आठ पुलिसकर्मियों की हत्या का आरोपित विकास दुबे आखिरकार पुलिस के शिकंजे में आ ही गया. पुलिस के मुताबिक उसकी गिरफ्तारी मध्य प्रदेश के उज्जैन में हुई. बताया जा रहा है कि वह सुबह करीब आठ बजे शहर के मशहूर महाकाल मंदिर में गया था. एक स्थानीय दुकानदार ने उसे पहचान लिया और पुलिस को खबर कर दी. जब वह मंदिर से बाहर निकला तो सिक्योरिटी गार्डों ने उससे पूछताछ की. इसके बाद उसे पकड़ लिया गया और पुलिस के हवाले कर दिया गया. उज्जैन के कलेक्टर आशीष सिंह के मुताबिक विकास दुबे से पूछताछ की जा रही है.

बीते हफ्ते उत्तर प्रदेश के कानपुर में गैंगस्टर विकास दुबे और उसके साथियों ने छापा मारने आई पुलिस की एक टीम पर हमला कर दिया था. इसमें एक डीएसपी सहित आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे. इसके बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस की 25 टीमें विकास दुबे की तलाश में जुटी थीं. बीते दो दिनों में अलग-अलग मुठभेड़ों में उसके तीन सहयोगी मारे गए थे.

विकास दुबे पर हत्या सहित कई गंभीर आरोपों में 60 से भी ज्यादा मामले दर्ज हैं. आरोप है कि स्थानीय थानाध्यक्ष सहित कई पुलिसकर्मियों की उसके साथ मिलीभगत थी और उनमें से ही किसी ने उसे छापे के बारे में पहले ही सूचना दे दी थी. इस घटना की वजह से पूरे थाने को लाइन हाजिर कर दिया गया है और 68 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच शुरू हो गई है.

इस मामले में रोज ही नई और हैरान करने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं. सोमवार को सोशल मीडिया पर एक चिट्ठी वायरल होने के बाद हंगामा मच गया. बताया गया कि यह चिट्ठी विकास दुबे पर छापे का नेतृत्व करने वाले डीएसपी देवेंद्र मिश्रा ने मार्च में लिखी थी. देवेंद्र मिश्रा भी इस मुठभेड़ में शहीद हो गए थे.

कानपुर के तत्कालीन एसएसपी अनंत देव तिवारी को लिखी गई इस चिट्ठी में स्थानीय थानाध्यक्ष विनय तिवारी और विकास दुबे की मिलीभगत का दावा किया गया है. इसमें कहा गया है कि विकास दुबे के खिलाफ दर्ज एक मामले की जांच करने वाले एक पुलिसकर्मी ने मामले में धारा बदल दी थी. चिट्ठी के मुताबिक पूछने पर उसने बताया कि ऐसा थानाध्यक्ष के कहने पर किया गया. चिट्ठी में आगे कहा गया है, ‘यदि थानाध्यक्ष ने अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन न किया तो गंभीर घटना घटित हो सकती है.’ ताजा खबर यह है कि विनय तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया है.

उधर, पुलिस का कहना है कि यह चिट्ठी किसी रिकॉर्ड में नहीं है. कानपुर के एसएसपी दिनेश कुमार पी ने कहा है कि डिस्पैच और रिसीविंग सेक्शन में जांच की गई है, लेकिन अभी तक इस चिट्ठी का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आईजी (कानपुर रेंज) मोहित अग्रवाल का कहना था, ‘इस तरह के आरोप हैं कि कुछ पुलिसकर्मी विकास दुबे के संपर्क में थे. इस संबंध में जांच हो रही है. चौबेपुर में एक नई पुलिस टीम की नियुक्ति की गई है.’

विकास दुबे के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि वह पुलिस, अपराध और राजनीति के उस गठजोड़ का लाभार्थी रहा है, जिसने बीते कुछ दशक के दौरान उत्तर प्रदेश में गहरी जड़ें जमा ली हैं. बीबीसी से बातचीत में कानपुर में नवभारत टाइम्स के पत्रकार प्रवीण मोहता कहते हैं कि विकास दुबे किसी राजनीतिक पार्टी में भले ही न रहा हो, लेकिन सभी पार्टियों के नेताओं से उसके अच्छे संबंध थे.’ वे आगे कहते हैं कि तमाम आपराधिक गतिविधियों में नाम सामने आने के बावजूद अगर यह अपराधी कानून की निगाहों से बचता रहा और अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ाता रहा तो यह बिना राजनीतिक पहुंच के संभव नहीं है.

विकास दुबे कानपुर के चौबेपुर इलाके के बिकरू गांव से ताल्लुक रखता है. इस गांव के पास ही शिवली नाम का एक कस्बा है. यहां की नगर पंचायत के अध्यक्ष रहे लल्लन वाजपेयी ने दैनिक भास्कर को बताया कि विकास दुबे ने 17 साल की उम्र में पहली हत्या की थी. उनके मुताबिक इस हत्याकांड में उसे कोई सजा नहीं हुई जिसके बाद वह बेकाबू हो गया. लल्लन वाजपेयी के मुताबिक विकास दुबे उन पर भी कई बार जानलेवा हमला करवा चुका है.

बताया जाता है कि कानून अपने हाथ में लेने की विकास दुबे की इस प्रवृत्ति ने उन्हीं दिनों इलाके के एक वरिष्ठ राजनेता को प्रभावित किया. उस समय सत्ताधारी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले इस राजनेता ने विकास दुबे को संरक्षण दिया. यह सफलता उसके लिए अहम थी. उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी रहे जावेद अहमद कहते हैं, ‘इससे विकास दुबे स्थानीय सत्ता तंत्र में दाखिल हो गया. धीरे-धीरे उसने इस तंत्र की बारीकियां समझना शुरू किया. अगले 25-30 साल उसने इसी समझ को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. जो भी पार्टी सत्ता में होती वह उसके करीब हो जाता. 1990 और 2000 के दशक में यह एक जरूरी प्रतिभा हुआ करती थी. इस बीच विकास दुबे ने तेजी से शहर में तब्दील हो रहे इलाके में बेबस और असहाय लोगों को जमीनें कब्जाना भी जारी रखा. कोई ईमानदार पुलिस अधिकारी उसके खिलाफ कार्रवाई भी करना चाहता तो राजनीतिक संरक्षण उसे बचा लेता.’

जानकारों के मुताबिक थोड़े समय बाद विकास दुबे को अहसास हुआ कि जब तक इलाके में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता संतोष शुक्ला सक्रिय हैं उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं होंगी. शुक्ला भी ब्राह्मण समुदाय से थे और उनका भी कोर वोट बैंक वही था जिस पर विकास दुबे की नजर थी. इसके अलावा राजनीतिक वरिष्ठता की वजह से भी हालात उनके पक्ष में थे. जावेद अहमद कहते हैं, ‘विकास दुबे ने संतोष शुक्ला की हत्या कर दी. उसे पूरा भरोसा था कि राजनीतिक समर्थन के चलते वह बच जाएगा. राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त संतोश शुक्ला की हत्या 2001 में शिवली नाम के एक इलाके के थाने में हुई थी.’

मामला हाई प्रोफाइल था. जांच शुरू हुई. विकास दुबे को आरोपित बनाया गया. चार्जशीट दाखिल हुई. लेकिन मुकदमे के दौरान सभी गवाह मुकर गए. इनमें से ज्यादातर उत्तर प्रदेश पुलिस के कर्मचारी थे. आखिर में सबूतों के अभाव में विकास दुबे को बरी कर दिया गया. प्रवीण मोहता कहते हैं, ‘इतनी बड़ी वारदात होने के बाद भी किसी पुलिस वाले ने विकास के खिलाफ गवाही नहीं दी. कोर्ट में विकास दुबे के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं पेश किया जा सका जिसकी वजह से उसे छोड़ दिया गया.’

विकास दुबे

जानकारों के मुताबिक सरकार में शामिल लोगों के सहयोग के बिना चाहे ऐसा नहीं हो सकता था. जावेद अहमद कहते हैं, ‘सवाल उठता है कि अभियोजन पक्ष क्या कर रहा था. जिला गवर्नमेंट काउंसिल, जो एक राजनीतिक नियुक्ति मानी जाती है, से पूछताछ होनी चाहिए थी. अभियोजन के प्रभारी जिला मजिस्ट्रेट से भी सवाल किए जाने चाहिए थे. इसके बजाय फैसला हुआ कि विकास दुबे को बरी किए जाने के खिलाफ ऊपरी अदालत में कोई अपील नहीं की जाएगी.’ बीबीसी से बातचीत में लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के राजनीतिक संपादक सुभाष मिश्र कहते हैं, ‘यह बिना सरकार की इच्छा के संभव नहीं था.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘पुलिस उस वक़्त भी उसे गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. विकास दुबे ने जब सरेंडर किया था. उस वक्त बीजेपी की सरकार थी.’ इसके बावजूद पार्टी के ही एक ऐसे वरिष्ठ नेता की हत्या के मामले में, जिसे राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त था, कुछ नहीं किया जा सका.

इसके बाद विकास दुबे पर एक और मुकदमा हुआ. यह साल 2000 में एक स्कूल के प्रधानाचार्य की हत्या का मामला था. इसमें 2004 में उसे उम्र कैद की सजा सुनाई गई. लेकिन हैरानी की बात है कि हत्या जैसे आरोपों में 60 से भी ज्यादा मुकदमों और गैंगस्टर एक्ट का सामना कर रहे इस अपराधी को थोड़े ही समय बाद जमानत भी मिल गई. 2017 में कानपुर में ही दर्ज दो मामलों में फरार चल रहे विकास दुबे को एसटीएफ़ ने लखनऊ के कृष्णानगर स्थित उसके घर से पकड़ा था. लेकिन इस मामले में भी उसे जमानत मिल गई. सबसे नए मामले की बात करें तो विकास दुबे 2018 में गिरफ्तार हुआ था. उस पर अपने ही एक चचेरे भाई पर जानलेवा हमला करने का आरोप था. लेकिन इसी साल फरवरी में उसे एक बार फिर से जमानत मिल गई थी.

बीते तीन दशक के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा, सपा और बसपा तीनों राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं. इन सभी ने अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाए, लेकिन विकास दुबे इन सभी अभियानों से बचा रहा. बल्कि एक समय तो उसे पुलिस की सुरक्षा भी मिली हुई थी. ऐसा क्यों हुआ, यह एक बड़ा सवाल है. असल में भले ही विकास दुबे के काले कारनामों की चर्चा अब दुनिया भर में हो रही हो लेकिन, इस वारदात से पहले तक खुद उसके जिले की पुलिस भी उसे लेकर बहुत गंभीर थी, ऐसा नहीं लगता है. इसका एक उदाहरण यह भी है कि ताजा वारदात से पहले तक विकास दुबे कानपुर के शीर्ष 10 अपराधियों में भी शामिल नहीं था.

अब यह जानकारी भी सामने आ रही है कि आठ पुलिसकर्मियों के शहीद होने से दो या तीन पहले ही कानपुर में एक नए एसएसपी की तैनाती हुई थी और उन्होंने भगोड़े घोषित विकास दुबे पर 25 हजार रु के ईनाम का ऐलान किया था. इससे पहले तक इस दुर्दांत अपराधी पर कोई ईनाम नहीं था. उत्तर प्रदेश में कोई अपराधी कितना बड़ा है, इसका एक पैमाना उस पर घोषित ईनाम भी होता है. लेकिन विकास दुबे का एक लंबे समय तक इससे बचे रहना काफी कुछ बताता है. जावेद अहमद कहते हैं, ‘असल में पुलिस अब कानून और व्यवस्था कायम रखने वाली मशीनरी नहीं रही. उसका काम सिर्फ व्यवस्था कायम रखने का हो गया है.’

राजनीतिक रसूख

बताया जाता है कि चौबेपुर के दो दर्जन से भी ज्यादा ब्राह्मण समुदाय के प्रभुत्व वाले गांवों में विकास दुबे की तूती बोला करती है. इन गांवों में सिर्फ वही प्रधान बनता रहा है जिसे विकास दुबे चाहता था. उसकी यह ताकत सत्ता के साथ उसकी करीबी से आती थी और इस ताकत की वजह से ही वह सत्ता के करीब भी रहा करता था. जावेद अहमद कहते हैं, ‘आखिर जो 20 प्रधानों को निर्विरोध चुनवा सकता हो, वह करीब एक लाख वोट दिलवाने का माद्दा तो रखता ही है. इतने वोट एक विधानसभा सीट जीतने और एक लोकसभा सीट के परिणामों को निर्णायक तरीके से प्रभावित करने के लिए काफी होते हैं.’

सुभाष मिश्र का भी मानना है कि विकास दुबे जैसे लोगों की राजनीतिक दलों में खूब उपयोगिता होती है. वे कहते हैं, ‘चुनाव जीतने में ये महत्वपूर्ण कारक होते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है. सबको मालूम है कि ये ‘जिताऊ लोग’ हैं. इनके पास पैसा, बाहुबल और कभी-कभी जातीय समीकरण भी ऐसा फिट बैठता है कि नेताओं के लिए उपयोगी साबित होते हैं. इसीलिए नेताओं के चुनाव जीतने के बाद ये अपने योगदान की वसूली भी करते हैं.’

जानकारों के मुताबिक इससे पहले विकास दुबे के खिलाफ पुलिस की कभी शिकंजा कसने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि हर पार्टी उसे राजनीतिक संरक्षण देती थी. क्या भाजपा, क्या सपा और क्या बसपा, हर पार्टी के नेताओं या झंडे वाले पोस्टरों के साथ विकास दुबे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. इसके बाद हर पार्टी उससे पल्ला झाड़ने में जुटी है.

इस पूरे मुद्दे को लेकर उठने वाले कई सवालों में से एक यह भी है कि पिछले करीब तीन दशक से पुलिस, राजनीति और अपराध के गठजोड़ का फायदा उठा रहे विकास दुबे ने आखिर पुलिस टीम पर इतना घातक हमला क्यों किया? जावेद अहमद कहते हैं, ‘इस अपराधी ने बिना किसी उकसावे के ऐसा क्यों किया, यह सवाल अब भी मुझे हैरान किए हुए है... आखिर उसने वह संतुलन क्यों बिगाड़ा जो उसे एक साथ अपराधी, भूमाफिया, राजनीतिक दलाल और ब्राह्मण रॉबिनहुड होने का मौका दे रहा था?’

सवाल और भी हैं. जैसे इतने कुख्यात गैंगस्टर को पकड़ने के लिए निकली टीम ने अपनी सुरक्षा का पर्याप्त ध्यान क्यों नहीं रखा? खबरों के मुताबिक डीएसपी समेत तमाम पुलिसकर्मी मौके पर प्रोटेक्टर और हेलमेट के बगैर गए थे. ज्यादातर लोगों के सिर और सीने पर गोलियां लगी हैं. यानी अगर वे सावधानी बरतते तो इनमें से कुछ लोग बच सकते थे. सवाल यह भी है कि घटना के तत्काल बाद कानपुर जिले की सीमा सील क्यों नहीं की गई. जानकारों के मुताबिक अगर ऐसा हुआ होता तो विकास दुबे और उसके सहयोगियों को खोजने के अभियान का दायरा काफी कम होता और उसे अब तक पकड़ लिया गया होगा. खबरें आ रही हैं कि मुठभेड़ वाली रात विकास दुबे ने दो दर्जन से ज्यादा शूटरों को गांव स्थित अपने घर पर बुलाया था. लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों के हथियारों के साथ आने की लोकल इंटेलिजेंस को खबर कैसे नहीं हुई?

ऐसे बहुत से सवाल हैं, लेकिन जवाबों के नाम पर फिलहाल अंधेरा है.