एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच अब सीबीआई करेगी. अदालत ने मुंबई पुलिस को आदेश दिया है कि वह इस मामले की केस डायरी और दूसरे सबूत केंद्रीय जांच एजेंसी के हवाले कर दे और जांच में उसका सहयोग करे. सुशांत सिंह राजपूत के पिता, इस चर्चित अभिनेता की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती, बिहार सरकार और महाराष्ट्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बीती 11 अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

गूगल पर इन दिनों सुशांत सिंह राजपूत लिखकर सर्च किया जाए तो ऐसी तमाम खबरें दिखती हैं जिनके शीर्षक में सुप्रीम कोर्ट से लेकर सीबीआई, करणी सेना, साजिश, मिस्ट्री गर्ल, तंत्र-मंत्र जैसे शब्द तक शामिल होते हैं. ये बताते हैं कि इस चर्चित अभिनेता की मौत का मामला अब कितना पेचीदा हो गया है. सुशांत सिंह राजपूत की मौत हुए अब करीब दो महीने हो चुके हैं, लेकिन इस घटना से उठा तूफान अभी तक शांत नहीं हुआ है. बल्कि देखा जाए तो इस अभिनेता की मौत की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती दिख रही है.

इस लिहाज से देखें तो अब सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला कुछ हद तक आरुषि-हेमराज वाले मामले की याद दिलाने लगा है. 2008 के इस मामले में भी तमाम तरह की सनसनीखेज थ्योरियों और दावों के बाद जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के सुपुर्द कर दी गई थी. सुशांत सिंह राजपूत मामले में भी ऐसा ही हुआ है. आरुषि-हेमराज मामला अभी तक अनसुलझा ही है और सुशांत सिंह राजपूत मामले का क्या होता है, यह देखा जाना बाकी है.

2008 में उत्तर प्रदेश के नोएडा में हुए उस हत्याकांड में सबसे पहले एक 14 साल की लड़की की हत्या की खबर सामने आई थी. आरुषि नाम की यह लड़की डॉक्टर दंपत्ति राजेश और नूपुर तलवार की बेटी थी. 16 मई 2008 की सुबह आरुषि का शव उसके ही कमरे में मिला था. घर में आरुषि और उसके माता-पिता के अलावा उनका नौकर हेमराज भी रहता था जो हत्या के बाद से घर से गायब था. इस कारण सीधा शक उसी पर गया. लेकिन अगले ही दिन हेमराज का शव भी इसी घर की छत से बरामद हो गया.

इसके बाद मीडिया में कथित साजिशों के सामने आने का दौर शुरू हुआ. आरुषि और हेमराज के अवैध संबंधों से लेकर राजेश तलवार द्वारा दोस्तों के साथ बीवियों की अदला-बदली जैसे तमाम सनसनीखेज दावे किए गए. इनका आधार कभी पुलिस सूत्र तो कभी दूसरे स्रोत बताए जाते. नतीजा यह हुआ कि अदालत के फैसला सुनाने से पहले ही लोग राजेश और नूपुर तलवार को अपराधी मान चुके थे. अदालती सुनवाई के दौरान एक शख्स ने तो राजेश तलवार पर चाकू से हमला तक कर दिया था जिसमें वे बुरी तरह जख्मी हो गए.

कुछ ऐसा ही टीवी चैनलों पर आज भी हो रहा है. तंत्र मंत्र षडयंत्र से लेकर बॉलीवुड की विषकन्या जैसे शीर्षकों के साथ शो बनाए जा रहे हैं जिनमें तथ्यों से ज्यादा तड़का दिखता है. नतीजा यह है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के लिए फिल्म निर्माता-निर्देशक करण जौहर से लेकर सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती तक बॉलीवुड की तमाम हस्तियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर नफरत के अभियान चल रहे हैं. इन अभियानों में इन्हें अपराधी मान लिया गया है और इनकी फिल्मों के बहिष्कार के आह्वान हो रहे हैं.

आरुषि-हेमराज हत्या मामले पर आधारित फिल्म ‘तलवार’ ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं. इसमें सीबीआई अधिकारी बने इरफान एक पुलिस वाले को झिड़कते हुए कहते हैं, ‘इसे इन्वेस्टिगेशन कहते हो तुम लोग! क्राइम सीन को तुमने मच्छी बाजार बना दिया.’ असल में आरुषि-हेमराज मामले में पुलिस की जांच के तरीके की काफी आलोचना हुई थी. इसकी वजह थी जांच में हुई तमाम लापरवाहियां. पुलिस ने वारदात की जगह को सील तक नहीं किया था. नतीजा यह हुआ कि जिसका भी मन हुआ वह घटनास्थल पर जाता रहा और जब तक फॉरेंसिक सबूत इकट्ठा करने की नौबत आई तब तक उनमें से कई अहम सबूत नष्ट हो चुके थे. यही नहीं, मीडिया में इस मामले को लेकर जो हद दर्जे की सनसनीखेज रिपोर्टिंग हुई उसमें भी पुलिस द्वारा चुनिंदा तरीके से लीक गई जानकारियों का ही हाथ था.

सुशांत सिंह राजपूत एक चर्चित स्टार थे और उनकी मौत का मामला पहले से ही हाई प्रोफाइल था. इसलिए उनके मामले में क्राइम सीन तो मच्छी बाजार नहीं बना, लेकिन कई तथ्य हैं जो इस मामले में पुलिस द्वारा बरती गई लापरवाहियों की तरफ इशारा करते हैं. जैसे हाल में टीवी चैनल टाइम्स नाउ से हुई बातचीत में मुंबई फॉरेंसिक टीम के एक सदस्य का कहना था कि सुशांत सिंह की आत्महत्या के दो दिन बाद तक पुलिस ने फॉरेंसिक टीम को मौके के मुआयने के लिए नहीं बुलाया था. इस सदस्य के मुताबिक सुशांत सिंह की डायरी के कुछ पन्ने भी फटे हुए थे जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई कि उन्हें किसने फाड़ा था. न ही टीम को कमरे में खून के धब्बे मिले और न ही पंखा ज्यादा झुका हुआ नज़र आया. यहां तक कि पुलिस ने फॉरेंसिक टीम से इस बारे में कोई सवाल भी नहीं पूछे जिनके जवाब शायद इस केस को सुलझाने में उसकी मदद कर सकते थे.

उधर, बिहार पुलिस के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे का दावा है कि कि बेहद हाईप्रोफाइल मामला होने के बावजूद सुशांत सिंह राजपूत के फ्लैट को कुछ दिन बाद ही खोल दिया गया था. जबकि आम तौर पर ऐसे मामलों में लंबे समय तक घटनास्थल को सील रखा जाता है ताकि सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न की जा सके. इस पूरे मामले में मुंबई पुलिस पर संदेह तब और गहरा गया जब उसके पास से दिशा सालियान की जांच से जुड़े फोल्डर के डिलीट होने की ख़बरें सामने आई. दिशा सालियान सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर रही थीं और उनकी मौत की खबर सुशांत की मौत से कुछ ही दिन पहले आई थी. कहा गया था कि उन्होंने एक इमारत की 14वीं मंजिल से छलांग लगा ली थी. इस मामले को भी अब सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जोड़कर देखा जा रहा है.

उधर, गुप्तेश्वर पांडे जिस बिहार पुलिस के मुखिया हैं उसने भी इस मामले में पेचीदगी की एक परत जोड़ दी है. ऐसा हुआ है उसके और महाराष्ट्र पुलिस के बीच टकराव के चलते. गुप्तेश्वर पांडे मुंबई पुलिस पर खुलकर आरोप लगाते रहे हैं कि उसने मामले की जांच में पटना पुलिस का बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया. एक टीवी चैनल से बातचीत में उनका कहना था कि मुंबई पुलिस ने उनके पुलिसकर्मियों के साथ सुशांत की कथित आत्महत्या वाले कमरे की वीडियोग्राफी, ज़रूरी सीसीटीवी फुटेज, जब्त सामान, मोबाइल और लैपटॉप का डेटा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट, फिंगर प्रिंट और केस डायरी की कॉपी में से कुछ भी साझा नहीं किया.’ बिहार पुलिस के मुखिया के मुताबिक उन्होंने इस सिलसिले में महाराष्ट्र के डीजीपी और मुंबई के पुलिस आयुक्त से भी बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.

सुशांत सिंह के पिता कृष्ण कुमार सिंह की शिकायत पर बिहार पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी. जांच के लिए उसने अपने एक आईपीएस अधिकारी विनय तिवारी को मुंबई भेज दिया था. लेकिन बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने उन्हें जबरन 14 दिन के लिए क्वारंटीन कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बीएमसी ने विनय तिवारी को मुक्त तो कर दिया, लेकिन तुरंत ही उन्हें पटना के लिए रवाना भी कर दिया गया.

कृष्ण कुमार सिंह का आरोप है कि उन्होंने फरवरी में ही मुंबई पुलिस से आशंका जताई थी कि उनके बेटे की जान को ख़तरा है. लेकिन पुलिस ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. हालांकि मुंबई पुलिस ने इससे इनकार किया है. एक बयान जारी कर उसने कहा कि यह शिकायत एक पुलिस अधिकारी तक वाट्सएप के ज़रिए पहुंचाई गई थी और चूंकि यह लिखित में नहीं थी इसलिए इस पर कार्रवाई नहीं की जा सकी.

मुंबई पुलिस से शिकायत सुशांत के पिता और बिहार पुलिस को ही नहीं है. खबर है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी उसके रवैय्ये से नाराज है. सुशांत सिंह राजपूत के पिता का आरोप है कि उनके बेटे के खातों से 15 करोड़ रु निकाल लिए गए. ईडी इसकी जांच कर रहा है लेकिन उसका कहना है कि मुंबई पुलिस उसका सहयोग नहीं कर रही. एक वेबसाइट से बातचीत में विभाग के एक सूत्र का कहना था, ‘हमने तीन अगस्त को मुंबई पुलिस को एक चिट्ठी भेजकर उससे मामले से जुड़े सारे दस्तावेज मांगे थे. लेकिन उसने पहले तो जवाब देने में ही 11 दिन का वक्त लगा दिया, और जवाब दिया भी तो कहा कि पहले ठीक-ठीक ये बताया जाए कि कौन से दस्तावेज चाहिए. इतनी गोपनीयता क्यों? इससे सिर्फ मामले की जांच में देर हो रही है और कुछ नहीं.’

हालांकि ईडी का इस मामले में शामिल होना भी इसकी पेचीदगियों को बढ़ाता ही लगता है. संडे गार्डियन में अपने एक लेख में पंकज वोहरा लिखते हैं, ‘आम तौर पर ईडी को जांच में तब शामिल किया जाता है जब बहुत बड़े पैमाने पर मनी लॉन्डरिंग हुई हो. लेकिन इस मामले में ऐसा लगता है कि शायद सुशांत की गर्लफ्रेंड ने उनकी सहमति से ही पैसा निकाला होगा.’ वे इस मामले में बिहार पुलिस के रवैय्ये पर भी सवाल खड़े करते हैं. उनके मुताबिक बिहार पुलिस का बर्ताव ऐसा था मानो वह मुंबई पुलिस को बताना चाह रही हो कि जांच कैसे की जाती है.

और अब जब मामला सीबीआई के सुपुर्द हो गया है तो कुछ लोग मानते हैं कि केंद्र ने भी अपनी सीमा से आगे जाकर काम किया है और इससे एक गलत परंपरा स्थापित हो सकती है. यानी अगर राज्य सरकार किसी मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश नहीं कर रही हो तो किसी दूसरे राज्य में एफआईआर करवा ली जाए और वहां से मामला सीबीआई के पास भेज दिया जाए. इसे लेकर केंद्र और राज्यों के बीच नया टकराव देखने को मिल सकता है. मुंबई की मेयर किशोरी पेडणेकर ने निर्देश दे ही दिए हैं कि कोविड-19 के खतरे को देखते हुए इस मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारियों को मुंबई आने से पहले स्थानीय पुलिस की अनुमति लेनी होगी, नहीं तो उन्हें भी आइसोलेट कर दिया जाएगा.

आरुषि-हेमराज हत्या मामले की जांच सीबीआई की दो अलग-अलग टीमों ने की थी. जैसे-जैसे इस मामले में जांचकर्ता बदले, वैसे-वैसे शक की सुई भी अलग-अलग लोगों की तरफ घूमती रही. सीबीआई की पहली टीम मान रही थी कि आरुषि और हेमराज की हत्या डॉक्टर दंपत्ति के कंपाउंडर कृष्णा और उसके दो अन्य साथियों - राजकुमार और विजय मंडल - ने की है. लेकिन सीबीआई की दूसरी और आखिरी टीम ने तलवार दंपत्ति को इन हत्याओं का दोषी माना. हालांकि उसका कहना था कि उसे यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके इसलिए मामला बंद कर दिया जाए. लेकिन अदालत ने सीबीआई की ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को ही आरोपपत्र मानते हुए तलवार दंपति के खिलाफ सुनवाई शुरू की और आखिर में उन्हें दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी. इस फैसले को हाई कोर्ट ने पलटते हुए उन्हें बरी कर दिया. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है. यानी 12 साल गुजरने के बाद भी आरुषि और हेमराज का कातिल कौन है, यह साबित नहीं हो पाया है.

कई लोगों को इससे हैरानी नहीं होती. इसका कारण यह है कि हाई प्रोफाइल मामलों में सीबीआई की सफलता की दर चार फीसदी से भी कम रही है. अपराध से जुड़े मामलों में तो उसका रिकॉर्ड और भी खराब है. ऊपर से सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला अब न्याय से ज्यादा राजनीति का सबब बनता दिख रहा है. और उनकी मृत्यु को दो महीने से ज्यादा भी हो चुके हैं. इतना समय हो जाने के बाद इस तरह के मामलों में सबूत जुटा पाना आसान नहीं होता और यहां पर तो मुंबई पुलिस की कार्यवाही स्पष्ट तौर पर तमाम सवालों के घेरे में है. इसलिए सवाल उठने लगा है कि क्या अब सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु का मामला भी किसी निश्चित और उचित अंजाम तक पहुंच पाएगा!