विंबडलन जूनियर डबल्स खिताब जीतकर अपने गुरू महेश भूपति के विश्वास पर खरे उतरे सुमित नागल भविष्य में टेनिस सिंगल्स मुकाबलों के एक बड़े खिलाड़ी हो सकते हैं.
कहते हैं कि महान प्रतिभाओं में अपना रास्ता खुद ढूंढने की क्षमता होती है. लेकिन, बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि अगर मुंबई के शिवाजी पार्क में सचिन तेंदुलकर को रमाकांत आचरेकर न मिले होते या फिर आचरेकर ने तब 11 साल के उस बच्चे की प्रतिभा को न पहचाना होता तो सचिन इस मुकाम तक नहीं पहुंचते. क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले तेंदुलकर भी अक्सर अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच रमाकांत आचरेकर को देते हैं.
हालांकि एक प्रतिभा को पहचानना उतना मुश्किल नहीं है जितना कि उसे निखारना. खुद आचरेकर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि प्रतिभा को पहचानने में वक्त नहीं लगता बल्कि उसे ये अहसास दिलाने में समय लगता है कि वह पैदा ही इस खेल के लिए हुआ है, उसके बिना यह खेल ही अधूरा है.
एक युवा टेनिस खिलाड़ी को पूरी तरह निखारने में एक से डेढ़ लाख डॉलर प्रति साल का खर्च आता है जिसे बिना किसी प्रायोजक के जुटाना आसान नहीं है.
लगभग पांच साल पहले भारत के स्टार टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति ने भी एक प्रतिभा को पहचाना था. इसके बाद उन्होंने इस प्रतिभा को निखारने का बीड़ा उठाया. यह चुनौती तब और बड़ी हो गई जब इसका सारा खर्च भी भूपति के कंधों पर आ गया. लेकिन टेनिस के इस दिग्गज को अपने फैसले पर पूरा विश्वास था. महेश भूपति का यह विश्वास तब सही साबित हुआ जब सुमित नागल ने हाल ही में विंबडलन जूनियर युगल वर्ग का खिताब जीत लिया.
16  अगस्त, 1997 को हरियाणा के झज्जर में जन्मे सुमित नागल दिल्ली के नांगलोई इलाके में रहते हैं. उनके पिता सुरेश सेना में हवलदार रह चुके हैं. मां कृष्णा गृहिणी हैं. इसी साल वे ऑस्ट्रेलियन ओपन के जूनियर में तीसरे दौर में पहुंचे थे. 17 साल के सुमित जूनियर ग्रैंड स्लैम जीतने वाले छठे भारतीय खिलाड़ी हैं. सुमित से पहले रामानाथन कृष्णन, रमेश कृष्णन, लिएंडर पेस, सानिया मिर्ज़ा और यूकी भांबरी ये कारनामा कर चुके हैं.
1962 में ऑस्ट्रेलिया के महान टेनिस खिलाड़ी रॉड लेवर के साथ विंबलडन का उदघाट्न मैच खेल चुके पूर्व डेविस कप कप्तान नरेश कुमार कहते हैं कि एक युवा खिलाड़ी को पूरी तरह निखारने में एक से डेढ़ लाख डॉलर प्रति साल का खर्च आता है जिसे बिना किसी प्रायोजक के जुटाना आसान नहीं है. यही कारण है कि प्रतिभा होते हुए भी भारतीय खिलाड़ी पिछड़ जाते हैं. लेकिन सुमित को महेश भूपति मिल गए. सेना की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी कर रहे सुमित के पिता सुरेश नागल एक टीवी चैनल से बातचीत में कहते हैं, 'सुमित ने जो भी हासिल किया उसका पूरा श्रेय महेश भूपति को जाता है. वे हमारे लिए भगवान जैसे हैं.'
भले ही आज सुमित नागल का नाम भारत के डबल्स ग्रैंड स्लैम विजेताओं की फेहरिस्त में जुड़ गया हो , लेकिन वे डबल्स के बजाय सिंगल्स मुकाबलों से अपनी पहचान बनाना चाहते हैं.
सुरेश नागल का कहना है कि सात बरस की उम्र में सुमित ने टेनिस खेलना शुरू किया था. उनके खेल को देखकर स्थानीय कोच ने कहा कि सुमित में बेजोड़ प्रतिभा है और उन्हें बड़े स्तर पर प्रशिक्षण मिलना चाहिए. इसी दौर में एक दिन महेश भूपति ने सुमित क खेल देखा और उन्हें अपनी टेनिस अकादमी में ले आए. यहीं से शुरू हुई उनके चैंपियन बनने की असल यात्रा. एक साक्षात्कार में सुमित के पिता बताते हैं, 'हम बहुत साधारण परिवार के लोग हैं. टेनिस जैसा खेल खिलाना और उसका खर्च उठाना हमारे बूते से बाहर था. महेश ने उसकी पूरी जिम्मेदारी उठाई.' दिग्गज नोवाक जोकोविच को अपना आदर्श मानने वाले सुमित भी यह मानते हैं कि महेश भूपति के बिना उनका इस खिताब तक पहुंचना संभव नहीं था. एक अख़बार से बातचीत में वे कहते हैं, 'महेश सर मेरी मदद न करते तो विंबलडन खेलना मेरे लिए संभव न होता.'
महेश भूपति टेनिस अकादमी के सीईओ गौरव नाटेकर के मुताबिक भूपति 2010 से सुमित का सारा खर्च उठा रहे हैं. पूर्व टेनिस खिलाड़ी रह चुके गौरव एक साक्षात्कार में बताते हैं कि जब उन्होंने सुमित को कनाडा और जर्मनी भेजने के लिए प्रायोजकों से बात करनी शुरू की तो इसमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें समझाना बहुत मुश्किल था. लेकिन महेश को सुमित की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था. पहले उन्होंने सुमित को मशहूर कैनेडियन कोच बॉबी महल के पास भेजा. बीते एक साल से सुमित जर्मनी की शटलर वास्के टेनिस अकादमी में अर्जेंटीना के कोच डेलफीनो के संरक्षण में प्रशिक्षण ले रहे हैं. इसका असर उनके खेल पर साफ दिखा है.
भले ही आज सुमित नागल का नाम भारत के डबल्स ग्रैंड स्लैम विजेताओं लिएंडर पेस, महेश भूपति, रोहन बोपन्ना और सानिया मिर्जा की फेहरिस्त में जुड़ गया हो , लेकिन वे डबल्स के बजाय सिंगल्स मुकाबलों से अपनी पहचान बनाना चाहते हैं. एक अखबार से बात करते हुए सुमित साफ कहते हैं कि वे डबल्स खिलाड़ी नहीं हैं. उन्होंने डबल्स टेनिस बेहद कम खेला है और वे बतौर सिंगल्स खिलाड़ी आगे बढ़ना चाहते हैं. उनका सपना है कि वे एक दिन ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बनें.  महेश भूपति को भी सुमित में भविष्य का एक बड़ा सिंगल्स खिलाड़ी  दिखता है. उन्हें पूरा भरोसा है कि आने वाले तीन सालों के अंदर सुमित बेहतरीन सिंगल्स खिलाड़ी के तौर पर उभरेंगे.
सुरेश नागल को खुशी है कि उनके बेटे ने विंबलडन डबल्स जूनियर का खिताब जीता, लेकिन मन में टीस भी है कि अगर वे समय से लंदन पहुंचे होते तो सिंगल्स में भी कुछ कर सकते थे.
सुमित का विंबलडन में डबल्स खेलना भी एक इत्तेफाक है. दरअसल विंबलडन जूनियर सिंगल्स में सुमित नागल के पहले दौर का मुकाबला चार जुलाई को था. महज दो दिन पहले उन्हें लंदन के लिए वीजा मिला. तीन जुलाई को सुबह सवा सात बजे सुमित लंदन जाने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पर थे, लेकिन उन्हें फ्लाइट पर चढ़ने से रोक दिया गया. एक एयरलाइंस ने उन्हें यह कहकर बोर्डिंग पास देने से मना कर दिया कि वे नाबालिग हैं और बिना कोच के हवाई जहाज में नहीं बैठ सकते. सुमित के परिजनों ने बार-बार गुहार लगाई कि उन्हें विंबलडन में खेलना है, लेकिन उनकी एक न सुनी गई.
आख़िरकार सुमित ने अर्जेंटीना के अपने कोच डेलफीनो से बात की. कोच ने उन्हें अपने पास जर्मनी आने को कहा. दोपहर बाद एक दूसरी एयरलाइंस में उनका टिकट बुक कराया गया जिसमें नाबालिग खिलाड़ी के कोच के साथ जाने वाली शर्त नहीं थी. जर्मनी में उन्होंने कोच को साथ लिया और मैच की सुबह चार जुलाई को लंदन पहुंचे. लेकिन इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी. थके हुए सुमित कड़े संघर्ष में पहले दौर का ही मुकाबला हार बैठे. हालांकि सुरेश नागल को खुशी है कि उनके बेटे ने विंबलडन डबल्स जूनियर का खिताब जीता, लेकिन मन में टीस भी है कि अगर वे समय से लंदन पहुंचे होते तो सिंगल्स में भी कुछ कर सकते थे.
विंबलडन जूनियर डबल्स ख़िताब जीत के बाद सुमित नागल की रैंकिंग में जबरदस्त उछाल आया है और वे 19 पायदान चढ़कर 745वें  नंबर पर पहुंच गए हैं. अगले साल फरवरी तक वे शीर्ष 300 खिलाड़ियों में शामिल होना चाहते हैं. सितंबर में भारत लौट रहे सुमित कहते हैं कि उनका अगला लक्ष्य एटीपी 500 सीरीज के तहत जर्मनी के हैंबर्ग में होने वाला टूर्नामेंट होगा. अगर यहां भी वे विंबलडन जैसा कोई कारनामा दोहरा पाए तो कोई हैरत नहीं कि वे भारतीय टेनिस के अगले पोस्टर ब्वॉय बन जाएं.