‘भारत और दुनिया के बाकी देशों में कोविड-19 के प्रकोप को देखते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और एक फंड बनाने की तत्काल जरूरत पैदा हो गई थी ताकि कोविड-19 पर लगाम लगाई जा सके. संकट की इस घड़ी में अगर पीएम केयर्स फंड नाम के एक पब्लिक चैरिटेबल ट्र्स्ट का गठन किया गया जिससे इस आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकें तो इस पर एतराज नहीं किया जा सकता.’

ये पंक्तियां सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की हैं जो उसने बीते मंगलवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. चर्चित संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की इस याचिका में मांग की गई थी कि पीएम केयर्स फंड का पैसा राष्ट्रीय आपदा राहत कोष यानी एनडीआरएफ में डाला जाए. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब इस तरह की आपदाओं के लिए एनडीआरएफ पहले से ही है तो एक अलग फंड बनाना गलत है.

लेकिन जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया. उसका कहना था कि वित्तीय योजना बनाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और कोई इस पर सवाल नहीं उठा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार, नागरिकों या विभिन्न संस्थाओं के लिए एनडीआरएफ में योगदान करने का विकल्प भी खुला है.

शीर्ष अदालत ने इस अनुरोध को भी खारिज कर दिया कि कोविड-19 से निपटने के लिए एक नई राष्ट्रीय नीति बनाई जाए. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि मौजूदा नीति न तो व्यापक है और न ही इसमें लॉकडाउन या कंटेनमेंट जैसे उन उपायों से जुड़े प्रावधान हैं जो कोविड-19 के चलते पहली बार देखने में आए हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र ने कई कदम उठाए हैं और किसी नई नीति की कोई जरूरत नहीं है. उसका कहना था, ‘भारत सरकार कोविड-19 के लिए एक नई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को तैयार करने, अधिसूचित करने और लागू करने के लिए बाध्य नहीं है.’

विपक्षी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताई है. कांग्रेस का कहना है कि पीएम केयर्स फंड के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जनता के प्रति सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए झटका है. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह भी कहा कि शासकों की मतदाताओं के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही के संदर्भ में यह एक दुखद दिन है.

उधर, भाजपा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनके इशारे पर चलने वाले एक्टिविस्टों के लिए झटका है. एक ट्टीट में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कहना था, ‘इससे पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके साथियों की बदनीयती और दुर्भावनापूर्ण कोशिशों के बावजूद सच की चमक कायम है.’ उन्होंने यह भी कहा कि अपने पापों को धोने के लिए कांग्रेस ने पीएम केयर्स फंड के खिलाफ झूठा अभियान चलाया.

इस तरह सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने पीएम केयर्स फंड को लेकर बहस फिर से गर्म कर दी है. पक्ष-विपक्ष के आरोपों और प्रत्यारोपों के इतर जाएं तो इस फंड पर तो कई सवाल हैं ही, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर भी सवाल उठते दिख रहे हैं. मसलन शीर्ष अदालत का कहना है कि कोविड-19 से उपजी परिस्थितियों से निपटने के लिए 2005 में बना और इस समय लागू राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम पर्याप्त है और किसी नई नीति की जरूरत नहीं है. तो फिर सवाल उठता है कि इसके लिए एक नए फंड की जरूरत भी क्यों है जब इसी कानून की धारा 46 के तहत एनडीआरएफ भी वजूद में है. यानी पीएम केयर्स फंड का गठन जिस उद्देश्य के लिए किया गया सिर्फ उसे पूरा करने के लिए ही देश में एनडीआरएफ पहले से ही है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आगे पढ़ने पर इस सवाल का जवाब मिलता है. शीर्ष अदालत का कहना है, ‘एनडीआरएफ और राज्यों में इसके समकक्ष एसडीआरएमएफ के लिए बने दिशा-निर्देशों में कोष का इस्तेमाल कुछ सीमित आपदाओं में करने की बात कही गई थी. इनमें जैविक और जनस्वास्थ्य के लिहाज से बनीं आपात परिस्थितियां शामिल नहीं थीं.’ सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ऐसे में कोई व्यक्ति या संगठन कोविड-19 जैसी चुनिंदा आपदाओं के लिए इस कोष में योगदान नहीं कर सकता था.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसके ठीक बाद शीर्ष अदालत ने खुद ही माना है कि 14 मार्च 2020 को जारी एक अधिसूचना के जरिये सरकार ने इसका इंतजाम कर दिया था. यानी इसके बाद कोविड-19 जैसी आपदा के लिए एनडीआरएफ में योगदान दिया जा सकता था. पीएम केयर्स फंड का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च को किया था. ऐसे में सवाल उठता है कि जब 14 मार्च को एनडीआरएफ में कोविड-19 के लिए स्वैच्छिक योगदान का प्रावधान हो गया था तो दो हफ्ते बाद इसी मकसद से पीएम केयर्स फंड का ऐलान क्यों किया गया? क्या यह संसद से पारित कानून की मूल भावना के खिलाफ नहीं है.

इस मामले में सरकार ने तर्क दिया और अदालत ने इसे मान भी लिया कि एनडीआरएफ के अस्तित्व में होने का मतलब यह नहीं है कि स्वैच्छिक योगदान के लिए किसी सार्वजनिक धर्मार्थ ट्र्स्ट का गठन नहीं किया जा सकता. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील थी कि पीएम केयर्स फंड एक स्वैच्छिक कोष है जबकि एनडीआरएफ के लिये बजट के माध्यम से भी पैसे का आवंटन किया जाता है और इस तरह दोनों कोष अलग हैं. लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या दोनों में यह फर्क होने से कोई फर्क पड़ता भी है? और पीएम केयर्स फंड के स्वैच्छिक होने पर भी सवाल उठ रहे हैं. सरकारी डॉक्टरों से लेकर दूसरे कर्मचारियों और विधानसभा सदस्यों तक ने यह आरोप लगाया है कि पीएम केयर्स फंड में योगदान के लिए उनका वेतन जबरन काटा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने यह दलील भी दी कि एनडीआरएफ के होने का मतलब कहीं से भी यह नहीं है कि किसी दूसरे स्वैच्छिक कोष में जमा हुआ पैसा इसमें ट्रांसफर कर दिया जाए, न ही इसकी कोई जरूरत है. शीर्ष अदालत ने भी यह बात मान ली. लेकिन यहां फिर वही सवाल है कि इस तरह के कोष की जरूरत ही क्या थी? माना कि सरकार को सार्वजनिक धर्मार्थ ट्र्स्ट बनाने का अधिकार है लेकिन अगर किसी काम के लिए एनडीआरएफ को उपयोग में लाया जा सकता था तो उसी काम के लिए पीएम केयर्स फंड को क्यों बनाया गया? क्यों पहले से ही मौजूद वैधानिक विकल्प के बावजूद जनता से पैसा लेने और उसे विभिन्न आपदाओं पर खर्च करने के लिए इस तरह की संस्था बनाई गई जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है? इस नई संस्था - पीएम केयर्स फंड - के गठन की अधिसूचना सरकार ने जारी की, इसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सदस्य सरकार में सबसे जिम्मेदार लोग हैं, यह चल प्रधानमंत्री कार्यालय से रही है, लेकिन सरकार इसे लोक प्राधिकारी यानी पब्लिक अथॉरिटी नहीं मानती है. यानी न तो इस पर सूचना का अधिकार लागू हो सकता है और न ही नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी सीएजी इसे ऑडिट कर सकता है.

पीएमओ के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) परवीन कुमार का पीएम केयर्स फंड से जड़ी जानकारियां मांगने वाले आरटीआई आवेदनों पर एक ही जवाब रहा है - ‘पीएम केयर्स आरटीआई एक्ट, 2005 की धारा 2(एच) के तहत पब्लिक अथॉरिटी नहीं है. पीएम केयर्स से जुड़ी संबंधित जानकारी pmcares.gov.in वेबसाइट पर देखी जा सकती है.’ लेकिन अगर कोई ट्रस्ट पब्लिक अथॉरिटी नहीं है तो यह उस पर या उसके ट्रस्टियों पर निर्भर करता है कि वे इसकी कौन सी जानकारी आपको देना चाहते हैं और कौन सी नहीं.

संविधान का अनुच्छेद 266 (2) साफ कहता है कि टैक्स जैसे राजस्व के माध्यमों के इतर जनता से सरकार के पास आने वाला कोई भी पैसा पब्लिक अकाउंट ऑफ इंडिया (भारत का लोक लेखा) में जाना चाहिए. उधर, सीएजी एक्ट की धारा 13(बी) में कहा गया है कि पब्लिक अकाउंट में हुए सारे लेन-देन का ऑडिट करना सीएजी का कर्तव्य है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में मोदी सरकार अलग फंड बनाने के बजाय एनडीआरएफ के जरिये ही जनता से पैसा लेती तो वह ज्यादा सही होता. या फिर वह पीएम केयर्स को पब्लिक अथॉरिटी मानने से परहेज नहीं करती. स्वाभाविक सी बात है कि अगर वह ऐसा करती और प्रधानमंत्री जनता से इन दोनों फंड्स में से किसी एक में योगदान करने की अपील करते तो पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े तमाम सवाल उठते ही नहीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसीलिए सवाल उठ रहा है कि अगर पीएम केयर्स फंड आरटीआई या सीएजी के दायरे में नहीं आता तो उसे ऐसा बनाया क्यों गया है?

अब सरकार और सुप्रीम कोर्ट भले ही कह रहे हों कि एनडीआरएफ में स्वैच्छिक दान देने का विकल्प खोल दिया गया है, लेकिन यह सवाल तो है ही कि ऐसा आरटीआई और अदालती मामलों का एक सिलसिला शुरू होने के बाद ही क्यों किया गया. और कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि जब प्रधानमंत्री से लेकर पूरी सरकार के प्रचार तंत्र का जोर सिर्फ पीएम केयर्स फंड पर हो तो भला एनडीआरएफ की कितनी पूछ होगी.

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर्स फंड के लिए बने ट्रस्ट को सही ठहराते हुए यह भी कहा है, ‘ट्रस्ट का जिम्मा ट्रस्टियों यानी कुछ लोगों के एक समूह के पास है, सिर्फ इस तथ्य के चलते ट्रस्ट के सार्वजनिक स्वरूप को अनदेखा नहीं किया जा सकता.’ यानी शीर्ष अदालत एक तरह से मानती दिखती है कि पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट होने का मतलब है कि सब ठीक है. लेकिन यहां सवाल यह है कि पीएम केयर्स फंड सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भले बनाया गया हो लेकिन इसकी कार्यशैली एक सार्वजनिक संस्था जैसी नहीं है. इसके निर्णय मनमाने ढंग से चंद लोग ले सकते हैं, इससे जुड़ी सभी जानकारियां सार्वजनिक नहीं हैं और उन्हें जानने का कोई आरटीआई जैसा एवं उसकी कमियां निकालने का कोई सीएजी ऑडिट जैसा तरीका भी नहीं है. और ऐसे ट्रस्टों के दुरुपयोग के भी तमाम उदाहरण वक्त-वक्त पर हमारे सामने आते ही रहे हैं.

पीएम केयर्स फंड के पीछे एक तर्क यह दिया जा सकता है कि इस समय हालात असाधारण हैं और ऐसे में जरूरी था कि कागजी औपचारिकताओं में समय न गंवाते हुए पैसे या उससे खरीदे गए संसाधनों को जल्द से जल्द जरूरत की जगह पर पहुंचाया जाए. एक पब्लिक ट्रस्ट में यह काम आसानी से हो सकता है. क्योंकि किसी पब्लिक अथॉरिटी में किसी भी निर्णय के लिए एक प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है जबकि ट्रस्ट में किसी भी फैसले को लेने के लिए सिर्फ ट्रस्टियों के दस्तखत की जरूरत होती है.

लेकिन यहीं एक गंभीर सवाल भी पैदा होता है कि अगर पीएम केयर्स में कोई भी निर्णय लेना इतना ही आसान है और इस पर उस तरह की निगरानी भी नहीं है तो क्या इसका दुरुपयोग नहीं हो सकता? जैसा कि नाम न छापने की शर्त पर कानूनी मामलों के एक विशेषज्ञ कहते हैं, ‘हो सकता है और आज नहीं तो कल हो सकता है. यह एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है तो इसके संचालन से जुड़े नियम भी जब चाहे बदले जा सकते हैं क्योंकि इन्हें बदलना ट्रस्टियों के हाथ में ही है. आज प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष हैं. कल को ट्रस्टी चाहें तो नियम बदलकर किसी को उसकी व्यक्तिगत क्षमता में भी इसका अध्यक्ष बनाया जा सकता है. अब मान लीजिए कल कोई अपात्र इसके चेयरमैन पद तक पहुंच जाए तो बस साइन की ही तो बात है. कौन पूछने वाला है कि किसी को कितना भी पैसा क्यों दिया. इस तरह की संभावनाएं तो खुली हैं ही.’

यहां एक तर्क यह भी दिया जा सकता है कि लोकतंत्र में सरकारें तो आती-जाती ही रहती हैं. इसलिए उसे चलाने वाली संस्थाएं और प्रक्रियाएं ऐसी होनी चाहिए कि उनका कोई दुरुपयोग न किया जा सके. पीएम केयर्स फंड के मामले में अगर यह मान भी लिया जाए कि वर्तमान सरकार साफ नीयत से काम कर रही है और आगे भी करेगी, लेकिन क्या इंस फंड के स्वरूप ने भविष्य में इसके दुरुपयोग की आशंका को जन्म नहीं दे दिया है?

इससे जुड़ा एक बड़ा सवाल यह भी है कि यथोचित विकल्प होते हुए भी पीएम केयर्स फंड के गठन से क्या एक गलत परंपरा शुरू होने की आशंका ने भी जन्म नहीं लिया है? भविष्य में केंद्र में किसी दूसरी पार्टी की सरकार आ जाए और वह किसी दूसरे उद्देश्य के लिए ऐसा ही कोई पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट खोल ले जो पारदर्शी और किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हो तो भाजपा किस आधार पर उसे गलत कहेगी? ऐसा ही राज्य सरकारें भी करने लगें तो क्या होगा?

लोकतंत्र में अदालती फैसलों का अहम महत्व इसलिए भी होता है कि वे नजीर की तरह काम करते हैं. क्या पीएम केयर्स फंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख ने एक चिंताजनक नजीर कायम नहीं कर दी है? माना कि सरकारें किसी भी उद्देश्य के लिए कितनी भी संस्थाएं बना सकती है लेकिन अगर उनमें पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव हो तो उन्हें सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है?

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