श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) के 74 वर्षीय नेता महिंदा राजपक्षे चौथी बार देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं. एसएलपीपी ने पांच अगस्त को हुए संसदीय चुनाव में दो तिहाई बहुमत से जीत दर्ज की. एसएलपीपी को देश की कुल 225 सीटों में से 145 पर जीत हासिल हुई, जबकि उसके नेतृत्व वाले गठबंधन को कुल 150 सीटें मिली हैं.

श्रीलंका में बीते साल हुए ईस्टर बम धमाकों के बाद वहां के कई क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, इसमें सिंहली समुदाय ने मुस्लिम समुदाय को काफी निशाना बनाया था. जानकारों की मानें तो बीते नवंबर में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद अब यहां के संसदीय चुनाव में भी सिंहली और तमिल-मुस्लिम समुदायों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण साफ़ दिखा है. इसका फायदा सीधे तौर पर सिंहली समुदाय से आने वाले महिंदा राजपक्षे और उनके छोटे भाई गोटबाया राजपक्षे को मिला है. श्रीलंका के पूर्व सेना प्रमुख रह चुके गोटबाया राजपक्षे इस समय श्रीलंका के राष्ट्रपति हैं. उन्होंने 2019 में अपना पद संभालते ही महिंदा राजपक्षे को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था.

श्रीलंका में 70 फीसदी सिंहली-बौद्ध आबादी है, चुनाव नतीजों को देखें तो सिंहली बहुल क्षेत्रों में राजपक्षे की पार्टी के उम्मीदवार भारी बहुमत से जीते हैं. खुद महिंदा राजपक्षे ने वोटों के मामले में नया इतिहास रचा है. उन्हें पांच लाख से ज्यादा वोट मिले हैं. श्रीलंका के इतिहास में इतने वोट किसी नेता को इससे पहले नहीं मिले.

भारत के लिए चिंता की बात क्यों है?

विदेश मामलों के ज्यादातर विशेषज्ञ महिंदा राजपक्षे का सत्ता में आना, भारत के लिए बड़े झटके जैसा बताते हैं. इसकी वजह राजपक्षे परिवार का चीन के करीब होना है. महिंदा राजपक्षे ने ही पहली बार चीनी निवेश को श्रीलंका में हरी झंडी दिखाई थी. चीन से भारी भरकम कर्ज के बदले उन्होंने श्रीलंका में उसे अपने मन मुताबिक प्रोजेक्ट चुनने और निवेश करने की खुली छूट दे दी थी. इसी कर्ज के दबाव में कुछ साल बाद श्रीलंकाई सरकार को अपना बेहद महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह चीनी सरकार को 100 साल की लीज पर देना पड़ा था. गोटबाया राजपक्षे देश के रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं. बतौर रक्षा सचिव उन्होंने चीनी युद्धपोत और पनडुब्बियां श्रीलंका के समुद्री तटों के पास लम्बे समय तक रुकने की इजाजत दी थी.

अगर भारत से राजपक्षे परिवार के संबंध देखें तो एक घटना से इन्हें समझा जा सकता है. श्रीलंका में 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में जब महिंदा राजपक्षे की हार हुई थी तो उन्होंने अपनी हार का ठीकरा भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों पर फोड़ा था. उनका कहना था कि चीन से उनकी करीबियों की वजह से भारत नहीं चाहता था कि वे श्रीलंका के राष्ट्रपति बनें. इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे पर चीन से पैसा लेकर चुनाव लड़ने का आरोप लगा था.

पूर्व राजनयिक राजीव भाटिया भारत सरकार को श्रीलंका के मामले में बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ाने की सलाह देते हैं. एक न्यूज़ वेबसाइट से बातचीत में वे कहते हैं, ‘अब ये बात सबको स्पष्ट हो गई है कि श्रीलंका के पास एक बहुत स्थाई सरकार है. राजपक्षे बंधु वहां फिर से सबसे शक्तिशाली बन गए हैं और वो चीन समर्थक के तौर पर जाने जाते हैं. लेकिन उन्हें अब भारत के साथ भी डील करना पड़ेगा. भारत को अब अपने रिश्तों को अच्छे से संभालना होगा क्योंकि श्रीलंका के साथ हमारे मतभेद भी हैं और झुकाव भी है. हमें इस खेल में दिखने की जरूरत है.’

राजपक्षे भाइयों को इस समय चीन की ज्यादा जरूरत

विदेश मामलों के जानकार ऐसी भी कुछ वजहें बताते हैं जिनके चलते श्रीलंका के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री और उनके भाई राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के चीन के करीब रहने की संभावना काफी ज्यादा नजर आती है. ये लोग कहते हैं कि ईस्टर बम धमाकों और फिर कोरोना वायरस के चलते श्रीलंका की 88 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था काफी खराब हालत में है. आलम यह कि एक डॉलर की कीमत करीब 185 श्रीलंकाई रुपयों के बराबर पहुंच गई है. हालिया आंकड़ों में इस साल उसकी विकास दर का अनुमान 1.3 फीसदी लगाया गया है. यह बीते 18 वर्षों में सबसे कम है. इस समय श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय मुद्रा भंडार भी 6.5 अरब डॉलर ही रह गया है.

ईस्टर हमलों के बाद से श्रीलंका में पर्यटन का भी बुरा हाल है. ऐसे में श्रीलंका को मदद के लिए एक ऐसे हाथ की जरूरत है जो अर्थव्यवस्था को सुधारने में उसकी मदद कर सके. जानकार कहते हैं कि इन परिस्थितियों में बीजिंग श्रीलंकाई सरकार के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है. भारत इस समय उसकी ज्यादा मदद इसलिए नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था इस वक्त खुद मंदी की स्थिति में है. बीते मई में ऐसा दिखा भी जब राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने चीन से अपने पुराने संबंधों का हवाला देते हुए उससे 50 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद मांगी. उनका कहना था कि कोरोना वायरस महामारी से लड़ने के लिए उनकी सरकार के पास पैसा नहीं बचा है. खबरों के मुताबिक बीते जुलाई में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मांग को मान लिया और श्रीलंका को आर्थिक मदद की पहली क़िस्त भी भेज दी.

श्रीलंका, चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (बीआरआई) के साथ भी जुड़ा है. खबरों के मुताबिक चीन ने आने वाले समय में बीआरआई के तहत श्रीलंका में 11 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश की योजना बनाई है. इनमें से आठ अरब डॉलर उसे कर्ज के रूप में मिलेंगे. चीन श्रीलंका में बुनियादी ढांचा विकास की तमाम परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है. इनमें एक ऑयल रिफाइनरी निर्माण, कोलंबो इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर, कैंडी को कोलंबो से जोड़ने वाला सेंट्रल हाईवे और कोलंबो बंदरगाह के निकट अरबों डॉलर की लागत से एक पोर्ट सिटी विकसित करने जैसी तमाम योजनाएं शामिल हैं.

कुछ विशेषज्ञ श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के चीन के करीब जाने की एक और वजह भी बताते हैं. श्रीलंका में जब अलगाववादी संगठन द लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू हुआ था उस वक्त गोटबाया राजपक्षे श्रीलंका के रक्षा मंत्री थे. लिट्टे पर सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों तमिल नागिरकों की हत्या करने को लेकर यूरोप और अमेरिका गोटबाया राजपक्षे पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते आ रहे हैं. कहा जाता है कि गृहयुद्ध के अंतिम चरण में श्रीलंकाई सेना द्वारा 40,000 से अधिक तमिलों को मौत के घाट उतारा गया था.

यूरोप और अमेरिका के दबाव में संयुक्त राष्ट्र लगातार श्रीलंकाई सरकार से इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग कर रहा है. श्रीलंका की पिछली सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इस जांच को लेकर प्रतिबद्धता भी जताई थी. लेकिन, कोरोना वायरस महामारी और गोटबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति बनने के चलते यह मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. जानकारों की मानें तो आने वाले समय में अगर अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र श्रीलंका सरकार पर जांच कराने का दबाव डालते हैं तो ऐसी परस्थितियों में चीन ही गोटबाया की मदद कर सकता है. चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य तो है ही, साथ ही उसके यूरोपीय देशों से भी अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं.