हिन्दूत्व का हिन्दू अन्य

इस नतीजे से बचना मुश्किल है कि इस समय हिन्दू समाज में जो हिंसा-हत्या-बलात्कार-झूठ की व्याप्ति है, दूसरों के प्रति जो घृणा है, लगातार बढ़ती और बढ़ायी जाती हुई, वह सभी प्रमाण है कि हिन्दू समाज बुरी तरह से टूट रहा है. हिन्दू सामाजिक संरचना में जो लगभग अपराजेय श्रेणीबद्धता है, उसमें, फिर भी, पारंपरिक रूप से ‘अन्य’ की जगह थी और उसकी भिन्नता का स्वीकार था. उसकी सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि में एक समृद्ध करने वाला अन्तर्विरोध रहा है. कई काल ऐसे रहे हैं जिनमें यह आध्यात्मिक दृष्टि सामाजिक विषमता को अतिक्रमित करने में सफल रही. धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने पर अल्पसंख्यक वर्ग का अधिकांश भारत में ही रहा और बहुसंख्यक हिन्दू समाज ने धर्मों से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक ढांचा चुना जिसमें बहुलता और विभिन्नता की जगह और सम्भावना थी. दशकों तक यह लोकतांत्रिक वृत्ति सार्थक और सजीव रही, भले उसको अस्वीकार कर कट्टरता और संकीर्णता की वृत्तियां भी समान्तर सक्रिय रही आयीं.

लोकतंत्र के ढांचे में अवस्थित होने के बावजूद हिन्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता-समता-न्याय के संवैधानिक धर्म से अपने को अलग करता रहा. अब वह हिस्सा हिन्दुत्व के रूप में संगठित, आक्रामक और सक्रिय होकर लोकतंत्र पर ही छा गया है. उसमें स्वयं हिन्दू परंपरा की आध्यात्मिक दृष्टि की कोई पहचान शेष नहीं. उसने सारे अध्यात्म को, हिन्दू चिन्तन को अनुष्ठानों में महदूद कर दिया है. मुख्यतः हिन्दी अंचल में हिन्दुत्व की शक्तियां बहुत प्रबल हो गयी हैं जहां स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद भी सामाजिक सुधार के कोई व्यापक आंदोलन नहीं हुए. जो हुए भी, जैसे प्रगतिशीलता और जनवाद के आन्दोलन, उनकी हिन्दू समाज में कोई पैठ नहीं थी. वे साहित्य के आन्दोलन थे और हैं और उनकी व्याप्ति वहीं तक है. दलित वर्ग के उभार ने भी हिन्दू समाज में, कम से कम हिन्दी क्षेत्र में, कोई रेडिकल सामाजिक चिन्तन और सुधार सम्भव नहीं किया.

यहां अब यह पहचान तक बाक़ी नहीं रही है कि हिन्दुत्व हिन्दू धर्म का विद्रूप है. वह पाकिस्तान को अपना ‘अन्य’ मानकर अपने को परिभाषित कर रहा है और उसमें अपना स्वायत्त आत्मबोध नहीं है. ‘दूसरों’ के प्रति घृणा उपजाये और बढ़ाये बिना हिन्दुत्व की कोई गति नहीं है. स्वतंत्रता और विभाजन के बाद जिस समाज ने लोकतंत्र चुना था और हिन्दू राष्ट्र बनना अस्वीकार किया था वह अब उस और ठेला जा रहा है. पाकिस्तान की धार्मिक कट्टरताओं को इस पर प्रसन्न होना चाहिये कि भारत अब उसका प्रतिरूप बनने की कोशिश में लगा है. इधर अल्पसंख्यक वर्ग ने मन्दिर के शिलान्यास पर चुप्पी साध रखी है और उसे सान्त्वना के रूप में दी गयी ज़मीन पर मसजिद ही नहीं अस्पताल भी बनाने का फ़ैसला कर कट्टरता को माकूल जवाब दिया है.

मन्दिर के शिलान्यास को लेकर हिन्दू समाज में जो धूम-धड़ाका होने की उम्मीद और कोशिश थी, वैसा नहीं हुआ जान पड़ता है. कोरोना महामारी के दौरान जिसके मामलों की संख्या 32 लाख पार कर चुकी है, शिलान्यास अगर हिन्दू समाज को बड़ी संख्या में अनुत्तेजित नहीं कर पाया है तो उसका क्या आशय है? शायद यह है कि हिन्दू समाज में अब हिन्दुत्व का अपना ‘अन्य’ आकार ले रहा है. पर शक यह भी होता है कि शायद बहुसंख्यक हिन्दू भयातुर हैं और इसलिए चुप हैं. जो भी हो, अगर हिन्दू समाज को भारतीय परम्परा और चिन्तन, आधुनिक लोकतंत्र के वाहक और पोषक के रूप में बने रहना है तो उसमें यह ‘अन्य’ अवश्यम्भावी हो जाता है. अगर कोई समाज पूरी तरह से सड़-गल न गया हो तो उसमें अपनी ऐतिहासिक निर्णायकता के अनुरूप ऐसी उपज हो सकना चाहिये. अभी यह कहना मुश्किल है कि हिन्दू समाज के मध्यवर्ग का कोई सर्जनात्मक और विचारशील हिस्सा ऐसी ‘अन्यता’ अर्जित करने के लिए सचेष्ट हो सकता है.

संवादक्षीण समय में संवाद

यह लगभग एक कलीशे बन गया है कि हमारे समय में संवाद बहुत क्षीण पड़ गया है. संवाद के बड़े मंच जैसे संसद, इलेक्ट्रोनिक मीडिया आदि संवाद के कम झगड़े के मंच अधिक हो गये हैं. सार्वजनिक जीवन में नित-नये ‘दूसरे’ गढ़े जा रहे हैं और दूसरों से संवाद करना ज़रूरी रह गया है. ज़रा-ज़रा सी बात पर हम दूसरों पर हमलावर होते हैं, संवाद कर उन्हें समझने-समझाने के बजाय. यह सिर्फ़ लोकतंत्र का शिथिल पड़ना भर नहीं है: यह भारतीय परम्परा से विरत होने के बराबर है. हमें जैसे यह याद ही नहीं रह गया है कि भारतीय परम्परा में लोक और शास्त्र दोनों ही स्तरों पर लगातार संवाद होते रहे हैं: याज्ञवल्क्य-गार्गी, शंकराचार्य-मंडन-मिश्र, नचिकेता-यम, काकमुशुण्डि-गरुड़, व्यास-शुकदेव-संवाद, युधिष्ठिर-यक्ष संवाद आदि ढ़ेर से प्रसंग है जो आज की स्मृति से लोप हो चुके. लोप तो गांधी-नेहरू, गांधी-अम्बेडकर, गांधी-जिन्ना संवाद भी हो चुके.

अमरीकी आलोचक हेलेन वेण्डलर की एक पुस्तक ‘इनविजीबिल लिसनर्स’ पढ़ रहा था. उस की मूल स्थापना यह है कि कविता किसी-न-किसी तरह का संवाद होती है. उन्होंने विस्तार से तीन कवियों जार्च हर्बर्ट, वाल्ट विटमैन और जान एशबरी की काव्यात्मक अंतरंगता का विशद विश्लेषण किया है. जार्ज हर्बर्ट का संवाद ईश्वर से, विटमेन का भविष्य के पाठक और एशबरी का संवाद रेनेसां के एक इतालवी चित्रकार से होता है. पुस्तक पढ़कर मुझे लगा कि ऐसे संवाद हम अपने कई कवियों के यहां सहज ही देख-सुन सकते हैं. कई बार वे जिस से संवाद कर रहे होते हैं वह श्रोता अदृश्य होता है पर कविता में उपस्थित अनुभव की जा सकती है. यह उपस्थिति कविता की संरचना को गहरे प्रभावित करती है.

मुक्तिबोध का संवाद प्रायः अपने आत्म से होता है जिसे वे आत्माभियोग की यंत्रणादायी हद तक ले जाते हैं. शमशेर बहादुर सिंह की कविता, ख़ास कर प्रेमकविता, एक असम्भव प्रेमिका से संवाद है. रघुवीर सहाय कभी तो सीधे पाठकों को संबोधित करते हैं जिनकी लोकतांत्रिक वृत्ति के सजग होने का उन्हें यक़ीन है और कभी वे लोकतंत्र मात्र को संबोधित करते लगते हैं. विजय देवनारायण साही विशेषतः ‘साखी’ की अपनी कुछ कविताओं में कबीर से संवादरत हैं जैसे कि, याद आता है, कबीर अपने समय में साधुओं से संवादरत थे. अज्ञेय कविता में ममेतर को रचने और उससे संवाद करते हैं.

यह तर्क भी दिया जा सकता है कि कविता मात्र भाषा के साथ कवि का संवाद होती है. यह संवाद एक ओर कवि को गढ़ता है तो दूसरी ओर स्वयं भाषा को रूपायित करता है. (शायद त्रिलोचन जीवन भर कविता में भाषा से संवाद करते रहे) यह भी कहा जा सकता है कि महत्वपूर्ण कविता में भाषा से कवि का यह संवाद जितना अन्तरंग होगा, कविता में उतनी ही आत्मीय सचाई और अन्तरंग गरमाहट होगी. कई बार, जैसा कि वेण्डलर ने कहा है, कवि कविता में इस संवाद द्वारा ऐसी आत्मीयता और निकटता पा लेता है जो उसके वास्तविक जीवन में सम्भव नहीं हो पाती.

कम से कम हमारी कविता का एक बड़ा हिस्सा प्रकृति से संवाद करता रहा है. इन दिनों हम भले बड़ी निमर्मता से अपने प्राकृतिक पर्यावरण को विकास की झोंक में लगातार क्षत-विक्षत कर रहे हैं पर हमारी परम्परा तो प्रकृति से संवाद और तादात्म्य की रही है. वह संवाद अब तक कविता में अबाध है. हम अपनी कविता में बार-बार जानते हैं कि प्रकृति से संवाद में जो अवरोध आ रहे हैं, वे हमारी मानवीयता में भी आने वाले अवरोध हैं.

व्यंजना का समय

हमारा समय दुर्भाग्य से लगातार ऐसा समय होता जा रहा है जिसमें वे सभी शक्तियां, जिनका लोकतांत्रिक और संवैधानिक कर्तव्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने का है, उस स्वतंत्रता में कटौती करने का माध्यम बन गयी हैं. इनमें सरकारें, पुलिस, अदालतें, मीडिया, विश्वविद्यालय आदि शामिल हैं. किसी तरह की आलोचना अब हमारे नज़दीक बरदाश्त के क़ाबिल नहीं रह गयी है. चूंकि हमारे पास बहुमत है, सत्ता है, धर्मशास्त्र है, अधिकार हैं, धन-बल, आचरण-संहिता आदि हैं, हम मनमाने ढंग से नागरिक अभिव्यक्ति और आलोचना को दबा-दण्डित-बाधित आदि कर सकते हैं. ऐसे अतिचार के लिए उत्साह इधर तेज़ी से उफनने लगा है. एक होड़ सी है कि कौन कितनों को रोकता-थामता, लांछित-दण्डित करता है.

ये सभी दमनात्मक कार्रवाइयां, कुल मिलाकर और ज़्यादातर, सीधे-सीधे जो कहा जाता है उसे ही याने अभिधा को ही ग्रहण कर पाती हैं. यह उनकी भाषिक क्षमता और इसलिए वैचारिक सामर्थ्य के सतहीपन का ही इज़हार है. जिस दोटूकपन का आग्रह अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए किया जाता रहा है, वह यहां अपने व्यापक विद्रूप में देखा जा सकता है. जब समाज में इतना चरम ध्रुवीकरण हो गया हो जितना कि इस समय भारतीय समाज में हो गया लगता है, तब बीच की कोई जगह नहीं बचती, न बची है. इस विडम्बना-भरी स्थिति में अपनी बात कहने और फिर भी कुछ ख़तरों से बच जाने की हिकमत आसानी से नहीं सूझती. हमें इतिहास में, बल्कि बीसवीं शताब्दी में, कुछ सख़्त-निर्मम तानाशाहियों में कई कवियों ने क्या उपाय किये इससे कुछ सबक मिल सकता है.

मध्य यूरोप के कई देशों ने साम्यवादी तानाशाही के दौर में अपने ऐतिहासिक विडम्बना-बोध को सक्रिय रहते हुए भी कविता में व्यंजना द्वारा एक तरह का सत्याग्रह किया था. सत्ताएं अभिधा ही समझती हैं और व्यंजना की बारीकियां उनकी पकड़ में नहीं आतीं. इस युक्ति का सहारा लेते हुए इन कवियों ने व्यंजना का सहारा लिया. यही नहीं कई पुराने क्लैसिक नाटकों को रंगकर्मियों ने ऐसे पेश किया कि श्रोता उसकी समकालीन प्रासंगिकता बखूबी समझ पाते थे जबकि नाटकों का परिवेश मध्यकालीन, प्राचीन, ग्रीक आदि होता था. कविताओं में कई बार समकालीन स्थिति की विडम्बना और अमानवीय क्रूरता को व्यंजित किया जाता था, मिथकों या ऐतिहासिक प्रसंगों द्वारा.

यहां यह याद रखना चाहिये कि सत्तारूढ़ शक्तियां भी अपनी वैधता के लिए ऐतिहासिक-पौराणिक प्रसंगों का, मनचाही दुर्व्याख्या कर, दामन थामती हैं. ऐसे समय में कविकौशल में एक तरह का कवि चातुर्य भी हो यह ज़रूरी लगता है. यह सच को सीधे न कहकर व्यंजित करना है. अभिधा सच को साफ-साफ कहने का एक मात्र तरीका नहीं है जैसे यथार्थवाद सिर्फ़ एक विधि है और यथार्थ को ग़ैरयथार्थवादी तरीके से भी प्रस्तुत किया जा सकता है, किया गया है. कविता की एक कठिनाई यह भी है कि उसका सच परिणत सच नहीं होता. वह ज़्यादातर प्रक्रिया में होता है. इस प्रक्रिया में अभिधा से अधिक व्यंजना सहायक होती है: सच धीरे-धीरे रूपायित होता है और स्वयं पाठक उसकी खोज और रचना में सहभागी होता है. इसलिए उस सच को, उसकी जटिलता और सूक्ष्मता में, पाठक अधिक टिकाऊ ढंग से आत्मसात् कर पाता है. यह आत्मसात् होने वाला कविता का सच, अन्ततः, पाठक में उसके नैतिक विवेक और संवेदना को जगाता-पोसता है. कविता की राजनैतिक ज़िम्मेदारी क्या-कैसी हो इस पर अरसे से विवाद होता रहा है पर कविता की नैतिक ज़िम्मेदारी भी होती है अनिवार्यतः और शायद व्यंजना उसे बेहतर निभाती है.