भी शरीर को गर्म रखने वाले ‘स्नो सूट’ ही बचाव का अहम हथियार होते हैं. लेकिन इन ‘स्नो सूट’ की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल हैं जिन्हें लेकर कोई खास कार्रवाई नहीं हो रही. दैनिक भास्कर पर राहुल कोटियाल की रिपोर्ट

जिस कंपनी ने सियाचिन में तैनात जवानों के लिए घटिया स्नो सूट सप्लाई किए, उसी को बार-बार मिला टेंडर, अब तक कोई कार्रवाई नहीं