एक वक्त था जब टीवी न्यूज मीडिया गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए सच की लड़ाई भी लड़ता था. याद आता है कि 1999 में हुए जेसिका लाल मर्डर केस में पहले तहलका और फिर एनडीटीवी ने मनु शर्मा को सजा दिलाने के लिए जेसिका की बहन सबरीना लाल का आखिर तक साथ दिया था. 2006 के आखिर में जब दिल्ली हाई कोर्ट ने मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा सुनाई थी तब मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस में एक ताकतवर नेता थे. ये लड़ाई आज भी सत्ता के खिलाफ सच के खड़े रहने के उदाहरण के तौर पर याद रखी जाती है. कोई मीडिया संस्थान अगर पत्रकारिता की सही पढ़ाई करवाए तो ये पूरी लड़ाई मीडिया की ताकत के ‘सही उपयोग’ की केस स्टडी के तौर पर भी पढ़ाई जा सकती है. ये वो दौर था जब ‘मीडिया ट्रायल’ और ‘मीडिया एक्टिविज्म’ अक्सर दोषी को सजा दिलाने के लिए काम करते थे और इनकी बुनियाद ठोस पत्रकारिता हुआ करती थी. आज की तरह चौकीदार से लेकर डिलीवरी बॉय तक के मुंह में माइक ठूंसने वाली पत्रकारिता नहीं.

फिर जब मीडिया का चरित्र बदला और दर्शकों के मुंह से सनसनीखेज टेबलॉयड न्यूज का स्वाद लगा तो मीडिया ट्रायल और मीडिया एक्टिविज्म ने उस दु:स्वप्न का रूप ले लिया जो घोर महिला विरोधी बनता चला गया. वो सत्ता से सवाल करने में डरने लगा, कॉन्सपिरेसी थ्योरीज से प्यार करने लगा, अतिनाटकीयता और आक्रामकता उसके प्रमुख हथियार हो गए, और पत्रकारिता के सिद्धांत अपने काम की बुनियाद बनाने की जगह आम नागरिकों को खोज-खोजकर वो उनके मुंह में माइक और शब्द ठूंसने लगा. इसका पहला शिकार बने आरुषि तलवार मर्डर केस में राजेश और नूपुर तलवार और अब तकरीबन वही मीडिया सर्कस, उसी द्वेष और भयावहता के साथ, रिया चक्रवर्ती को अपना शिकार बना रहा है.

हाल ही में अपना पक्ष रखने के लिए रिया चक्रवर्ती ने भी कुछ इंटरव्यूज दिए. हमारा कानून कहता है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो जाए तब तक हर किसी को अपना पक्ष रखने का हक है. तो फिर रिया चक्रवर्ती को ये हक क्यों न दिया जाए? इस मीडिया ट्रायल में, उनके अलावा लगभग सभी ने अपना-अपना पक्ष पिछले कुछ महीनों से टीवी चैनलों के समक्ष रखा है, तो उन्हें ये स्पेस क्यों नहीं मिलना चाहिए? सोशल मीडिया पर कइयों ने कहा कि उनके ये इंटरव्यूज स्क्रिप्टिड थे. कइयों ने कहा कि मुश्किल सवाल नहीं पूछे गए. कइयों ने कहा कि हर इंटरव्यू में शब्दश: एक-से जवाब दिए गए. कइयों ने कहा कि नाटकीयता अधिक थी क्योंकि ‘सुशांत मेरे सपने में आए और अपनी बात रखने को कहा’ जैसी हास्यास्पद बातें रिया ने बोलीं. लेकिन, जो कायदे की बातें रिया ने बोलीं वो ‘तकरीबन’ हर उस सवाल का जवाब देने वाली थीं जो इतने दिनों से लगातार मीडिया ट्रायल का हिस्सा बनते रहे हैं.

एक से लेकर पौने दो घंटे के इंटरव्यूज देना आसान नहीं होता, वो भी तब जब आपसे हर वो संभव सवाल पूछा जाए जो इस केस से जुड़ा हो. एनडीटीवी 24*7 को दिया इंटरव्यू तो एक घंटे का होने के अलावा लाइव भी था और इसमें रिया ने कुछ उन सवालों के जवाब भी दिए जो राजदीप सरदेसाई को पहले दिए इंटरव्यू के बाद सोशल मीडिया पर लगातार पूछे जा रहे थे. जैसे हवाई जहाज में ट्रैवल करने में सुशांत को लगने वाले डर से जुड़ा काउंटर-सवाल. बाद में चलकर 2015 का एक पुराना वीडियो भी सामने आया जिसमें सुशांत क्लॉस्ट्रोफोबिक होने की बात खुद स्वीकार रहे हैं.

यानी कि अगर आप एक तटस्थ दर्शक बनकर देखें, तो रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यूज भले ही कुछ सवाल अनुत्तरित छोड़ देते हैं, सत्रह हजार ईएमआई भरने जैसे कुछ अधूरे जवाब भी पेश करते हैं, और कुछ सवाल पूछे भी नहीं जाते. जैसे उन्होंने इतना महंगा वकील कैसे हायर किया. लेकिन फिर भी इन सभी इंटरव्यूज में रिया अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए कई सारी बेवजह की कॉन्सपिरेसी थ्योरीज की रीढ़ तोड़ती हुई नजर आती हैं. साथ ही वे कुछ ऐसे सवाल भी उठाती हैं जो लॉजिकल हैं और सीबीआई के लिए आगे की दिशा तय कर सकते हैं. ऐसा ही कुछ उन ऑडियो टेप्स से भी समझ आता है जिसमें सुशांत अपने भविष्य की प्लानिंग करते हुए सुनाई दे रहे हैं और रिया इनमें उनकी मदद ही करती हुई मालूम होती हैं. इस टेप में खुद सुशांत साफ तौर पर कह रहे हैं कि उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर है जिस वजह से वे अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते हैं.

मगर इन कायदे के इंटरव्यूज को क्यों हमारा समाज और मीडिया पचा नहीं पा रहा? हो सकता है कि रिया चक्रवर्ती गुनहगार हो और उन पर लग रहे सारे इल्जाम और कॉन्सपिरेसी थ्योरीज सही हों. उस सूरत में उन्हें यकीनन सजा होनी चाहिए लेकिन इसका फैसला तो कानून करेगा न. और जब तक वो फैसला नहीं आ जाता क्यों हमारा मीडिया और ऑनलाइन समाज रिया चक्रवर्ती की बातों को एक दूसरा पक्ष मानकर स्वीकार नहीं कर रहा? जिस तरह का ऑनलाइन हेट उन्हें इन इंटरव्यूज और ऑडियो और चैट स्क्रीनशॉट्स के सामने आने से पहले और बाद में लगातार मिल रहा है वो हमारे इस समाज के बारे में आखिर क्या बता रहा है?

आप इस आलेख में ‘मीडिया ट्रायल’ से जुड़े ऊपर वर्णित तीनों उदाहरणों के महिला पात्रों की जिंदगियों पर गौर कीजिए. जेसिका लाल हत्याकांड पर 1999 से लेकर 2006 तक समाज में जो चिंतन होता था उसमें भी जेसिका लाल के कैरेक्टर को लेकर तमाम वाहियात सवाल उछाले जाते थे. एक मॉडल इतनी रात गए लोगों को शराब क्यों सर्व कर रही थी वगैरह वगैरह. वो तो शुक्र है तब सोशल मीडिया और आज के वक्त का उन्मादी टीवी मीडिया नहीं था. वर्ना सोच कर देखिए, कि क्या जेसिका लाल के खिलाफ भी वैसा ही नेरेटिव नहीं खड़ा किया जा सकता था जैसा आज रिया चक्रवर्ती के खिलाफ किया जा रहा है? आज रिया चक्रवर्ती को विषकन्या से लेकर डायन, काला जादू करने वाली बंगालन और अमीर बॉयफ्रेंड का पैसा हड़पने वाली गोल्ड डिगर गर्लफ्रेंड तक बोला जा रहा है, तो क्या ग्लैमरस मॉडल जेसिका लाल को बख्श दिया जाता?

आरुषि तलवार हत्याकांड में भी आप मीडिया की भूमिका पर गौर कीजिए. तब भी सुशांत सिंह राजपूत केस की तरह तलवार दंपति के यहां काम करने वालों से लेकर पड़ोसियों तक पर टीवी मीडिया टूट पड़ा था और रात-दिन हमारे टेलीविजन पर अंजान लोगों के मुंह में माइक ठूंस कर यह नेरेटिव बनाया गया था कि राजेश तलवार और नुपूर तलवार ने ही अपनी बेटी आरुषि की हत्या की है. ये उन्माद इस चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया था कि एक दिन किसी अंजान शख्स ने टीवी मीडिया की बातों को सच मानकर कोर्ट में राजेश तलवार को चाकू से घायल तक कर दिया. लेकिन इसकी पड़ताल करने वाली पुलिस से लेकर सीबीआई तक की भूमिका पर कई सवाल उठते रहे, और 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजेश और नूपुर तलवार को बरी तक कर दिया. इसके बाद 2018 में सीबीआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया और तब से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. लेकिन सनद रहे कि 2008 में हुआ ये हत्याकांड आज भी अनसुलझा ही है.

आरुषि तलवार हत्याकांड के दौरान हुए मीडिया ट्रायल ने आरुषि की मां नूपुर तलवार की जिंदगी भी दोजख की थी. आखिर में रिया चक्रवर्ती की तरह उन्हें भी टीवी स्टूडियोज के चक्कर लगा-लगाकर खुद के निर्दोष होने की पैरवी करनी पड़ी थी और तब भी हमारा समाज यही कहता था जो आज रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यूज देखकर कह रहा है. देखो तो बिलकुल भी भावुक नहीं हो रही है. देखो तो कैसे रटे-रटाए जबाव दे रही है. देखो तो नेरेटिव चेंज करने की कोशिश कर रही है. देखो तो चेहरे पर कितनी कठोरता है अपनी बेटी के जाने का गम तक नहीं. और उस मीडिया ट्रायल में सिर्फ नूपुर तलवार जलील नहीं हुईं, बल्कि जिस तरह की बातें मीडिया और पुलिस ने भी आरुषि और हेमराज और उनके पिता राजेश तलवार के बीच के रिश्तों पर कहीं, उन बातों ने 14 वर्षीय आरुषि की यादों को भी खराब किया. ठीक वैसे ही जैसे आज का मीडिया ट्रायल सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी यादों का मोंटाज लगातार खराब तस्वीरों से भर रहा है.

पश्चिम का एक कुख्यात मीडिया ट्रायल भी उदाहरण है कि मीडिया और समाज संस्थागत रूप से कितने महिला विरोधी होते हैं. नाम है, अमांडा नॉक्स मीडिया ट्रायल. 21 साल की अमेरिकी छात्र अमांडा नॉक्स जो कि पढाई करने के लिए इटली गई थी, उसे 2007 में अपनी फ्लैटमेट की हत्या का दोषी माना जाता है और 2009 में इटली में ही 26 साल की सजा सुनाई जाती है. इस बीच इटली का मीडिया और उसके पीछे-पीछे वैश्विक मीडिया भी अमांडा नॉक्स को मर्डरर, मैन-ईटर, साइकोपैथ बनाकर दर्शकों के सामने पेश करता है और अदालत में मुकदमा चलने से पहले ही दुनिया भर में वे हत्यारन घोषित कर दी जाती हैं. लेकिन बाद में चलकर इस केस में कई मोड़ आए और आखिरकार 2015 में जाकर इटली की ही अदालत ने उन्हें हमेशा के लिए बरी किया. इस केस पर फिल्म भी बनी और नेटफ्लिकस की एक डॉक्युमेंटरी भी और हर एक माध्यम में इस केस की आलोचना बेसिर-पैर के मीडिया ट्रायल और उसके दुष्परिणामों को लेकर होती रही है.

आज जो 28 वर्षीय रिया चक्रवर्ती के साथ हमारा मीडिया और समाज कर रहा है वो भी उतना ही गलत है जितना ऊपर वर्णित उदाहरणों में दर्ज महिलाओं के साथ समय-समय पर मीडिया और समाज करता रहा है. अगर रिया चक्रवर्ती सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जिम्मेदार हैं भी, तब भी मीडिया ट्रायल का ये तरीका कैसे सही हो सकता है और अगर वे गुनहगार नहीं निकलीं तब तो और भी हमें अपने गिरेबां में झांककर देखने की जरूरत पड़ने वाली है. हमारा उन्मादी मीडिया क्या करेगा अगर सीबीआई ने रिया चक्रवर्ती को सुशांत की हत्या का दोषी नहीं माना तो? क्या वो सरेआम माफी मांगेगा और उसके खुद के पत्रकार वैसे ही अपने एंकरों के मुंह में माइक ठूंसेंगे जैसे वे इन दिनों रोज करते पाए जाते हैं? नहीं! वे सबकुछ भूल कर किसी और झुनझुने को बजाने निकल पड़ेंगे.