चार वर्ष पहले

चार वर्ष पहले यही जुलाई का महीना था. मई के उत्तरार्द्ध से हम हर रोज़ दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में सुबह-शाम उसकी सघन चिकित्सा इकाई में अचेत लेटे उनका हाल जानने जाते थे. वेण्टीलेटर पर वे शान्त-मौन आंखें बन्द किये लेटे रहते थे. उनकी ज़रा सी हरकत, जैसे पल भर के लिए आंखें खोलना, हमें उम्मीद से भर देती थी. वे 94 बरस के हो चुके थे और कई बार अप्रत्याशित रूप से स्वस्थ होकर अस्पताल से घर वापस आ चुके थे. इस बार भी हमें ऐसे ही किसी चमत्कार की प्रतीक्षा थी. पर वह हुआ नहीं. 23 जुलाई 2016 को सुबह 11 बजे के थोड़ा बाद उनका निधन हो गया. हमारे सचिव संजीव चौबे और मैं बाहर ही थे और एक तरह से मैंने मुक्तिबोध, अपने पिता और अब रज़ा को अपनी आंखों के सामने मरते देखा. पिता तो उस समय सजग थे, भले अस्पताल में थे. मुक्तिबोध और रज़ा दोनों ही महीनों अचेत रहकर दिवंगत हुए, अस्पताल में ही. 24 जुलाई को इस मूर्धन्य चित्रकार के शव को उनकी इच्छा के अनुसार हमने मण्डला की कब्रगाह में उनके पिता की कब्र के बगल में, राजकीय सम्मान के साथ, दफ़्न किया.

इन चार वर्षों में मण्डला में सैयद हैदर रज़ा और उनके पिता की कब्र को सादा-सुघर रूप दे दिया गया है. हिन्दी कवि असंग घोष की पहल पर यहां के एक मार्ग का नाम उन पर रख दिया गया है और एक सुकल्पित रज़ा कलावीथिका भी बना दी गयी है जहां कलाप्रदर्शन के अलावा संगीत, साहित्य आदि की महफ़िलें आयोजित हो सकती हैं. हर वर्ष रज़ा की प्रिय और वरेण्य नर्मदाजी के तट पर रज़ा फ़ाउण्डेशन उनके जन्म और देहावसान के महीनों अर्थात् फ़रवरी और जुलाई में छात्रों-युवाओं के लिए कला-कर्मशाला, नागरिकों के लिए कला-शिविर, लोकसंगीत-नृत्य आदि के आयोजन करता है. अपने देहावसान के बाद एसएच रज़ा मण्डला शहर के जनजीवन में अब एक प्रेरक उपस्थिति हैं और यह शहर प्रीतिकर विस्मय से यह पहचान रहा है कि वहां के साधारण मध्यवर्ग के एक लड़के ने कला में कैसी कालजयी मूर्धन्यता अर्जित की, और 70 से अधिक बरस उससे दूर रहकर भी, उसको अपनी स्मृति और कला में संजोये रहा.

इस बीच रज़ा फ़ाउण्डेशन, जिसे रज़ा ने ही स्थापित और पोषित किया, लगातार अपनी सक्रियता और जीवन्त उपस्थिति देश के कला-संगीत-साहित्य-नृत्य-विचार जगत् में बनाये हुए है. उसके द्वारा प्रेरित और वित्तपोषित रज़ा पुस्तकमाला में 100 के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और यह संख्या अगले वर्ष के अन्त तक 150 होने की सम्भावना है. किसी कलाकार की उदारता से सम्भव हुई यह पुस्तकमाला हिन्दी में सबसे बड़ी पुस्तकमाला होने जा रही है. रज़ा को यह जानकर बेहद सन्तोष होगा, वे जहां भी हैं, कि उनकी प्रिय मातृभाषा हिन्दी में यह सम्भव हुआ है.

इस वर्ष कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण फ़ाउण्डेशन की गतिविधियों की निरन्तरता बाधित हुई है. फिर भी, ककैया के एक विद्यालय में, जहां रज़ा का विद्यारम्‍भ हुआ और मण्‍डला के एक विद्यालय में छात्र अपने परिसरों में चित्र बनाकर रज़ा को प्रणति दे रहे हैं. रंगसामग्री और मण्‍डला में घर बैठकर चित्रकारी करने के लिए इच्‍छुक नागरिकों को गमले और रंग उपलब्‍ध कराये गये हैं. एक अनाथाश्रम और एक वृद्धाश्रम में अनाज-वितरण की व्‍यवस्‍था भी फ़ाउण्‍डेशन ने की. पिछले तीन महीनों से 40 के लगभग अर्थाभावग्रस्‍त लेखकों-कलाकारों को फ़ाउण्‍डेशन साढ़े सात हज़ार रुपये प्रति माह प्रति व्‍यक्ति की वित्‍तीय सहायता भी कोरोना संकट में दे रहा है. फ़रवरी 2021 से रज़ा का सौवां वर्ष शुरू होगा और उसकी तैयारी चल रही है.

छोटी कविताएं

छोटी कविताओं का अपना आकर्षण होता है. वे बड़ी मुद्राएं नहीं बनातीं और सीधे मर्म को बेंधती हैं. उनकी संक्षिप्ति कथ्य की अल्पता नहीं होती. वे अकसर संक्षेप में या तो अधिक कह जाती हैं या उस अधिक की ओर गहरा संकेत करती हैं. अमेरिका से प्रकाशित नाओमी शिहाब नाई द्वारा सम्पादित एक अंग्रेजी काव्य संचयन ‘दिस सेम स्काई’ इधर फिर पलट रहा था तो कई छोटी कविताओं में मन रमा. उनमें से तीन के हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत हैं:

कलम - मोहम्मद अल-गज़ी (ट्यूनीशिया)

अपनी अनाश्वस्त उंगलियों में एक कलम लो

भरोसा करो, आश्वस्त होओ

कि सारा संसार एक नभ-नील तितली है

और शब्द जाल हैं उसे पकड़ने का.

समुद्र-तट पर - कमाल ओज़र (तुर्की)

लहरें पदचिह्नों को मिटा रही हैं

उनके जो तट पर चल रहे हैं

हवा शब्दों को दूर ले जा रही है

जो दो व्यक्ति एक-दूसरे से कह रहे हैं

लेकिन वे फिर भी तट पर चल रहे हैं

उनके पांव नये चिह्न बनाते हुए

फिर भी वे दो साथ-साथ बतिया रहे हैं

नये शब्द पाकर.

चाहत की दूरियां - फ़ौजिया अबू ख़ालिद (सऊदी अरब)

जब तुम दूर चले गये हो और मैं

तुम्हें एक चिट्ठी से पछिया नहीं सकती

इसलिए कि दूरी

तुम्हारे और मेरे बीच

ओहकी आवाज़ से कमतर है

क्योंकि शब्द छोटे हैं

मेरी चाहत की दूरी से

कटौती और बढ़त

लोकतंत्र की एक बड़ी विशेषता यह होती है कि उसमें नागरिकता अपनी सजगता और सक्रियता से सत्ता को जवाबदेह बनाने की लगातार कोशिश करती रहती है. हमारे लोकतंत्र में, दुर्भाग्य से, सत्ता केन्द्रीकृत और संवेदनहीन हो रही है. उसकी अविचारित हड़बड़ी ने करोड़ों ग़रीब और प्रवासी मज़दूरों को बहुत ही दारुण स्थिति में डालकर शहरों से अपने गांव-घर लौटने को, भयानक कठिनाइयों के चलते, मजबूर किया. उनके अनेक दारुण यंत्रणामय चित्र हमने सोशल मीडिया पर लगातार देखे हैं. वापसी के लिए रेल या बसों आदि की व्यवस्था में भी सत्ताओं की अक्षम्य कोताही हमने देखी है.

गोदी मीडिया इस दृश्यावली और उससे ज़ाहिर होने वाली सत्ता की निर्मम अक्षमता को भले हाशिये पर डालता रहा हो, सोशल मीडिया ने उन्हें दिखाकर लोकतांत्रिक कर्तव्य और नैतिकता निभाये. सत्ता का जवाबदेही निभाने से क्रूर इनकार और नागरिकता द्वारा अपनी सजगता से उसका प्रतिकार हमने दोनों एक साथ देखे. सत्ता लोकतांत्रिक भावना में कटौती कर रही है, जिसमें प्रशासन के कई अंग ख़ास कर पुलिस और अदालतें तक शामिल हैं. लेकिन साथ ही साधारण नागरिक, अलग-अलग मोर्चों पर, प्रश्नवाचक और मुखर होकर लोकतंत्र में बढ़त कर रहे हैं.

कोरोना महामारी और उसके कारण लागू किये गये लॉकडाउन में भय बहुत व्यापक हो गया है. लगता है कि हम अब एक भयाक्रान्त व्यवस्था बन गये हैं. पर इसके साथ-साथ यह भी अलक्षित नहीं जा सकता कि गाली-गलौज, लांछन, झगड़े से किसी संवाद को असंभव बनाने वाली भक्ति और पालतू प्रवृत्तियों के बरक़्स लोग लगातार प्रश्न भी पूछ रहे हैं. पेट्रोल-डीजल के हर रोज़ बढ़ते दाम, चीन की भारत में घुसपैठ, कोरोना प्रकोप को लेकर की गयी कई नयी-पुरानी घोषणाओं और वक्तव्यों को सामने लाकर लगातार बेचैन करने वाले प्रश्न पूछे जा रहे हैं.

सत्ताएं ऐसी प्रश्नवाचकता को, कई क़ानूनों की अनैतिक और मनमानी व्याख्या कर, द्रोही आदि क़रार देने के लोकतंत्र-विरोधी कारनामों में लिप्त हैं. पर वे इस प्रश्नवाचकता को कम नहीं कर पा रही हैं. शीर्षस्थ राजनेताओं की गतिविधि पर यह सजग नागरिकता कड़ी नज़र रख रही है और उनकी असंगतियों और चूकों को सामने ला रही है. इसका राजनैतिक प्रतिफल क्या और कब होगा यह कहना मुश्किल है. पर लगता है कि, राजनैतिक दलों से अलग और विपक्ष से विच्छिन्न, एक तरह का अव्यवस्थित पर सजग-सक्रिय प्रतिपक्ष अब साधारण अज्ञातकुलशील नागरिकता रूपायित कर रही है.

यह आकस्मिक नहीं है कि इसमें रचने-सोचने वाला बड़ा समुदाय शामिल है. यह ज़्यादातर साम्प्रदायिक, लालची, धर्मान्ध, जातिवादग्रस्त मध्यवर्ग से अलग एक ढीला-ढाला वर्ग है. सत्ता द्वारा उसे दबाना या नष्ट करना, जिसकी हर चन्द कोशिश वह निश्चय ही करेगी, आसान नहीं होगा. लेकिन आगे आने वाले तनावों और बाधाओं के सामने इस अल्पसंख्यक वर्ग का टिक पाना और बढ़ पाना भी बेहद कठिन होगा. लोकतंत्र कितना बचता-बढ़ता है वह, कुछ हद तक, इसकी परिणति पर निर्भर करेगा.