पूरे विश्व में एशिया महाद्वीप ही ऐसा भूभाग है जहां से दुनिया के सभी धर्म उपजे. इस सृजनशीलता में भारत का स्थान और भी विशिष्ट है. इसी धरती पर हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख इत्यादि धर्मों का जन्म हुआ. पश्चिम एशिया में आज के सऊदी अरब और इजराइल के भूभाग पर तीन एकेश्वरवादी धर्म - यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म - अस्तित्व में आये.
भारत के पश्चिम में स्थित सऊदी अरब के मक्का नामक शहर से इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद ने इस धर्म का प्रचार आरम्भ किया था. यह करीब 1400 साल पहले की बात है. आज पूरे विश्व में इस धर्म को मानने वालों की संख्या करीब 180 करोड़ से अधिक है. इस लिहाज से दुनिया में ईसाई धर्म के बाद इस्लाम धर्म दूसरे स्थान पर आता है.
यहूदी और ईसाई धर्म की तरह ही इस्लाम निराकार एकेश्वर की उपासना को अपने धर्म का मूल मानता है. इस्लाम, यहूदियों और ईसाइयों के प्रत्येक पैगम्बरों को अपना पैगंबर भी मानता है. लेकिन हज़रत मुहम्मद इस धर्म के अंतिम पैगम्बर हैं.
इस्लाम धर्म का विचार पांच स्तंभों पर आधारित है :
1. निराकार एकेश्वर के अस्तित्व में विश्वास
2. इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब को ईश्वरीय वाणी का संदेशवाहक पैगम्बर मानना
3. दान (ज़कात) देना
4. रमज़ान के महीने में व्रत (रोज़ा) रखना और
5. हज (निश्चित महीने में मक्का स्थित काबा की धर्मयात्रा) पर जाना.
ज़कात, रोज़ा और हज उन्हीं व्यक्तियों के लिए अनिवार्य है जो इसे अंजाम देने में सक्षम हों. यानी यदि आपके पास अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से अधिक धन है तो दान देना आपका फर्ज है. रोज़ा या व्रत वे ही रख सकते हैं जिनका शरीर ऐसा करने में सक्षम हो. इसी प्रकार हज की यात्रा पर जाने की अनिवार्यता उन व्यक्तियों के लिए ही है जो शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से ऐसा करने के लायक हों.
कोरोना महामारी की विपदा के कारण विदेशियों के लिए इस साल हज की यात्रा को निरस्त कर दिया गया है. बाकी लोगों के लिए यह 28 जुलाई से शुरू हो चुकी है और दो अगस्त तक चलने वाली है. संक्रमण के खतरे को देखते हुए इस साल सऊदी अरब में रहने वाले भी मात्र 1000 लोग ही इस यात्रा में शामिल हो रहे हैं. इनमें से करीब दो-तिहाई विदेशी मूल के और एक-तिहाई स्थानीय लोग हैं. पिछली साल हज यात्रा में करीब 25 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था. इस बार उन लोगों को यात्रा के लिए प्राथमिकता दी गई है जिन्होंने पहले हज नहीं किया है और केवल ऐसे लोगों को ही चुना गया है जिनकी उम्र 20 से 50 वर्ष के बीच की है.
जब से मक्का पर सऊदी अरब का नियंत्रण है तब से और एक लंबे समय से ऐसा नहीं हुआ है लेकिन यह पहली बार नहीं है कि हज यात्रा पर रोक लगी हो या इसे निरस्त कर दिया गया हो. इससे भी पहले युद्ध, राजनैतिक विवाद और महामारी के चलते कई बार हज यात्रा को रद्द किया जा चुका है.
सन 865 ईस्वी में पहली बार हज यात्रा को रद्द किया गया था जब इस्लाम के चौथे खलीफा हज़रत अली (शियाओं के प्रथम इमाम) के बड़े पुत्र इमाम हसन के पड़पौत्र इस्माइल इब्न यूसुफ अलवी ने बगदाद में अब्बासी खलीफा के साथ युद्ध के दौरान सऊदी अरब स्थित अराफात के पहाड़ों पर हमला किया. इस हमले में हज यात्रा पर निकले तीर्थयात्रियों को भी जान-माल का नुकसान हुआ और इसकी वजह से हज को रोक दिया गया.
इसके बाद सन 930 ईस्वी में बहरीन के शासक अबू ताहिर अल-जनाबी ने मक्का पर आक्रमण किया. ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, इस हमले के दौरान 30,000 हज तीर्थयात्रियों का नरसंहार हुआ और उनके शवों को ज़मज़म नाम के कुएं में फेंक दिया गया था. आक्रमणकारियों ने काबा से सटी मस्जिद अल-हराम को लूट लिया और काबा की दीवार पर लगे संग-उल-असवद (काला पत्थर) को उखाड़ कर अपने साथ बहरीन ले गए. काबा मक्का में स्थित इस्लाम धर्म की सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद - मस्जिद-अल-हरम - के बीचों-बीच स्थित वह इमारत जिसे अल्लाह का घर कहा जाता है. दुनिया के हर कोने के मुस्लिम धर्मावलंबी इसी की दिशा में मुंह करके नमाज पढ़ते हैं और सभी हज यात्री इसकी सात बार परिक्रमा करते हैं.
काबे की दीवार पर लगे काले पत्थर को बहुत पवित्र माना जाता है और काबा की परिक्रमा करते हुए इसे छुआ जाता है. मक्का के इस्लामी धर्मगुरुओं का यह मानना था कि जब तक यह काला पत्थर काबा की दीवार पर दोबारा न लगाया जाये तब तक हज यात्रा मान्य नहीं हो सकती. मक्का और बहरीन के शासकों में संधि होने में एक दशक का समय लगा और सन 930 से सन 940 के 10 साल तक हज यात्रा आयोजित नहीं की जा सकी.
ऐसा नहीं है कि हज यात्रा का निलंबन मात्र युद्ध एवं राजनैतिक विवादों के चलते ही हुआ हो. कई बार विभिन्न प्रकार की महामारियों के चलते भी हज यात्रा पर रोक लगी.
पैगंबर मुहम्मद के प्रवचनों के संग्रह ग्रंथों को हदीस कहा जाता है. इनमे से एक हदीस महामारी के समय हज यात्रा के बारे में मार्गदर्शन करती है. इस हदीस के अनुसार “यदि किसी जगह प्लेग (महामारी) का प्रकोप हो तो उस जगह प्रवेश न करें; और यदि आप जिस जगह रहते हैं वहां महामारी हो जाये तो उस जगह को न छोड़ें.”
सन 967 में मक्का में प्लेग का प्रकोप हुआ जिसमें हजारों लोगों की जान गई. इस कारण उस साल की हज यात्रा को रद्द कर दिया गया. साल 1837 से 1858 के बीच प्लेग और हैजा जैसे संक्रामक रोगों के प्रकोप की वजह से हज यात्रा तीन बार निरस्त हुई और तीर्थयात्रियों को सात साल तक मक्का की यात्रा करने से रोका गया.
इस्लाम में स्पष्ट कहा गया है कि जीवन वही ईश्वर ले सकता है जिसने जीवन दिया है. इसलिए जान-बूझ कर खुद को ऐसे जोखिम में न डालो जिससे अपना या किसी और का जीवन खतरे में पड़ जाये. यानी कि जीवन को जोखिम में पड़ जाने से बचाने के लिए हज यात्रा को कभी भी रोका जा सकता है. बल्कि उसे रोका ही जाना चाहिए.
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