भारत के आधुनिक मूर्धन्य चित्रकारों में गिने जाने वाले कृष्ण खन्ना पांच जुलाई को 95 बरस के हो गये. जीवन और कला दोनों के प्रति अथक उत्साह रखने वाले कृष्ण अब भी सृजनरत हैं. कुछ दिनों पहले जब फ़ोन पर उनसे बात हुई तो वे अपने स्टूडियो में एक बड़े कैनवास पर काम करने जा रहे थे. सच्चे यारबाश, बहुत मददगार कृष्ण खन्ना ने दशकों पहले - 1961 में - एक अन्तरराष्ट्रीय बैंक की बड़ी नौकरी अपना जीवन पूरी तरह से कला में बिताने के लिए छोड़ दी थी. उस समय उनकी मुक्ति का पर्व मनाने बैंक के बाहर मक़बूल फ़िदा हुसैन आदि मौजूद थे और एसएच रज़ा ने, फ़ोन पर उनके नौकरी छोड़ने की ख़बर मिलने पर, पेरिस में अपने घर पर शाम को जश्न मनाया था.

आधुनिक मूर्धन्यों का जो समूह हुसैन-सूज़ा-रज़ा द्वारा बम्बई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के नाम से 1945 में स्थापित किया गया था, बहुसंख्यक आधुनिक इसी समूह में थे. कृष्ण खन्ना भी इनमें से एक हैं. उस समूह के आखि़री जीवित-सजीव-सक्रिय सदस्य. कृष्ण बाद की पीढ़ियों के और तथाकथित आधुनिकता से विरत होने वाले कई कलाकारों जैसे जगदीश स्वामीनाथन और विवान सुन्दरम के भी घनिष्ठ रहे हैं. भारत भवन में सातवें-आठवें दशक की महत्वपूर्ण कृतियों का जो संग्रह उसके संग्रहालय ‘रूपंकर’ में है उनके चयन में कृष्ण की भूमिका रही है. उन्हें अंग्रेज़ी की कई कविताएं मुखाग्र हैं जिनमें यीट्स, ईलियट, आडेन, ऐकन, डिलेन टामस आदि शामिल हैं.

रज़ा से उनकी घनिष्ठता रही और उनके बीच का पत्राचार रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत, हिन्दी अनुवाद में, ‘मेरे प्रिय’ नाम से राजकमल से पुस्तककार प्रकाशित हुआ है. कृष्ण हंसमुख विनोदप्रिय व्यक्ति हैं. किसी भी आयोजन या महफ़िल में वे हों तो उनकी हंसी अनसुनी-अनदेखी नहीं जा सकती. उन्होंने ईसा, आखिरी सपर से लेकर बैंड बजाने वाले, ट्रकों पर सवार लोग आदि सब चित्रित किये हैं. सार्वजनिक मुद्दों पर हमेशा मुखर उदारदृष्टि, उदार-चरित कृष्ण खन्ना सौ वर्ष जियें यह स्वस्तिकामना सारे कला-जगत् की है.