हद-बेहद

इन दिनों सरहद पर सबका ध्यान है. मीडिया का तो इतना कि भयानक रूप से बढ़ती कोरोना महामारी अब कम उसके ध्यान में आ रही है. नोट करने की बात यह है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि प्रायः हर चीज़ के बारे में बहुत ऊंचे स्वर में बातें कही जा रही हैं जिनको सच या सही मानने में बड़ी उलझन है. सारे आंकड़े अपनी प्रामाणिकता खोते जा रहे हैं. यह कहना बहुत कठिन है कि कौन सच बोल रहा है. झूठ का ऐसा घटाटोप है कि वह सब कुछ की सरहद का अतिक्रमण कर रहा है.

दिलचस्प यह है कि झूठ अब एक अटूट-अथक धारावाहिकता में सामने आते रहते हैं. गोदी मीडिया, भक्तगण, सोशल मीडिया का इन दिनों ऐसा गठबन्धन हो गया है कि कोई भी झूठ सच की तरह फैला दिया जाता है और कई बार लगता है कि झूठ को सच से नवेरने, अलगा पाने की हमारी क्षमता पर भी कुठाराघात हो रहा है. कई बार हमारे पास ऐसा विवेक करने का समय ही नहीं रह पाता. झूठ इतनी तेजी से एक के बाद एक आते हैं कि जब तक एक झूठ को आप पहचाने तब तक दूसरा झूठ आ जाता है. झूठ इतनी गतिशील शायद ही पहले कभी रहा हो. उसकी गतिशीलता कहीं न कहीं उसकी व्यापक मान्यता का भी आधार बनती जा रही है. हम ऐसे समय में हैं जिसमें झूठों का अम्बार लगता जा रहा है और हम उसकी किसी हद का अन्दाज़ तक नहीं कर सकते. यह झूठ के बेहद का क्षण है.

यह भी अनदेखा नहीं जाना चाहिये कि इस समय सच बोलना सत्ता को गाली देना माना जाने लगा है. प्रश्न पूछना तो द्रोह पोषित हो चुका है. हर स्थिति को एक नयी सरहद की तरह इस्तेमाल किया जाने वाला है. बहुमत है तो विरोध करना अनुचित है; सीमा पर चीनी आक्रमण हो रहा है तो सचाई जानने की चेष्टा करना सेनाओं के मनोबल पर प्रहार करना है. आपकी देशभक्ति ही संदिग्ध हो जायेगी. असली सरहद यह खिंच गयी है कि आप भक्ति और वफ़ादारी, आज्ञापालन की हदों में रहें और सच की चिन्ता न करें.

कहा-अनकहा

कविता में जो अनेक सन्तुलन साधने पड़ते हैं जैसे लय, आकार आदि, उनमें से एक होता है कहे और अनकहे के बीच का सन्तुलन. एक ऐसे समय में जब अभिधा (स्पष्ट या सीधा लेखन) का लगभग प्रकोप जैसा हो और बहुत से कवि सब कुछ कहने पर उतारू हों, यह सन्तुलन लगभग ग़ायब हो जाता है. उसकी ज़रूरत नहीं रह जाती क्योंकि सब कुछ कहने के बाद कुछ भी अनकहा नहीं रह जाता. यह कविता के सामान्य धर्म याने कहे-अनकहे के सन्तुलन को बनाये रखने से विरत होना है. यह दृष्टि और कौशल दोनों का मामला हो जाता है.

कविता जो कहती है, उसके अलावा कुछ अनकहा भी छोड़े रहती है. यह अनकहा रसिक या पाठक पहचानता है और उसे ‘लोकेट’ अवस्थित करता है. यह कविता पढ़ने-सुनने के आस्वाद को गहरा करता है. शायद कविता का गद्य से बुनियादी अन्तर यही है कि गद्य जहां सब कुछ कहने की विधा है, वहां कविता कहने-अनकहने की. यह अनकहा कुछ छिपाने की कोशिश नहीं होता. न ही वह किसी अक्षमता का प्रमाण होता है. वह रसिक या पाठक को इस अनकहे को खोजने की उत्तेजना देने का एक प्रकार होता है. अज्ञेय की तो एक कविता ही है: ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया.’ उसी कविता से एक शब्द बेसबरा उभार लेकर कहें तो कवि को सब कुछ कहने की बेसबरी से बचना चाहिये. शमशेर के यहां कविता शब्दों के बीच की नीरवता में अक्सर अवस्थित होती है. कई बार यह तक लग सकता है कि जो कहा गया उससे अधिक महत्वपूर्ण या सार्थक वह है जो कहा नहीं गया.

एक स्तर पर कुछ भी अनकहा न छोड़ने की वृत्ति को कविता में बढ़ते अख़बारीपन ने पोसा और विकसित किया है. बहुत सारे कवि भूल जाते हैं कि कविता सूचना नहीं होती. वह सचाई की ख़बर नहीं देती, उसे उसकी सूक्ष्मता-जटिलता में चरितार्थ करती है. वह सचाई की रिपोर्ट नहीं होती. उसका बुनियादी संघर्ष, भाषा में, उसकी अनेक शक्तियों और क्षमताओं का सुघर और कल्पनाशील इस्तेमाल करते हुए, सचाई को ऐसे विन्यस्त करने का होता है कि उसका सच अर्जित सच हो, न कि सिर्फ़ सूचित सच. बड़े कवि, जो हर समय में, अल्पसंख्यक होते हैं, काव्य-सत्य का दावा उतना नहीं करते जितना उसे समस्याग्रस्त करते हैं. इस सत्य को गढ़ने और पाने में पाठक-रसिक की हिस्सेदारी होती है. कविता का सच रागलिप्त, सगुण और हिस्सेदार सच होता है. उसमें अनकहा लगातार अन्तर्ध्वनित और सगुम्फित होता रहता है.

हर कहने की एक सीमा भी होती है. सचाई हमेशा ही इतनी जटिल होती है कि उसे शब्दों में पूरी तरह से स्वायत्त करना सम्भव नहीं होता. अनकहा रहने देना शब्द की सीमा का, एक तरह से, विनयपूर्ण स्वीकार होता है. कवि जो अनकहा छोड़ता है वह इसलिए नहीं कि उसको कह सकता था पर आत्मसंयम के चलते ऐसा नहीं कर रहा है. बल्कि इसलिए कि सचाई या अनुभव या भाव में ऐसा कुछ अनिवार्यतः है जो शब्दों में नहीं आ सकता. यह अनकहा कहने की अपर्याप्तता का संकेत भी होता है.

अराजकता और कल्पना

‘हमें यह पसन्द हो या नापसन्द, हम सभी कलाकार होने को अभिशप्त हैं. हम रचयिता और कलाकार हैं अपने जीवन के, अपने भविष्य और अतीत के. उदाहरण के लिए, हम अपने अतीत को एक शव या संसाधन या किसी और के रूप में देखते हैं. दुनिया को जैसे हम देखते, जैसे उसकी व्याख्या करते या बनाते हैं, वैसे हम कलाकार हैं. हम दैनिक कलाकार हैं खेल, बातचीत, सैर, भोजन, दोस्तियों, सेक्स और प्रेम के. हर चुम्बन, काम का हर टुकड़ा, हर बांटा गया शब्द या हर सुनी हुई बात में…’ ऐसा ब्रिटिश कथाकार हनीफ़ कुरेशी ने अपने एक निबन्ध में लिखा है जो उनकी कहानियों और निबन्धों की एक पुस्तक ‘लव-हेटरेड’ में संकलित है.

वे कहते हैं कि महान कला और विचार हमेशा विचित्र होते हैं. वे दुनिया का बखान नहीं होते बल्कि स्वेच्छा से सपना देखने जैसे होते हैं. दैनिक कला दुनिया को रचती और पुनर्रचती है, उसे अर्थ और महत्व देते हुए. वह एक ज़िम्मेदारी है. कल्पना सचाई गढ़ती है, उसका अनुकरण नहीं करती. इस पर कोई दिलचस्प मतैक्य नहीं है कि दुनिया कैसी है. आखिर में यही बात कि वहां बाहर कुछ नहीं है सिवाय उसके जो हम बनाते हैं और हम उसे ज़्यादा या कम बनाते हैं. यह एक दैनिक प्रश्न है इस बारे में कि हम कैसे जीना चाहते हैं और क्या होना चाहते हैं.

हनीफ़ कुरैशी इस बारे में बहुत साफ़ हैं कि कल्पना किसी बुनियादी क़िस्म की अराजकता का अधिक सर्जनात्मक, विकल्प खोजने वाला, विधेयात्मक संस्करण है. कल्पना को नियमों में बांधा नहीं जा सकता. वह अतिक्रमण से ही आगे बढ़ती है. यह कल्पना कभी-कभार समाज-विरोधी भी लग सकती है. कल्पना जोखिम का काम है इतिहास में ऐसे लेखकों-कलाकारों की सूची आसानी से मिल सकती है जिन पर इसलिए प्रहार किये गये या सेंसर लगाया गया या जेल भेज दिया गया कि उनके विचार ऐसे थे जो ज़्यादातर लोगों की बरदाश्त के बाहर थे.

कल्पना, कला में और अन्यत्र भी, सुशील नहीं होती. वह ऐसे अनुभव, जीवन के ऐसे पक्ष उजागर कर सकती है जो चालू नैतिकता के दायरे से बाहर हैं. कल्पना अपनी नैतिकता स्वयं खोजती और प्रस्तावित करती है. अक्सर वह चालू नैतिकता का अतिक्रमण होता है. इसलिए उसे अराजक मानकर दबाने, रोकने या दण्ड देने की कोशिश की जाती है. कल्पना का गणतंत्र, चालू अर्थों में, अराजक होकर ही अपना स्वराज स्थापित करता है. यह अकारण नहीं है कि राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक सत्ताएं साहित्य और कलाओं की सत्ता को प्रतिसत्ता मानकर उसे या तो हाशिये पर डालने या फैलने से रोकने की चेष्टा करती हैं. सत्ता और प्रतिसत्ता का द्वन्द्व नया नहीं है और न ही यह परिणाम कि अन्ततः प्रतिसत्ता भी स्थापित होकर रहती है. देर-सबेर अराजक का राज भी जगह बना लेता है.