पूरे देश में कोरोना वायरस के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और जम्मू-कश्मीर (जो कि अब एक केंद्र शासित राज्य है) में भी इन मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. यहां अब तक 15 हजार से ज्यादा कोरोना वायरस पॉज़िटिव मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें से करीब 12 हजार मामले कश्मीर घाटी के 10 जिलों में ही हैं. करीब पौने दो सौ लोगों ने इस बीमारी से अभी तक जम्मू-कश्मीर में अपनी जान गंवाई है.

केंद्र सरकार ने जब अनुच्छेद-370 को अप्रभावी करने और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने का निर्णय लिया था तब उसकी ओर से कहा गया था कि इससे बेहतर शासन को सुनिश्चित करके राज्य का सही मायनों में विकास किया जा सकेगा. जानकारों के मुताबिक कोरोना संकट के समय मोदी सरकार के पास यह दिखाने का अवसर था कि अगस्त 2019 में उसने जो कहा था वह सही था. कहा गया कि अगर कोविड-19 के समय केंद्र सरकार थोड़ी सूझ-बूझ के साथ काम करेगी तो कश्मीर में मौजूद अविश्वास के माहौल को थोड़ा ठीक किया जा सकता है. लेकिन अगर राज्य के जमीनी हालात को आज देखें तो कश्मीर घाटी के लोग पिछले चार महीनों में नई दिल्ली के पास नहीं बल्कि उससे और दूर होते दिखाई देते हैं.

अगर कश्मीर घाटी में रहने वाले लोगों से बात करके उनके आक्रोश को समझने की कोशिश की जाये तो इस मुश्किल वक्त में भी दिल्ली से उनका इतना नाराज होना उतना चौंका देने वाली बात भी नहीं लगती है.

पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर राज्य में अभूतपूर्व लॉकडाउन के बीच देश के गृह मंत्री, अमित शाह ने संविधान के अनुच्छेद-370 को अप्रभावी बनाने का ऐलान किया था. यह अनुच्छेद पहले जम्मू-कश्मीर को भारत में एक विशेष स्थिति दिया करता था. लेकिन इसके बाद से देश का संविधान पूरी तरह से जम्मू-कश्मीर पर लागू हो गया.

इसके साथ-साथ भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य के दो टुकड़े करके लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र प्रशासित राज्यों में तब्दील कर दिया. इसके बाद कश्मीर घाटी में छह महीने से ज़्यादा तक कर्फ्यू जैसी स्थिति बनी रही, दो महीने से ज़्यादा समय तक यहां पर फोन पूरी तरह से बंद रहे, छह महीनों से ज़्यादा समय तक कश्मीर के ज्यादातर राजनेता हिरासत में रहे (इनमें से कई अभी भी बंद ही हैं) और राज्य में 4जी मोबाइल इंटरनेट सेवा अभी तक बंद ही है.

‘इस सब के बीच जब कोरोना वायरस का आगमन हुआ तो लोगों ने यह सोचा कि शायद इस वजह से भारत सरकार की विशेष स्थिति को खत्म करने की कोशिशों और उसके स्वभाव में थोड़ी सी नरमी देखने को मिलेगी. लेकिन हुआ बिलकुल उल्टा. उसकी गतिविधियां कोरोना वायरस वाले लॉकडाउन के बीच और तेज़ हो गयीं’, दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविध्यालय में कश्मीर पर अनुसंधान कर रहे, बशारत अली, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं. अली के मुताबिक भारत सरकार राज्य में कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन को कई तरीकों से अपने हितों को साधने के लिए इस्तेमाल कर रही है.

डोमिसाइल सर्टिफिकेट (मूल निवासी प्रमाण पत्र):

मई के महीने में कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर के नेतृत्व वाले प्रशासन ने लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किए जाने की घोषणा की. नए नियमों के अनुसार कोई भी ऐसा व्यक्ति जो जम्मू-कश्मीर में 15 साल से अधिक समय के लिए रहा हो, या राज्य में सात साल के लिए पढ़ा हो या फिर उसने दसवीं, बारहवीं की परीक्षा यहां से पास की हो, वह इस प्रमाण पत्र का हकदार हो जाता है.

पहले ऐसा नहीं था. पहले अनुच्छेद 35 ए के मुताबिक जम्मू-कश्मीर की विधानसभा यह तय करती थी कि कौन इस राज्य का मूल निवासी है और कौन नहीं. लेकिन अब लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट ऑनलाइन मिलने लगा है.

‘यहां के लोगों को यह तो पता था कि अनुच्छेद-370 हटने के बाद यह सब ज़रूर होगा, लेकिन जिस वक़्त पूरा देश कोरोना वायरस से लड़ रहा है उस वक़्त ऐसा करना लोगों के मन में भारत सरकार के इरादों को लेकर कई सवाल खड़े कर देता है’, श्रीनगर में काम कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं. वे कहते हैं कि ऐसे समय पर जब कश्मीर में इंटरनेट अभी भी पूरी तरह से बहाल नहीं हुआ है और कोरोना वायरस के चलते लोगों को अपने घरों से निकलने की अनुमति नहीं है यह निर्णय लेना साफ-साफ दर्शाता है कि भारत सरकार का इरादा सिर्फ जम्मू-कश्मीर की ‘डेमोग्राफी’ को बदलना है.

‘जब पूरा प्रशासन एक बीमारी के खिलाफ लड़ने में व्यस्त हो, ऐसे समय पर तहसीलदारों पर यह दबाव डालना कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट देने में देर लगने की सूरत में उन पर 50,000 रुपए का जुर्माना लगेगा और क्या दिखाता है’, वे पत्रकार नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर सत्याग्रह को बताते हैं.

आम लोगों से बात करें तो उनका भी यही मानना है.

‘हमारे पास इंटरनेट नहीं है, ऑनलाइन अप्लाई करने के लिए, हम बाहर नहीं जा सकते लॉकडाउन के चलते. और बाहर के लोग, जिनमें बाहर के ही नौकरशाह लोग शामिल हैं, आराम से इस सर्टिफिकेट के लिए ऑनलाइन अप्लाई कर रहे हैं’, दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले से आने वाले 70 साल के एक दुकानदार ग़ुलाम मुहम्मद भट, ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

इस बात पर मई, जून के महीनों में कश्मीर के लोगों में खूब चर्चा हुई. अब बात पुरानी हो गयी है, लेकिन यह भाव कि भारत सरकार कश्मीर के लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक समझती है पुराना नहीं हुआ है. वह अब थोड़ा और मजबूत हो गया है और उसके सिर्फ यही एक कारण नही है.

पर्यटन, अमरनाथ यात्रा और बाहर के मजदूर

हाल ही में कोरोना वायरस के बढ़ते हुए मामलों के चलते कश्मीर में प्रशासन ने फिर से लॉकडाउन घोषित कर दिया. कई जिलों में दफा-144 लागू कर दी गई और लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने पर रोक लगा दी गयी. श्रीनगर, अनंतनाग, पुलवामा और कई अन्य जिलों में सड़कें बंद कर दी गयीं और उन पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गयी, ताकि लोग ज़्यादा लोग एक जगह से दूसरी जगह न जा सके.

प्रशासन के इन फैसलों का सब, हिचकिचाते हुए ही सही, पर स्वीकार कर रहे थे. लेकिन तभी प्रशासन के कुछ और निर्णय सामने आए जिन्होंने कश्मीर के लोगों में पहले से ही पनप रहे संदेह को और गहरा कर दिया. इसके बाद कश्मीर में लोग पूछ रहे थे कि अगर वे बाहर नहीं जा सकते, दुकानें नहीं खोल सकते, अपने काम काज पर नहीं जा सकते तो अमरनाथ यात्रियों को राज्य में आने देना कितना बुद्धिमानी का काम है.

‘मेरी दुकान पिछले लगभग एक साल से बंद ही पड़ी है. मैं अब इसे खोलने की कोशिश भी नहीं कर रहा हीं क्यूंकि महामारी फैली हुई है. लेकिन क्या महामारी के बीच अमरनाथ यात्रा की इजाज़त देना सही है?’ अनंतनाग जिले के पहलगाम में किराने की दुकान चलाने वाले, अली मुहम्मद शाह पूछते हैं.

हालांकि राज्य में कोरोना वायरस की स्थिति को देखते हुए श्री अमरनाथ बोर्ड ने 21 जुलाई को एक बैठक कर इस साल की यात्रा स्थगित करने का फैसला ले लिया है, लेकिन इससे पहले स्थानीय लोगों के मन में जो भाव आ गया था वह शायद अभी रहने वाला है.

जम्मू-कश्मीर के प्रशासन ने कश्मीर में हवाई जहाज़ से आने वाले पर्यटकों के लिए भी अपने द्वार खोल दिये हैं और यह बात भी लोगों को काफी खल रही है, क्यूंकि अगस्त 2019 से लगभग कोई भी पर्यटक कश्मीर नहीं आया है.

‘अब कोरोना वायरस के बीच पर्यटकों को आने देना कौन सी समझदारी है? क्या यह सिर्फ यहां के लोगों को यह बताने के लिए किया जा रहा है कि कश्मीर कश्मीरियों का न रहकर भारत के अन्य राज्यों में बसे लोगों का हो गया है?’ बशारत अली पूछते हैं.

इसी बीच कश्मीर में कुछ क़ानूनों में भी बदलाव हुआ है जिसमें से एक यह है कि सुरक्षा बल अब अपनी छावनियों के बाहर भी, कुछ सामरिक स्थानों पर, निर्माण कार्य कर सकते हैं. यह अनुमति ‘कंट्रोल ऑफ बिल्डिंग ऑपरेशन एक्ट-1988’ और ‘जेएंडके डेव्लपमेंट एक्ट-1970’ में संशोधनों के द्वारा दी गयी है. इसके साथ-साथ हजारों मजदूर भी भारत के अन्य राज्यों से कश्मीर की तरफ लाये जा रहे हैं. अगर सोशल मीडिया पर वाइरल हुए एक स्थानीय न्यूज चैनल - गुलिस्तान न्यूज - के वीडियो की मानें तो इन मजदूरों का कोरोना वाइरस टेस्ट भी नहीं किया जा रहा है.

Play
गुलिस्तान न्यूज का सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

‘कश्मीर में लॉकडाउन के चलते सारा काम ठप पड़ा हुआ है, ऐसे में मजदूरों का आना एक ही चीज़ की तरफ इशारा करता है कि इनको सुरक्षा बालों के द्वारा किए जाने वाले निर्माण में लगाया जाएगा’, इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइन्स एंड टेक्नोलोजी में अन्तरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने वाले, डॉ उमर गुल, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

गुल कहते हैं कि कश्मीर के लोग इस समय बंद हैं और किसी भी तरफ से कोई विरोध होने की कोई संभावना नहीं है, ‘लेकिन कम से कम मानवीय आधार पर ही सही, इन मजदूरों का टेस्ट वगैरह हो जाना चाहिए. यह न सिर्फ यहां के लोगों की सुरक्षा के लिए है बल्कि सुरक्षा बलों की सुरक्षा के लिए भी ज़रूरी है.’

लेकिन स्थानीय लोगों को लगता है कि लेकिन सुरक्षा के नाम पर कश्मीर में पिछले पांच महीनों में सिर्फ मिलिटेंटस और सुरक्षा बलों में मुठभेड़ हुई हैं और जगह-जगह नए बंकर बना दिये गए हैं.

इस साल जनवरी से लेकर अभी तक कम से कम 130 मिलिटेंट्स अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए हैं. जहां कश्मीर में मिलिटेंट्स का मारा जाना कोई नई बात नहीं है, वहीं उनके शव उनके परिजनों को न देना बिलकुल नया है.

पिछले चार महीनों में लगभग हर मुठभेड़ के बाद पुलिस ने यह कहा है कि मारे गए मिलिटेंट्स के शव कोरोना वायरस के चलते उनके परिजनों को नहीं दिये जाएंगे. उनके शव उत्तर कश्मीर में, घर के एक या दो सदस्यों के सामने, दफन किए जा रहे हैं.

इस बात से कश्मीर के लोगों में, खास तोर पर मारे गए मिलीटेंट्स के घरवालों में, काफी आक्रोश है.

‘अगर 4000 सुरक्षाकर्मी पूरे गांव को घेर कर दो मिलिटेंट्स को मार गिरा सकते हैं तो क्या दो दर्जन लोग अपने किसी मारे गए बच्चे का अंतिम संस्कार नहीं कर सकते? यह किस तरह की नीति है जहां मां-बाप अपने बच्चे को अपने कब्रिस्तान में नहीं दफन कर सकते?’ अनंतनाग जिले के अरविनी गांव में एक मारे गए मिलीटेंट के घरवालों ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

लेकिन कई जानकार इस बात को भावनाओं से परे रख कर देखते हैं.

‘जब किसी मिलिटेंट के जनाजे में हजारों लोग जमा होते थे तो प्रशासन के लिए मुश्किल हो जाती थी उनको संभालना. और वहीं इन जनाज़ों में और युवक हिंसा के रास्ते पर चल पड़ते थे. भारत सरकार इन जनाज़ों का तोड़ काफी समय से ढूंढ रही थी और उन्हें कोरोना वायरस के रूप में यह बहाना मिल गया’, कश्मीर को बहुत बारीकी से जानने वाले एक सुरक्षा अधिकारी ने सत्याग्रह को, उनका नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया.

पिछले पांच महीनों में कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों के बंकरों में भी काफी इजाफा हुआ है, जिससे लोगों को काफी दिक्कतें भी आ रही हैं.

‘सड़क पर देखें तो हर 50 मीटर पर न सिर्फ एक बंकर है बल्कि पूरी सड़क कांटेदार तार या अन्य चीजों से घिरी पड़ी है. हर जगह चेकिंग, कहीं जाना है तो बार-बार रोका जाता है, ट्रैफिक न होने के बावजूद घंटों गाड़ी में खड़े रहना पड़ता है. ये सब चीज़ें लोगों को दिल्ली से दूर नहीं करेंगी तो और क्या होगा’, डॉ उमर गुल सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं. उनके मुताबिक लोगों के मन में यह बैठ गया है कि ये सब चीज़ें जान-बूझ कर की जा रही हैं, कश्मीर के लोगों को ‘भारत में उनकी जगह दिखाने के लिए.’

ये तो वे चीज़ें हैं जो भारत सरकार ने कोरोना वाइरस महमारी के दौरान कश्मीर में की हैं और जिनसे कश्मीर के लोगों में निराशा और संदेह ने और भी गहरी जड़ पकड़ ली है. वहीं कुछ चीज़ें ऐसी भी हैं जो सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान नहीं की हैं लेकिन वे लोगों के मन में केंद्र सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ाने का काम कर रही हैं.

महमारी में 4जी इंटरनेट बहाल करना ऐसी ही एक चीज़ है:

जैसा कि शुरू में हमने बताया कि कश्मीर में चार अगस्त 2014 को इंटरनेट सेवायें बंद कर दी गई थीं और अभी तक भी 4जी इंटरनेट बहाल नहीं हुआ है. सरकार 4जी इंटरनेट को सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से एक खतरे के तौर पेश करती आ रही है.

लोग जैसे-तैसे बिना इस सुविधा के गुज़ारा कर रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस के आने से ज़िंदगी इंटरनेट के बिना काफी मुश्किल हो गयी है. सबसे ज़्यादा 4जी इंटरनेट न होने से जो लोग प्रभावित हुए हैं वै हैं डॉक्टर, क्यूंकि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जो चीज़ सब से ज़रूरी मानी जा रही है वह है जानकारी.

‘और आजकल की दुनिया में सारी जानकारी इंटरनेट से आती है, जो हमारे पास है तो लेकिन 2जी जो आजकल की दुनिया में किसी काम का नहीं है’, श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह (एसएमएचएस) अस्पताल में काम करने वाले एक डॉक्टर ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. यहां डॉक्टरों को पत्रकारों से बात करने की अनुमति नहीं है, इसीलिए डॉक्टर से बात करना उतना आसान नहीं है.

वे कहते हैं कि इंटरनेट के बिना उनका काम बहुत मुश्किल है, ‘क्यूंकि हर घंटे दुनिया के किसी न किसी कोने से कोरोना वाइरस के बारे में कोई नयी जानकारी आती है और हम उस जानकारी से महरूम रहते हैं.’

दूसरा तबका जो 4जी इंटरनेट न होने के चलते तमाम परेशानियां झेल रहा है वह है यहां के छात्र. कश्मीर घाटी में पिछली पांच अगस्त से अभी तक सिर्फ मार्च में कुछ दिन स्कूल खुले थे. “और अब जबकि पूरी दुनिया में छात्र ऑनलाइन पढ़ रहे हैं हमारे पास वह विकल्प भी नहीं है. 2जी इंटरनेट पर क्या ऑनलाइन क्लास होगी और क्या तो समझ में आएगा” कश्मीर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे गुलजार अहमद सत्याग्रह को बताते हैं.

अहमद की तरह ही हजारों छात्र 4जी इंटरनेट के न होने से पढ़ाई में देश के दूसरे हिस्सों के छात्रों से पीछे छूट रहे हैं.

‘जहां पूरे देश में बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं, हमारे साथ ही यह अन्याय क्यूं हो रहा है. क्या हमें हक़ नहीं है पढ़ने का? और फिर दिल्ली में बैठे लोग कहते हैं कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है. कश्मीर का मतलब क्या सिर्फ ज़मीन है? लोग नहीं?’, दसवीं क्लास में पढ़ रही, साइमा अमीन, ने श्रीनगर में सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

इन सब चीजों को परे भी रखें तो छोटे-छोटे मामले, जैसे अस्पतालों में सही से इलाज न होना, वक़्त पर कोरोना वायरस का टेस्ट न होना, अस्पतालों में कोरोना वायरस के अलावा और किसी चीज़ का इलाज न होना, क्वारंटीन सेंटरों में सुविधाओं का न होने जैसी चीज़ें भी लोगों को खल रही हैं. हालांकि इस तरह की अव्यवस्थायें दूसरे राज्यों और देशों में भी देखने को मिल रही हैं लेकिन कश्मीर में कई लोग बाकी चीजों के साथ रखकर इन्हें एक अलग ही निगाह से देखते हैं.

कुल मिलाकर यह कि जहां भारत सरकार को कोरोना वायरस जैसी महमारी में कश्मीर के लोगों को जीतने का जो एक मौका मिला था, वह शायद उसने गंवा दिया है. लोगों में संदेह और आक्रोश अब पिछले साल के अगस्त से भी ज़्यादा है और यह कश्मीर को किस दिशा में लेकर जाएगा, कह पाना मुश्किल है.