24 मार्च को जब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला, 232 दिन के बाद रिहा हुए तो उन्होंने कोई राजनीतिक बात नहीं की, सिर्फ यह कहा कि उन्होने दोपहर का खाना अपने माता-पिता के साथ खाया.

“लेकिन यह याद नहीं कि क्या खाया क्योंकि में अचम्भे की हालत में हूं” उमर ने कहा था. फिर उन्हें उस अचम्भे से निकलने और जम्मू-कश्मीर के हालात पर बात करने में लगभग चार महीने लग गए.

सिर्फ उमर अब्दुल्ला ही नहीं, उनके पिता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री रहे, फारुख अब्दुल्ला, सहित कश्मीर के हर राजनेता का यही हाल था. किसी ने भी पिछले एक साल में कोई राजनीतिक बात नहीं की है और अब अचानक से सब बोल पड़े हैं.

अब इतने दिनों बाद उमर अब्दुल्ला का कहना है कि जब तक जम्मू-कश्मीर एक केन्द्र शासित क्षेत्र बना रहेगा वे कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे. उनके इस बयान को कई अखबारों ने यह कह कर छापा कि उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर को वापिस एक पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं.

उमर अब्दुल्ला के साथ-साथ कश्मीर के लगभग अन्य सभी राजनेता भी बोल रहे हैं और उनके बयानों पर खूब चर्चा हो रही है. सवाल यह पैदा होता है कि अचानक से ऐसा क्या हो गया कि सारे राजनेता अपनी चुप्पी तोड़ रहे हैं?

किसने क्या कहा और उसके क्या-क्या मतलब निकल सकते हैं, इन पर बात करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि हुआ क्या था.

5 अगस्त 2019:

चार अगस्त 2019 की रात कश्मीर में, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित, लगभग सारे बड़े और मध्य वर्ग के राजनेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. ये गिरफ्तारियां तब के राज्यपाल, सत्यपाल मालिक, के उस बयान के चंद घंटों के बाद हुई थीं जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार का अनुच्छेद-370 हटाने का कोई इरादा नहीं है.

लेकिन अगली सुबह, जब कश्मीर में लोग अपने-अपने घरों में बंद थे और संचार के सारे माध्यम भी बंद कर दिये गए थे, देश के गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में खड़े होकर न सिर्फ अनुच्छेद-370 हटाने की घोषणा की बल्कि यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित राज्यों में बांट दिया जाएगा - लद्दाख और जम्मू-कश्मीर.

इसके बाद कश्मीर में कई महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा. फोन बंद रहे. 4जी इंटरनेट अभी भी बंद है. साथ ही साथ कई राजनेता भी हिरासत में ले लिये गये जिनमें से पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती और पूर्व आईएएस अफसर शाह फैसल अभी भी अपने घरों में नज़रबंद हैं. बाकियों में से कई छूट गये जिनमें फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला भी शामिल हैं. फारुख, उमर से थोड़ा पहले छूट गए थे.

लेकिन जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है रिहा होने के बाद भी इन राजनेताओं ने कश्मीर के हालात पर कोई बात नहीं की, न 370 पर और न जम्मू-कश्मीर को बांटे जाने पर. अब पांच अगस्त यानी अनुच्छेद-370 हटने के एक साल पूरा होने से कुछ दिन पहले यकायक सब बोल पड़े हैं.

बयानबाज़ी की शुरुआत तीन बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, फारुख अब्दुल्ला ने की, उनके नई दिल्ली के तीन दिन के दौरे के बाद. हालांकि फारुख ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका नई दिल्ली का दौरा पूरी तरह से निजी था, लेकिन वहां से लौटते ही अपने बयान में उन्होने जम्मू-कश्मीर को फिर से एक पूर्ण राज्य बनाने की मांग की.

“कश्मीर के लोगों के साथ विश्वासघात हुआ है. जो विश्वास कश्मीर के लोगों ने भारत में शामिल होने के समय जताया था वो पांच अगस्त को लिए गए फैसले से टूट गया है” फारुख अब्दुल्ला ने कहा और साथ ही यह भी बताया कि उनकी पार्टी अब सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने हक़ के लिए लड़ेगी.

अपने बयान में फारुख अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि अनुच्छेद-370 यह कह कर हटाया गया था कि इससे कश्मीर में शांति आएगी और मिलिटेन्सी खत्म हो जाएगी लेकिन “मैं पूछना चाहूंगा कि हुई है मिलिटेन्सी खतम, आई है शांति?”

फारुख ने कहा कि उनकी लड़ाई शांतिपूर्वक होगी और उनकी पार्टी यह निर्णय लेगी कि जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव होंगे तो वह लड़ेगी या नहीं. उनके बयान के फौरन बाद उनके बेटे उमर अब्दुल्ला का बयान इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख की शक्ल में आया.

उमर अब्दुल्ला के बयान पर जबर्दस्त प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. कश्मीर के लोग अनुच्छेद-370 पर बात न करके सिर्फ जम्मू-कश्मीर को वापस राज्य बनाने की बात करने के लिए उन पर उंगली उठा रहे हैं. वहीं उमर की अपनी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता रूहुल्लह मेहदी ने उनके बयान के एक दिन बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि यह इस्तीफा उन्होंने उमर के बयान से सहमत न होने के चलते दिया है.

“जो पांच अगस्त को हुआ था वो जम्मू-कश्मीर के राज्य होने या न होने से परे है. जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने की मांग आखिरी होनी चाहिए” मेहदी का अपने एक इंटरव्यू में कहना है.

इस सब राजनीतिक शोर के बीच उमर अब डैमेज कंट्रोल में लगे हुए हैं. “मैंने सिर्फ यह कहा था कि मैं जम्मू-कश्मीर राज्य का मुख्यमंत्री रहा हूं और मैं केंद्र प्रशासित जम्मू-कश्मीर की विधानसभा के लिए चुनाव नहीं लड़ूंगा. मैंने जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाने की बात नहीं की” उमर ने अपने एक बयान में कहा.

उनके एक अन्य बयान में वे अनुच्छेद-370 के बारे में भी बात करते दिखाई दिये जिसमें उनका यह भी कहना था कि उनकी बातों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है.

“मैंने कभी भी जम्मू-कश्मीर की (370 द्वारा प्रदान की गई) विशेष स्थिति बहाल करवाने की लड़ाई को जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य बनाने की लड़ाई के पीछे नहीं रखा. लेकिन फिर भी 370 के बारे में दिये गए मेरे बयान मिटा दिये जाते हैं” उमर ने नुकसान को कम करने का प्रयास करते हुए कहा.

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) - जिसकी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती अभी भी नज़रबंद हैं - के नेता भी अब इस मसले पर बयानबाज़ी करने लगे हैं.

पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता और विधान परिषद के सदस्य रहे, फिरदौस टाक, का कहना है कि उनकी पार्टी की मांग बिलकुल स्पष्ट है और वह है अनुच्छेद-370 की फिर से बहाली करने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाना.

“हमारे सारे हक़ जो हमसे पांच अगस्त को छीने गए थे हमें वापिस मिलने चाहिए” टाक कहते हैं.

उन्ही की पार्टी के एक और नेता नईम अख्तर, जो कि मंत्री भी रह चुके हैं, ने पांच अगस्त को लिए गए भारत सरकार के निर्णय को “मैराइटल रेप” कहा है.

“शादी कानून के हिसाब से होती है और अगर एक पक्ष दूसरे की मर्ज़ी के खिलाफ ज़बरदस्ती निर्णय ले तो, उसको मैराइटल रेप ही कहते हैं,” अख्तर ने मंगलवार को दिये गए एक इंटरव्यू में कहा है.

उधर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, ग़ुलाम अहमद मीर ने भी जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने पर ज़ोर दिया है. दूसरी तरफ हाल ही में पीडीपी छोड़कर ‘जम्मू एंड कश्मीर अपनी पार्टी’ बनाने वाले अल्ताफ़ बुखारी ने लोगों को 370 भूल कर आगे बढ़ने की सलाह दी है और साथ ही साथ जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने की भी मांग की है.

यह तो हो गए राजनेताओं के बयान. अब सवाल यह है कि अचानक से इतनी बयानबाज़ी क्यूं?

सत्याग्रह ने इस बारे में अलग-अलग लोगों से बात की और जहां उनके विचार अलग अलग थे, एक बात पर सभी सहमत थे - ये राजनेता नई दिल्ली के आशीर्वाद से ही अपना मुंह खोल रहे हैं.

“यह बिलकुल स्पष्ट है कि यह सब अब इतने समय बाद बोल रहे हैं तो दिल्ली के इशारे पर ही बोल रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि अभी क्यूं?” श्रीनगर में स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार, शम्स इरफान, सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं.

शम्स का मानना है कि भारत सरकार इन सभी से जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने की मांग के जरिये कई और चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है.

“हम सभी को पता है कि जम्मू-कश्मीर वापिस राज्य बन ही जाएगा. लेकिन ये सभी इस वक्त शोर मचा कर कश्मीर की डेमोग्राफी में हो रहे बदलाव और आर्मी के जगह-जगह चल रहे निर्माण कार्यों जैसी चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं,” शम्स कहते हैं.

शम्स हाल ही में “डोमिसाइल” कानून और जम्मू-कश्मीर के निर्माण के क़ानूनों में बदलाव की बात कर रहे हैं.

मई के महीने में कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर के नेतृत्व वाले प्रशासन ने लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किए जाने की घोषणा की. नए नियमों के अनुसार कोई भी ऐसा व्यक्ति जो जम्मू-कश्मीर में 15 साल से अधिक समय के लिए रहा हो, या राज्य में सात साल के लिए पढ़ा हो या फिर उसने दसवीं, बारहवीं की परीक्षा यहां से पास की हो, वह इस प्रमाण पत्र का हकदार हो जाता है. पहले ऐसा नहीं था.

इसके अलावा सुरक्षा बल अब अपनी छावनियों के बाहर भी, कुछ सामरिक स्थानों पर, निर्माण कार्य कर सकते हैं. यह अनुमति ‘कंट्रोल ऑफ बिल्डिंग ऑपरेशन एक्ट-1988’ और ‘जेएंडके डेव्लपमेंट एक्ट-1970’ में संशोधनों के द्वारा उन्हें दी गयी है.

लेकिन वहीं ऐसे लोग भी हैं जो यह सोचते हैं कि केंद्र जम्मू-कश्मीर को वापिस पूर्ण राज्य बनाना चाहता है और इन लोगों के बयान एक माहौल बनाने में मदद करेंगे.

कश्मीर विश्वविध्यालय में पॉलिटिकल साइन्स के अध्यापक, लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार इजाज अशरफ वानी ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा कि उनको बिलकुल ऐसा ही लगता है.

“अभी हालांकि सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है, लेकिन बिलकुल ऐसा ही लगता है क्योंकि भारत सरकार के पास जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने के अलावा और कोई चारा भी नहीं है” वानी सत्याग्रह को बताते हैं.

वे कहते हैं कि कश्मीरी लोगों का इस मामले पर बिलकुल चुप्पी साधना किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है. “यह कैसा है कि आप लोगों के खिलाफ निर्णय लेते हो और लोग चुप हैं. यह आपके जनतंत्र पर एक सवाल है न! तो इस सवाल के जवाब में अब यह सब हो रहा है. इन लोगों से बयान दिलवाए जा रहे हैं” वानी कहते हैं.

जहां वानी जैसे लोग इस सब को अनुमान बता रहे हैं वहीं कुछ लोग कहते हैं कि निर्णय लिया जा चुका है. जैसे श्रीनगर के पूर्व लोकसभा सदस्य और कांग्रेस नेता, तारिक हमीद कर्रा का मानना है कि जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य घोषित करने का निर्णय लिया जा चुका है.

“मुझे अपने एक मित्र, जिनकी दिल्ली में अच्छी पहुंच है, ने बताया है कि यह निर्णय भारत सरकार पहले ही ले चुकी है. जम्मू-कश्मीर को 15 अगस्त को वापिस राज्य बना दिया जाएगा और यह सब जो शोर मच रहा है, यह उसका श्रेय लेने की कोशिश है” कर्रा कहते हैं.

सिर्फ कश्मीर में रह रहे लोग ही नहीं बल्कि बाहर बैठकर यहां की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोग भी इसको “मैच फिक्सिंग” ही कह रहे हैं.

स्वीडन के उप्पसला विश्वविध्यालय में ‘पीस एंड कोन्फ़्लिक्ट’’ के प्रोफेसर, अशोक स्वेन कहते हैं कि यह एक फ़िक्स्ड मैच है.

“अब्दुल्ला और मोदी ने डील की है जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य बनाने की. अब्दुल्ला ये मांग करेंगे और मोदी मान जाएंगे. महबूबा 370 वापिस मांग रही हैं, इसीलिए अभी भी बंद हैं” अशोक कहते हैं.

जहां कुछ लोगों ने जम्मू-कश्मीर को वापिस राज्य बनाने की तारीख भी बता दी है, वहीं कुछ लोग इन राजनेताओं के अचानक से बोल पड़ने को किसी और नजरिये से भी देखते हैं.

श्रीनगर में एक अन्तराष्ट्रीय अखबार के लिए काम करने वाले एक पत्रकार, जिन्होंने उनका नाम प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी, कहते हैं कि ये सब चीज़ें ये जतलाने के लिए की जा रही हैं कि कश्मीर में जनतंत्र अभी भी बाक़ी है.

“जैसे आज की ही मिसाल लें जब चुनाव आयोग ने एक प्रेस रिलीज़ के जरिये जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर, जीसी मुरमु, के उस बयान पर टिप्पणी कि जिसमें उन्होंने कश्मीर में चुनाव होने की संभावना की बात की थी. तब कहां था चुनाव आयोग जब राज्यपाल सत्यापल मलिक ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी को सरकार नहीं बनाने दी थी?” वे वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि चुनाव आयोग की इस टिप्पणी की तरह ही इन राजनेताओं के बयान भी हमारा जनतंत्र वाला भरम कायम रखने की एक और कोशिश है.

“जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य बना भी दिया जाएगा तो क्या होगा. मुझे नहीं लगता है कोई फर्क पड़ेगा’ वे कहते हैं.

कुछ लोग राजनेताओं की इस बयानबाज़ी को कश्मीर में मुख्यधारा के राजनेताओं की छवि सुधारने का एक प्रयास मानते हैं.

हुआ यह था कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती और सारे बड़े नेताओं ने अनुच्छेद-370 हटाये जाने को लेकर धमकियां दी थीं. महबूबा ने तब यह कहा था कि अगर अनुच्छेद-370 हटा तो जम्मू-कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा. वहीं उमर ने कहा था कि 370 तब भी रहेगा जब मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे.

लेकिन मोदी प्रधानमंत्री भी हैं, जम्मू-कश्मीर अभी भी भारत का ही अंग है और अनुच्छेद-370 भी हटा दिया गया है.

“फिर जो रवैया इन राजनेताओं के साथ भारत सरकार ने अपनाया उसने कश्मीर के लोगों में इनके लिए एक नफरत का भाव पैदा कर दिया है. लोगों को यह एहसास हो गया है कि ये लोग झूठ बोलते थे कि कश्मीर भारत के साथ ही सुरक्षित है” कश्मीर में सिविल सर्विसेस के उम्मीदवारों को पॉलिटिकल साइन्स पढ़ाने वाले, इम्तियाज़ शेख ने सत्याग्रह से बातचीत में कहा.

वे कहते हैं कि भारत सरकार को भी कश्मीर चलाने के लिए इन राजनेताओं की ज़रूरत है और इनका उपयोग करने के लिए ज़रूरी है कि इनकी छवि ठीक की जाये.

लेखक इजाज अशरफ वानी, शेख की टिप्पणी में एक और चीज़ जोडते हैं. वे कहते हैं कि पिछले एक साल में भारत सरकार ने कश्मीर में नए राजनीतिक गुट बनाकर नैशनल कॉन्फ्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे दलों की कमी पूरी करने की कोशिश कर के देख ली.

“जैसे अलताफ़ बुखारी वाली अपनी पार्टी (जम्मू एंड कश्मीर अपनी पार्टी). ये कोशिश नाकाम हो गयी है क्योंकि किसी भी नयी पार्टी को सालों लग जाते हैं लोगों के साथ एक संबंध बनाने मे, और कश्मीर में अब नया प्रयोग करने के लिए समय नहीं बचा है” वानी कहते हैं कि भारत सरकार को एनसी और पीडीपी जैसे गुटों की अहमियत का अंदाज़ा हो गया है और इसीलिए उनकी छवि सुधारने का उन्हें एक अवसर दिया गया है.

अब इस बयानबाज़ी की वजह जो भी हो और भारत सरकार का निर्णय जो भी हो, कश्मीर में फिर से राजनीतिक बातें खुल कर हो रही हैं. कयास लगाये जा रहे हैं कि 370 हटाये जाने के एक साल बाद अब फिर से शायद कश्मीर में बड़ी राजनीतिक गतिविधियां और शायद कुछ उथल पुथल भी देखने को मिलेगी.