बीते महीने की बात है. पीएम केयर्स फंड को लेकर उठ रहे तमाम सवालों की पड़ताल करते हुए हमने एक रिपोर्ट की थी. इन सवालों में से एक यह भी था कि पीएम केयर्स फंड लोक प्राधिकार यानी पब्लिक अथॉरिटी है या नहीं. असल में इस फंड से जुड़ी कई जानकारियां मुहैया कराने को लेकर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत कई आवेदन दायर किए गए थे जो खारिज हो गए थे. प्रधानमंत्री कार्यालय का तर्क था कि पीएम केयर्स फंड लोक प्राधिकार यानी पब्लिक अथॉरिटी नहीं है, इसलिए इस पर आरटीआई कानून लागू नहीं होता और इसीलिए इसके तहत मांगी गई जानकारियां भी नहीं दी जा सकतीं.

पीएमओ के इस तर्क की पड़ताल करने के लिए हमने हिंदी में आरटीआई एक्ट पढ़ना शुरू किया. थोड़ी ही देर में हमें अहसास हो गया कि यह भाषा का एक बीहड़ है जिसमें कहीं पहुंचने से ज्यादा आसार भटकने के हैं. दुरुह हिंदी से किसी तरह गुजरते हुए हम आरटीआई कानून के अध्याय एक के खंड 2 (ज)(घ) पर पहुंचे. इसमें लिखा था:

“लोक प्राधिकारी” से समुचित सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना या किए गए आदेश द्वारा, स्थापित या गठित कोई प्राधिकारी या निकाय या स्वायत्त सरकारी संस्था अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत-

(i) कोई ऐसा निकाय है जो समुचित सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है.

(ii) कोई ऐसा गैरसरकारी संगठन है जो समुचित सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है.

हिंदी का बढ़िया ज्ञान रखने वालों को भी यह भाषा अजनबी लग सकती है. अभिप्रेत या सारभूत जैसे शब्द शायद ही कोई आम व्यवहार में बोलता हो. जब बोलता ही नहीं तो समझना तो दूर की बात है. यही वजह है कि हमने तय किया कि एक बार इसी हिस्से को कानून के अंग्रेजी संस्करण में भी देख लिया जाए. वहां इसे इस तरह लिखा गया था:

“public authority” means any authority or body or institution of self-government established or constituted by notification issued or order made by the appropriate Government, and includes any— (i) body owned, controlled or substantially financed; (ii) non-Government organisation substantially financed directly or indirectly by funds provided by the appropriate Government.”

साफ है कि साधारण सी अंग्रेजी जानने वाले के लिए भी इसे समझना मुश्किल नहीं है. लेकिन हिंदी में इस बात को जिस तरह से लिखा गया है उसके चलते साधारण तो क्या, असाधारण हिंदी ज्ञान वाला भी चकरा सकता है. इसी बात को थोड़ा समझ में आने वाली हिंदी में कुछ-कुछ इस तरह भी लिखा जा सकता था:

“लोक प्राधिकार यानी पब्लिक अथॉरिटी का अर्थ है कोई भी ऐसी संस्था, संगठन या संस्थान जिसकी स्थापना सरकार के किसी आदेश से हुई हो. इसमें ऐसी संस्थाएं शामिल हैं जिनका मालिकाना हक सरकार के पास हो या सरकार का उन पर नियंत्रण हो या फिर उनके खर्च का एक बड़ा हिस्सा सरकार देती हो. ऐसी गैर-सरकारी संस्थाओं को भी लोक प्राधिकार यानी पब्लिक अथॉरिटी माना जाएगा जिनके खर्च का एक बड़ा हिस्सा सरकार से आता हो, भले ही यह पैसा उन्हें सीधे (अप्रत्यक्ष) मिले या फिर किसी दूसरे तरीके (अप्रत्यक्ष) से.”

दिलचस्प बात यह है कि आरटीआई कानून में ही इस कानून को आम लोगों के लिए सरल भाषा में सुलभ बनाने की जरूरत बताई गई है. इसके अध्याय 6 के खंड 26 (2) में कहा गया है कि कानून लागू होने के 18 महीनों के भीतर सरकार एक ऐसी मार्गदर्शिका यानी गाइड लाए. इसमें कानून से जुड़ी सारी जानकारियां राजभाषा में इस तरह लिखी हुई हों कि वे आसानी में समझ में आ जाएं, क्योंकि इस कानून के तहत किसी अधिकार का इस्तेमाल करने वाले को इसकी जरूरत पड़ सकती है. लेकिन यह बात ही ज्यादातर लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाने वाली बोझिल हिंदी में इस तरह से लिखी हुई है:

समुचित सरकार इस अधिनियम के प्रारंभ से अठारह मास के भीतर, अपनी राजभाषा में, सहज व्यापक रूप और रीति से ऐसी सूचना वाली एक मार्गदर्शिका संकलित करेगी , जिसकी ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा युक्तियुक्त रूप में अपेक्षा की जाए, जो अधिनियम में विनिर्दिष्ट किसी अधिकार का प्रयोग करना चाहता है.’

कानून के अंग्रेजी संस्करण में यही बात इस तरह कही गई है:

“The appropriate Government shall, within eighteen months from the commencement of this Act, compile in its official language a guide containing such information, in an easily comprehensible form and manner, as may reasonably be required by a person who wishes to exercise any right specified in this Act.”

इस उदाहरण से फिर साबित होता है कि अंग्रेजी के साधारण ज्ञान से भी आरटीआई कानून को समझा जा सकता है, लेकिन हिंदी के मामले में ऐसा नहीं है. और यह मामला सिर्फ आरटीआई तक सीमित नहीं है. बाकी कानूनों का भी कमोबेश यही हाल है.

भारत एक लोकतंत्र है. लोक तंत्र से जिन तंतुओं के जरिये जुड़ता है उनमें देश के कानून भी शामिल हैं. भारत में सबसे ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं. लेकिन जिस हिंदी में ये कानून लिखे गए हैं वह इन्हें उसी जनता से दूर देती है जिसके लिए ये कानून बने हैं. जाहिर सी बात है कि कानून को बरतने की बात तो तब होगी जब कानून समझ में आएगा. चूंकि ऐसा नहीं है तो कानून का मतलब समझने के लिए लोग या तो वकीलों पर निर्भर होते हैं या सामाजिक कार्यकर्ताओं पर या फिर मीडिया पर. लेकिन इन जरियों से भी अक्सर कानून उनके लिए अबूझ का अबूझ ही रहता है. दिलचस्प यह भी है कि इनमें से कुछ कानून तो ऐसे हैं जो इसी यानी 21वीं सदी में वजूद में आए हैं. इसके बावजूद इनकी भाषा न जाने किस बीती सदी की है.

बात को आगे बढ़ाते हुए कुछ और ऐसे कानूनों और उनकी हिंदी को देखते हैं जो हाल के समय में बने हैं और जिन्हें क्रांतिकारी बताया गया है. ये कानून आम लोगों की जिंदगी की बुनियादी और बेहद अहम जरूरतों से जुड़े हुए हैं.

सबसे पहले नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार कानून की बात. 2009 में बना यह कानून छह से 14 साल की उम्र वाले हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है. इसमें प्रावधान है कि सरकारी स्कूलों को इस आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देनी होगी और निजी स्कूलों को कम से कम 25 फीसदी बच्चों के मामले में ऐसा करना होगा.

इस कानून के अध्याय एक के खंड 2 (घ) में कहा गया है.

‘अलाभित समूह का बालक से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक रूप से और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग या सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषाई, लिंग या ऐसी अन्य बात के कारण, जो समुचित सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट की जाए, अलाभित ऐसे अन्य समूह का कोई बालक अभिप्रेत है.’

अब देखते हैं कि कानून के अंग्रेजी संस्करण में यह प्रावधान किस तरह लिखा हुआ है :

“child belonging to disadvantaged group” means a child belonging to the Scheduled Caste, the Scheduled Tribe, the socially and educationally backward class or such other group having disadvantage owing to social, cultural, economical, geographical, linguistic, gender or such other factor, as may be specified by the appropriate Government, by notification;

क्या इसे पढ़ने में किसी अंग्रेजी भाषी या साधारण सी अंग्रेजी जानने वाले को भी कोई तकलीफ हो सकती है. लेकिन हिंदी में यह बात जिस तरह से कही गई है उसे समझने के लिए किसी ठेठ हिंदी इलाके का कोई व्यक्ति भी कई बार शब्दकोश देखने के बाद अपना सर पकड़ सकता है. इसे इस तरह की भाषा में भी लिखा जा सकता था:

‘वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाले बच्चे’ से मतलब है ऐसा बच्चा जो अनुसूचित जाति, जनजाति, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग या फिर इसी तरह के किसी अन्य ऐसे समूह से हो जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषाई, लैंगिक या फिर किसी अन्य कारण (जो सरकार द्वारा तय हों) के चलते वंचित रहा हो.’

इसी तरह अध्याय तीन के खंड 8 (क) में सरकार के कर्तव्यों का जिक्र करते नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार में कहा गया है:

‘समुचित सरकार प्रत्येक बालक को निशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराएगी. परंतु जहां किसी बालक को, यथास्थिति, उसके माता-पिता या संरक्षक द्वारा, समुचित सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा स्थापित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारवान् रूप से वित्तपोषित विद्यालय से भिन्न किसी विद्यालय में प्रवेश दिया जाता है, वहां ऐसा बालक या, यथास्थिति, उसके माता-पिता या संरक्षक ऐसे अन्य विद्यालय में बालक की प्राथमिक शिक्षा पर उपगत व्यय की प्रतिपूर्ति के लिए कोई दावा करने का हकदार नहीं होगा.’

अंग्रेजी में इसे ऐसे लिखा गया है:

‘The appropriate government shall provide free and compulsory elementary education to every child:

provided that where a child is admitted by his or her parents or guardian, as the case may be, in a school other than a school established, owned, controlled or substantially financed by funds provided directly or indirectly by the appropriate Government or a local authority, such child or his or her parents or guardian, as the case may be, shall not be entitled to make a claim for reimbursement of expenditure incurred on elementary education of the child in such other school.’

इसे सरल हिंदी में इस तरह भी लिखा जा सकता था:

‘सरकार हर बच्चे के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करेगी. लेकिन यदि किसी बच्चे को उसके माता-पिता या अभिभावक ने किसी ऐसे स्कूल में भर्ती कराया है जो सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित, नियंत्रित या वित्तपोषित नहीं है तो ऐसा बच्चा या उसके माता-पिता या संरक्षक सरकार से उस स्कूल में बच्चे पर हुए खर्च के भुगतान का दावा नहीं कर सकते.’

मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना भी हाल के समय का एक ऐसा कानून है जिसे ऐतिहासिक कहा जाता है. इसकी वजह यह है कि यह ग्रामीण इलाकों में हर परिवार के बालिग सदस्यों को साल में कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी देता है. लेकिन इसकी भाषा भी जटिलता, अस्पष्टता और बोझिलता से मुक्त नहीं है. उदाहरण के लिए इसके अध्याय दो के खंड 3(1) में कहा गया है:

‘यथा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, राज्य सरकार में ऐसे ग्रामीण क्षेत्र में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाये, प्रत्येक गृहस्थी को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के लिये स्वेच्छा से आगे आते हैं, इस अधिनियम के अधीन बनाई गई स्कीम के अनुसार किसी वित्तीय वर्ष में सौ दिनों से अन्यून के लिये ऐसा कार्य उपलब्ध कराएगी.’

कानून के अंग्रेजी संस्करण में इसे इस तरह लिखा गया है:

‘Save as otherwise provided, the State Government shall, in such rural area in the State as may be notified by the Central Government, provide to every household whose adult members volunteer to do unskilled manual work not less than one hundred days of such work in a financial year in accordance with the Scheme made under this Act.’

इसे सरल हिंदी में इस तरह लिखा जा सकता था:

‘इस कानून के तहत राज्य सरकार, केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्र में हर परिवार के ऐसे बालिग सदस्यों को रोजगार देगी जो इसके लिए तैयार हों. यह रोजगार एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों का होगा और इसके लिए किसी विशेष हुनर की आवश्यकता नहीं होगी. रोजगार इस कानून के तहत बनी योजना के मुताबिक दिया जाएगा.’

वैसे दिलचस्प बात यह भी है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली मनरेगा कानून की वेबसाइट पर ही इस कानून की कोई प्रति उपलब्ध नहीं है. इसका एक लिंक जरूर है, लेकिन वह काम नहीं करता.

अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की बात करते हैं. इसे 2013 में बनाया गया था. इसकी शुरुआत में ही इसके उद्देश्य के बारे में कहा गया है:

‘जनसाधारण को गरिमामय जीवन व्यतीत करने के लिए सस्ती कीमतों पर पर्याप्त मात्रा में क्वालिटी खाद्य की सुलभ्यता को सुनिश्चित करके, मानव जीवन चक्र के मार्ग में खाद्य और पोषण संबंधी सुरक्षा और उससे संबंधित या उसके अनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम.’

साफ है कि बेवजह की जटिलता की परंपरा यहां भी निभाई गई है. अब कानून में दर्ज इसी बात को अंग्रेजी में देखते हैं:

‘An Act to provide for food and nutritional security in human life cycle approach, by ensuring access to adequate quantity of quality food at affordable prices to people to live a life with dignity and for matters connected therewith or incidental thereto.’

सवाल यह है कि क्या हिंदी में इसे ऐसे किसी आसान तरीके से नहीं लिखा जा सकता था?

‘इस कानून का उद्देश्य यह है कि देश के किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में भोजन और पोषण की कभी कमी न हो. कानून के जरिये यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लोगों की जेब पर ज्यादा बोझ डाले बगैर उन्हें पर्याप्त मात्रा में अच्छी गुणवत्ता वाला भोजन मुहैया कराया जाए ताकि वे सम्मान के साथ जिंदगी गुजार सकें. खाद्य सुरक्षा कानून में इस विषय से जुड़ी सभी जरूरी बातों का ध्यान रखा गया है.’

कानून को बेवजह पेंचीदा बनाने के ऐसे कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं. लोकतंत्र में कानून का शासन सबसे ऊपर होता है. कहा जाता है कि कानून का पालन सबको करना होगा और इससे कोई यह कहकर नहीं बच सकता कि उसे कानून के बारे में पता नहीं था. इसके अलावा, यह बात भी सच है कि लोगों की कानूनी जागरूकता को बढ़ाकर ही उन्हें और नतीजतन लोकतंत्र को सशक्त बनाया जा सकता है. यानी लोकतंत्र के सशक्तिकरण के लिए सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ नागरिकों की कानूनी जागरूकता का विकास भी जरूरी है. लेकिन जागरूकता कैसे बढ़ेगी जब कानून ऐसी अबूझ हिंदी में लिखे गए हों? नागरिकों के लिए बने इन कानूनों की भाषा ही उन्हें नागरिकों से दूर कर रही है.

भारत में हुई 2011 की जनगणना में करीब 53 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी पहली भाषा बताया था जबकि अंग्रेजी के मामले में यह आंकड़ा ढाई लाख ही था. अंग्रेजी को दूसरी भाषा के रूप में जानने वालों का 8.3 करोड़ लोगों का आंकड़ा भी मिला दें तो भी यह संख्या हिंदी से कहीं पीछे ठहरती है. भारत में अंग्रेजी आपको एक विशेषाधिकार देती है और इसलिए इसे प्रभुत्व की भाषा माना जाता है. ऐसे में कानूनों की हिंदी में लिखाई के मामले में यह भेद कुछ लोगों को इस प्रभुत्व को बनाए रखने की कोशिश जैसा भी लग सकता है.

आखिर में उसी आरटीआई एक्ट पर आते हैं जिससे हमने बात शुरू की थी. इस कानून के तहत बने केंद्रीय सूचना आयोग ने मई, 2015 में एक आदेश में कहा था कि अगर कानून लोगों के लिए सहज और समझ में आने वाली भाषा में उपलब्ध नहीं हों तो किसी भी सरकार को उनसे इनके पालन की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. इस टिप्पणी को पांच साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, लेकिन मसला वहीं का वहीं है. कागजों पर कानूनों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन उनका उद्देश्य अधूरा रह जा रहा है.