11 मई, 1953: भारतीय जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर में बिना परमिट घुसने की कोशिश में गिरफ्तार कर लिए गए थे. जबकि उनके साथ आए 29 साल के अटल बिहारी वाजपेयी एक नमक से भरे ट्रक में छिपकर वापिस दिल्ली पहुंच थे.

अनुच्छेद-370 का विरोध करने आए मुखर्जी का देहान्त 44 दिन बाद श्रीनगर की सेंट्रल जेल में रहस्यमय ढंग से हो गया. उधर वाजपेयी पिछली सदी के आखिरी दशक में भारत के प्रधानमंत्री बन गए. मुखर्जी द्वारा स्थापित की गयी भारतीय जन संघ आजकल की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) है.

5 अगस्त, 2020: अनुच्छेद-370 हटाये जाने की पहली वर्षगांठ पर कर्फ्यू जैसी स्थिति के बीच एक कश्मीरी मुसलमान युवती, रूमाइसा वानी ने - जो भाजपा की नेता हैं - दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में लाल चौक पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया. इसके अलावा भी कश्मीर घाटी में जगह-जगह पर भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अनुच्छेद-370 हटाये जाने का जश्न मनाया.

देखा जाये तो ये दो घटनाएं जम्मू-कश्मीर में भाजपा की लगभग पूरी कहानी बयां कर देती हैं. लेकिन और भी चीज़ें हैं बताने लायक और कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. तो चलिये शुरू से शुरू करते हैं.

कश्मीर और भाजपा:

भाजपा को कश्मीर में हमेशा शक की निगाह से देखा गया. जानकारों की मानें तो इसके लिए कुछ तो भाजपा की अपनी राजनीति जिम्मेदार थी और कुछ मुस्लिम बहुसंख्यक कश्मीर के राजनेताओं ने उसे जिस तरह से यहां पर पेश किया, ये दोनों चीज़ें जिम्मेदार हैं.

“भाजपा की राजनीति कभी ढकी-छुपी नहीं रही है. उन्होने हमेशा से अनुच्छेद-370 हटाने की बात की थी और फिर अयोध्या जैसी अन्य चीज़ें तो भाजपा के साथ हमेशा से जुड़ी रही हैं. इन सब चीजों ने ज़ाहिर है कश्मीर के लोगों में भाजपा के प्रति एक रोष हमेशा बनाए रखा” कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति पर नज़र रखने वाले, शाह अब्बास, ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

शाह कहते हैं कि इसी वजह से भाजपा हमेशा जम्मू-कश्मीर की “चुनावी राजनीति” में कई दशकों तक एक दर्शक से ज़्यादा कुछ नहीं थी.

“यहां की राजनीतिक पार्टियां भाजपा को लोगों को डराने के लिए इस्तेमाल किया करती थीं” शाह कहते हैं, “यह कह कर कि भाजपा का हिंदुत्व जम्मू-कश्मीर को बर्बाद कर देगा,”

शाह की बात 2014 के विधानसभा चुनाव अभियान पर एक नज़र डालने से ही साबित हो जाती है. उस समय कश्मीर की मुख्य राजनीतिक पार्टियां कश्मीरी लोगों से भाजपा को रोकने के लिए वोट मांगती दिखाई दी थीं.

“हमें भाजपा के मिशन-44* को रोकना है और उन्हें जम्मू-कश्मीर में कदम नहीं रखने देना है” 2014 के चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, मुफ़्ती मुहम्मद सईद, कई रैलियों में लोगों से कहते दिखाई दिये थे.** यह अलग बात है कि बाद में वे खुद ही भाजपा के साथ गठबंधन कर बैठे.

तो कुल मिला कर यह कि न तो कश्मीर में और न जम्मू में भाजपा की कोई साख हुआ करती थी और यह बात अलग-अलग विधानसभा के नतीजों से भी सिद्ध होती है.

1987 के मशहूर (धांधली के लिहाज से) चुनाव में भाजपा को जम्मू-कश्मीर में दो सीटें मिली थीं. फिर 1996 जब कश्मीर में मिलीटेन्सी शिखर पर थी और लोगों ने चुनाव में बिलकुल हिस्सा नहीं लिया था, भाजपा को यहां आठ विधानसभा सीटें मिली थीं.

“लेकिन फिर 2002 के चुनाव में, जिसको जम्मू-कश्मीर का हाल ही में पहला बिना धांधली का चुनाव माना जाता है, भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली थी. 2008 में जम्मू-कश्मीर में उसके विधायकों की संख्या इस एक से बढ़कर 11 हो गयी थीं” एक सरकारी अफसर, जो चुनावों का अभिलेख रखते हैं, ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

वे कहते हैं कि ये सारी सीटें भाजपा को सिर्फ जम्मू में ही मिलीं हैं और अभी तक कश्मीर घाटी में वह अपना खाता तक नहीं खोल पायी थी.

लेकिन कम सीटें और बहुत थोड़े से वोट मिलने के बावजूद भी भाजपा ने, अगर देखा जाये तो, कभी जम्मू-कश्मीर को नज़रअंदाज़ नहीं किया.

इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1992 में जब कश्मीर में हिंसा अपने चरम पर थी, भाजपा के तब के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अब के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कश्मीर घाटी में तिरंगा फहराने आए थे. वहां उन्होंने श्रीनगर के लाल चौक पर कड़ी सुरक्षा के बीच तिरंगा फहराया था.

“मेरी मुलाक़ात जोशी और मोदी से तभी हुई थी. और में उन्हीं दिनों भाजपा में शामिल हुआ था,” कश्मीर के बडगाम जिले में रहने वाले भाजपा नेता, अशरफ आज़ाद*** कहते हैं.

आज़ाद कहते हैं कि अगले कई सालों तक मोदी निरंतर कश्मीर आते रहे और लोगों से मिलते रहे, चाहे घाटी में कितनी ही हिंसा क्यों न हो रही हो. “फिर 1998 में मोदी जी को पार्टी ने जम्मू-कश्मीर का इंचार्ज बना दिया और वे और बारीकी से यहां की चीजों को समझने लगे,”

इस बीच जहां जम्मू में भाजपा ने अपनी ठीक-ठाक साख बना ली थी, वहीं कश्मीर में अगर कुछ लोग पार्टी से जुड़े थे भी तो वे ऐसा खुल कर नहीं कर पा रहे थे. पार्टी के पुराने लोग कहते हैं कि तब मोदी के निरंतर प्रयासों से कश्मीर घाटी में कोई 100 के करीब लोग भाजपा से जुड़े थे, लेकिन सब गुप्त रूप से. यह सिलसिला काफी समय तक चलता रहा.

“मैं 2004 में भाजपा से जुड़ा था और 2011 तक मैंने इस बात का किसी को पता नहीं चलने दिया था. 2011 में, मैंने कश्मीर विश्वविद्यालय की अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर भाजपा से जुड़े होने का ऐलान किया था” जम्मू-कश्मीर में भाजपा के मुख्य प्रवक्ता, अल्ताफ ठाकुर सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं. ठाकुर पिछले लगभग एक दशक से दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में अपने घर नहीं जा पाये हैं, क्योंकि वहां उन्हें अपनी जान का खतरा है.

भाजपा की इन निरंतर कोशिशों का फल उन्हें 2014 में देखने को मिला, जब उन्हें उस साल हुए विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की 87 में से 25 सीटें मिलीं.

अब यह नरेंद्र मोदी की कोशिशें और 2014 का “मोदी वेव” था, या फिर कश्मीर में राजनेताओं का बार-बार भाजपा का नाम लेकर जम्मू के लोगों को कश्मीर से अलग करना था, भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में बहुत बढ़िया प्रदर्शन दिखाया और उसी साल पहली बार वह जम्मू-कश्मीर में सरकार का हिस्सा भी बन गई.

भाजपा और जम्मू-कश्मीर सरकार:

भाजपा ने कड़ी परीक्षा के बाद जम्मू-कश्मीर में सरकार तो बना ली थी लेकिन यह सरकार ज़्यादा देर चल नहीं पायी.

“शुरू से ही भाजपा और पीडीपी का जम्मू-कश्मीर में गठबंधन स्थिर नहीं रहा था. चाहे वह तब के मुख्यमंत्री, मुफ़्ती मुहम्मद सईद, का चुनाव के बाद पाकिस्तान और अलगाववादियों को शांतिपूर्वक चुनाव होने देने के लिए धन्यवाद कहना था या फिर प्रधान मंत्री मोदी का श्रीनगर में, मुफ़्ती की उपस्थिति में यह कहना कि उन्हें कश्मीर पर किसी की सलाह की ज़रूरत नहीं है” कश्मीर की राजनीति पर नज़र रखने वाले, मुनीब हुसैन, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

हुसैन कश्मीर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि भाजपा और पीडीपी के गठबंधन में तब और खटास आ गई जब जम्मू में एक गुज्जर लड़की के साथ बलात्कार और उसकी हत्या ने पूरे देश को झिंझोड़ दिया था. “तब भाजपा और पीडीपी आमने-सामने खड़े दिखाई दिये जब भाजपा के दो मंत्री एक बलात्कारी के पक्ष में निकाली गयी रैली में भाग लेते दिखाई दिये थे.” हुसैन कहते हैं.

अप्रैल 2018 की इस घटना के कुछ दिन बाद ही उन दोनों मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन दोनों पार्टियों में जो मन-मुटाव हुआ था वह रह गया. और फिर जून 2018 में भाजपा ने अचानक से समर्थन वापस लेकर जम्मू-कश्मीर की सरकार गिरा दी.

अगर आप कश्मीर में भाजपा के लोगों के साथ बात करें तो वे सरकार गिराने की वजह यहां चल रहे भ्रष्टाचार और चाचा-भतीजावाद को ठहराते हैं.

“पीडीपी ने हमारे जम्मू-कश्मीर को उन्नति की तरफ ले जाने के मंसूबे में खूब बाधाएं डाल रखी थीं. इसीलिए उस समय कश्मीर से भ्रष्टाचार कम करने के लिए वो फैसला लिया गया था” भाजपा नेता, ज़ुबैर नज़ीर, ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. ज़ुबैर श्रीनगर से भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और फिलहाल एक वरिष्ठ नेता के रूप में पार्टी से जुड़े हुए हैं.

पीडीपी और भाजपा के एक-दूसरे से अलग होने के बाद लगभग एक साल तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा रहा. और इसके बाद 2019 की 5 अगस्त को आखिरकार वह हो ही गया जिसके लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी जान गंवाई थी. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटा दिया गया. इसके साथ-साथ राज्य को दो केंद्र प्रशासित राज्यों में भी तब्दील कर दिया गया.

ज़ुबैर कहते हैं कि राष्ट्रपति शासन में या फिर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद प्रगति की गति काफी तेज़ हो गयी है.“चाहे वो विकास का काम हो या फिर भ्रष्टाचार खत्म करने का, सब सही ढंग से हो रहा है.”

अब सवाल यह पैदा होता है कि अनुच्छेद-370 के बाद कश्मीर में भाजपा कहां है?

ज़ाहिर है कि ऐसे कदम उठाने के बाद कश्मीर घाटी में भाजपा के खिलाफ आक्रोश और बढ़ता दिखाई दिया है. लोग खुलेआम नहीं तो बंद कमरों में भाजपा को खूब भला-बुरा कह रहे हैं.

लेकिन अगर भाजपा से जुड़े लोगों से बात करें तो ऐसा बिलकुल नहीं है, बल्कि इसका उल्टा है. “जहां कुछ एक साल पहले कश्मीर में हमारे कार्यकर्ता हजारों में भी नहीं थे, वहीं इस समय सिर्फ कश्मीर घाटी में हमारे सात लाख से ज़्यादा कार्यकर्ता हैं,” अल्ताफ़ ठाकुर सत्याग्रह को बताते हैं. वे कहते हैं कि लोगों को मोदी जी की “130 करोड़ हिंदुस्तानी, जिसमें न कोई मुसलमान है और न हिन्दू,” वाली बात समझ में आ गयी है.

ठाकुर कहते हैं कश्मीर में लोग समझ गए हैं कि पीडीपी और एनसी जैसी पार्टियां सिर्फ अपना फायदा देखती थीं.

“लोगों को यह भी समझ में आ गया है कि अगर कश्मीर में प्रगति और तरक़्क़ी हो सकती है वो सिर्फ भाजपा के जरिये हो सकती है. बाकी सबके मुखौटे गिर गए हैं” ठाकुर कहते हैं.

ठाकुर की बातों में यह सच´चाई ज़रूर है कि इस समय कश्मीर में राजनीतिक दलों में से सिर्फ और सिर्फ भाजपा के लोग ही ज़मीन पर नज़र आ रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह बाकी पार्टियों के नेताओं की गिरफ्तारी भी है, लेकिन फिर भी यह तथ्य कश्मीर के लिहाज से एक बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है.

“पहले जहां भाजपा वालों को जम्मू के बाहर निकलते ही गिरफ्तार कर लिया जाता था वहीं अब कश्मीर के मुसलमान भाजपा वाले अनुच्छेद-370 हटाये जाने का खुलेआम जश्न मानते हैं. कुछ तो बदला है न?” कश्मीर की इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइन्स एंड टेक्नॉलजी में इंटरनेशनल रिलेशन्स पढ़ाने वाले, उमर गुल, ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

क्या बदला है, एक लंबी कहानी है जो पिछले साल चार अगस्त को शुरू हुई थी और अभी खतम नहीं हुई है.

लेकिन साथ ही प्रश्न यह भी है कि अगर लोग खुलेआम भाजपा के साथ जुड़ रहे हैं तो ऐसा क्यों हो रहा है?

शुरुआत में हमने रूमाइसा वानी की बात की थी. सत्याग्रह ने इस प्रश्न का जवाब ढूंढने के लिए उनसे बात की. रूमाइसा कहती हैं कि उन्हें भाजपा में लोगों के लिए कुछ करने का जज़्बा नज़र आया है.

“यही वजह है कि मैं अपने पति के साथ इस पार्टी में शामिल हुई हूं. बाकी सारी पार्टियां कश्मीर में अपने अपने हित देखते हुई आई हैं. सिर्फ भाजपा ऐसी एक पार्टी है, जो लोगों का विकास चाहती है” रूमाइसा ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

यह पूछे जाने पर कि भाजपा को कश्मीर में मुसलमान विरोधी पार्टी माना जाता है और उन्हें लोग शक की निगाह से देखते हैं, रूमाइसा कहती हैं कि राजनीति अलग है और धर्म अलग. “उनका अपना धर्म है और हमारा अपना धर्म. और धर्म से परे कर्म होता है जो हम लोग खूब निभाते हैं. रही लोगों की बात तो उनको धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि क्या सच है और क्या झूठ,”

रूमाइसा बताती हैं कि सैंकड़ों लोग रोज़ उनसे संपर्क करके भाजपा में शामिल होने का उत्साह ज़ाहिर करते हैं. रूमाइसा की ही बात आगे बढ़ाते हुए अनंतनाग जिले की भाजपा अध्यक्ष, आलिया जान भी कहती हैं कि भाजपा ने कश्मीर में गरीब और लाचार औरतों का हाथ थामा है.

“जो औरतें अभी भी चूल्हे पर खाना बनाती थीं उनको एलपीजी चूल्हे दिये गए हैं. लड़कियों की पढ़ाई के लिए लाड़ली बेटी स्कीम है” आलिया ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. वे पूछती हैं कि अभी तक किस सरकार ने आम लोगों के बैंक खाते में पैसे डाले थे.

“अभी तक किस सरकार ने 70 साल में लोगों को मुफ्त राशन दिया है. हमारे बारे में उल्टी-सीधी बातें इसलिए की जाती हैं क्यूंकि यहां कश्मीर में कई लोगों की दुकानें बंद हो गयी हैं और लोगों को विकास का मतलब समझ आने लग गया है” आलिया कहती हैं.

वे कहती हैं कि मोदी के “सबका साथ, सबका विकास” नारे ने उन्हें भाजपा में शामिल होने का साहस दिया है.

और भी कई भाजपा के लोगों से सत्याग्रह ने इस बारे में बात की और सबका यही कहना था. ये सभी लोग अनुच्छेद-370 को “नफरत की दीवार” बताते हुए यह भी कहते हैं कि अब इसके गिर जाने से कश्मीर का विकास होगा.

जहां एक तरफ इतने लोगों का भाजपा के साथ जुड़ना उनकी पार्टी के लिए शायद गर्व की बात हो, वहीं ज़मीन पर मुख्यधारा के नाम पर सिर्फ भाजपा के लोगों का दिखना उनके लिए खतरनाक साबित हो रहा है.

भाजपा के लोगों की हत्याएं

कश्मीर में मुख्यधारा से जुड़े लोगों की हत्या कोई नयी बात नहीं है. और पीछे नज़र डाली जाये तो सबसे पहले मारे जाने वाले मुख्यधारा के नेता भाजपा से ही जुड़े हुए थे.

14 सितंबर, 1989 में टीका लाल टपलू नाम के वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता की उनके श्रीनगर में स्थित घर में घुस कर हत्या कर दी गयी थी. यह कश्मीर की शायद पहली राजनीतिक हत्या थी.

“लेकिन कुछ समय पहले तक भाजपा के लोगों को बहुत कम निशाना बनाया जा रहा था. उसकी वजह शायद यह थी कि एनसी, पीडीपी और कांग्रेस के लोग ज़्यादा नज़र में थे और भाजपा के लोग या तो गुप्त रूप से काम कर रहे थे या ज़्यादा नज़र में नहीं थे” गुल ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

अब जबकि मुख्यधारा के नाम पर सिर्फ भाजपा है तो अब इसके लोगों पर भी हो रहे हमले बढ़ गए हैं.

बीती नौ जुलाई को उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा इलाक़े में भाजपा के एक युवा नेता, उनके भाई और उनके पिता की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. इसके बाद ये हमले तेज़ हो गए हैं और अब पंचायत के सदस्यों को भी निशाना बनाया जा रहा है. तब से अभी तक कुल मिलाकर भाजपा से जुड़े पांच लोग मारे जा चुके हैं और एक गंभीर रूप से घायल, हस्पताल में पड़े मौत और ज़िंदगी के बीच जूझ रहे हैं.

इन हत्याओं ने काफी लोगों के मन में शंका पैदा कर दी है और सिर्फ दो दिन में छह से ज़्यादा भाजपा से जुड़े लोगों ने पार्टी से इस्तीफ़े का ऐलान किया है.

हालांकि भाजपा इन लोगों के डर को “मौकापरस्ती” का नाम भी दे रही है. पार्टी के प्रवक्ता, अल्ताफ ठाकुर, कहते हैं कि ये वो लोग हैं (जो इस्तीफ़े दे रहे हैं) जो अपने फायदे के लिए आए दिन पार्टियां बदलते रहते हैं.

इस संबंध में सत्याग्रह ने कई लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन उनमें से ज्यादातर ने अपने इस्तीफ़े की वजह ‘निजी’ बता कर फोन रख दिया. लेकिन दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के एक सरपंच, मुहम्मद इकबाल, एक वीडियो में बोलते नज़र आते हैं - “मुझे मरना नहीं है. मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनकी मां भी गुज़र गयी है.”

इन हत्याओं से पार्टी के छोटे ही नहीं बल्कि बड़े नेताओं में भी भय का माहौल है इससे इनकार नहीं किया जा सकता. रूमाइसा कहती हैं कि पांच अगस्त को झण्डा फहराने के वक़्त उनके साथ और भी लोग थे, लेकिन उन्होने उनको कमेरे के सामने नहीं आने दिया.

“मेरे घर पर सुरक्षा बल तैनात हैं. मैं सुरक्षित हूं, लेकिन मैं अपने कार्यकर्ताओं की जान जोखिम में नहीं डाल सकती,” वे कहती हैं.

लेकिन भाजपा तब भी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती जब पार्टी अपने कार्यकर्ताओं, पंचायत के लोगों और ब्लॉक डेव्लपमेंट काउंसिल के सदस्यों को ‘सुरक्षित’ स्थानों पर लेकर जा रही है. कुछ को होटलों और दूसरी सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया है. हालांकि घोषित तौर पर पार्टी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर यही कहते हैं कि “इन लोगों के लिए राष्ट्र हित्त कोई माइने नहीं रखता है, यह बस अपना फाइदा देख के फ़ेलसे करते हैं.”

कश्मीर घाटी में भाजपा से जुड़े लोगों को फिलहाल अपनी जान ही जोखिम में नहीं दिख रही है बल्कि अपना भविष्य भी अंधकारमय नज़र आ रहा है.

हर राजनीति से जुड़े इंसान का ख्वाब होता है चुनाव लड़ना और जीतना. जहां भाजपा से जुड़े लोगों ने कड़ी मेहनत के बाद कश्मीर में थोड़ी-बहुत साख बना ली थी और शायद वे चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार थे तभी जम्मू-कश्मीर को एक ऐसा केन्द्रीय प्रशासित राज्य बना दिया गया, जहां चुनाव के हाल फिलहाल कोई आसार नज़र नहीं आ रहे.

और अगर चुनाव हो भी गए तो कश्मीरियों के लिए केंद्र प्रशासित राज्य के चुनाव कितना मायने रखेंगे यह भी एक बड़ा सवाल है.

ऐसे में इन सभी को उम्मीद की एक ही किरण नजर आती है. “देश के गृह मंत्री ने आश्वासन दिया है और उनकी बात वज़न रखती है. हमें यकीन है कि जल्दी ही जम्मू-कश्मीर को फिर से एक पूर्ण राज्य बना दिया जाएगा” ठाकुर, ज़ुबैर, रूमाइसा, आलिया और अन्य भाजपा के लोग, जिनसे सत्याग्रह ने बात की, यह आशा जताते हैं.

* मिशन-44 भाजपा का चुनावी नारा था जिसमें वह जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में बहुमत के लिए ज़रूरी 44 सीटें लेने की बात करती थी.

** ये रैलियां इस पत्रकार ने विस्तार से कवर की हुई हैं.

*** आज़ाद ने ये बातें हाल ही में एक इंटरव्यू में कही हैं. सत्याग्रह की काफी कोशिश के बाद भी हमारी उनसे बात नहीं हो पायी. इसकी वजह घाटी में लगा लॉकडाउन और आज़ाद का फोन बंद होना है.