प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री होना चाहिए था, ऐसा मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी. कांग्रेस में वे जिस मुकाम पर पहुंच गए थे उसे देखते हुए खुद उनको भी यह उम्मीद कई बार रही. लेकिन राजनीति विज्ञान पढ़ और पढ़ा चुके प्रणब मुखर्जी यह भी समझते ही रहे होंगे कि सत्ता के खेल में शीर्ष तक पहुंचने के सूत्र सिर्फ प्रतिभा से नहीं जुड़ते, इसमें परिस्थितियों की भी भूमिका होती है. इसलिए बहुत से लोग उन्हें एक ऐसा प्रधानमंत्री कह सकते हैं जो भारत को कभी नहीं मिला.

उनके इस पद पर पहुंचने की पहली संभावना 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बनी थी. प्रणब मुखर्जी तब वित्त मंत्री थे और इंदिरा गांधी के बाद पार्टी में नंबर दो थे. प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी में कैबिनेट की बैठकें वही लेते थे. तब प्रणब मुखर्जी की क्या ख्याति थी इसका एक अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि चर्चित पत्रिका यूरो मनी ने उस समय उन्हें दुनिया में सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री बताया था.

ऐसे में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद स्वाभाविक तौर पर उन्हें कमान मिलने की उम्मीद रही होगी. कहते हैं कि उन्होंने इस उम्मीद को जाहिर भी किया (हालांकि अपनी आत्मकथा में उन्होंने इससे इनकार किया है). लेकिन इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी बनाने की जो प्रक्रिया शुरू की थी तब तक वह स्थापित हो चुकी थी. सो प्रणब दा को किनारे कर दिया गया और राजनीतिक और प्रशासनिक दक्षता में उनके सामने कहीं न ठहरने वाले राजीव गांधी देश के छठे प्रधानमंत्री बन गए.

बस इसी मोड़ पर प्रणब मुखर्जी के उस शानदार सफर में थोड़ी ढलान दिखती है जो 1969 में उनके इंदिरा गांधी की नजर में आने और उसी साल पहली बार राज्य सभा में पहुंचने के साथ शुरू हुआ था. माना जाता है कि अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर करने की उन्हें कीमत चुकानी पड़ी. राजीव गांधी ने प्रणब मुखर्जी को न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल से बाहर रखा बल्कि उन्हें राजनीति की मुख्यधारा से भी बाहर कर दिया. उन्हें पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की जिम्मेदारी संभालने के लिए कोलकाता भेज दिया गया. इससे खफा होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी और 1986 में राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई. लेकिन 1987 के राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी की बुरी गत के बाद प्रणब मुखर्जी को अहसास हो गया कि यह राह उनके लिए नहीं है. सो उन्होंने राजीव गांधी से संवाद के टूटे पुल जोड़े और 1989 में अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया. इसके बाद प्रणब दा हमेशा पार्टी के अनुशासित सिपाही रहे.

प्रणब मुखर्जी के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने की संभावना 1991 में तो नहीं बनी क्योंकि उस वक्त तक उन्हें दोबारा कांग्रेस में शामिल हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था. इस दौरान वे नरसिम्हा राव की सरकार में योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे. उनके फिर से प्रधानमंत्री बन सकने का मौका तब आया जब 2004 में यूपीए की पहली सरकार बनने जा रही थी. सोनिया गांधी ने तब विपक्ष के दबाव में आकर यह पद लेने से इनकार कर दिया तो एक बड़े वर्ग का मानना था कि अब वह होना तय है जो 1984 या 1991 में नहीं हो सका था. संयोग था कि उस साल प्रणब मुखर्जी पहली बार कोई लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. यानी परिस्थितियां उस दौरान हर लिहाज से उनके अनुकूल लग रही थीं. अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड द कोएलिशन इयर्स (1996-2012) में उन्होंने इस बारे में लिखा है, ‘उम्मीद जताई जा रही थी कि सोनिया गांधी के इनकार के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए अगला विकल्प मेरा होगा. शायद इस उम्मीद का आधार यह था कि मुझे सरकार में रहने का व्यापक अनुभव था जबकि सिंह के अनुभव का बड़ा हिस्सा नौकरशाही में था.’

लेकिन सबको चौंकाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने मनमोहन सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया. माना जाता है कि प्रणब मुखर्जी जिस बात को अपनी मजबूती मान रहे थे वही उनके लिए कमजोर कड़ी साबित हुई. अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, ‘मनमोहन सिंह की तुलना में प्रणब ज्यादा राजनीतिक शख्स थे. और यही बात उनके खिलाफ गई. निश्चित तौर पर सोनिया गांधी राजनीतिक तौर पर तेज-तर्रार एक ऐसे नेता को प्रधानमंत्री के पद पर नहीं बैठाना चाहती थीं, जिसकी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं थीं. साफ तौर पर 7 रेस कोर्स रोड में उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था.’ यह भी माना जाता है कि प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने पर सोनिया गांधी पार्टी और सरकार पर उस तरह से नियंत्रण नहीं रख पातीं जैसा मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते संभव हो सका.

बताया जाता है कि प्रधानमंत्री के लिए मनमोहन सिंह का नाम तय होने के बाद प्रणब मुखर्जी ने सरकार में शामिल न होने का फैसला कर लिया था. जानकारों के मुताबिक यह स्वाभाविक ही था क्योंकि कभी मनमोहन सिंह उनसे काफी जूनियर हुआ करते थे. लेकिन सोनिया गांधी ने कहा कि उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होना ही होगा क्योंकि उनके रहने से सरकार को मजबूती मिलेगी. माना जाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को इसलिए भी सरकार में रखना चाहती थीं कि वह गठबंधन की सरकार थी और प्रणब दा के मित्र सभी दलों में थे. इस तरह प्रणब मुखर्जी मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में आ गए और आने वाले वर्षों में उन्होंने रक्षा, वित्त और विदेश जैसे अहम मंत्रालय संभाले.

तीसरी बार प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा 2009 में हुई. यह तब की बात है जब आम चुनाव कुछ ही महीने दूर थे. मनमोहन सिंह की बाइपास सर्जरी हुई थी और उन्हें काफी समय तक आराम करना पड़ा था. इस दौरान औपचारिक तौर पर तो यह ऐलान नहीं किया गया कि प्रधानमंत्री का काम कौन देख रहा है, लेकिन विकीलीक्स द्वारा लीक एक केबल के हवाले से दावा किया गया कि वह प्रणब मुखर्जी ही थे. इसी दौरान खबरें आईं कि अगर मनमोहन सिंह का स्वास्थ्य जल्द सामान्य नहीं हुआ तो सिर पर खड़े चुनाव को देखते हुए प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. जानकारों के मुताबिक तब भी वही कारण उनके खिलाफ गया जो 2004 में गया था.

प्रणब मुखर्जी के चौथी बार प्रधानमंत्री बनने की चर्चा और इसकी खुद उन्हें भी उम्मीद 2012 में हुई. तब यूपीए राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुनने की कवायद कर रहा था. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि सोनिया गांधी ने उनसे कहा था, ‘आप इस पद के लिए सबसे बेहतर दावेदार हैं, लेकिन आप सरकार में एक ज़िम्मेदार भूमिका निभा रहे हैं तो क्या आप ऐसे में कोई दूसरा नाम सुझा सकते हैं.’ प्रणब मुखर्जी के मुताबिक इससे उन्हें लगा कि मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया जा सकता है और उन्हें प्रधानमंत्री. हालांकि ऐसा नहीं हुआ और वे देश के 13वें राष्ट्रपति बन गए.

राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल को बहुत से लोग बढ़िया मिसाल मानते हैं तो कइयों की राय इससे उलट भी है. पहले वर्ग का मानना है कि प्रणब मुखर्जी ने पहले मनमोहन सिंह और फिर नरेंद्र मोदी के साथ बढ़िया समन्वय के साथ काम किया. उन्होंने संसद में चर्चा के बगैर कई अध्यादेश पारित करने को लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दी तो संसद न चलने देने पर अड़े विपक्ष को भी समझाया. ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनके कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का कोई मतभेद सुर्खियां बना हो. इन सारी बातों को लोकतंत्र के लिहाज से अच्छा माना गया. राष्ट्रपति के रूप में अपनी पारी पूरी होने के मौके पर उन्होंने कहा था कि उनके और प्रधानमंत्री के बीच असहमति के कई मौके आए, लेकिन, इससे दोनों के बीच के रिश्ते पर असर नहीं पड़ा.

उधर, एक दूसरा वर्ग भी है जिसे लगता है कि प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति के रूप में आचरण वैसा नहीं रहा जैसा उनके कद के किसी राजनेता का रहना चाहिए था. इस वर्ग का मानना है कि वे इस पद पर रहते हुए कोई नजीर कायम कर सकते थे. जैसा कि बीबीसी से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘प्रणब मुखर्जी ने सिर्फ़ अपने काम से काम रखा और सरकार के काम में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की.’ उनकी तरह और भी कई लोग मानते हैं कि ज्यादातर राष्ट्रपतियों की तरह प्रणब मुखर्जी भी रबर स्टैंप जैसे ही रहे और उन्होंने स्वविवेक का न्यूनतम प्रयोग किया. ये लोग उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के मामले को इसके उदाहरण के तौर पर गिनाते हैं जिसे अदालत ने हटा दिया था.

समग्रता में देखें तो बंगाली भद्रलोक से आए प्रणब मुखर्जी का व्यक्तित्व सही मायने में उस सर्वस्वीकार्यता की जीवंत मिसाल था जो अब राजनीति में दुर्लभ होती जा रही है. हर पार्टी में उनके मुरीद थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले कहा था कि प्रणब मुखर्जी ने उन्हें पिता तुल्य स्नेह दिया. उधर, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनकी आत्मकथा के विमोचन के मौके पर कहा था कि प्रणब मुखर्जी उनसे कहीं काबिल थे और प्रधानमंत्री उन्हें ही बनना चाहिए था.

बहुत से लोग मानते हैं कि अगर ऐसा हो जाता - फिर भले ही यह 2012 में भी होता - तो कांग्रेस का इस कदर पतन नहीं होता. जैसा कि नीलांजन मुखोपाध्याय लिखते हैं, ‘उनकी राजनीतिक कुशलता मोदी की आसान जीत के रास्ते में अवरोध बन कर खड़ी होती. उद्योग जगत के भीतर उनका रिश्ता मोदी को इतनी आसानी से कॉरपोरेट जगत के समर्थन को अपने पक्ष में नहीं मोड़ने देता. अगर मुखर्जी का नेतृत्व होता, तो नीतिगत लकवे (पॉलिसी पैरालिसिस) का आरोप भी उतना असरदार नहीं रहता.’ वे आगे लिखते हैं, ‘प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति के तौर पर नियुक्त करना, एक प्रतिभा को व्यर्थ करने का उदाहरण था. सोनिया गांधी ने बदलाव करने की जगह चीजों को अपने हाथों से फिसल जाने का मौका दिया. ऐसा लगता है कि उन्होंने पूर्वाग्रह को तर्क के ऊपर तरजीह दी.’