छोटी-बड़ी दुनिया

हम अपने को तरह-तरह से कितना ही क्यों न फैला लें हमारी वास्तविक दुनिया छोटी ही होती है. यह साहित्य के बारे में भी उतना ही सच है जितना अन्य कई अनुशासनों के बारे में. डॉक्टर, वकालत, धर्म, राजनीति आदि की दुनिया भी, कई बार बड़ी होने का छद्म करते हुए, होती छोटी ही है. इस छोटी दुनिया से बाहर, कई बार अलग, कई बार उससे बहुत नज़दीक, बड़ी दुनिया होती है. इन दो दुनियाओं के बीच संवाद, विसंवाद, तनाव-लगाव, द्वन्द्व-विवाद आदि कई तरह के रिश्ते होते हैं. दोनों का काम, एक-दूसरे के बिना, अकसर नहीं चलता.

ज़रूरी नहीं है कि छोटी होने के कारण किसी दुनिया का भूगोल संकीर्ण हो. वह अगर खुली-उदार, बहुलता के प्रति अभिमुख हो तो उसके संकीर्ण होने का कोई कारण नहीं होता. क्या आज हमारे साहित्य की छोटी दुनिया संकीर्ण होने से बची हुई व्यवस्था है? संकीर्ण होने से बचाव तभी मुमकिन है जब व्यापक साहित्य-समाज में संवाद, सहकार, खुलापन, दूसरों के लिए जगह हो. हिन्दी का साहित्य-समाज बारहा छुटभैयेपन पर उतर आता है. यह छुटभैयापन उन लेखकों को भी सहना पड़ता है जो उदारचरित और खुले, संवाद-प्रिय होते हैं. उनकी उदारता को छुटभैयापन अवमूल्यित या लांछित करने की कोशिश करता है.

कुछ लोगों की उदार वृत्ति, खुलापन साहित्य-समाज की संकीर्णता को दूर नहीं कर पाते और अकसर ऐसे लेखक इस छोटी दुनिया में निहत्थे, अकेले पड़ते जाते हैं. जैसे छुटभैये राजनीति-धर्म-मीडिया आदि में एक क़िस्म की फूहड़-भदेस लोकप्रियता पा लेते हैं, वैसा ही साहित्य में भी होता है. लोकप्रियता, ऐसे में, संकीर्णता को कम नहीं करती, उसे वैध और स्वीकार्य बनाने की चेष्टा करती है. दुर्भाग्य यह भी है कि हमारी छोटी दुनिया को नयी तकनीक ने व्यापक करने के उपाय सुलभ करा दिये हैं. यह बेहद फैल गयी दुनिया अपने सत्व में छोटी और संकीर्ण दोनों है. हमारे यहां साहित्य में जो सहभाव अन्तर्भूत है उसका कम से कम एक काम छोटी बड़ी दुनियाओं को साथ लाने का होना चाहिये. क्या हमारे समय में साहित्य इस सहभाव से दूर नहीं जा रहा है?

साहित्य की ज़िम्मेदारी

साहित्य को कोई ज़िम्मेदारी देता नहीं है, न राज्य, न समाज, न पाठक, न अन्य संस्थाएं जो उससे संबद्ध हैं जैसे कि प्रकाशक, शैक्षणिक संस्थान, अकादेमियां आदि. इन सभी की साहित्य से कुछ अपेक्षा होती है जिसे कई बार उसकी ज़िम्मेदारी समझ-मान लिया जाता है. कुछ ज़िम्मेदारी साहित्य को परम्परा से दी गई या उससे आ गयी मान ली जाती है: साहित्य को समाज का दर्पण होना चाहिये; साहित्य को समाज और समय को व्यक्त करना चाहिये; साहित्य को नैतिक होना चाहिये; उसे सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिये; उसे सामाजिक यथार्थ, व्यक्ति के अन्तर्जीवन आदि को अभिव्यक्त करना चाहिये. ये सभी अपेक्षाएं की जाती हैं, जिन्हें साहित्य की ज़िम्मेदारी मान लिया जाता है.

इनमें से कुछ का प्रभाव, दबाव या आतंक इतना होता है कि साहित्यकार स्वयं इन्हें अपनी ज़िम्मेदारी मानने लगता है. प्रायः साहित्य की भाषा के प्रति कोई ज़िम्मेदारी है या होती है इसका ज़िक्र, हिन्दी में, इस सिलसिले की सारी चर्चा में प्रायः नहीं होता है. इसकी भी कोई चर्चा नहीं के बराबर हुई है कि स्वयं समाज की साहित्य के प्रति क्या ज़िम्मेदारी है और वह कैसे-क्या निभायी जाती या जा रही है. इस पर भी बहुत कम विश्लेषण हुआ है कि साहित्य की उस सभ्यता के प्रति क्या ज़िम्मेदारी है जिसमें वह घटता, चलता-पुसता है. यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि इतिहास में ऐसे समय आते हैं जब समूची सभ्यता संकट में होती है. हमारा समय ऐसा ही समय है. तब यह आज साहित्य की ज़िम्मेदारी है कि वह सभ्यता-समीक्षा करे, सभ्यता-स्मृति को जागृत करे और सभ्यता-विवेक का पुनराविष्कार करे. यह जानना रोचक होगा, या शायद दुखद अचरज भरा, कि आज कितने लेखक अपनी रचना में इस सभ्यतामूलक अपेक्षा के प्रति सजग हैं.

हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते, कम-से-कम लेखक के रूप में, कि आज जब हमारी सभ्यता की बहुलता, भाषा, मूल्यों आदि का मुखर-आक्रामक अवमूल्यन हो रहा है और लेखक-वर्ग का एक बड़ा हिस्सा, बल्कि बहुसंख्यक हिस्सा इससे उदासीन है. इस वजह से इतिहास में यह दर्ज़ किया जायेगा कि साहित्य के एक बड़े हिस्से ने भारतीय सभ्यता के साथ विश्वासघात किया. उस मुक़ाम पर साहित्य की सफलता किसी लोकप्रियता-सम्प्रेषणीयता-सही राजनीति आदि के बल पर प्रमाणित नहीं हो पायेगी. कई बार सभ्यता के प्रति ज़िम्मेदारी समाज के प्रति ज़िम्मेदारी से कहीं बड़ी होती है, सिर्फ उसी तक सीमित नहीं.

साहित्य की जो भी ज़िम्मेदारी होती है वह साहित्य स्वयं तय करता है. यह भी न सिर्फ़ संभव है बल्कि वस्तुतः होता ही है कि अलग-अलग लेखक अलग-अलग, अपनी दृष्टि-संवेदना, स्वभाव के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारी तय करें. ज़िम्मेदारी लेने और उसके अनुसार आचरण करने में दूरी से तनाव आदि हो सकते हैं.

रंगदृष्टि का वितान

इस 16 अगस्त को नेमिचन्द्र जैन जीवित होते तो 101 बरस के हो गये होते. कविता, उपन्यास और साहित्य के अलावा नेमिजी को, उचित ही, हिन्दी में रंगमंच पर आधारित रंगालोचना का स्थपति माना जाता है. उनकी साहित्य-दृष्टि और रंगदृष्टि में गहरा संबंध है. उन्होंने ही सुरेश अवस्थी के साथ मिलकर नाटक को अकादेमिक पाठ की जकड़बन्दी से मुक्त कर रंगपाठ से उसकी नयी आलोचना की शुरूआत की थी. नेमिजी ने अपने जीवन के पचास वर्ष से अधिक रंगमंच की स्वतंत्र समावेशी सत्ता पर आग्रह करते बिताये. उन्होंने इस आग्रह को विशद और गहरे रंगचिन्तन से पुष्ट और समृद्ध किया. शाब्दिक भाषा से अलग रंग-भाषा का विश्लेषण और आकलन किया. आधुनिकता का एहतराम करते पर उससे अनाक्रान्त रहकर समवर्ती रंगमंच को शास्त्र, लोक और आधुनिकता की निरन्तरता में देखने-समझने का जतन किया. रंगालोचना के लिए नयी अवधारणाएं, पदावली आदि गढ़ी और उनका सक्षम और सूक्ष्म प्रयोग किया.

नेमिजी कई दशकों तक हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में नियमित रंगसमीक्षा लिखते रहे. उनके द्वारा स्थापित और अरसे तक संपादित पत्रिका ‘नटरंग’ उनकी रंगदृष्टि की ठोस अभिव्यक्ति और विकास का मंच भी रही. नाटक से संबंधित वह हिन्दी की सबसे दीर्घजीवी पत्रिका है, शायद समूचे भारतीय परिदृश्य में भी अकेली. ‘नटरंग’ ने रंगालोचना, नाट्यलेखन, हिन्दी रंगमंच और भारतीय रंगमंच के बीच निरन्तर संवाद के लिए अवसर और मंच जुटाये.

नेमिजी की रंगदृष्टि के निर्माण और विकास में उनका इप्टा में बिताये समय का सीधा अनुभव, उनका साहित्य का प्रेम और अध्ययन, संगीत नाटक अकादेमी में कार्य, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अध्यापन का लम्बा अनुभव, अनेक रंगनिर्देशकों जैसे हबीब तनवीर, इब्राहीम अलकाज़ी, शम्भु मित्र, राजिन्दर नाथ, ब व कारन्त आदि की रंगप्रस्तुतियाँ, बांग्ला-मराठी-कन्नड़ आदि की सजीव रंगपरम्पराएं, लोक नाट्य सम्पदा आदि तत्व शामिल हुए.

उन्होंने हिन्दी के अनेक कवियों और कथाकारों को हिन्दी में मौलिक नाटक लिखने की ओर प्रेरित-प्रोत्साहित किया जिनमें असग़र वज़ाहत, मृणाल पाण्डे, नन्दकिशोर आचार्य, दूधनाथ सिंह, रामेश्वर प्रेम आदि शामिल हैं. मध्यप्रदेश के कालिदास समारोह को प्रासंगिक बनाने के लिए उसके पुनराविष्कार में उनका हाथ था. मप्र में ही शुरू हुए रंगशिविरों में उनकी सलाह से ही अनेक युवा रंगनिर्देशक जैसे ब व कारन्त, बंसी कौल, एम के रैना, राजेन्द्र गुप्त, रामगोपाल बजाज आदि बुलाये गये.

भारत भवन के अन्तर्गत जो मध्यप्रदेश रंगमण्डल ब व कारन्त के निर्देशन में गठित हुआ उसकी स्थापना और विकास में नेमिजी की सक्रिय भूमिका थी. उनकी दृष्टि में रंगमंच में मानवीय उपस्थिति और सक्रियता जो तात्कालिक समग्रता पाती है वह अन्यत्र दुर्लभ है. निर्देशकों के पहले वर्चस्व से नेमिजी कभी प्रभावित नहीं हुए और उनका आग्रह अभिनेता की केन्द्रीयता पर था. उन्होंने रंगरूढ़ियों के अतिक्रमण का हमेशा स्वागत किया अगर उससे कोई सार्थक मानवीय अनुभव सम्भव होता हो. हिन्दी में अकेले जितना नेमिजी ने रंगमंच के लिए किया उतना शायद ही किसी और व्यक्ति ने किया होगा.