आंकड़े कहते हैं कि दुनिया भर में महिलाएं पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा अनपेड वर्क यानी ऐसा काम करती हैं जिसके लिए उन्हें कोई आर्थिक भुगतान नहीं किया जाता. भारत में जहां पुरुष रोजाना औसतन 52 मिनट ही ऐसा कोई काम करते हैं, वहीं महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा औसतन 352 मिनट यानी लगभग छह घंटे है. आंकड़े यह भी कहते हैं कि महिलाएं जितना काम घरों में करती हैं, वह भारत की जीडीपी के 3.1 फीसदी के बराबर है. ऐसा होने की वजह के बारे में अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है. दरअसल, भारत समेत दुनिया के हर कोने में यह समझ आम है कि महिलाएं हमेशा खयाल रखने वाली (प्राइमरी केयर गिवर) होती हैं. दूसरी तरह से कहें तो यह माना जाता है कि महिलाएं घरेलू कामकाज, बच्चों-बुजुर्गों या बीमारों की देखभाल जैसी जिम्मेदारियां निभाने में कहीं ज्यादा कुशल होती हैं. लेकिन इस समय जब कोरोना वायरस महामारी के चलते सारा विश्व एक स्वास्थ्य आपदा का सामना कर रहा है तब यह समझ महिलाओं के लिए और भी बड़ी मुसीबत बन गई है.

कोरोना वायरस का असर बढ़ने और शहरों में लॉकडाउन होने के साथ ही महिलाओं के बढ़े हुए काम से त्रस्त हो जाने की बात कही जाने लगी थी. दरअसल, स्वास्थ्य आपदा के चलते एक तरफ जहां लोग बीते कई महीनों से घरों में बंद हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू नौकरों का आना भी रुक गया है. ऐसे में गृहणियां हो या कामकाजी महिलाएं, उनके काम न सिर्फ पति और बच्चों की मौजूदगी से बल्कि हाउस-हेल्प की गैर-मौजूदगी के चलते भी बढ़ गए हैं. समय बीतने के साथ, अब इसमें आर्थिक कारण भी शामिल होने लगे हैं. यानी, नौकरियां जाने या सैलरी कटने, या आमदनी कम होने के चलते लोग अब घरेलू खर्चों में कटौती करते हुए भी दिखाई देने लगे हैं. ऐसे में जो महिलाएं यह उम्मीद कर रहीं थी कि हालात नॉर्मल होने के साथ उनकी जिंदगी फिर से पहले जैसी हो जाएगी, वे अब लंबे समय के लिए खुद को इन परिस्थितियों में फंसा पा रही हैं.

अगर विशेष तौर पर कामकाजी महिलाओं की बात करें तो बदली हुई इस स्थिति में इनमें से कुछ जहां नौकरी गंवा देने के चलते तनाव में है वहीं, जिनकी नौकरियां अब भी सुरक्षित हैं, वे डे-केयर या चाइल्ड केयर जैसी सुविधाओं के बंद होने से भी उलझन में हैं. वहीं, कुछ वेतन में हुई कटौतियों के चलते आगे इस तरह की सुविधाओं का खर्च न उठा पाने के कारण तमाम तरह की परेशानियों का सामना कर रही हैं.

इसके साथ ही, दुनिया भर से आने वाले आंकड़े बताते हैं कि कोविड-19 के प्रकोप के बाद से महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले भी बढ़ गए हैं. महिलाओं के लिए काम करने वाले कई सामाजिक संगठनों का आकलन है कि भारत में भी घरेलू हिंसा के मामलों में इस दौरान बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है. भारत में इस दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोत्तरी की बात राष्ट्रीय महिला आयोग भी स्वीकार करता है.

भारत के संदर्भ में ऊपर कही गई ये तमाम बातें उन महिलाओं पर ही ज्यादा अच्छे से लागू होती हैं जो नौकरीशुदा हैं या शादीशुदा, या फिर दोनों हैं. लेकिन वे युवा महिलाएं जो इनमें से कोई नहीं हैं, उनका क्या? वे महिलाएं जो इस समय अपना करियर बनाने की ओर बढ़ रहीं थीं या ऐसा करने के लिए किसी तरह अपनी शादी टाल रहीं थीं, उनके लिए यह समय किसी दो-तरफा महाविपदा की तरह आया है. कोरोना महामारी ने उनके करियर बनाने की संभावनाओं को पहले से भी कम कर दिया है. दूसरी तरफ इस महामारी से जुड़ी तमाम वजहों से उन पर शादी करने का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहीं रीवा की दीप्ति पांडेय कहती हैं कि ‘मेरे जैसी सरकारी नौकरी की चाह रखने वाली लड़कियों ने नपे-तुले रिस्क लिए थे. हमने प्राइवेट सेक्टर के मौके छोड़कर यह तय किया कि इतना समय हम सिविल सर्विसेज की तैयारियों को देंगे, फिर इतना वक्त नौकरी को देंगे उसके बाद जीवन के अगले फैसले होंगे. लेकिन कोरोना वायरस के कारण हमारा ये रिस्क हमारी गलती बनता लग रहा है. मैं दो साल से घर से बाहर रहकर तैयारी कर रही हूं, और मेरे पास अब सिर्फ एक साल का वक्त बचा है. मध्य प्रदेश में राजनीति के इतने पेंच उलझे थे कि बीते दो सालों से वैसे भी नौकरियां नहीं थीं, अब शायद अगले दो सालों का भी बंटाढार हो चुका है. कोरोना के चलते अब तक इस साल की परीक्षाओं का नोटिफिकेशन तक नहीं आ पाया है, कई परीक्षाओं के नतीजे अटके हुए हैं. ऊपर से इकॉनमी के जो हालात हैं तो हम वापस अपने छोड़े हुए करियरों की तरफ जाने का भी नहीं सोच सकते हैं. वहां विकल्प नहीं हैं. लड़की होने का नुकसान ये है कि हमारी एज हर दिन बढ़ रही होती है. इस समय सारी चीजें रुकी हुई हैं लेकिन उम्र नहीं रुकी है. ऐसे में अब जल्द ही शादी करनी पड़ सकती है. इसका दबाव इस उम्र की तरह ही बढ़ता जा रहा है.’

दीप्ति की बातों पर गौर करते हुए अगर पोस्ट कोरोना युग में नौकरियों की संभावनाओं को टटोलें तो नेशनल सैंपल सर्वे और पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे द्वारा जारी किए गए रोजगार संबंधी आंकड़े बताते हैं कि कोरोना त्रासदी के बाद साढ़े तेरह करोड़ से ज्यादा नौकरियां खत्म हो सकती हैं. इसमें सरकारी और गैर-सरकारी सेक्टर की नौकरियां शामिल हैं. अब एक तरफ जहां पहले से मौजूद नौकरियां खत्म हो रही हैं, वहीं जानकार यह अंदाज़ा लगाते दिखाई दे रहे हैं कि कोरोना महामारी के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ने की दर आज़ादी के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर आ सकती है. ऐसे में आगे नौकरियां मिलना थोड़ा और मुश्किल हो सकता है. महिलाओं के संदर्भ में बात करें तो नौकरी के मामले में पहले से ही दोयम दर्जे पर रहने वालीं और इसमें थोड़ी ही भागीदारी कर पाने वाली महिलाओं के लिए अब यह पत्थर पर दूब उगाने जैसी कोशिश कही कही जा सकती है. करियर के मामले में महिलाओं के पास असफल होकर फिर कोशिश करने के मौके लगभग न के बराबर होते हैं और इन परिस्थितियों ने उनके मौके और भी कम कर दिये हैं.

महिलाओं के रास्ते में आ खड़ी हुई इस नई मुश्किल के बारे में इंदौर में काम करने वाली समाजसेवी रंजना श्रीवास्तव कहती हैं कि ‘हमारे यहां आज भी लड़कियों के करियर को किसी गैर-जरूरी कवायद की तरह ही लिया जाता है. अक्सर होता ये है कि अपना करियर बनाने की इच्छा रखने वाली लड़कियों को एक समय सीमा दे दी जाती है. इसके बाद कुछ भी हो उन्हें शादी-ब्याह कर घरवालों को फुर्सत कर देना होता है. कोरोना त्रासदी ने बहुत-सी लड़कियों की इस समय सीमा को और छोटा कर दिया है.’

लखनऊ की आकांक्षा सिंह इसके साथ-साथ अपनी एक और परेशानी के बारे में हमें बताती हैं. वे कहती हैं कि ‘मेरी उम्र महज 25 साल है. मैं अपने आपको बहुत ब्रिलियंट नहीं मानती लेकिन फिर भी नौकरी करना चाहती हूं. मुझे ऐसा लग रहा था कि क्योंकि मेरी उम्र कम है इसलिए मैं करियर में थोड़े एक्सपेरिमेंट कर सकती हूं. इसलिए बीते साल मैंने अपनी मीडिया की नौकरी छोड़कर नोएडा में डिजिटल मार्केटिंग का कोर्स जॉइन कर लिया था. अब कोरोना त्रासदी के कारण वो बीच में ही अटक गया है. हालांकि इंस्टीट्यूट वाले अपनी फीस जस्टिफाई करने के लिए सबकुछ ऑनलाइन करवा रहे हैं लेकिन इसमें पेंच ये है कि अब मुझे घर पर रहना पड़ रहा है. पहले नौकरी या कोर्स था और मैं भी बाहर थी इसलिए शादी की बात नहीं होती थी. अब उन्हें (घरवालों को) पता चल गया है कि लंबे समय के लिए लड़की घर में फंस गई है तो वे कहते हैं कि शादी कर लो, जिन्हें करनी होती है वे शादी के बाद भी नौकरियां कर लेते हैं.’

करियर स्थापित होने से पहले शादी से जुड़ी एक व्यावहारिक समस्या की तरफ ध्यान दिलाते हुए आकांक्षा कहती हैं कि ‘पहले उम्मीद थी कि नौकरी मिलेगी, एकाध साल में जम जाएगी तब शादी कर लेंगे. लेकिन घर वालों की शादी को लेकर जल्दबाज़ी देखकर लग रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि नौकरी शुरू ही न हो पाए. पहले से नौकरी न करने का खतरा ये है कि हो सकता है कि मेरी नौकरी बाद में ससुराल वालों को पसंद ही ना आए. अगर आप पहले से काम कर रहे होते हैं तो अरेंज मैरिज में ये बात दिमाग में रखकर आपको पसंद या नापसंद किया जाता है. सर्टेन न होने पर अभी तो कह देंगे कि हां कर लेना, बाद में धोखा दे दिया तो मैं कुछ नहीं कर पाउंगी.’ आगे वे हंसते हुए जोड़ती हैं कि ‘लव मैरिजेज में ही अपने मन का काम करने की आज़ादी होती है लेकिन लव करने के मौके भी लॉकडाउन में खत्म हो गए हैं. मैरिज ही रह गई है.’

जिन लड़कियों का करियर अभी शुरू नहीं हुआ है या जिनके पास इस वक्त नौकरिया नहीं है उनकी परेशानी तो एक अलग स्तर की है. लेकिन इस वक्त कुछ परेशानी उन लड़कियों की भी बढ़ गई है जिन्हें आजकल घर से ही अपना काम करने की सहूलियत मिली हुई है. दिल्ली में एक नामी हिंदी अखबार में काम करने वाली नंदिनी दुबे बीते कुछ समय से अपने होमटाउन कानपुर में रह रही हैं. नंदिनी बताती हैं कि ‘मैं उस एज में पहुंच गई हूं, जिसके लिए मां-बाप कहते रहते हैं अब देखते रहो, सोचना शुरू कर दो. बेशक वो मुझे प्रेशर नहीं करते हैं लेकिन मौका निकालकर कहते तो रहते ही हैं. चार-पांच साल पहले जब ऐसी बातें आईं थीं तो मैंने करियर का हवाला देकर उन्हें रोक दिया था. मैं इस मामले में खुशकिस्मत रही कि उन्होंने मुझे बिना ज्यादा टेंशन के वक्त दिया. हालांकि ये वक्त की पाबंदी हमेशा लड़कियों पर ही होती है कि उन्हें एक टाइम पीरियड में ही खुद को साबित करना होता है, सफल बनना होता है. पर हां, भले ही मेरी नौकरी सुरक्षित है लेकिन घर पर रहने पर होता ये है कि इस तरह की बातें आपके कानों में पड़ती रहती हैं.’

नंदिनी इस मामले में खुशकिस्मत हैं लेकिन रंजना श्रीवास्तव के मुताबिक हमारे समाज के ज्यादातर हिस्से को इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कोई लड़की नौकरी कर रही है या नहीं. ‘ज्यादातर मामलों में परिवार वाले या तो शादी तक का वक्त बिताने के लिए लडकियों को कोई नौकरी करने देते हैं या फिर इसलिए कि कभी-कभी इसकी वजह से अच्छा रिश्ता होने की संभावना बढ़ जाती है’ रंजना कहती हैं.

यहां पर भारतीय समाज से जुड़े एक अजीब विरोधाभास पर गौर करें तो कोरोना त्रासदी के इस समय में दुनिया के सबसे बड़े, ज़रूरी और महंगे आयोजन भी जहां हालात सामान्य होने तक टाले जा रहे हैं. वहीं, भारतीय शादी जैसे टाले जा सकने वाले आयोजनों को लेकर खासी जल्दबाज़ी भी देखने को मिल रही है. नंदिनी इस नज़रिए को भारतीय शादियों की भव्यता या और उसमें होने वाले भारी खर्च से जोड़ते हुए कहती हैं कि ‘कई लोग इसे मौके की तरह भी देख रहे हैं. वे इसे फायनेंशियली भुना लेना चाहते हैं. मतलब, उन्हें लगता है कि इस समय 25-30 लोगों में शादी हो जाएगी और बहुत सारी बचत होगी. कई बार शादी के उम्मीदवार भी इसे इसी तरह देखते हैं, लड़कियां तो हमेशा ही मां-बाप के पैसे बचा लेना चाहती हैं, इसलिए भी वो ज्यादा दबाव महसूस करती हैं.’

ग्वालियर की श्रेया ठारवानी कुछ समय पहले तक मुंबई के पास ठाणे में स्थित एक फैशन ब्रांड के साथ काम किया करती थीं. कोरोना महामारी के दौरान हुई छंटनी की गाज उनकी कंपनी के कई अन्य लोगों के साथ-साथ उनकी नौकरी पर भी गिरी. ऐसे में इस समय ज्यादा नौकरियां न होने के चलते उन्होंने कुछ समय अपने घर पर बिताने का फैसला किया. ‘कई बार तो लगता है कि जैसे मैंने घर आकर ही गलती कर दी है. दिन में कई बार शादी का राग सुनना पड़ जाता है जबकि मैं अभी तय नहीं कर पाई हूं कि मुझे शादी करनी है या नहीं. और, करनी है तो कब करनी है. मजेदार बात ये है कि मेरे पैरेंट्स ने मुझे मेरे प्रोफेशन के हिसाब से बहुत कैल्कुलेटेड रिस्क बताया है. उनका कहना है कि मेरी नौकरी तो चली ही गई है और अगले एक-डेढ़ साल तक मंदी रहने वाली है. ऐसे में मैं अगर अगले कुछ महीनों में शादी करती हूं तो मुझे अपनी जिंदगी पटरी पर लाने के लिए इतना सारा समय मिल जाएगा. फिर तब तक नौकरियां भी वापस आ जाएंगी. कभी-कभी तो मैं भी सोचने लगती हूं कि कर ही लूं क्या?’ श्रेया कहती हैं.

बनारस की रहने वाली गीतांशी मिश्रा (बदला हुआ नाम) इस साल अपनी फाइन आर्ट्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली आकर कहीं नौकरी करना चाहती थीं. लेकिन फिलहाल वे पिछले कई महीनों से अपने घर में ही फंसी हुई हैं. कोरोना वायरस ने उनकी आगे की सारी योजना पर पानी फेर दिया है. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताती हैं कि ‘अब एक साल तो खराब हो गया. और ये ही वो उम्र है जिस समय शायद शादी-ब्याह की बातें सबसे ज्यादा होती हैं. घर वालों को लगता है कि मैं अभी से हाथ से निकलती जा रही हूं और दिल्ली जाकर न जाने क्या होगा.’ ऐसे हालात में गीतांशी बताती हैं कि वे भी शादी के बारे में इतना जरूर सोचने लगी हैं कि अगर कोई ऐसे शहर का लड़का मिला जहां उनके पास नौकरी के मौके होंगे तो उससे शादी करने के बारे में सौचा जा सकता है. उन्हें लगता है कि अभी आगे नौकरियों का भरोसा नहीं और कितने दिन वे रोज़-रोज़ घर वालों की वही बातें सुनती रहेंगी!

श्रेया ठारवानी और गीतांशी मिश्रा की बातों से अंदाज़ा लगता है कि लोगों पर उनके आसपास की परिस्थितियों या माहौल कितना प्रभाव डाल सकते हैं. दिल्ली में रहने वाली अनुभा यादव हमेशा ही अपने माता-पिता के साथ रहती रही हैं. अपने आसपास होने वाली शादी-ब्याह की चर्चाओं पर वे कहती हैं कि ‘कई बार परिस्थितियां आपको उस विकल्प की तरफ भी सोचने पर मजबूर कर देती हैं जिन्हें आप सामान्य हालात में सिरे से नकार सकते हैं. और कुछ नहीं तो शादी ही कर लेते हैं, भी वही बात है.’

शादी से पहले, करियर बना लेने की चाह रखने वाली इन लड़कियों की बातों पर गौर करें तो अंदाज़ा लगता है कि बीते कुछ समय से नारीवादी चिंतक लगातार यह आशंका क्यों व्यक्त कर रहे हैं कि कोरोना त्रासदी, फेमिनिज्म की सालों की कोशिशों को अनकिया कर कर सकती है. महिलाओं द्वारा अनपेड वर्क किए जाने के जिन आंकड़ों का जिक्र इस आलेख की शुरूआत में किया गया है, वह भी कोरोना त्रासदी के दौरान शादी में जल्दबाज़ी की वजह बनता दिखता है. यानी, अब कुछ लड़के या उनके परिवार वाले इसलिए भी जल्द शादी करना चाहते हैं ताकि लॉकडाउन जैसी स्थिति में घर का काम करने से उन्हें निजात मिल जाए. श्रेया बताती हैं कि ‘घरवालों के दबाव के चलते मैंने जिस एक लड़के से बात की. उसकी बातों से साफ अंदाज़ा लग रहा था कि वह अकेले रहने और घर के साथ-साथ ऑफिस का काम करते हुए तंग आ चुका है, और सिर्फ इसीलिए जल्दी से शादी कर लेना चाहता है. मैं खुद को अब घर का काम करते हुए नहीं देख सकती. पेरेंट्स को वो पसंद था. सोचिए, मेरे मां-बाप मेरी लाइफस्टाइल को ही बदल देना चाहते हैं. पूरी तरह ऐसा कैसे हो सकता है.’

लाइफस्टाइल बदले जाने और इस बारे में अपना मत घरवालों को न समझा पाने की बात नंदिनी और दीप्ति भी अपनी बातचीत में कहती हैं. नंदिनी कहती हैं ‘कई बार तो ताने भी सुनने को मिल जाते हैं कि भई, यहीं से गई हो तुम. अब तुम्हारी लाइफस्टाइल में ऐसे क्या बदलाव आ गए हैं जो तुम हमारे साथ या किसी के भी साथ एडजस्ट नहीं कर पाओगी.’ वहीं दीप्ति कहती हैं कि ‘हम आदतें या दिनचर्या बदल सकते हैं लेकिन सोच का क्या करेंगे. घर वालों से तो क्या कई बार वो हमारे पुराने दोस्तों से भी नहीं मिल पाती है. एक खास तरह की सोच और संवाद भी तो जीवनशैली ही है न.’ कहा जा सकता है कि जीवनशैली में बड़े बदलाव की मांग भी युवा महिलाओं को होने वाले तनाव की एक छोटी ही सही लेकिन वजह है.

कुल मिलाकर, कोरोना त्रासदी, तमाम लोगों के करियर और जीवन में महत्वपूर्ण हो सकने वाले छह महीनों को बेजा कर चुकी है लेकिन महिलाओं के मामले में यह नुकसान कई तरह से बड़ा है. अगर यह सिलसिला अगले एकाध साल तक और चलता है तो भारत में युवा महिलाओं की एक बड़ी संख्या सही मौकों से महरूम रह सकती है. यहां पर यह जानना थोड़ा चौंकाने वाला हो सकता है कि महिलाओं की इस स्थिति की भविष्यवाणी कोरोना त्रासदी शुरू होने के साथ ही की जा चुकी थी. लेकिन फिलहाल तो इस पर बात ही नहीं हो रही है, कुछ होने की उम्मीद करना बहुत दूर की कौड़ी है.