अल्फ्रेड मेहैन 19वीं सदी में अमेरिकी नौसेना के रियर एडमिरल हुआ करते थे. साथ ही एक बहुत कुशल रणनीतिकार भी थे. उनकी एक सबसे प्रसिद्ध पुस्तक है ‘’इतिहास पर समुद्री-शक्ति का प्रभाव’’ (दि इनप्लुएन्स ऑफ़ सी पॉवर अपॉन हिस्टरी). उनका मानना था कि किसी देश की राष्ट्रीय महत्ता शांतिकाल में समुद्र के वाणिज्यिक उपयोग से और युद्धकाल में उस पर अपने अलंघनीय नियंत्रण से जुड़ी होती है. उनकी भविष्यवाणी थी कि 21वीं सदी की दुनिया का भाग्य उसके सागरों पर तय होगा.

हम 21 वीं सदी में ही रह रहे हैं. इस सदी के आरंभ से ही चीन एशिया में अपनी सामरिक शक्ति का धुंआधार विस्तार कर रहा है. जिस तेज़ी और ढिठाई से दक्षिण चीन सागर से लेकर पूर्वी अफ्रीका तक के हिंद महासागर में पैर पसारते हुए वह अपने नौसैनिक अड्डों एवं जहाज़ों का जाल बिछा रहा है, उससे इस विशाल क्षेत्र के तटवर्ती देशों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक है. यह बेचैनी इस कारण और भी बढ़ जाती है कि चीन एक ऐसा देश है, जिसके शासक हिटलर के फ़ासिस्टों और स्टालिन के कम्युनिस्टों की तरह जब अपनी ही जनता के ख़ून के प्यासे रहते हैं, तो दूसरों को भला कैसे शांति से जीने देंगे! पड़ोसी देशों की ज़मीनें हड़पते हुए अपना भूभाग बढ़ाना उनके लिए शाश्वत राजधर्म बन गया है. तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने, धोखाधड़ी और झूठ बोलने में उनका कोई सानी नहीं है.

हिंदी-चीनी भाई-भाई नहीं हो सकते

कुछ समय से भारत के साथ अच्छे व्यापारिक एवं राजनीतिक संबंध होते हुए भी चीन के नेताओं ने, जून 2020 में, जिस कुटिलता के साथ लद्दाख के अक्साई चिन इलाके में अपने पैर पसारने का प्रयास किया, उससे यह भ्रम सदा-सर्वदा के लिए दूर हो जाना चाहिये कि हिंदी-चीनी कभी भाई-भाई हो सकते हैं. हमें अंतिम रूप से गांठ बांध लेना चाहिये कि ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाली कहावत भारतीय भले ही हो, उस पर अमल की शपथ चीन ने ले रखी है. चीन के सारे पड़ोसी कभी न कभी इसके भुक्तभोगी बन चुके हैं या बनेंगे.

भारत के दक्षिण-पश्चिम में हिंद महासागर में बसा मालदीव तो चीन का पड़ोसी भी नहीं है. तब भी वहां फ़रवरी 2018 में आपात स्थिति की घोषणा होते ही चीन को जैसे ही भनक मिली कि भारत वहां राजनैतिक स्थिरता लाने के लिए अपने सैनिक भेजने की सोच रहा है, चीनी नौसेना के 11 युद्धपोत मालदीव की दिशा में चल पड़े. उसके तीन दूसरे युद्धपोत उसी समय समुद्री डाकुओं से लड़ने के एक कथित अभियान के बहाने से सोमालियाई तट के पास तैनात थे. यानी चीनी नौसेना के 14 युद्धपोत हिंद महासागर में तैनात थे और वे किसी भी समय मालदीव पहुंच सकते थे.

आठ चीनी युद्धपोत हमेशा हिंद महासागर में

भारत को विवश होकर एक बड़े युद्धाभ्यास के माध्यम से चीन को संदेश देना पड़ा कि हम भी तैयार हैं. चीन ने उस समय अपने क़दम पीछे हटा तो लिये, पर कौन कह सकता है कि वह हमेशा इसी तरह पीछे हट जायेगा. भारतीय नौसेना की जानकारी के अनुसार, परमाणु शक्ति चालित चीनी पनडुब्बियों सहित उसके आठ युद्धपोत हमेशा हिंद महासागर में तैनात रहते हैं.

भारत को न चाहते हुए भी, चीन के ही कारण, अपनी नौसेना के आधुनिकीकरण और उसकी मारकशक्ति बढ़ाने के एक बहुत ही ख़र्चीले कार्यक्रम पर ध्यान देना पड़ रहा है. चीन 21 वीं सदी शुरू होने के साथ ही भारत को घेरते हुए हिंद महासागर में अपने नौसैनिक अड्डों व अन्य सुविधाओं की एक मेखला बनाने में जुट गया, जिसे अंग्रेज़ी मीडिया ने ‘स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) नाम दे रखा है. हिंद महासागर के क़रीब एक दर्जन तटवर्ती देशों में चीन अब तक कम से कम 16 जगहों पर अपनी नौसेना के लिए विशेष सुविधाएं जुटाने या अड्डे बनाने में सफल रहा है. वह बांग्लादेश को भी दो पनडुब्बियां देकर उस पर डोरे डालने में लगा हुआ है. सुनने में आया है कि चीन वहां के कोक्स बाज़ार में एक नौसैनिक अड्डा बनाने में सहायता दे रहा है.

मालदीव में नौसैनिक अड्डे का निर्माण

टोही उपग्रहों द्वारा लिये गये चित्र दिखाते हैं कि मालदीव के फ़ेयदहू-फ़िनोलहू द्वीप का कायापलट हो गया है. चीन ने मालदीव को 40 लाख डॉलर देकर इस द्वीप को 2066 तक के लिए पट्टे (लीज़) पर ले रखा है. उसने उसके आस-पास की गहराई को पाटते हुए उसका आकार 38 हज़ार वर्गमीटर से बढ़ा कर एक लाख वर्गमीटर कर दिया है. वहा बड़े पैमाने पर वहां निर्माणकार्य चला रहा है. चीन ने घुमा-फिरा कर मान भी लिया है कि वह वहां अपना एक अड्डा बना रहा है, जो ‘’एक सार्वभौम देश होने के नाते उसका अधिकार है.’’

2018 तक मालदीव पर चीन का डेढ़ अरब डॉलर के बराबर कर्ज चढ़ चुका था. चीन इसका लाभ उठा कर मालदीव के अब तक 17 द्वीपों को पट्टे पर लेते हुए उन्हें हथिया चुका है. यदि वह इनका सैनिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करता है, तो न तो छोटा-सा मालदीव उसका कुछ बिगाड़ पायेगा और न भारत चीन को ऐसा करने से रोक पायेगा.

भारत के लिए दो बड़े सिरदर्द

मालदीव में चीन की नौसैनिक उपस्थिति से विश्लेषक भारत के लिए दो बड़े सिरदर्द देखते हैं. एक तो यह कि भारत के साथ सामान्यतः अच्छे संबंधों वाला मालदीव राजनैतिक दृष्टि से किसी भी समय चीन की गोद में बैठ सकता है. फ़ेयदहू-फ़िनोलहू द्वीप उसे चीन समर्थक मालदीव के पिछले राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की कृपा से ही मिला था. दूसरा सिरदर्द यह है कि मालदीव में चीनी नौसैनिक अड्डा भारत के इतना निकट होगा कि वह हिंद महासागर में भारत के सुरक्षा-हितों और सभी प्रकार के जहाज़ों के आवागमन के लिए दीर्घकालिक ख़तरा बन जायेगा. भारत के मिनिकॉय द्वीप से वह केवल 900 किलोमीटर और मुख्य भूमि से एक हज़ार किलोमीटर दूर होगा. मालदीव के ही दक्षिणी छोर पर का ‘गान’ द्वीप 1970 वाले दशक तक ब्रिटिश नौसैनिक एवं वायुसैनिक अड्डा हुआ करता था. मालदीव की सहमति से अब वहां कई दशकों से भारतीय नौसेना की एक निगरानी चौकी है.

चीन मालदीव में अपने नौसैनिक अड्डे का उपयोग परमाणु पनडुब्बियों के संचालन के साथ-साथ भारतीय पनडुब्बियों की जासूसी के लिए भी कर सकता है. हिंद महासागर के इस हिस्से में भारत के पास कोई नौसैनिक अड्डा नहीं है. पू्र्वी अफ्रीका के द्वीप-देशों सीशेल्स, मडागास्कर और मॉरिशस में भारत के अभी केवल ऐसे राडार स्टेशन हैं, जिनकी सहायता से वह अफ्रीका के पास वाले हिंद महासागर में चीनी नौसेना की गतिविधियों की टोह लेते हुए उन पर नज़र रख सकता है. यहां उसे चीनी सर्वेक्षण जहाज़, और चालक-रहित दूरनियंत्रित पनडुब्बीवाहन, नियमित रूप से इस क्षेत्र के नक्शे आदि बनाते दिखते हैं.

चीन के जाल में फंसता म्यानमार

भारत के पूर्वी पड़ोसी म्यानमार (बर्मा) का क्याउक्प्यू बंदरगाह कहने को तो चीन के लिए एक वाणिज्यिक सुविधा है, पर उसका सैनिक उद्देश्यों के लिए भी उपयोग करने से चीन को भला कौन रोक सकेगा. चीन ने सात अरब 30 करोड़ डॉलर लगा कर उसका निर्माण किया है और दो अरब 70 करोड़ डॉलर की लागत से उसके पास ही एक औद्योगिक परिसर बना रहा है. चीन इस बंदरगाह को अपने युन्नान प्रांत से जोड़ने के लिए एक सड़क के साथ रेलमार्ग भी बनाना चाहता है. डर यही है कि म्यानमार यदि चीन के सारे ऋण समय पर उतार नहीं पाया, तो मालदीव और श्री लंका के ढर्रे पर क्याउक्प्यू भी एक दिन उसी की मुठ्ठी में होगा.

म्यानमार की राजदानी येंगन से 400 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में, उसके ‘बड़े कोको’ द्वीप पर चीन का एक बड़ा इलेक्ट्रॉनिक जासूसी स्टेशन है. चीन ने 50 मीटर ऊंचे एक एन्टेना टॉवर, राडार तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं वाले इस स्टेशन का निर्माण 1994 में ही पूरा कर लिया था. बताया जाता है कि चीन ने वहां भारत की दिशा में लक्षित बैलिस्टिक मिसाइल भी तैनात कर रखे हैं. अंडमान सागर के पास के अलेक्ज़ैन्ड्रा जलमार्ग वाले ‘छोटे कोको’ द्वीप पर चीनी सेना का एक और अड्डा है.

चीन ने ये दोनों कोको द्वीप म्यानमार से 1994 में पट्टे पर लिये थे. दोनों सामरिक महत्व की एक ऐसी जगह पर हैं, जो पूर्व में इंडोनेशिया के मलक्का जलडमरुमध्य (Strait of Malacca) और पश्चिम में बंगाल की खाड़ी के बीच पड़ती है. यहां से भारतीय नौसेना पर और अंडमान-निकोबार में उसकी प्रक्षेपास्त्र सुविधाओं पर पैनी नज़र रखी जा सकती है. मलक्का जलडमरुमध्य से होकर आने-जाने वाले सभी प्रकार के जहाज़ इसी रास्ते से गुज़रते हैं.

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति

समझा जाता है कि हिंद महासागर क्षेत्र में कार्यरत चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की संख्या जल्द ही 20 के आस-पास हो जायेगी. सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद महासागर में अपने नौसैनिक बेड़ों को हवाई सुरक्षा देने के लिए चीन को पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर और दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर के पास तीन वायुसैनिक अड्डों की भी ज़रूरत पड़ेगी.

भारत में श्री लंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर काफ़ी चिंता है. एक चीनी कंपनी ने 2017 में उसे 99 वर्षों के पट्टे पर ले लिया, क्योंकि श्री लंका उसके निर्माण के लिए मिले ऋण की अदायगी करने में असमर्थ था. समझा जाता है कि अंततः चीन उसका भी उपयोग अपनी नौसेना के लिए करेगा और वहां अपनी पनडुब्बियां भी रखना चाहेगा. जब भी चीन ऐसा करेगा, वह भारत को पानी के रास्ते तीन दिशाओं से घेरते हुए उसके पैरों को छू रहा होगा.

जिबूती में चीन का पहला नौसैनिक अड्डा

जुलाई 2017 में पूर्वी अफ्रीका के जिबूती में चीन के पहले सागरपारीय सैनिक अड्डे ने काम करना शुरू किया. टोही उपग्रहों द्वारा मई 2020 में लिये गये चित्र दिखाते हैं कि चीन अपने इस अड्डे का विस्तार कर रहा है और उसे आधुनिक बना रहा है. उसके पोतघाट (पीयर) को बढ़ा कर क़रीब 400 मीटर लंबा कर दिया गया है, ताकि वहां चीन के ‘लियोनिंग’ विमानवाहक युद्धपोत जैसे बड़े-बड़े जहाज़ भी लंगर डाल सकें. क़रीब 10,000 तक चीनी सैनिकों के रहने की जगहें और इलेक्ट्रॉनिक जासूसी सहित कई दूसरी सुविधाएं भी वहां जुटायी गयी हैं.

उपग्रहों के नये चित्रों में यह भी दिखायी पड़ता है कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के पास हिंद महासागर क्षेत्र में चीन का संभवतः दूसरा सागरपारीय सैनिक अड्डा बन रहा है. इन चित्रों में बंदरगाह के परकोटे के भीतर वाहन-अवरोधक, सुरक्षा-बाड़ें, संतरियों की चौकियां और निगरानी टॉवर जैसे निर्माणकार्य दिखायी पड़ते हैं. चीन का कहना है कि वह अपने ‘सदाबहार मित्र’ पाकिस्तान के लिए यहां “सबसे आधुनिक युद्धपोत” बना रहा है. आठ पनडुब्बियां वह पहले ही पाकिस्तान को बेच चुका है.

चीनी नौसेना के पास इस समय दो विमानवाहक पोत हैं, पर वह कम से कम पांच और ऐसे पोत बनाना चाहता है. हर विमानवाहक पोत पर औसतन 36 युद्धक विमानों के लिए जगह होगी. चीन, ईरान और रूस की नौसेनाओं ने, जून 2019 में, हिंद महासागर तथा ओमान की खाड़ी में पांच दिनों तक चला एक अपूर्व युद्धाभ्यास किया. युद्धाभ्यास ईरान के उसी चाबहार बंदरगाह के पास से शुरू हुआ, जिसका भारत विस्तार कर रहा है. बाद में इन तीनों देशों के राष्ट्रपतियों की बेजिंग में बैठक भी हुई. यानी, अब ईरान भी चीन के पाले में चला गया है. चीन के पास ईरान जैसे ढुलमुल देशों को ललचाने के लिए इतना पैसा है कि भारत तो क्या, अमेरिका भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता.

भारत की चिंता

चीन हिंद महासागर में जिस तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है और उसके तटवर्ती देशों को पटा रहा है, वह भारत के लिए सबसे अधिक चिंता-उद्विग्निता का विषय है. किसी असामान्य समय में हिंद महासागर में तैनात चीनी पनडुब्बियां बैलिस्टिक मिसाइल-धारी भारतीय पनडुब्बियों पर हमला बोल सकती हैं या समुद्र के नीचे बिछे दूरसंचार केबलों को क्षति पहुंचा सकती हैं. सामान्य समय में वह ऐसा कर सकने की क्षमता अर्जित कर रहा है. चीन के बारे में कहा जाता है कि वह दो हज़ार वर्ष पुराने अपने नामी रणनितिकार सुन त्ज़ू के सिद्धातों के अनुसार अपनी रणनीतियां बनाता है. सुन त्ज़ू का दिया एक प्रमुख सिद्धांत है, “शत्रु को लड़े बिना ही वश में कर लो.’’

भारत कुछ देर से जागा है, पर अब जाग गया है. वह भी 2001 से हिंद महासागर में अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है. अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में स्थित अपने सैनिक प्रतिष्ठानों को आधुनिक बना रहा है. ये दोनों द्वीपसमूह उस मलक्का जलडमरुमध्य के रास्ते में पड़ते हैं, जहां से होकर चीनी युद्धपोत और वाणिज्यिक जहाज़ दक्षिण-पश्चिम एशिया की ओर आते-जाते हैं. मॉरिशस और मेडागास्कर में निगरानी तंत्र बनाने के बाद भारतीय सेनाओं के लिए एक ऐसा संचार उपग्रह भी अंतिरक्ष में स्थापित किया गया है, जिसके माध्यम से नौसेना के युद्धपोत आपस में और नौसैना के मुख्यालय से हमेशा संपर्क में रह सकते हैं.

भारत की बढ़ी हुई सक्रियता

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के साथ ही हिंद महासागर में भारत की सैन्य सक्रियता बहुत तेज़ी से बढ़ी है. उनके कार्यकाल के पहले ही वर्ष में भारतीय नौसेना के जहाज़ों ने 50 से अधिक देशों का दौरा किया. 2016 में भारतीय नौसेना ने एक अंतरराष्ट्रीय ‘जहाज़ी बेड़ा महोत्सव’ आयोजित किया, जिसमें 50 देशों के 100 से अधिक युद्धपोतों ने भाग लिया. अक्टूबर 2017 से भारतीय नौसेना हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति जताते हुए तीन-तीन महीनों के लिए अपने युद्धपोत अलग-अलग देशों के बंदरगाहों में भेजती है. इससे भारतीय नौसैनिकों को विभिन्न देशों की तैयारियों और उनके बंदरगाहों की विशेषताओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है. भारतीय नौसैनिक अमेरिका, फ्रांस, जापान इत्यादि कई देशों की नौसेनाओं के साथ नियमित युद्धाभ्यास भी करते हैं.

मई 2018 से चीनी जहाज़ों पर नज़र रखने के लिए अंडमान-निकोबार में युद्धक विमान भी तैनात किये गये हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को वास्तव में अंडमान-निकोबार का नौसैनिक उपयोग करने के लिए वहां कहीं बड़े पैमाने पर विकास करना चाहिये. दोनों द्वीपसमूहों की भौगोलिक स्थिति चीनी नौसेना की गतिविधियों पर नज़र रखने और उस पर प्रहार करने के लिए आदर्श मानी जाती है. सामरिक महत्व की ऐसी ही भौगोलिक स्थिति इन्डोनेशिया के साबांग बंदरगाह की भी है. इन्डोनेशिया के साथ एक समझौते के अधीन भारतीय नौसेना भी साबांग का उपयोग कर सकती है.

भारत की तैयारियां

2016 में भारत ने अपने नौसैनिक जहाज़ों के लिए हिंद महासागर में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे डिएगो गार्सिया और 2018 में फ़ारस की खाड़ी के होर्मूज़ जलडमरुमध्य (Strait of Hormuz) के मुहाने पर स्थित ओमान के दुक़म बंदरगाह और वायुसैनिक अड्ढे के उपयोग के अधिकार प्राप्त किये. डिएगो गार्सिया वही द्वीप है, जहां के अमेरिकी नौसैनिक अड्डे का इंदिरा गांधी के दिनों में भारत ज़ोरदार विरोध किया करता था. इस अमेरिकी अड्डे का अब भारत भी लाभ उठा सकता है. ओमान का दुक़म बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से बहुत दूर नहीं है.

2017 से भारतीय नौसेना और वायुसेना फ़ारस की खाड़ी में स्थित अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों का भी उपयोग कर सकती है. उसी वर्ष जनवरी में भारत और फ्रांस के बीच सहमति बनी कि भारत अफ्रीका में लाल सागर के तट पर बसे जिबूती में फ्रांस के मुख्य नौसैनिक अड्डे का और दक्षिणी हिंद महासागर में स्थित फ्रांसीसी द्वीप रेनियों के नौसैनिक अड्डे का भी उपयोग कर सकता है. भारत की दृष्टि से रेनियों की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसकी लगभग नौ लाख की जनसंख्या में से एक-चौथाई (25 प्रतिशत) भारतीय मूल के दक्षिण भारतीय लोग हैं.

नवंबर 2017 में भारत ने सिंगापुर के साथ एक समझौता किया, जो भारत को उसके चांगी नौसैनिक अड़्डे के उपयोग की सुविधा देता है. जुलाई 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ़्रीकी देश सीशेल्स की यात्रा की और उसके एसम्पशन द्वीप पर अपना एक नौसैनिक अड़्डा बनाने का समझौता किया. भारत ने यह सुविधा सीशेल्स को दस करोड़ डॉलर का ऋण देकर प्राप्त की है. भारतीय नौसेना के प्रभावक्षेत्र को बढ़ाने वाले ये सारे समझौते प्रधानमंत्री मोदी की उन अनेक विदेशयात्राओं के दौरान किये गये हैं, जिनको लेकर कई बार उनकी आलोचना होती रही है.

भारतीय नीति का एक दूसरा पहलू

हिंद महासागर के देशों में अपनी सैनिक उपस्थिति बढ़ाने की भारतीय नीति का एक दूसरा पहलू है इन देशों को वित्तीय सहायता देकर या उनके नागरिकों को प्रशिक्षण देकर अपने लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना. इस नीति के अंतर्गत संबद्ध देशों के छात्रों को भारत में प्रशिक्षण दिया जाता है, उनके साधनों-उपकरणों की मरम्मत की जाती है या उन्हें सैन्य-अभ्यास के लिए उपयुक्त सुवाधाएं दी जाती हैं. सहयोग का एक दूसरा स्वरूप है अपने प्रशिक्षक संबद्ध देशों में भेजना या प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त साज़-सामान सुलभ करना. उदाहरण के लिए, भारतीय सेना के प्रशिक्षक मालदीव, मॉरिशस और सीशेल्स में जाकर वहां के सैनिकों को प्रशिक्षित करते हैं. उन्हें भारत से मिले विमानों, हेलीकॉप्टरों और नौकाओं द्वारा गश्त लगाना सिखाते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के समय में वित्तीय सहायता का आयाम भी तेज़ी से बढ़ा है. बांग्लादेश इसका एक प्रमुख उदाहरण है. अप्रैल 2017 में बांग्लादेश की वायुसेना के लिए 50 करोड़ डॉलर देने पर सहमति बनी. बांग्लादेश इस पैसे से अपने युद्धक विमानों की मरम्मत के लिए भारत से कल-पुर्ज़े ख़रीदना और अगली पीढ़ी के युदधक विमानों के चयन के लिए आवश्यक अध्ययनकार्य करवाना चाहता था. भारत को इससे पता चलता कि बांग्लादेश की वायुसेना का हाल कैसा है. यदि वह भारतीय कल-पुर्ज़ों पर निर्भर बन जाता है, पर कभी कोई ऐसा निर्णय लेता है, जो भारत के हितों के विपरीत है, तो कल-पुर्ज़ों की आपूर्ति रोक कर उसके विमानों को ज़मीन पर ही बिठाया भी जा सकता है. भारत का सोचना था कि इस तरह उसे बांग्लादेश को चीन की गोद में जाने और चीन को वहां अपने पैर जमाने से रोकने का अच्छा मौका मिल सकता है.

हर देश के विरुद्ध चीनी दावे

हिंद महासागर दूरपूर्वी एशिया के उत्तर में जापान से लेकर दक्षिण में ऑस्ट्रेलिया तक के सभी देशों के लिए एक जीवनरेखा के समान है. विश्व के 50 प्रतिशत कंटेनरों और 70 प्रतिशत कच्चे तेल का परिहन इसी रास्ते से होता है. चीन इस इलाके में लगभग हर देश के किसी न किसी द्वीप, द्वीपसमूह या समुद्री आर्थिक क्षेत्र पर अपने दावे ठोक कर सबसे शत्रुता मोल लिये बैठा है. चीन को छोड़ कर किसी भी एशियाई देश के पास उतनी बड़ी और सक्षम नौसेना नहीं है, जितनी भारत की है. इसलिए चीन से ख़ार खाये बैठे सभी देश भारत की तरफ़ देख रहे हैं.

चाहे जापान हो या ताइवान, वियतनाम हो या इन्डोनेशिया, मलेशिया हो या ऑस्ट्रेलिया - सभी भारत के सहयोग से चीन के होश ठिकाने लगाने के इच्छुक हैं. भारत अपने लिए इससे बेहतर वातावरण की कामना कर ही नहीं सकता. अमेरिका में भी नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति-पद के चुनाव के बाद चाहे जो व्यक्ति राष्ट्रपति बने, उसे चीनी विस्तारवाद पर लगाम लगाने के अभियान में भारत का साथ देना ही पड़ेगा.

भारत की प्रमुख भूमिका होगी

जापान 2001 से ही हिंद महासागर में अपने नौसैनिक जहाज़ भेज कर मध्यपूर्व से आने वाले तेल के टैंकरों को सुरक्षा प्रदान कर रहा है. अमेरिका के साथ उसकी एक सुरक्षा संधि भी है. किंतु यह संधि मुख्यतः दक्षिणी चीन सागर में दोनों देशों के सैनिक एवं व्यापारिक हितों की सुरक्षा पर लक्षित है. यह संधि पूरे हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति अनुभव कराने में समर्थ नहीं है. इसीलिए चीन हिंद महासागर पर अपनी धाक जमाने के लिए उतावला है. उसने 2000 से 2016 के बीच 44 नयी पनडुब्बियां बनायीं, जबकि अमेरिका ने इस दौरान केवल 15 पनडुब्बियां बनायीं. अमेरिका और जापान, दोनों चाहते हैं कि चीन को उसकी सीमाएं दिखाने और हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित बनाने में अब भारत की प्रमुख भूमिका होनी चाहिये.

जापानी प्रधानत्री शिन्ज़ो आबे की सितंबर 2017 की भारत यात्रा के समय दोनों देशों के संयुक्त वक्तव्य में कहा भी गया है कि “दोनों देशों की नौसेनाएं पारस्परिक हित में विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों में सहयोग करेंगी.” कुछ सुरक्षा विशेषक्ष तो यहां तक मानते हैं कि चीनी पनडुब्बियों की टोह लेने के लिए भारत, बंगाल की खाड़ी के तटों से लेकर हाइनान द्वीप तक, समुद्र के नीचे सेंसरों की एक ‘जलगत दीवार’ बना रहा है. जापान इसे अपने हित में देखता है और भारत को तकनीकी सहायता भी दे रहा बताया जाता है.

चार देशों वाला क्वाडगुट

भारत ने 2018 में ही तय कर लिया था कि वह हिंद महासागर-प्रशांत महासागर क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाने के प्रयासों के लिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रलिया की पहल वाले गुट के साथ राजनयिक सहयोग में गर्मी लायेगा. भारत के भी इस गुट में शामिल होने के बाद से उसे ‘क्वाड’ के नाम से पुकारा जाता है. यह अनौपचारिक गुट चीन की बढ़ती हुई शक्ति को संतुलित करने के विचार से अब ठोस आकार ग्रहण कर रहा है. फिलीपीन्स, वियतनाम और इन्डोनेशिया भी इस गुट के कामों में दिलचस्पी ले रहे हैं. हो सकता है कि वे भी कभी उसमें शामिल हो जायें. ‘क्वाड’ जितना अधिक ठोस आकार ग्रहण करेगा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की चौधराहट पर उतनी ही अधिक लगाम कसेगी.

भारत की सबसे बड़ी समस्य़ा धन की कमी है. नौसेना को पूर्णतः आधुनिक बनाने के लिए मोदी सरकार ने एक 15 वर्षीय योजना बनायी है. 2015 से 2030 के बीच नौसेना को नये जहाज़ ख़रीदने और जरूरी साज़-सामान का स्वदेशीकरण करने के लिए प्रतिवर्ष औसतन आठ अरब 50 करोड़ डॉलर मिलने चाहिये थे. पर ऐसा हो नहीं पा रहा है. उदाहरण के लिए 2017 में नौसेना को केवल तीन अरब डॉलर ही मिले. उसे इसका 90 प्रतिशत पिछले अनुबंधों की अदायगी पर ख़र्च करना पड़ा. भारत के पास इस समय लगभग 140 युद्धपोत हैं. 2027 तक उनकी कुल संख्या लगभग 200 कर देने की यौजना है लेकिन धनाभाव के कारण इसमें संदेह ही है.

स्वदेशीकरण की धीमी गति

नौसेना की 70 प्रतिशत ज़रूरतें इस समय विदेशी आयात द्वारा पूरी की जाती हैं. और नौसेना के स्वदेशीकरण की प्रक्रिया बहुत धीमी है. इसी धीमेपन का एक उदाहरण है भारत का पहला स्वनिर्मित विमानवाहक जहाज़ ‘विक्रांत’, जो फ़रवरी 2009 से बन रहा है पर अभी तक समुद्र में अपनी पहली परीक्षण यात्रा तक नहीं कर पाया है. ‘विक्रांत’ 2022 से पहले सेवारत नहीं हो पायेगा. फ़िलहाल ‘विक्रमादित्य’ ही भारत के पास एकमात्र सेवारत विमानवाहक पोत है. भारत का दूसरा स्वनिर्मित विमानवाहक पोत ‘विशाल’ 2030 से पहले नहीं उपलब्ध होगा. उसका निर्माण तीन साल बाद शुरू होना है. भारत के पास इस समय कुल 16 पनडुब्बियां है, जिन में से केवल एक ‘अरिहंत’ बैलिस्टिक मिसाइल दाग सकने वाली परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी है. भारत ऐसी पनडुब्बी स्वयं बनाने वाला संसार का छठा देश है. ऐसी चार और पनडुब्बियां बनाने की योजना है. पर, धन की कमी उनके निर्माण को भी विलंबित करेगी.

जहां तक धन का प्रश्न है, भारत अपने रक्षा बजट का केवल 15 प्रतिशत ही नौसेना पर ख़र्च करता रहा है. भारत सहित चार देशों वाले तथाकथित ‘क्वाड’ गुट में अमेरिका 30 प्रतिशत, जापान 25 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया अपने रक्षा बजट का 23 प्रतिशत अपनी नौसेना पर ख़र्च करता है. चीन के बारे में ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. वह निश्चित रूप से भारत की अपेक्षा बहुत अधिक धन ख़र्च करता होगा. इसी कारण उसके पास इस समय, बैलिस्टिक मिसाइलधारी छह परमाणु पनडुब्बियों सहित, कुल 68 पनडुब्बियां है. चीन ने यह संख्या 2030 तक 110 कर देने की योजना बनायी है.

भारत की अपेक्षा चीन कहीं अधिक साधनसंपन्न है. उसकी कुटिल चालों और विस्तारवादी चरित्र के कारण भारत की उत्तरी सीमाओं पर और भारत का पद-प्रक्षालन (सफाई) करने वाले, उसी के नामधारी, हिंद महासागर में चुनौतियां बहुत बड़ी ज़रूर हैं, पर वे न तो असाध्य हैं और न भारत अकेला है. अमेरिका, जापान, फ़्रांस और ऑस्ट्रलिया जैसे देश ही इस मामले में उसके साथ नहीं हैं, पूरा दक्षिणपूर्व एशिया उसी की ओर देख रहा है. बहुतों का भविष्य दांव पर है. चीन को टक्कर देने में भारत को ही अगुवाई करनी पड़ेगी है. उचित भी यही है कि हिंद महासागर पर हिंद (भारत) का डंका बजना चाहिये. दुनिया में कोई दूसरा ऐसा देश नहीं है, जिसके नाम पर किसी महासागर का नाम हो. भारत को अपने आप को इस असाधारण सम्मान का सुयोग्य पात्र सिद्ध करना ही होगा.