भारत की संसदीय प्रणाली में जवाबदेही सुनिश्चित करने में भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी सीएजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. लेकिन, जहां आम नागरिकों को सरकारी कोष पर निगरानी रखने के लिए सीएजी की भूमिका जरूरी लगती है वहीं सत्तारूढ़ सरकारें अक्सर ही उनकी ‘ऑडिट रिपोर्ट्स’ को संसद और विधानसभाओं में देरी से पेश करती हैं. इस वजह से ऑडिट करने वाली इस संवैधानिक संस्था के काम का वांछित असर देखने को नहीं मिलता है.

2014 से 2019 के मध्य संसद में पेश की गयीं ‘ऑडिट रिपोर्ट्स’ का विश्लेषण बताता है कि इस दौरान 42 से भी अधिक रिपोर्ट्स को संसद में 90 से भी अधिक दिनों की देरी से पेश किया गया था. इस विश्लेषण हेतु उपलब्ध रिपोर्ट्स पर हुए हस्ताक्षर और उनको संसद में पेश किए जाने की तारीख़ को आधार बनाया गया है.

इन रिपोर्ट्स में से बहुत सी ऐसी भी थीं जिनको 180 से भी अधिक दिनों की देरी के पश्चात संसद में पेश किया गया. इनमें से क़रीब आधी ऑडिट रिपोर्ट्स विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और गतिविधियों की पर्फॉर्मेंस ऑडिट्स थीं.

ख़राब प्रदर्शन

2014 की बात करें तो इस दौरान संसद में पेश की गयीं 32 ऑडिट रिपोर्ट्स में से आठ ऑडिट रिपोर्ट्स की पेशी में 90 से भी अधिक दिन का विलम्ब देखने को मिला. इसके ठीक अगले वर्ष, कुल 31 ऑडिट रिपोर्ट्स प्रस्तुत हुई जिनमें से छह रिपोर्ट्स को पेश करने में फिर से इतनी ही देरी देखने को मिली. 2016 में 47 ऑडिट रिपोर्ट्स में से दो को संसद के सामने रखने में 90 से भी अधिक दिनों की देरी हुई. वर्ष 2017 में पेश की गयी कुल 38 ऑडिट रिपोर्ट्स में से 10 ऑडिट रिपोर्ट्स को संसद के सामने पेश करने में सरकार ने 90 से भी अधिक दिनों को समय लिया.

ऑडिट रिपोर्ट्स के प्रस्तुतीकरण में देरी का यह क्रम मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के अंतिम साल - 2018 - में और भी अधिक गम्भीर रूप में हमारे सामने आता है. इस दौरान कार्यपालिका की ओर से 17 में से आठ ऑडिट रिपोर्ट्स को पेश करने में 90 दिनों से अधिक की देरी हुई. ऑडिट रिपोर्ट्स को पेश करने में कार्यपालिका की ओर से इसी तरह की देरी वर्ष 2019 में भी देखने को मिली जब 21 में से सात ऑडिट रिपोर्ट्स 90 से भी अधिक दिनों संसद तक नहीं पहुंच सकीं.

किसी भी सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों से संबंधित ऑडिट रिपोर्ट्स को संसद के समक्ष रखने में होने वाली देरी से उन कार्यक्रमों पर सार्वजनिक बहस की संभावना काफी सीमित हो जाती है. ऑडिट रिपोर्ट्स के प्रस्तुतीकरण में जान-बूझकर की जाने वाली इस देरी से, सरकार इन रिपोर्ट्स की संसदीय और विधायी समीक्षा को टालने में सफल रहती है. संसद की लोक लेखा समिति और सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति की बैठकों में किसी ऑडिट रिपोर्ट पर तब तक चर्चा नहीं की जा सकती है जब तक वह रिपोर्ट सदन में पेश नहीं हो जाती है.

हमारे विश्लेषण के दौरान ऐसी तमाम ऑडिट रिपोर्ट्स के उदाहरण सामने आए जिन्हें सीएजी द्वारा संसद और विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार को सौंपा जा चुका था. लेकिन फिर भी उन रिपोर्ट्स को सदन में देरी से ही पेश किया गया. इन उदाहरणों से ऐसा लगता है मानो कई ऑडिट रिपोर्ट्स को जान-बूझकर संसद में समय पर पेश नहीं किया जाता है.

जिन ऑडिट रिपोर्ट्स को संसद में देरी से पेश किया गया उनमें 2017 में, कृषि फ़सल बीमा योजना, समेकित गंगा संरक्षण मिशन (यानी नमामि गंगे), 2018 में प्रधान मंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना, अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एक्सलरेटेड इरीगेशन बेनेफिट्स प्रोग्राम-एआईबीपी) एवं 2019 में पर्यावरण पर खनन के प्रभाव तथा कोल इंडिया लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियों द्वारा उससे निपटने संबंधी रिपोर्ट्स प्रमुख हैं.

देर में और देर

यह बेहद निराशाजनक है कि सीएजी ऑडिटर्स द्वारा की गयी गहन पड़ताल इतनी अधिक देरी से संसद और जनता के सामने आ पाती है. ऑडिटिंग का कार्य पहले ही वित्तीय वर्ष की समाप्ति के बाद शुरू होता है. फिर ऑडिट रिपोर्ट के अंतिम रूप में आ जाने के बाद, संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों को ‘ऑडिट पैराग्राफ़्स’ पर जवाब दाख़िल करने के लिए उचित समय दिया जाता है. इस तरह ऑडिट रिपोर्ट को अंतिम रूप दिये जाने तक किसी सरकारी कार्यक्रम, योजना या लेन-देन को कम से कम एक वर्ष बीत चुका होता है.

2008 में आयोजित एक सम्मेलन में भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा विभाग के सदस्य पीके कटारिया व सुबीर मलिक ने “ऑडिटिंग फॉर गुड गवर्नेंस: ओवरसाइट एंड इनसाइट” शीर्षक से लिखे डिस्कशन पेपर में कहा था कि “एक राज्य में, जनवरी 2008 के प्रथम सप्ताह में सरकार को एक कमर्शियल ऑडिट रिपोर्ट भेजी गयी थी, लेकिन राज्य सरकार उस रिपोर्ट को विधानसभा के बजट व मानसून सत्र में प्रस्तुत करने में विफल रही. जब इस मुद्दे पर प्रधान महालेखाकार व महालेखाकार द्वारा मुख्य सचिव के साथ चर्चा की गयी तो सरकार ने बताया कि विधानसभा में रखे जाने से पहले रिपोर्ट के अध्ययन के लिए उन्हें इससे अधिक समय चाहिए था.”

बहुत से जानकारों की राय में इस समस्या के समाधान हेतु सीएजी की कार्यप्रणाली को निर्धारित करने वाले कानून - नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें ) अधिनियम 1971 - को संशोधित किये जाने की आवश्यकता है. इनके मुताबिक इसके जरिये ऐसा प्रावधान किये जाने की जरूरत है जिससे सरकारें किसी ऑडिट रिपोर्ट को ज्यादा समय तक लटका कर नहीं रख सकें.

संशोधन संबंधी इस सुझाव की सिफारिश करने वालों में पूर्व सीएजी विनोद राय भी शामिल हैं. अपनी आत्मकथा ‘नॉट जस्ट एन अकाउंटैंट’ में वे लिखते हैं: “रिपोर्ट को सदन के पटल पर ‘जितनी जल्दी हो सके’ रखने के लिए सरकार की भलमनसाहत पर निर्भर होने के बजाय उसके मिलने के सात दिन के भीतर उसे सदन में पेश किए जाने की समयावधि निर्धारित की जानी चाहिए.’

तब से अब तक ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं. इस दौरान दो सरकारें केंद्र की सत्ता संभाल चुकी हैं. दोनों ही सीएजी की ऑडिट रिपोर्टों को संसद के सामने समय पर न रखने की दोषी रही हैं. अगर वे ऐसा नहीं करतीं तो कानून में किसी संशोधन की जरूरत ही नहीं थी. क्या हम उनसे इतनी आसानी से ऐसे सुधार की उम्मीद कर सकते हैं जो उन्हें ही सुधारने का काम करता है?