‘सुप्रीम कोर्ट के पांच जज कह चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को निराश किया है और प्रशांत भूषण ने भी अपने ट्वीट्स में यह बात कही है. दूसरी बात, सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने कहा है कि शीर्ष न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है. इनमें से दो ने यह टिप्पणी तब की जब वे कुर्सी पर थे. सात ने यह बात अपने रिटायरमेंट के तुरंत बाद कही. मेरे पास उन सबके ये बयान हैं. मैंने खुद 1987 में भारतीय विधि संस्थान में एक भाषण दिया था...’

ठीक यहीं पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को रोक दिया. यह बीते हफ्ते की बात है. जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अदालत अटॉर्नी जनरल से मामले के गुण-दोष के बारे में नहीं जानना चाहती. मामला सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का था जिसमें वह चर्चित अधिवक्ता प्रशांत भूषण को दोषी ठहरा चुका है. इससे पहले अटॉर्नी जनरल अदालत से अपील कर चुके थे कि प्रशांत भूषण को सजा न दी जाए. उनका यह भी कहना था कि बतौर वकील प्रशांत भूषण ने बहुत अच्छे काम किए हैं.

लेकिन अदालत इस दलील से सहमत नहीं थी. जस्टिस अरुण मिश्रा का कहना था कि अच्छे काम का हवाला देकर गलत काम को ढका नहीं जा सकता. लेकिन जब अटॉर्नी जनरल ने यह बताना शुरू किया कि सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व जज और वे खुद भी ऐसा ही कर चुके हैं तो शीर्ष अदालत ने उन्हें आगे बोलने ही नहीं दिया. अदालत ने कहा कि केके वेणुगोपाल का बयान तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा जब तक प्रशांत भूषण अदालत के सामने दिए गए अपने बयान पर पुनर्विचार नहीं करते. इस बयान में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा था कि उन्होंने जो कहा है वह सोच-समझकर कहा है और अदालत इसके लिए उन्हें जो चाहे सजा दे सकती है.

असल में जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही का नोटिस भेजा था तब न्यायालय की अवमानना कानून 1971 के तहत एक नोटिस अटॉर्नी जनरल को भी भेजा गया था ताकि वे इस मामले में अदालत की मदद कर सकें. बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट में अपने बयान से पहले केके वेणुगोपाल अपनी लिखित राय शीर्ष अदालत को सौंप चुके थे और उसमें भी उन्होंने प्रशांत भूषण को कोई सजा न देने की सलाह दी थी.

अटॉर्नी जनरल के इस रुख ने एक बड़े वर्ग को चौंकाया है. इसकी वजह यह है कि राज्यपाल की तरह संवैधानिक पद होने के बावजूद अटॉर्नी जनरल को राज्यपाल की तरह ही केंद्र सरकार का आदमी माना जाता है. वह सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार और सुप्रीम कोर्ट में उसका सबसे बड़ा वकील होता है. उसकी नियुक्ति भले ही राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन जैसा कि बाकी ऐसी नियुक्तियों के मामले में होता है इसकी सिफारिश केंद्र सरकार करती है. यही वजह है कि संविधान में भले ही अटॉर्नी जनरल का कार्यकाल तय न हो लेकिन अक्सर केंद्र की सरकार बदलने पर उसे भी बदल दिया जाता है. यहां पर एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए उन अटॉर्नी जनरल को किसी भी अदालत में सुने जाने का अधिकार देता है जिन्हें सर्वोच्च अदालत ने बीच में ही चुप करवा दिया था.

रफाल सहित तमाम मामलों में प्रशांत भूषण मोदी सरकार के लिए सिरदर्द बनते रहे हैं. इससे पहले जब वे आम आदमी पार्टी में थे तब भी भाजपा और उसकी सरकार के लिए सरदर्द बने रहा करते थे. इसलिए कई लोग मान रहे थे कि अटॉर्नी जनरल अवमानना के इस मामले में उनके लिए सजा के पक्षधर होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. केके वेणुगोपाल ने प्रशांत भूषण को सजा न देने की अपील तो की ही, अदालत के सामने उन्हीं बातों को भी दोहरा दिया जिनका जिक्र प्रशांत भूषण ने भी किया था.

सवाल है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. अलग-अलग लोग इसके अलग-अलग जवाब देते हैं. द वायर में अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार वी वेंकटेशन कहते हैं, ‘अटॉर्नी जनरल इस मौके पर केंद्र सरकार के वकील के बजाय अपने पद के (वृहत्तर) दायित्व के हिसाब से काम कर रहे थे.’ यानी वे प्रशांत भूषण के मामले में देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होने की अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे थे जिसका काम सरकार या सुप्रीम कोर्ट को खरी सलाह देना है, भले ही यह उसे भाए या नहीं.

आज के राजनीतिक माहौल में यह सुनकर हैरानी हो सकती है, लेकिन ऐसे उदाहरण अपवाद के तौर पर ही सही, पर रहे हैं. मसलन देश के पहले अटॉर्नी जनरल एमसी सीतलवाड़ (1950-1963) न्यायिक प्रशासन से जुड़े मामलों में खुलकर जवाहरलाल नेहरू सरकार की आलोचना करते थे. इसके चलते यह नौबत आ गई थी कि तत्कालीन कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने कानून मंत्री और अटॉर्नी जनरल के पद के विलय तक का प्रस्ताव दे दिया था. लेकिन इसका भारी विरोध हुआ क्योंकि अटॉर्नी जनरल का अलग पद बनाने का उद्देश्य ही यही था कि सरकार को कानूनी मामलों में एक निष्पक्ष और अराजनीतिक सलाह मिले.

उधर, बीबीसी से बातचीत में संविधान संबंधी मामलों के जानकार और वरिष्ठ अधिवक्ता संग्राम सिंह का मानना है कि प्रशांत भूषण के मामले में केके वेणुगोपाल का रुख बार और बेंच के बीच का मामला है जिसमें कभी-कभी टकराव हो जाता है.’ असल में बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) अवमानना के इस मामले में प्रशांत भूषण के साथ खड़ी है. अपने बयान में उसका कहना है, ‘ऐसे समय में जब नागरिक बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तो आलोचनाओं से नाराज़ होने की बजाय उनकी जगह बनाये रखने से उच्चतम न्यायालय का कद बढ़ेगा.’ केके वेणुगोपाल लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट के वकील रहे हैं. यही वजह है कि कुछ लोग प्रशांत भूषण के मामले में उनके रुख को बिरादरी के भाव से भी प्रेरित मानते हैं.

और यह बिरादरी के व्यवहार से भी झलक जाता है. 41 बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को एक चिट्ठी लिखकर एक ‘बेहद सम्मानित’ अटॉर्नी जनरल की मौजूदगी के प्रति ‘पूरी तरह से असम्मान’ दिखाने को लेकर अपनी निराशा जताई है. इनमें राजू रामचंद्रन और डेरियस खंबाटा जैसे दिग्गज भी शामिल हैं जो एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं. असल में अदालत ने अटॉर्नी जनरल को बोलने से तो रोका ही, दिन भर की कार्रवाई के रिकॉर्ड में से उनका जिक्र तक गायब कर दिया गया. इन सभी वकीलों का यह भी कहना है कि प्रशांत भूषण के मामले पर एक बड़ी बेंच में विचार होना चाहिए.

इसके अलावा 450 से ज्यादा वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को एक चिट्ठी लिखकर प्रशांत भूषण को लेकर शीर्ष अदालत के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की महानता में किसी आलोचना से उतनी कमी नहीं आई जितनी प्रशांत भूषण की आलोचना पर दी गई उसकी प्रतिक्रिया से आई है.

इस सबका नतीजा यह है कि इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट खुद को बुरी तरह उलझाता दिख रहा है. आलम यह है कि माफी मांगने से साफ इनकार करते हुए प्रशांत भूषण लगातार कह रहे हैं कि वे कोई नरमी नहीं चाहते और अदालत उन्हें सख्त से सख्त सजा दे. लेकिन अदालत कह रही है कि वे सोचने के लिए थोड़ा और समय ले लें. इससे ऐसा लग रहा है कि शीर्ष अदालत के लिए न उगलते और न निगलते बनने वाली स्थिति हो गई है. जैसा कि एन वेंकटेशन कहते हैं, ‘प्रशांत भूषण, जिन्हें पिछले हफ्ते अपने दो ट्वीट्स के लिए अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया जा चुका है, की सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से सुनवाई हुई उससे हैरानी होती है. क्या दोषी से ज्यादा अदालत सजा सुनाए जाने से बचना चाहती है?’

इसके चलते बहुत से लोग मानते हैं कि अब नतीजा जो भी आए, शीर्ष अदालत की प्रतिष्ठा पर एक और चोट पड़ना तय है. उनके मुताबिक अगर प्रशांत भूषण को सजा हुई तो सुप्रीम कोर्ट की आलोचना होगी और अगर नहीं हुई तो भी एक बड़े वर्ग में उसकी किरकिरी होना तय है क्योंकि वह इस चर्चित अधिवक्ता को पहले ही दोषी ठहरा चुका है.

अवमानना के इस मामले में प्रशांत भूषण को वकीलों का ही नहीं बल्कि पूर्व जजों का भी समर्थन मिल रहा है. कुछ दिन पहले उनके समर्थन में जो हस्ताक्षर अभियान चलाया गया उस पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 13 पूर्व जजों ने भी दस्तखत किए थे. बीते महीने भी कई पूर्व जजों सहित 131 हस्तियों ने प्रशांत भूषण के समर्थन में बयान जारी किया था. पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने भी हाल में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इस कदर जल्दी दिखाकर दूसरे पक्ष को उसके अधिकार से वंचित किया है.

इसके अलावा सिविल सोसायटी से जुड़े संगठनों ने भी प्रशांत भूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख की आलोचना की है. मसलन कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव ने अपने एक बयान में कहा है, ‘न्यायपालिका में जनता का भरोसा जनता के अधिकार सुनिश्चित करने से बनता है, अवमानना के कानून का इस्तेमाल करने से नहीं और वह भी ऐसे समय पर जब महामारी के चलते अदालत की गतिविधियां पहले से ही सीमित हैं और कई अहम मामलों की सुनवाई नहीं हो रही.’ दिलचस्प बात है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन बी लोकुर और दिल्ली और मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह इस संगठन के एक्जीक्यूटिव बोर्ड में शामिल हैं.

अकादमिक जगत की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं. द इंडियन एक्सप्रेस में अपने एक लेख में हैदराबाद स्थित नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा कहते हैं, ‘11 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चार सबसे वरिष्ठ जजों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इसमें उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायपालिका की विश्वसनीयता दांव पर है. उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका एक सफल लोकतंत्र की कसौटी है और इसके बिना लोकतंत्र नहीं बच सकता. सुप्रीम कोर्ट ने तब खुद और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर लगा इतना बड़ा आरोप सह लिया. अब वह एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता के ट्टीट की उपेक्षा नहीं कर पा रहा.’

इसके अलावा कई राजनेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है. शशि थरूर से लेकर सीताराम येचुरी और डी राजा तक अलग-अलग पार्टियों से ताल्लुक रखने वाले इन राजनेताओं का मानना है कि प्रशांत भूषण देश की सर्वोच्च अदालत के जमीर को जगाए रखने वाले शख्स हैं और उनके खिलाफ इस फैसले का अभिव्यक्ति और असहमति की आजादी पर बहुत बुरा असर होगा.

इसके अलावा इस प्रकरण के दौरान अवमानना को लेकर अतीत में सुप्रीम कोर्ट की उदारता के उदाहरण भी दिए जा रहे हैं. मसलन 1999 की वह घटना जब आउटलुक पत्रिका में छपा अरुंधति रॉय का एक लेख विवाद का कारण बन गया था. बुकर विजेता इस चर्चित लेखिका ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की थी जिसमें नर्मदा पर बन रहे सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने पर लगी रोक हटा दी गई थी. इस मामले में भी अवमानना की मांग हुई. लेकिन अरुंधति रॉय के लेख पर नाखुशी और इससे असहमति जताने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने से इनकार कर दिया. शीर्ष अदालत के तत्कालीन जस्टिस एसपी भरुचा का कहना था, ‘अदालत के कंधे इतने विशाल हैं कि ऐसी टिप्पणियों से उस पर फर्क नहीं पड़ता और फिर यह बात भी है कि इस मामले में हमारा ध्यान विस्थापितों के पुनर्वास और राहत के मुद्दे से भटकना नहीं चाहिए.’ सवाल उठ रहा है कि अब उन विशाल कंधों को क्या हो गया है.

यानी देखा जाए तो प्रशांत भूषण के मामले में हर तरफ से सुप्रीम कोर्ट पर एक तरह का नैतिक दबाव बन गया है. जानकारों के मुताबिक यही वजह है कि उसने प्रशांत भूषण को दोषी मान लेने के बाद भी उनकी सजा पर राय लेने के लिए अटॉर्नी जनरल को अदालत में बुलाया. यह अलग बात है कि इससे बात और उलझती दिख रही है. अब सबकी नजरें कल के दिन पर हैं जिसे शीर्ष अदालत ने प्रशांत भूषण को सजा सुनाने के लिए मुकर्रर किया है.